स्वामी दयानन्द सरस्वती और भारतीय राष्ट्रवाद

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स्वामी दयानन्द सरस्वती

स्वामी दयानन्द सरस्वती और भारतीय राष्ट्रवाद

(DAYANAND AND INDIAN NATIONALISM)

“वे (स्वामी जी) पुनर्निर्माण और राष्ट्रीय संगठन के सर्वाधिक प्रबल पैगम्बर थे।”

-रोम्याँ रोला

महर्षि दयानन्द ने भारतीयों के हृदय में स्वधर्म और स्वदेश के प्रति स्वाभिमान उत्पन्न करने और देश में नवजागरण का मन्त्र फूंकने का महान् कार्य किया । मूल रूप से वे राजनीतिक चिन्तक नहीं थे और न ही उन्होंने किन्हीं राजनीतिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया, तथापि उनके चिन्तन और व्यवहार की रग-रग में भारत के प्रति उत्कट प्रेम भरा था। वे भारतीय राष्ट्रवाद के नि:संदिग्ध रूप में अनन्य पुजारी थे। उनके राजनीतिक विचारों की झलक हमें उनके दो ग्रन्थों-‘सत्यार्थ प्रकाश’ एवं ‘ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका’ में मिलती है जिनमें एक-एक अध्याय राजनीतिक विचार मन्थन पर है।

(1) स्वामी दयानन्द ने ऐसे समय में भारतीय राष्ट्रवाद में प्राण फूंके और देशवासियों को नवजागरण का सन्देश दिया जब भारत पर ब्रिटिश साम्राज्य का शिकंजा कसता जा रहा था, ईसाई सभ्यता देश की. पुरातन संस्कृति पर छाती जा रही थी और अनेक अग्रणी समाज सुधारक भी ईसाई प्रभाव से आक्रान्त थे। ऐसे विकट और अवसादग्रस्त समय में महर्षि दयानन्द हिन्दू पुनरुत्थानवाद के उग्र प्रवक्ता बने। उन्होंने पश्चिम की चकाचौंध से प्रभावित देशवासियों में अपनी संस्कृति की महानता भरी और बाहर की ओर झाँकती हुई उनकी मनोवृत्तियों को पीछे धकेलकर उनमें देश के प्रति अनुराग जगाया । दयानन्द ने देशवासियों के सम्मुख भारत की महिमा के गीत गाये और कहा कि आर्यावर्त (भारत) एक ऐसा देश है जिसके समान भूगोल में (विश्व में) कोई दूसरा देश नहीं है। भारत देश ही सच्चा ‘पारस-मणि’ है जिसे ‘लोहे रूपी दरिद्र विदेशी’ छूने के साथ ही सुवर्ण अर्थात् धनाढ्य हो जाते हैं।

दयानन्द ने भारतीयों के हृदय में यह भाव भरने का अथक प्रयास किया कि आर्य लोग ही ईश्वर के प्रिय लोग हैं, वेद ही उनकी वाणी है और भारत ही ईश्वर का प्रिय देश है। अन्य सारे धर्म अपूर्ण हैं तथा आर्य समाज और देशवासियों का कर्तव्य है कि दूसरे धर्मों के मानने वालों को हिन्दू बनाए। वास्तव में “दयानन्द प्रथम हिन्दू समाज-सुधारक थे जिन्होंने बचाव की नीति छोड़कर हमला शुरू कर दिया, जिन्होंने हिन्दू धर्म को ईसाई और मुसलमान आलोचकों के हमले से बचाने का चाव, उनसे उनकी ही जमीन पर लड़ना स्वीकार किया, ताकि उन्हें अपनी स्थिति बचाने की फिक्र हो ।” स्वामी दयानन्द का विश्वास था कि विदेशी तत्वों को मुँह तोड़ उत्तर देने, हिन्दू धर्म और अपनी संस्कृति की महानता प्रस्थापित करने और देशवासियों में स्वाभिमान जाग्रत कर उठ खड़े होने की प्रबल लहर पैदा कर देने में ही हिन्दुओं, देशवासियों और भारत देश का कल्याण है। उन्होंने सन्देश दिया कि केवल वैदिक धर्म ही सत्य और सार्वदेशिक है। उन्होंने नारा दिया कि “वेदों के युग में लौट चलो ।’ दयानन्द को “उनके पुनरुत्थानवाद के कारण कभी कभी प्रतिक्रियावादी कह दिया गया है और यह मान लिया गया है कि उनका आग्रहपूर्ण वेदवाद प्रगति-विरोधी नारा था किन्तु जिस महान् शक्ति तथा उत्साह से दयानन्द का व्यक्तित्व बना था वह निष्क्रियता के कार्यक्रम से सन्तुष्ट नहीं हो सकता था। वे कर्मवादी थे, न कि कोरे कल्पनाशील विचारक और उनके वेदवाद का उद्देश्य देश की शक्ति की अभिव्यक्ति को अनुप्रेरित करना था। वस्तुतः वे लड़ाकू हिन्दुस्तान के आक्रामक समर्थक थे किन्तु जिस लडाकूपन का परिचय दयानन्द और आर्य समाज ने दिया वह अंशतः इस्लाम और ईसाइयत इन दो सामी (सेमेटिक) धार्मिक समुदायों के मदोन्मत्त रवैये के विरुख सन्तुलन कायम रखने का एक साधन था। इतिहास के महान् आन्दोलन प्रायः अतीतमुखी हुआ करते हैं। यूरोप के पुनर्जागरण तथा धर्म सुधार आन्दोलन ने क्रमश: अरस्तू और बाइबिल की ओर देखा और फ्रांस की क्रान्ति ने यूनान तथा रोम के गणतन्त्रवाद से प्रेरणा ली। उसी प्रकार दयानन्द का वैदिक आदर्शवाद कर्म की प्रेरणा देने के लिए था। रानाडे, विवेकानन्द और गाँधी की भाँति दयानन्द भी अनुभव करते थे कि धर्म ने ही भारत की महान् विपत्तियों के समय रक्षा की है।”

(2) हिन्दु पुनरूत्थानवाद के माध्यम से भारतीय राष्ट्रवाद को जगाने के लिए स्वामी दयानन्द ने अविवेक, अन्धविश्वासों और रूढ़िवादिता से डटकर लोहा लिया तथा सत्य के मन्दिर की स्थापना करनी चाही। उन्होंने आर्य समाज के सामाजिक आचार और नैतिक सिद्धान्तों की जो संहिता बनाई उसमें भी जन्मना, जात-पाँत, मनुष्यों में असमानता और खियों तथा पुरुषों में विषमता की गुंजाइश नहीं थी। रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार स्वामी दयानन्द ने नये भारत के पथ का निर्माण किया और ऐसे सीधे तथा निष्कंटक रास्ते की ओर संकेत किया जिसमें हिन्दू धर्म के व्यक्ति सरल और विवेकपूर्ण जीवन चला सके। दयानन्द ने लोगों में स्वाभिमान की भावना जाग्रत की, उनको मानसिक रूप से चेताया, उनमें अपने गौरवशाली अतीत के प्रति उत्साह जगाया और इन सभी बातों से भारतीय राष्ट्रवाद को सम्बल मिला । वस्तुतः दयानन्द ने यह भाँप लिया था कि भारतीय राजनीतिक दृष्टि से पूर्व ही मानसिक दृष्टि से परतन्त्र हो चुके थे और जब तक मानसिक परतन्त्रता से उन्हें छुटकारा नहीं दिलाया जाएगा तब तक आर्थिक-राजनीतिक सामाजिक परतन्त्रता के विनाश का मार्ग साफ नहीं होगा। अतः उन्होंने अपने ओजस्वी विचारों से देश को मानसिक जड़ता से मुक्ति दिलाने का अथक प्रयत्न किया । भारतीय राष्ट्रवाद के उत्थान की दिशा में यह एक बहुत ही दूरदर्शी और प्रेरणापूर्ण कदम था। स्वामी दयानन्द ने खुले तौर पर स्वीकार किया कि भारत में ब्रिटिश शासकों में श्रेष्ठतर सामाजिक कुशलता है, उनकी अधिक उत्तम सामाजिक संस्थाएँ हैं, उनमें आत्म-त्याग, सार्वजनिक सेवा, उत्साह, अनुशासन और देशभक्ति की भावना है। उन्होंने भारतीयों को सन्देश दिया कि वे अपने राष्ट्रीय और सामाजिक चरित्र को अनुकरणीय बनाएँ।

(3) महर्षि दयानन्द ने ‘सत्यार्थ प्रकाश‘ में स्वराज्य का आदर्श रूप प्रस्तुत किया जिसने देशवासियों को प्रेरणा दी। उन्होंने देशवासियों का ध्यान इस ओर दिलाया कि भारत (आर्यावत) में भी इस समय आर्यों का अखण्ड, स्वतन्त्र, स्वाधीन और निर्भय राज्य नहीं है तथा जो कुछ भी है वह भी विदेशियों से पदाक्रान्त हो रहा है। उन्होंने कहा कि दुर्दिन जब आता है तब देशवासियों को अनेक प्रकार के दुःख भोगने पड़ते हैं। कोई कितना ही करे, लेकिन जो स्वदेशी राज्य होता है वह सर्वोपरि एवं सर्वोत्तम होता है। विदेशियों का राज्य, चाहे वह मत-मतान्तर के आग्रह से रहित हो, अपने और पराये के पक्षपात से शून्य हो, प्रजा पर पिता के समान कृपा रखने वाला हो और न्याय तथा दयापूर्ण हो, कभी भी पूर्ण सुखदायक नहीं हो सकता। दयानन्द ने इस प्रकार के मार्मिक और भावोत्तेजक शब्दों में स्वदेशी राज्य का गौरवदान करके भावी राष्ट्र निर्माताओं के लिए प्रेरणा और अनुकरणीय आदर्श प्रस्तुत किया। वे देश की स्वतन्त्रता के लिए इतने व्याकुल थे कि अपनी प्रार्थनाओं तक में वे यही कामना करते थे। अपनी पुस्तक ‘आर्याभिविनय’ की प्रार्थनाओं में उन्होंने ईश्वर से यह कामना की है कि “दूसरे देशों के राजा हमारे देश में कभी न हों, और हम कभी पराधीन न हों” तथा “हम पर सहाय करो जिससे सुनीतियुक्त होकर हमारा स्वराज्य अत्यन्त बढ़े।”

स्वामी दयानन्द के लिए सम्पूर्ण भारत उनका घर था और प्रत्येक देशवासी के मन में वे भारत की सेवा करने की जिज्ञासा और आकाँक्षा भर देना चाहते थे। उनका कहना था कि इस देश की मिट्टी में पलकर ही हम इतने बड़े हुए हैं, अतः हमारा कर्तव्य है कि हम तन-मन-धन से अपने देश की सेवा ठीक उसी प्रकार करें जिस प्रकार वह हमारी सेवा मौन भाव से कर रहा है। भारत को एक सशक्त राष्ट्र देखने की इच्छा से, देश को निकट भविष्य में स्वतन्त्रता प्राप्ति की राह पर दृढ़तापूर्वक गति देने के उद्देश्य से, दयानन्द ने कठोर जाति प्रथा पर प्रहार किया और पृथकता तथा अस्पृश्यता पर चोट की। उन्होंने यह भाँप लिया कि फूट और जात-पाँत ने हिन्दुओं के लिए बाह्य शत्रु के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बनाना असम्भव-सा कर दिया है। अतः उन्होंने सन्देश दिया कि यदि हमें व्यक्तिगत तथा सामूहिक रूप से प्रगति करनी है तो हमारे जीवन के नियमों और आदर्शों में परिवर्तन होना चाहिए। अस्पृश्यता के विरुद्ध उनका युद्ध भारत के लिए, भारत की एकता के लिए एक महान् देन कही जाएगी।

(4) राष्ट्रीय आन्दोलन में भारतीय राष्ट्रवाद के जागरण में स्वामी दयानन्द की एक महत्वपूर्ण देन यह थी कि उन्होंने उसी युग में भारत की एक सम्पर्क भाषा की कल्पना राष्ट्र-भाषा के रूप में कर ली थी। गाँधीजी और सरदार पटेल से भी पहले स्वामी दयानन्द ने गुजरात में यह आवाज लगाई थी-देश को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए हिन्दी का पूरे देश में प्रचलन आवश्यक है। स्वामी जी की मातृभाषा गुजराती थी और उनका अध्ययन संस्कृत के माध्यम से हुआ था, पर इतने पर भी उन्होंने अपने ग्रन्थों का माध्यम हिन्दी को ही चुना है। डॉ० अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ‘Thoughts on Pakistan’ में स्वामी जी की हिन्दी को एक आदर्श शैली मानकर लिखा है-“ऐसी हिन्दी ही देश की राजभाषा होनी चाहिए। उसमें न तो संस्कृत के शब्दों की भरमार है और न ही बलात् कोई शब्द अरबी-फारसी या उर्दू से उसमें थोपा गया कहीं दिखाई देता है।”

स्वामी जी के अंग्रेजी ज्ञान की अनभिज्ञता पर ब्रह्म समाज के एक नेता ने कलकत्ते में एक बार उनसे कहा-क्या यह अच्छा होता है जो आपने अंग्रेजी भी पढ़ी होती। स्वामी जी ने पूछा-उससे क्या होता ? इस पर वे बोले-वैदिक ज्ञान की जिस गरिमा का बखान आप यहाँ कर रहे हैं उसका विदेशों में भी प्रचार होता। स्वामी जी हँस कर बोले-लेकिन एक भूल आपसे भी हुई है जो आपने संस्कृत नहीं पढ़ी। यदि आप संस्कृत जानते तो हम सब मिलकर देश का सुधार करते और बाद में विदेशों की ओर मुँह उठाते । ज्ञान का दीपक अपने घर में ही यदि प्रकाश न कर सका तो दूसरों के घर में कैसे वह उजाला करेगा ? उन दिनों जब अंग्रेजी शासन अपने पूरे यौवन पर था और यातायात के साधन भी इतने विकसित नहीं थे, तब कश्मीर से कन्याकुमारी तक स्वामी जी ने हिन्दी के माध्यम से पूरे देश को नव-जागरण का मन्त्र दिया था ।

स्वामी दयानन्द ने हिन्दी को राष्ट्रीय एकता का माध्यम माना। “मृत्यु से कुछ ही दिन पूर्व उदयपुर रियासत के दीवान मोहनलाल विष्णुलाल पाण्ड्या ने स्वामी जी से देश की एकता पर बात करते हुए पूछा-आपकी राय में उसके मुख्य आधार क्या हो सकते हैं ? स्वामी जी ने कहा-जिस देश में एक भाषा, एक धर्म और एक वेशभूषा को महत्व नहीं मिलेगा उसकी एकता बराबर लड़खड़ाती ही रहेगी। आप लोग रियासतों का अपना सारा कारोबार देवनागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिन्दी में प्रारम्भ कीजिए, फिर देखिए उसके कितने अच्छे परिणाम सामने आते हैं।”

(5) स्वामी दयानन्द का क्षेत्र राजनीति नहीं था, पर उन्होंने भाँप लिया कि 1857 की क्रान्ति में असफलता का एक प्रमुख कारण यह था कि तत्कालीन देशी रियासतें तटस्थ रहीं। अत: उन्होंने देशी रजवाड़ों को अपना प्रमुख कार्य क्षेत्र बाद में बनाया और वहाँ सामाजिक-राजनीतिक चेतना जगाने का कार्य किया। “राजा-महाराजाओं में स्वदेशाभिमान जगाने वाले इस साधु की गतिविधियों से ब्रिटिश सरकार परेशान थी ।” भारतीय राष्ट्रवाद को सबल बनाने के लिए महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में भारतीय नरेशों के व्यक्तिगत जीवन में सुधार लाने का भी बड़ा प्रयत्न किया । “थोड़े से समय के अन्दर ही बड़ौदा, उदयपुर, जोधपुर, इन्दौर, कोल्हापुर तथा शाहपुरा राज्य के नरेशों के जीवन में उनके उपदेशों से जो सुधार हुआ उसका हितकर परिणाम उनके व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक जीवन में प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर होने लगा और उनके राज्यों की व्यवस्था भी सुधरने लगी।”

(6) भारतीय राष्ट्रवाद को प्रोत्साहन स्वामी दयानन्द द्वारा स्वदेशी की हिमायत से भी मिला । उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग करना प्रत्येक व्यक्ति का एक धार्मिक कर्त्तव्य बताया। स्वदेशी वस्तुओं के निर्माण और प्रयोग को प्रोत्साहन देने में स्वामीजी वस्तुतः महात्मा गाँधी के अग्रदूत थे और उनके इस कदम ने भारतीय जीवन के राजनीतिक पक्ष को बहुत अधिक प्रभावित किया।

(7) स्वामी दयानन्द ने निर्भीकता का पाठ पढ़ा कर भारतीयों को विदेशी प्रभुत्व से टक्कर लेने की शक्ति दी। उन्होंने स्पष्ट रूप से इस बात पर बल दिया कि केवल निर्भीकता ही, अपने राजनीतिक स्वरूप में, एक ऐसी शक्ति है जो निरंकुश साम्राज्यवाद के विरुद्ध खड़ी हो सकती है। उन्होंने इस तरह प्रकट किया कि मानव-अधिकारों की प्राप्ति केवल निर्भीकता और साहस से ही हो सकती है। उन्होंने इस बात का प्रत्येक प्रयत्न किया कि भारतवासी अपना आत्मबल बढ़ाएँ और निर्भय होकर विदेशी प्रभुत्व के विरुद्ध खड़े हों। स्वामी दयानन्द के ये विचार स्वतन्त्रता की भावना से ओत-प्रोत थे। वस्तुतः “दयानन्द का स्वतन्त्रता के प्रति तीव्र अनुराग था, और उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व उसके लिए तड़पा करता था ।”

महर्षि दयानन्द के इन विचारों और कार्य-कलापों से स्पष्ट है कि वे उस राष्ट्रवादी परम्परा के जनक थे जिसका चरमोत्कर्ष हम लोकमान्य तिलक, बिपिनचन्द्र पाल, अरविन्द और लाजपत राय में देखते हैं। कई महत्वपूर्ण बातों में तो वे महात्मा गाँधी के अग्रवाह थे। उनके द्वारा संस्थापित आर्य समाज यद्यपि विशुद्ध रूप से गैर-राजनीतिक संस्था थी और है, किन्तु देश में राष्ट्रीय चेतना के जागरण और प्रसार की दिशा में वह एक प्रबल शक्ति बन गई। “दयानन्द ने जो आन्दोलन शुरू किया, उससे आत्म-निर्भरता की भावना उत्पन्न हुई और भारतीयों में आत्म-सम्मान की भावना का जोर पहुँचा ।” वेलेन्टाइन शिरोल के इस मूल्यांकन में कोई अतिरंजना नहीं है कि दयानन्द की समग्र प्रवृत्ति जनता को विदेशी प्रभावों के विरुद्ध करने की थी। डॉ० ग्रीसवाल्ड ने कहा था कि स्वामी दयानन्द “बहुत सुन्दर स्वप्नों के द्रष्टा थे। वे ऐसे भारत का स्वप्न देखते थे, जो कुसंस्कारों से शुद्ध हो, विज्ञान से पूरा लाभ उठाए और एक ईश्वर पूजा करे, आत्म-शासित हो एवं उसे दुनियाँ के राष्ट्रों में उचित स्थान मिले तथा उसके प्राचीन गौरव का पुनरुद्धार हो ।”

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