राजा राममोहन राय का जीवन परिचय

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राजा राममोहन राय

इस लेख क द्वारा दो प्रश्नो का उत्तर मिल जायेगा-

“भारत में उदारवादी आन्दोलन का आरम्म राजा राममोहन राय से हुआ।” इस कथन की विवेचना कीजिए।

अथवा

इस कथन की व्याख्या कीजिए कि “राजा राममोहन राय आधुनिक भारत के जनक और भारतीय पुनर्जागरण के वास्तविक प्रतिनिधि थे।”

राजा राममोहन राय

राजा रामोहन राय को आधुनिक भारतीय चिन्तन का सिरमौर कहा जाता है। सोफिया फालेट ने उन्हें भारतीय इतिहास में एक सजीव ऐसे पुल के रूप में देखा है जिसके ऊपर होकर भारत अपने असीम अतीत से निकल कर अज्ञात भविष्य की ओर अग्रसर होता है। वास्तव में राजा राममोहन राय आधुनिकता के प्रर्वतकों में प्रथम थे जिन्होंने न केवल सृजनात्मक सुधारवाद का झण्डा गाड़ा बल्कि जिन्होंने भारतीय चिन्तन में आधुनिक प्रवृत्ति और प्रभाव को गुणात्मक स्तर प्रदान किया । गोरी सरकार की व्यापक साम्राज्यवादी योजना के बावजूद उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर सुधार की माँग की। उन्होंने अकर्मण्यता, भाग्यवाद, विघटन आदि के विरोध में प्रबल आवाज उठाई और देश की दलित तथा विघटित सामाजिक व्यवस्था को झकझोर दिया। उनका चिन्तन कोरा शून्यवादी न था बल्कि उन्होंने व्यावहारिक विकल्प प्रस्तुत किये और यही कारण है कि उनको आधुनिक भारतीय सामाजिक एवं राजनीतिक चिन्तन का जनक कहा जाता है। उनको भारतीय इतिहास में आधुनिक युग का अग्रदूत कहना इसी तथ्य से सार्थक है कि उनके बाद कोई डेढ़ सौ वर्षों के समय में हमने जितने महान् प्रयास किये, उनके विचारों और कार्यों में पूर्वाभास विद्यमान था।

राजा राममोहन राय का जीवन-परिचय

(LIFE-SKETCH)

राजा राममोहन राय (1772-1833) का जन्म बंगाल के हुगली जिले के राधानगर ग्राम में हुआ था। उनके प्रपितामह कृष्णचन्द्र बनर्जी बंगाल के नवाब की सेवा में थे और उन्हें ‘राय’ की उपाधि प्राप्त हुई थी। तब से ‘राय’ शब्द परिवार के सभी सदस्यों के नाम के साथ जुड़ गया था। राममोहन राय के पिता रमाकान्त राय थे और माता का नाम तारिणी देवी । परिवार में ही उन्हें पिता से वैष्णव एवं माता से शक्ति प्रभाव प्राप्त हुए। पिता रमाकान्त राय ने पुत्र को अच्छी शिक्षा दिलाने में किसी प्रकार की कोर-कसर न रखी।

राजा राममोहन राय बाल्यकाल से ही प्रतिभा के धनी थे। वह बहुभाषाविद् थे। छ: से नौ वर्ष की उम्र में उन्होंने बंगाल और फारसी सीखी। दस से तेरह वर्ष की उम्र में उन्होंने अरबी और हिन्दी सीखी। तेरह से पन्द्रह वर्ष के बीच में उन्होंने संस्कृत का ज्ञान प्राप्त किया। सैंतीस से बयालीस वर्ष की उम्र में अंग्रेजी, सैंतालीस से उनचास के बीच ग्रीक और हेब्रू तथा उनसठ से साठ के बीच उन्होंने फ्रेंच और लैटिन सीखी। कम से कम पूर्व लिखित छ: भाषाओं में उन्हें सहजता और दक्षता के साथ अपने भावों को अभिव्यक्त कर सकने की क्षमता प्राप्त थी। राममोहन राय को ‘राजा’ की उपाधि दिल्ली के मुगल सम्राट् द्वारा तब प्रदान की गई थी जब उसने उन्हें ब्रिटिश सम्राट् के समक्ष अपना मामला प्रस्तुत करने भेजा था।

राममोहन राय (1772-1833) उस वैचारिक क्रान्ति के सृष्टा थे, जिससे आधुनिक भारत का जन्म हुआ। उन्होंने इस देश को मध्ययुगीन दलदल में फँसा पाया और उसमें ऐसी जान फूंकी कि भारतीय विचार और जीवन की धारा ही बदल गई। राममोहन राय की प्रखर मेधा और प्रकाण्ड विद्वता, मानव सेवा की विवेकपूर्ण भावना एवं विश्वजनीन दृष्टि ये सभी पुनर्जागरण और धार्मिक सुधार एक साथ लाने में सहायक हुए। पहले ने हमारे बौद्धिक और सांस्कृतिक जीवन में प्रत्येक पहलू का स्पर्श किया और उसके रूप को बदला। दूसरे का प्रभाव बहुत दूरगामी था वैसा ही जैसा यूरोप में मार्टिन लूथर के धार्मिक सुधारों का था। “यदि पश्चिमी देशों में मार्टिन लूथर का कार्य ईसाइयों द्वारा स्मरणीय है, तो राममोहन राय की भगीरथ प्रयत्न उन्हें निश्चय ही हिन्दू-जाति के हित-कर्ताओं में ऊँचे पद पर प्रतिष्ठित करेंगे ।” जिस विद्वान ने राममोहन राय के विषय में ये पंक्तियाँ लिखी हैं, उसने केवल उत्साह में आकर उनकी प्रशंसा नहीं की है, यह एक गम्भीर आलोचक की उक्ति है। उनकी बुद्धि और चरित्र की कुछ विशेषताएँ-निस्सार को त्याग कर केवल सार वस्तु को ग्रहण करने की क्षमता, भावुकता-रहित तटस्थता और अविचल निश्चय शक्ति उनके जीवन में उत्तरार्द्ध में अधिक मुखरित हुई। परन्तु ये विशेषताएँ उनमें शुरू से ही मौजूद थीं। जब वे बालक थे, तभी हम उन्हें मूर्तिपूजा के औचित्य पर सन्देह व्यक्त करते हुए पाते हैं।

राजा राममोहन राय का कार्यक्षेत्र बहुमुखी था। उन्होंने सभी धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन प्रारम्भ किया तथा एक ओर सच्चे वेदान्ती के रूप में ईसाई मिशनरियों का प्रभाव बढ़ने से रोका तो दूसरी ओर अद्वैतवादी भारतीय दर्शन की परम्परा को पुनर्जीवित किया। धार्मिक सुधारक के रूप में उन्होंने विभिन्न धर्मों में प्रचलित रूढ़ियों और विधि- विधानों को छोड़ने पर बल दिया तथा एकेश्वरवाद के सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। वास्तव में इस्लामी अध्यात्म विद्या और समाजशास्त्र के अध्ययन ने उन्हें मूर्ति-पूजा तथा अनेकेश्वरवाद का कटु आलोचक बना दिया था। समाज सुधारक के रूप में राजा राममोहन राय ने एक क्रान्ति का सूत्रपात किया और बौद्धिक चेतना उत्पन्न की। उनके प्रयत्नों से ही सती प्रथा का अन्त हुआ। उनका यह कार्य ही अकेला उनकी पावन स्मृति को चिरस्थायी बनाने के लिए पर्याप्त है। उन्होंने विधवा विवाह, अन्तर्जातीय विवाह, यौवनारम्भ के उपरान्त विवाह आदि के पक्ष में जबरदस्त प्रचार किया। शिक्षाविद् के रूप में उन्होंने परम्परावादी पण्डितों का विरोध करते हुए आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा पद्धति को समर्थन प्रदान किया। वस्तुतः कोई ऐसा विषय शायद ही रहा हो, जो उनसे अछूता रह गया हो। जिस विषय का उन्होंने स्पर्श किया, उसे उन्होंने अलंकृत कर दिया और अपने बुद्धिवाद ने उन्हें बड़ा प्रभावित किया।

प्रकाण्ड पाण्डित्य तथा स्वाधीन चेतना की अमिट छाप छोड़ दी। यूरोपीय उदारवाद और राजा राममोहन राय ने समाज सुधार के कार्य को राजनीतिक जागृति के साथ जोड़ने का महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने अपने एक पत्र में यह स्पष्ट मत व्यक्त किया कि हिन्दुओं का धार्मिक व्यवहार उन्हें अपने राजनीतिक हितों की दृष्टि से विमुख कर रहा है। जाति-व्यवस्था और धार्मिक विधियों तथा धार्मिक संस्कारों की संकीर्णता ने हिन्दू समाज को खोखला बना दिया है और उसकी एकता को भंग कर दिया है। अत: आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दू समाज में सुधार कार्य इस प्रकार किये जाएँ कि वह अपने राजनीतिक महत्व को समझ सके । इस प्रकार राजा राममोहन राय ने एक युगदृष्टा के रूप में राष्ट्रीयता एवं लोकतन्त्र के विचारों को धर्म, समाज सुधार एवं राजनीतिक विकास से सम्बन्धित कर दिखाया। किन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं है कि राजा राममोहन राय केवल हिन्दू पुनरुत्थान के प्रतीक थे। वे सच्चे अर्थ में धर्म निरपेक्षतावादी थे। प्रमाण के रूप में एक अंग्रेजी पत्र का वह हास्य रूपक उद्धरित किया जा सकता है जिसमें राजा राममोहन राय को भारत का गवर्नर जनरल बनाने का सुझाव दिया गया था और यह लिखा गया था “राजा राममोहन राय न हिन्दू हैं, न मुसलमान हैं, न ईसाई हैं और ऐसी स्थिति में वे निष्पक्षता से गवर्नर जनरल का कार्यभार सम्हाल सकते हैं ।” इससे यह स्पष्ट है कि स्वयं अंग्रेज उन्हें एक निष्पक्ष भारतीय के रूप में मानते थे । राजा राममोहन राय ने 1821 में ‘संवाद कौमुदी’ पत्रिका के प्रारम्भ द्वारा वर्षों से सुप्त राजनीतिक चिन्तन को एक नई दिशा प्रदान की तथा इसके माध्यम से भारतीयों के प्रारम्भिक राजनीतिक अधिकारों की माँग प्रस्तुत की।

राजा राममोहन राय ने लगभग 10 वर्ष तक ईस्ट इण्डिया कम्पनी की नौकरी की। 1814 में उन्होंने नौकरी छोड़कर धार्मिक उत्थान और सत्य-शोधन के उद्देश्य से कलकत्ता में रहना शुरू कर दिया। यहाँ उनकी भेंट एच० एच० विल्सन, मैकाले, सर विलियम जोन्स, सर हाइड ईस्ट, एडम जैसे अंग्रेज विद्वानों से हुई। 1815 में उन्होंने ब्रह्मसूत्र का बंगला में अनुवाद प्रकाशित किया और 1816 में केन तथा ईशोपनिषद् का बंगला तथा अंग्रेजी अनुवाद । इस प्रकार 1818 तक उन्होंने कई संस्कृत ग्रन्थों के सम्बन्ध में अपनी व्याख्या प्रकाशित की। 1820 में राममोहन राय ने कई ईसाई धर्म-पुस्तकों पर अपनी व्याख्या प्रकाशित की जिसने काफी विवाद उत्पन्न कर दिया। नारी-अधिकार, भाषण-स्वतन्त्रता, समाचार-पत्रों की स्वतन्त्रता आदि के लिए उन्होंने निरन्तर संघर्ष किया। उन्होंने बंगला में ‘संवाद कौमुदी’ तथा फारसी में ‘मिरात-उल-अखबार’ नामक दो पत्र निकाले जिनमें साहित्यिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक और वैज्ञानिक विषयों पर लेख प्रकाशित होते थे।

राजा राममोहन राय ने 1815 में ‘आत्मीय सभा’ की, धर्म और दर्शन के विद्वानों की एक प्रकार की विचारगोष्ठी की, 1827 में ब्रिटिश इण्डिया यूनीटेरियन एसोसिएशन की और 1828 में ब्रह्म समाज की स्थापना की। ब्रह्म समाज की स्थापना राममोहन राय के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी और यद्यपि इसकी स्थापना के बाद वह केवल चार ही वर्ष जीवित रहे, तथापि “ब्रह्म समाज के विचार क्रमश: बंगाल से बाहर दूर-दूर तक फैल गये और उन्होंने उदारवाद, तर्कनावाद और आधुनिकता का वह वातावरण तैयार किया जिसने भारतीय चिन्तन में क्रान्ति उत्पन्न कर दी थी।

राजा राममोहन राय ने राजनीतिक समस्याओं के व्यावहारिक समाधान के लिए ऐतिहासिक पद्धति का प्रयोग किया। भारतीय इतिहास के कुशाग्र विद्वान के रूप में उन्होंने यह मत व्यक्त किया कि भारत में ईसा के लगभग दो हजार वर्ष पूर्व से ही सांविधानिक शासन-व्यवस्था प्रचलित थी, जिसमें ब्राह्मणों का कार्य विधि-

निर्माण करने का था तथा क्षत्रिय प्रशासक के रूप में थे। ब्राह्मणों ने विधि-निर्माण का कार्य स्वेच्छाचारिता से न करके लोकमत के आधार पर किया था। ब्राह्मणों ने क्षत्रियों की निरंकुशता पर भी नियन्त्रण बनाये रखा। किन्तु जैसे ही ब्राह्मणों ने पदलोलुपता के कारण सत्ता क्षत्रियों को समर्पित कर दी वैसे ही क्षत्रियों ने कार्यपालिका तथा व्यवस्थापिका सम्बन्धी कार्य अपने हाथ में केन्द्रित पर निरंकुशता का प्रारम्भ किया। गजनी तथा गौरी ने राजपूतों के आन्तरिक कलह का लाभ उठाकर भारतीयों को पराधीन बना दिया। राजा राममोहन राय के अनुसार निरंकुशता के अलावा भारतीय राजाओं की आपसी फूट तथा कायरता, युद्ध-कौशल की कमी तथा जनता में देशभक्ति के अभाव ने भारत को अहिंसा के मार्ग की ओर प्रवृत्त कर गुलामी की बेड़ियों में जकड़ दिया। राजा राममोहन राय न केवल भारतीय इतिहास के ज्ञाता थे अपितु यूरोप तथा अमेरिका के इतिहास का भी उन्हें अच्छा ज्ञान था। उनकी समस्त रचनाओं में यह ऐतिहासिक अनुभव परिलक्षित होता है। राजा राममोहन राय की निम्नलिखित कृतियों से हमें उनके राजनीतिक विचारों का पता चलता है-

  1. हिन्दू उत्तराधिकार कानून के अनुसार स्त्रियों के प्राचीन अधिकारों पर कतिपय आधुनिक अतिक्रमण सम्बन्धी टिप्पणियाँ (1822);
  2. प्रेस-नियमन के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय एवं सम्राट् को याचिका (1823);
  3. अंग्रेजी शिक्षा पर लॉर्ड एम्हर्स्ट के नाम एक पत्र (1823);
  4. ईसाई जनता के नाम अन्तिम अपील (1823);
  5. यूरोपवासियों को भारत में बसाने सम्बन्धी विचार (1831);
  6. प्राचीन एवं आधुनिक सीमाओं का संक्षिप्त विवरण तथा भारत का इतिहास (1832);
  7. भारत की न्यायिक एवं राजस्व व्यवस्था आदि पर प्रश्नोत्तर (1832);
  8. पत्र एवं भाषण आदि।

राजा राममोहन राय के विचारों पर मोन्थेको, ब्लेकस्टन तथा बेंथम की छाप स्पष्टतः दिखाई देती है। मोन्थेको के प्रभाव में उन्होंने शक्ति पृथक्करण तथा विधि के शासन को स्वीकार किया और अपने लेखों में इनका बारम्बार उल्लेख किया। इसी प्रकार बेंथम के शासन, नैतिकता एवं व्यवस्थापन सम्बन्धी विचारों का इन पर प्रभाव पड़ा। बेंथम के समाज में राजा रामोहन राय ने भी प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त का तिरस्कार किया। बेंथम के प्रभाव में राजा राममोहन राय ने भारत में दीवानी तथा फौजदारी दण्ड-संहिता निर्मित करने की जोरदार माँग प्रस्तुत की। कानून तथा नैतिकता के अन्तर एवं उपयोगितावाद से सम्बद्ध सिद्धान्त भी राजा ने बेंथम के प्रभाव में स्वीकार किये। इन्हीं आधार पर उन्होंने सती प्रथा की समाप्ति का आन्दोलन भारत में चलाया था। किन्तु कुछ अर्थों में वे बेंथम से भिन्न विचार भी रखते थे। वे बेंथम के इस विचार से सहमत नहीं थे कि मानव मात्र की समान आवश्यकताएँ होती हैं तथा इस अर्थ में सभी मानव समान हैं। राजा का यह अभिमत था कि भारत की जनता के लिए वे ही नियम तथा कानून उपयुक्त हैं जो कि यहाँ की मान्यताओं, रीति-रिवाजों तथा परिस्थितियों से मेल खाते हों। बेंथम के बाद ब्लेकस्टन का राजा राममोहन राय पर प्रभाव पड़ा। अंग्रेजी संविधान की गूढ विशिष्टताओं का ज्ञान प्राप्त कर राजा राममोहन राय ने भारत में नागरिक स्वतन्त्रता की माँग प्रस्तुत की। तत्कालीन भारत की स्थिति को देखते हुए राजा राममोहन राय ने भारत की राजनीतिक स्वतन्त्रता की माँग प्रस्तुत न करके न्याय, जीवन की सुरक्षा तथा सम्पत्ति सम्बन्धी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की बात कही।

15 नवम्बर, 1830 को राजा राममोहन राय समुद्री मार्ग से इंग्लैण्ड के लिए रवाना हुए। अप्रैल, 1832 में वे इंग्लैंड पहुँचे जहाँ उनका हार्दिक स्वागत किया गया। विख्यात अंग्रेज दार्शनिक और विधि सुधारक जर्मी बेंथम से उनकी घनिष्ठ मैत्री हुई तथा स्वयं ब्रिटिश सम्राट ने उनका सम्मान किया। उनके इंग्लैण्ड आवासकाल के समय प्रथम ‘सुधार अधिनियम’ पारित हुआ। “उन्होंने उसका स्वागत किया और कहा कि यह उत्पीड़न, अन्याय तथा अत्याचार पर स्वतन्त्रता, न्याय और सम्यकता की विजय है। राममोहन राय इंग्लैण्ड से फ्राँस गये जहाँ वे बीमार पड़ गये। वे पुनः इंग्लैण्ड लौट आये और 20 सितम्बर, 1833 को ब्रिस्टल में उनका स्वर्गवास हो गया।

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