इस्लामिक चिंतन

इस्लामिक चिंतन

इस्लामिक चिंतन और उसकी प्रमुख विशेषताएँ

उत्तरार्द्ध काल में राजनीतिक का मूल आधार मुस्लिम चिंतन ही रहा। इसका कारण यही था कि जिन्होंने केन्द्रीय सत्ता पर आधिपत्य बनाये रखा वे ईस्लाम के अनुयायी ही थे। चूंकि करीब-करीब सभी मुसलमान यहीं के थे और बलात धर्म परिवर्तन के द्वारा मुसलमान बनाये गये थे। वे मिली जुली संस्कृति के वाहक बने जो कि मुख्यत उत्तर भारत में व्याप्त थी। शहरों और कस्बों में रहने वाले गैर मुस्लिम भी इस मिश्रित संस्कृति के प्रभाव में थे।

जहीर मसूद कुरेशी के अनुसार इस्लामिक समुदाय के राजनीतिक साहित्य की चार मुख्य परम्परायें थी- प्रथम परम्परा विधिवेत्ताओं की थी, जिन्होंने शरियत को आधार बनाया। द्वितीय परम्परा में वह साहित्य आता है जिसमें किसी राजनीतिक सिद्धान्त के आधार पर शासकों को परामर्श दिया गया है। तीसरी प्रवृत्ति एक मात्र ऐतिहासिक समाज शास्त्री इब्र खाल्दुन की कृतियों में मिलती है जिनमें अनेक आधुनिक विचार भी हैं। कुरेशी का मत है कि प्लेटों और अरस्तू का फलसफा के राजनीतिक चिन्तन से मुकाबला करना सम्भवतः इस्लाम का दर्शन को सबसे बड़ा योगदान है यद्यपि इस पर आम सहमति नहीं है। चौथा, हिन्दू धर्म और इस्लाम के संघर्ष के बावजूद दोनों ने एक दूसरे को प्रभावित भी किया है। बुद्धिजीवियों और अभिजन वर्ग के स्तर पर शरियत के राजनीतिक धर्मशास्त्र का प्राचीन भारतीय धर्म की अवधारणा के राजनीतिक पक्ष से सम्पर्क आया जिससे एक दूसरे की मूल भावना को समझने में मदद मिली। जन साधारण के स्तर पर भक्ति और सूफीवाद कई स्थानों में समन्वय और कहीं कहीं संघर्ष भी नजर आया। सूफीवाद का जनसाधारण पर भक्ति आन्दोलन जितना व्यापक प्रभाव नहीं पड़ा।

मुस्लिम इतिहासकारों ने शरियत को दृष्टिगत रखते हुए राज्य शासन और प्रशासन का अध्ययन किया। उनमें से कुछ ने राजनीतिक चिन्तन की पृष्ठभूमि के रूप में धर्मशास्त्रों को भी अध्ययन सामग्री बनाया। उनका विचार बना कि शरियत और धर्मशास्त्र अपने में सम्पूर्ण हैं और दो व्यवस्थाओं के प्रतीक हैं। धीरे धीरे अनेक लेखकों ने इन दोनों के आधार पर इनमें समन्वय स्थापित करने का भी प्रयास किया जिससे बाद में मिलीजुली संस्कृति की पृष्ठभूमि के निर्माण में सहायता मिली। राजा राममोहन राय से लेकर गाँधी जी के चिन्तन पर इसका प्रभाव पड़ा है। स्वतंत्रता संग्राम में ब्रिटिशसत्ता के विरुद्ध संघर्ष हेतु हिन्दू मुसलमान को एक दूसरे के नजदीक आने और एक समान उद्देश्य की प्राप्ति हेतु संगठित होने में मिली जुली संस्कृति की अवधारणा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। ब्रिटिश काल में परकीय सत्ता द्वारा दोनों समुदायों में फूट डालों और राज करो की नीति अपनाने के कारण साम्प्रदायित कटुता से विभक्त भारत के पुनर्जागरण की दिशा में यह चिन्तन महत्वपूर्ण रहा है। धर्म निरक्षेपता, सर्वधर्म सम्भाव, सामाजिक बहुलवाद, धार्मिक सहिष्णुता आदि अवधारणायें स्वतंत्र भारत के पुनर्निर्माण हेतु किये जाने वाले प्रयासों में कारगर सिद्ध हुई हैं। मध्य युग की आत्मघात करने की प्रवृत्ति महत्वपूर्ण रही है। यद्यपि यह प्रकृत्ति अनेक बार अवरुद्ध रही है जिसमें साम्प्रदायिक तनाव बढ़ा है, लेकिन इनके प्रभाव को नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता।

इस्लाम, राज्य, राजसत्ता एवं समाज

चूकि मध्य युग में केन्द्रीय सत्ता प्रधानतया मुस्लिम शासकों के हाथ में रही है अतः इस्लाम के राजनीतिक दर्शन का संक्षिप्त अध्ययन अत्यन्त आवश्यक है। सभी शासकों ने न्यूनाधिक रूप से राज्य, शासन, प्रशासन और राजनीति में इस्लाम की सत्ता को स्वीकार किया है। अत: यह अध्ययन और भी महत्वपूर्ण बन जाता है। इस युग में मुस्लिम शासकों ने इस्लाम को सर्वाधिक महत्व दिया यद्यपि कुछ अपवाद भी हैं। लेकिन इस्लाम को नकारने का साहस कोई भी नहीं जुटा पाया। दूसरे शब्दों में, सैद्धान्तिक स्तर पर व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन इस्लाम द्वारा प्रभावित रहा है और कई शासकों ने इसको अमली जामा पहनाने का भी प्रयास किया है। यहाँ इस्लाम के मूल सिद्धान्तों और राज्य के बारे में संक्षिप्त विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है।

अरबी भाषा में इस्लाम का अर्थ ईश्वर की आज्ञा पालना और शांति है। यह अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण है। यह शांति का प्रतीक है, मस्तिष्क और शरीर की असली शांति केवल अल्लाह के प्रति पूर्ण वफादारी और समर्पण से ही सम्भव है। यह (अल्लाह की) आज्ञानुसार जीवन यापन है और इसी से दिल में शांति प्राप्त होती है और सम्पूर्ण समाज में भी शांति की स्थापना होती है।

इस्लाम के अनुसार ईश्वरीय कानून और प्राकृति कानून में कहीं विरोध नहीं है और मुसलमान को चाहिये कि वह अपने लौकिक जीवन में ईश्वरीय विधि को उतारे। संक्षेप में इस्लाम के मूलभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं-

इमान, रिसालत, नमाज, रोजा, जकात, हज और अखिरात इन सबका सार यह है कि ईश्वर एक है और मोहम्मद उनके पैरम्बर हैं। प्रत्येक मुसलमान को दिन में पाँच बार नमाज अदा करनी चाहिये। उसे वर्ष में एक महीने उपवास करना चाहिये। उसे अपनी आय का अढ़ाई प्रतिशत गरीबों को देना चाहिये। मक्का जीवन में कम से कम एक बार यात्रा अवश्य करनी चाहिये और आखिरी वक्त ईश्वर को अपने जीवन में किये गये कार्यो का लेखा जोखा देने के लिए तैयार रहना चाहिये।

इस्लाम में राज्य की कोई अवधारणा नहीं है केवल समाज पर ही जोर दिया गया है, लेकिन व्यक्ति और समाज के सम्बन्धों का निरूपण किया गया है। व्यक्ति के लौकिक जीवन का धार्मिक शिक्षाओं के अधीन लाया गया है और श्रेष्ठ जीवन के लिए समाज से भागने की आवश्यकता नहीं है। पारिवारिक और सामाजिक जीवन की परिधि में ही यह सब सम्भव है। इस्लाम व्यक्ति और समाज दोनों ही की गरिमा में विश्वास रखता है और दोनों में समन्वय स्थापित करता है। वस्तुत: व्यक्ति और समाज दोनों का उद्देश्य ही एक है। व्यक्ति के अधिकार हैं तो साथ में कर्त्तव्य भी हैं। उसके सामाजिक उत्तरदायित्व भी हैं जो उसके अधिकारों की सीमा का निर्धारण करते हैं। इस्लाम समानता पर जोर देता है। कुरान में वर्णित है अरे मनुष्य के पुत्रों तुम एक दूसरे से उत्पन्न हुए हो, तुम जातियों और कुनबों में विभाजित हो गये हो, लेकिन असल में तुम हो एक ही परिवार के और तुम ऐसा ही अहसास करो। वस्तुत: तुम में वे ही श्रेष्ठ हैं जो ईश्वर से डरते हैं।

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