राममोहन राय के आर्थिक विचार

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राममोहन राय के आर्थिक विचार

राममोहन राय के आर्थिक विचार

(THE ECONOMIC IDEAS OF RAM MOHAN ROY)

(1) राजा राममोहन राय ने किन्हीं आर्थिक सिद्धान्तों की रचना नहीं की, लेकिन देश की कतिपय आर्थिक समस्याओं के प्रति अपनी जागरूकता निःसन्देह प्रकट की। उन्होंने ही सबसे पहले भारतीय जमींदारी प्रथा के विरोध में आवाज उठाई और कहा कि जमींदार तथा जागीरदार, किसानों व मजदूरों के शोषक हैं तथा देश के आर्थिक-सामाजिक पतन का एक प्रमुख कारण है। पर जहाँ उन्होंने गरीब किसानों को जमींदारों की लूट के शिकार से बचाना चाहा, वहाँ यह विचार भी प्रस्तुत किया कि सरकार जमींदारों से अपनी माँगें कम कर दें। उन्होंने प्रवर समिति को कहा कि निःसन्देह सरकार के इस कदम से राजस्व में क्षति होगी, पर इस क्षति की पूर्ति दो उपायों से हो सकती है-

  • विलासिता की सामग्री पर कर की वृद्धि करके, एवं
  • उच्च वेतनमान के यूरोपीय कलेक्टरों के स्थान पर निम्न वेतनमान के भारतीय कलेक्टरों की नियुक्ति करके। राममोहन राय ने प्रवर समिति के सामने यह भी कहा-“आवश्यकता है कि जमीन का जो स्थाई बन्दोबस्त जमींदारों के साथ किया गया है वही स्थाई बन्दोबस्त किसानों और मजदूरों के साथ देश भर में कर दिया जाय। ऐसा करने से वे सभी सरकार के वफादार बने रहेंगे और देश की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहेगे।”

(2) प्रवर समिति के समक्ष राजा राममोहन ने एक अन्य विचार रखा कि “तैनात-फौज के ऊपर अधिक व्यय होता है। अत: तैनात फौज की अधिक संख्या घटा दी जाए और उस तैनात-फौज के बदले यहाँ के कुछ लोगों को प्रशिक्षित करके रिजर्ल्ड फोर्स में पदभार ग्रहण से जो बचत होगी वह अन्यान्य किसी भी उपाय से बढ़ाई गई आय से अधिक ही होगी।”

(3) राय ने स्वतन्त्र व्यापार के विचार का समर्थन किया। उन्होंने यह भी विचार रखा कि अंग्रेजों द्वारा अपने देश पर ले जाए जाने वाले माल पर से कर हटा लेना चाहिए ताकि विदेशी बाजार में भारतीय माल की अच्छी खपत हो।

(4) राजा राममोहन ने महिलाओं के आर्थिक अधिकारों की रक्षा के लिए भी नए विचारों का प्रचार किया । वंश की सम्पत्ति में पुत्री के अधिकार का पक्ष लेने वाले वे पहले विचारक थे। सम्पत्ति पर पुरुष सदस्यों के एकाधिकार सम्बन्धी हिन्दू कानून की उन्होंने कठोर आलोचना की और इस सम्बन्ध में 1822 में ‘मॉडर्न एन्क्रोचमेंट ऑन दी एनसिएंट राइट्स ऑफ फीमेल्स एकोर्डिंग टू दि हिन्दू ला’ (Modern Encroachment on the Ancient Rights of Females According to the Hindu Law) नामक बहुत ही विचारोत्तेजक लेख लिखा। इसमें उन्होंने प्राचीन महर्षियों और शास्त्रों के उद्धरण देकर यह तर्क उपस्थित किया कि परिवार की सम्पत्ति पर स्त्री सदस्याओं का भी अधिकार होना चाहिए। पति की सम्पत्ति में पत्नी को उतना ही अंश मिलना चाहिए जितना कि लड़के को मिलता है। लड़की हिस्से की भागीदार होनी चाहिए। अपने एक लेख में उन्होंने यह विचार प्रकट किया कि पिता को अपने पूर्वजों की सम्पत्ति को अपने पुत्रों से परामर्श किये बिना ही बेच देना या रहन रखने का पूर्ण अधिकार है।

(5) राममोहन राय भारत से इंग्लैण्ड को धन की निकासी (Economic drain) रोकना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने प्रस्ताव किया कि भारत में एंजी संग्रहीत करने वाले यूरोपियनों को भारत को ही अपना घर बना देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चहिए। भारत में यूरोपियन के आवास सम्बन्धी इस विचार से राममोहन राय के बारे में कुछ गलतफहमियाँ पैदा हो गईं और यह आरोप लगाया गया कि वे भारत में यूरोपियनों के प्रवेश को प्रोत्साहन दे रहे हैं। लेकिन राजा साहब का इरादा तो यह था कि धनी और सच्चरित्र यूरोपीय भारत में बसकर और अपनी पूँजी लगाकर भारत का औद्योगीकरण करके तथा अपने ज्ञान से भारतीयों को लाभान्वित करने में योग दे सकेंगे। यदि राममोहन राय के हृदय में कोई अन्य विचार होता तो वे यह कभी कहते कि समाज के निम्न स्तर के यूरोपियनों को भारत में आकर रहने की अनुमति न दी जाय । इसके अतिरिक्त उनका यह भी स्पष्ट विचार था कि जो शिक्षित सच्चरित्र उच्च श्रेणी के पूँजीदार यूरोपीय भारत में बसें उन्हें शासक सम्प्रदाय का सदस्य होने के नाते कोई विशेष सुविधाएँ प्राप्त न हों बल्कि उनके साथ न्यायिक व्यवहार वैसा ही हो जैसा भारतीयों के साथ होता था।

(6) देश में नमक तैयार करने का एकाधिकार ईस्ट इण्डिया कम्पनी का था और नमक का मूल्य भी अधिक था। राजा राममोहन राय ने कहा कि यदि नमक तैयार करने के काम का एकाधिकार हटा दिया जाय तो आपसी प्रतियोगिता के फलस्वरूप नमक ज्यादा अच्छा बनेगा और उसका मूल्य भी कम होगा।

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