क्या कौटिल्य का राजा निरंकुश है ?

क्या कौटिल्य का राजा निरंकुश है ?

क्या कौटिल्य का राजा निरंकुश है ?

कौटिल्य राजतन्त्र को ही शासन का एकमात्र स्वाभाविक और श्रेष्ठ प्रकार मानता है और राज्य में सप्त अंगों में राजा को सर्वोच्च स्तिाति प्रदान करता है। किन्तु ऐसा होने पर भी कौटिल्य का राजा निरंकुश नहीं है, उस पर कुछ ऐसे प्रतिबन्ध हैं जिनके कारण वह मनमानी नहीं कर सकता । ये प्रतिबन्ध निम्न प्रकार हैं-

राजा की शक्ति पर प्रथम प्रतिबन्ध अनुबन्धवाद का था। कौटिल्य के अनुसार मनुष्य ने राजा की आज्ञाओं के पालन की जो प्रतिज्ञा की उसके बदले में राजा ने अपने प्रजा के धन-जन की रक्षा का दिया था। इसका स्वाभाविक निष्कर्ष यह है कि राजा के द्वारा प्रजा के धन-जन को हानि पहुँचाने वाला कोई कार्य नहीं किया जा सकता। कौटिल्य ने एक स्थान पर बताया है कि राजा की स्थिति वेतनभोगी सैनिकों के समान ही होती है। इसका तात्पर्य यह है कि राजा कर्त्तव्यपालन के लिए बाध्य है और वह राजव से निश्चित वेतन ही ले सकता है। कौटिल्य के राजा को मनमाने ढंग से राज्य की समत्ति भोग-विलास के साधन प्राप्त करने का अधिकार नहीं था।

राजा की शक्ति पर दूसरा प्रतिबन्ध धार्मिक नियमों और रीति-रिवाजों का था। राना के अधिकार धर्म और रीति-रिवाजों से सीमित थे और वह इनका पालन करने के बाध्य था। इस बात की आशंका रहती थी कि राजा द्वारा इन नियमों का उल्लंघन किये जाने पर जनता क्षुब्ध होकर स्वयं ही उसके जीवन का अन्त कर दे। तत्कालीन जीवन में धर्म और परलोक की भावना बहुत प्रबल होने के कारण नरक का भय भी राजा को मनमानी करने से रोकता था। उसकी निजी नैतिक और धार्मिक भावना उसे निरंकुश बनने से रोकती थी।

राजा की शक्ति पर तीसरा प्रतिबन्ध मन्त्रिपरिषद् का था। उसके अनुसार राज्य रूपी रथ के दो चक्र राजा और मन्त्रिपरिषद् हैं, इसलिए मन्त्रिपरिषद् का अधिकार राजा के बराबर ही है। मन्त्रिपरिषद् राजा की शक्ति पर नियन्त्रण रख उसे निरंकुश बनने से रोकती थी।

इन सबके अतिरिक्त कौटिल्य ने राजा की निरंकुशता पर अन्तिम किन्तु एक अत्यन्त प्रभावशाली प्रतिबन्ध राजा के व्यक्तित्व तथा उसे प्रदान की गयी शिक्षा के आधार पर लगाया है। कौटिल्य ने राजा के लिए अनेक मानसिक और नैतिक गुण आवश्यक बताये हैं और इस प्रकार का सर्वगुणसम्पन्न राजा अपने स्वभाव से ही निरंकुश नहीं हो सकता। इसके अलावा उसे राजा की शिक्षा पर बल दकर उस पर ऐसे संस्कार डालने चाहे हैं कि वह निरंकुशता का मार्ग न अपनाकर लोकहित के कार्यों में ही लगा रहे । वस्तुत: कौटिल्य ने राजतन्त्र का समर्थन और इस व्यवस्था में राजा को पर्याप्त शक्तियाँ देने का कार्य प्रजाजन के हित को दृष्टि में रखकर ही किया है।

बी० पी० सिन्हा ने ‘दि जर्नल ऑफ बिहार रिसर्च सोसाइटी’ के एक लेख में कौटिल्य का राजा निरंकुश नहीं है, इसकी पुष्टि में निम्न तर्क दिये हैं :

  1. कौटिल्य ने राजपुत्र की योग्य शिक्षा तथा सत्संग पर बल दिया है।
  2. कौटिल्य ने राजा के सामने उच्चादर्श रखे हैं जिनका पालन करना राजा का परम कर्तव्य है। राजा और प्रजा के बीच पिता-पुत्र का सम्बन्ध होना चाहिए। कौटिल्य के अनुसार-

प्रजा सुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम् ।

नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम् ॥

अर्थात् प्रजा के सुख में राजा का सुख है, प्रजा के हित में उसका हित । जो कुछ राजा को प्रिय हो वह उसे ही हित न समझे जो प्रजा को प्रिय हो वह उसे ही अपना हित समझे।

  1. स्वायत्त शासन की संस्थाएँ जैसे ग्राम और नगर सभाएँ भी काफी सीमा तक राजा की निरंकुशता रोकने में सफल होंगी।
  2. ब्राह्मण और पुरोहित भी अपनी मन्त्रणाओं द्वारा राजा पर पर्याप्त नियन्त्रण रखते थे। क्योंकि कौटिल्य ने लिखा है कि ब्राह्मणों का कर्तव्य है कि वे राजा को समय-समय पर उसके कर्त्तव्यों की याद दिलाते रहें।
  3. कौटिल्य ने राजा की मन्त्रियों और अमात्यों के साथ मन्त्रणाओं पर भी काफी बल दिया है। कोई भी कठिन समस्या मन्त्रिपरिषद् के बहुमत से निश्चित होनी चाहिए।
  4. सामाजिक परम्पराओं और अन्य निरूढ़ियों का पालन करना भी राजा के लिए आवश्यक था।
  5. जनमत के डर से भी राजा निरंकुश नहीं हो सकता।

श्री कृष्णराव ने ठीक लिखा है कि “कौटिल्य का राजा अत्याचारी नहीं हो सकता, चाहे वह कुछ बातों में स्वेच्छाचारी रहे, क्योंकि वह धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र के सुस्थापित नियमों के अधीन रहता है।” इसी बात को स्वीकार करते हुए Saletore ने लिखा है कि “वह अपना राज्य और जीवन में खोये बिना यूनान के अत्याचारी राजाओं जैसा नहीं बन सकता, क्योंकि भारत में जनता ऐसे राजा सहन नहीं कर सकती थी। यद्यपि राजा का पद सर्वोच्च था, किन्तु न तो वह राजा से पृथक् था और न उसके लिए विदेशी ही और वह जैसा चाहे, जनता के प्रति व्यवहार करने के लिए स्वतन्त्र न था।

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