राममोहन राय के सामाजिक विचार

राममोहन राय के सामाजिक विचार

राममोहन राय के सामाजिक विचार

(THE SOCIAL THOUGHTS OF RAM MOHAN ROY)

“एक एक कुसंस्कार को हटाने में उन्होंने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। नारी-उत्पीड़न को दूर करने, उन्हें शिक्षा देने और उनके जन्मजात अधिकारों को दिलाने के लिए राममोहन राय ने एड़ी चोटी का पसीना एक किया। सबसे बड़ी बात यह है कि राममोहन राय ने लोगों के नैतिक चरित्र गठन और धार्मिक-विकास द्वारा सामाजिक उन्नति करने की कोशिश की।”

-राममोहन राय द्विशत जन्म वार्षिक समारोह समिति

राजा राममोहन राय ने एक सामाजिक उन्नति का सूत्रपात किया। उन्होंने यह विश्वास व्यक्त किया कि धर्म और समाज-सुधार की अनुपस्थिति में केवल राजनीतिक विकास का कोई मूल्य नहीं रहेगा। चाहे राजनीतिक स्तर पर हम मुक्त हो जाएँ, पर यदि समाज का सुधार और विकास नहीं होगा तथा धार्मिक अन्धविश्वासों और पाखण्डों से हम ऊपर नहीं उठेंगे तो राजनीतिक स्वाधीनता खोखली होगी। इसी दूरगामी विश्वास से प्रेरित होकर राजा राममोहन राय ने सामाजिक क्रान्ति का, धार्मिक-सामाजिक विकास का शंख फूंका। राममोहन राय ने राजनीतिक प्रगति और सामाजिक तथा धार्मिक सुधारों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध सुनिश्चित करने की दूरदर्शिता दिखाई और आगे चलकर ऐसी ही अनुभूति महात्मा गाँधी को हुई।

(1) राममोहन राय ने मूर्ति पूजा का घोर विरोध किया। उनका विश्वास था कि इससे असंख्य विभाजन और उप-विभाजन उत्पन्न करके हिन्दू समाज की जड़ों पर कुठाराघात किया है। उन्होंने यह प्रस्थापित करने की चेष्टा की कि मूर्ति पूजा हिन्दू धर्म का कोई मौलिक अंग नहीं है अपितु इसका चलन बाद में जाकर हुआ है। मूर्ति-पूजा के पक्ष में एक सूक्ष्म तर्क था-‘असली चीज श्रद्धा है। मूर्ति की श्रद्धापूर्वक पूजा कीजिए तो ईश्वर प्राप्त होगा ।” राममोहन राय का उत्तर था कि विष को श्रद्धा के साथ दूध मानकर पीने से भी वह घातक सिद्ध होगा। बाजार से सौदा खरीदने-जैसी मामूली बातों तक में हम सोच-समझकर, नाप-तोलकर काम करते हैं। तो क्या फिर परम और चरम महत्व की बातों में ही हम सोचना-समझना, नापना-तोलना छोड़कर श्रद्धा के आसरे बैठे रहें ? राममोहन राय का कहना था कि “उपनिषद् अद्वैतवाद की शिक्षा देते हैं जिसमें मूर्ति-पूजा का कोई स्थान ही नहीं है।

(2) राजा राममोहन राय ने परम्परावादिता का विरोध किया और कहा कि सामान्य प्रवृत्ति के रूप में भी यह खतरनाक है। परम्परा में अन्ध श्रद्धा का लाभ उठाकर बहुत से अविवेकपूर्ण कार्य को बड़ा प्राचीन और पवित्र बना दिया जाता सामान्य ऐतिहासिक विश्लेषण से ही यह सिद्ध हो सकता है कि वे अविवेकपूर्ण कार्य हाल ही के उपज हैं। “राममोहन का कहना था कि यदि आप परम्परा को सर्वोपरि मानते हैं तब तो कर्मकाण्ड और मूर्ति पूजा को छोड़कर शुद्ध ब्रह्म की पूजा करना सर्वथा आवश्यक है, क्योंकि शुद्ध ब्रह्म की पूजा ही आपके धर्म की सबसे प्राचीन परम्परा है।”

(3) राममोहन राम ने सती प्रथा के विरोध में जो अभियान प्रारम्भ किया, वह सर्वविदित है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में बताया कि सती प्रथा या ‘सह-मरण’ शास्त्र सम्मत प्रथा नहीं है, शास्त्र विकृत कुसंस्कार है। 1829 में उन्होंने इस सम्बन्ध में एक पुस्तिका भी लिखी। मुख्यतः उन्हीं के प्रचार के फलस्वरूप लॉर्ड विलियम बैंटिंक ने एक आज्ञा जारी कर सती प्रथा को 1829 में निषिद्ध घोषित कर दिया। श्रीमती फ्राँसिस के० मार्टिन ने ‘बंगाल हरकरा’ नामक समाचार पत्र में लिखा था-“महान् हिन्दू दार्शनिक राममोहन राय की विशेष सहायता के बिना शायद कभी भी अंग्रेज सरकार के लिए कानूनन सती प्रथा रद्द करना सम्भव न होता, परन्तु उनकी यह देन किसी के द्वारा स्वीकृत नहीं की गई है।” राममोहन राय ने, सोफिया फालेट के शब्दों में “हिन्दू धर्म-ग्रन्थों के अपने गम्भीर ज्ञान के आधार पर यह प्रमाणित किया कि सती प्रथा धर्म-संगत नहीं थी। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी दिखाया कि स्वार्थी सम्बन्धीजन किसी धार्मिक प्रेरणा से नहीं बल्कि, विधवाओं के भरण-पोषण के खर्च से छुटकारा पाने के लिए इस प्रथा को जारी रखना चाहते थे।”

(4) राजा राममोहन राय ने उदार और वैज्ञानिक सामाजिक विचारों के विकास के लिए अथक् प्रयास किये। उन्होंने नारी स्वातन्त्र्य, नारी-अधिकार और नारी-शिक्षा पर बड़ा बल दिया तथा हिन्दू नारी के साथ किये जाने वाले अन्याय और अत्याचार की कटु निन्दा की । “राममोहन ने कहा कि कट्टर हिन्दुओं को चाहिए कि वे शैव-विवाहों को भी वह मान्यता दें जो वैदिक विवाहों को प्राप्त है। अगर उनकी सलाह मानी जाती, तो विधवा-विवाह, अन्तर्जातीय-विवाह, यौवनारम्भ के उपरान्त विवाह आदि सभी हिन्दू समाज में मान्य होते।” अपने मृत पति की सम्पत्ति में स्त्री की उचित भाग न देने के नियम की उन्होंने विशेष रूप से भर्त्सना की। राजा राममोहन ने बहुपत्नी-प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाते हुए ऐसी वैधानिक व्यवस्था की आवश्यकता पर बल दिया कि कोई भी हिन्दू एक मजिस्ट्रेट से लाइसेंस लिए बिना अपनी पहली पत्नी के जीवन काल में दूसरा विवाह नहीं कर सकता। राममोहन राय का ही स्वप्न था कि बाल-विधवाएँ पुनर्विवाह करें और प्रौढ़ विधवाएँ आत्म-सम्मान का जीवन व्यतीत करने के लिए शिक्षित की जाएँ। उन्होंने यह मानने से इन्कार कर दिया कि स्त्रियाँ पुरुषों की अपेक्षा मन्द-बुद्धि हैं। भारतीय इतिहास के उदाहरण देकर उन्होंने सिद्ध किया की लीलावती, भानुमति, कर्णट राजा एवं कालिदास की पत्नी तथा मैत्रेयी आदि नारियाँ प्रतिभा, विद्या और ज्ञान की साकार मूर्ति थीं। स्त्रियों पर बेईमानी के दोषारोपण को उन्होंने ठुकरा दिया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि पुरुष और स्नी दोनों के चरित्रों का मूल्यांकन किया जाए तो आसानी से पता चल जाएगा कि पुरुषों और स्त्रियों में कौन अधिक बेईमान है ? राय ने जाति प्रथा के विरुद्ध प्रचार किया और यह दृढ़ विश्वास व्यक्त किया कि हिन्दुओं की राजनीतिक कमजोरी का कारण उनमें असंख्य जातियों और उपजातियों का होना है। उन्होंने यह मत रखा कि एक व्यक्ति की श्रेष्ठता अथवा हीनता का निर्णय उसके गुणों में होना चाहिए, न कि जन्म से।

राममोहन राय ने 1815 में जिस ‘आत्मीय सभा’ की स्थापना की उसमें धर्म के साथ सामाजिक समस्याओं की भी आलोचना होती थी। जाति भेद की समस्या, पंक्ति भोजन और निषिद्ध खाद्य की समस्या, बाल विधवा और कठोर ब्रह्मचर्य पालन, औचित्यानौचित्य, बहु-विवाह की प्रथा, सती प्रथा, मूर्ति पूजा सम्बन्धी विभिन्न प्रकार के कदाचार आदि के सम्बन्ध में इस सभा के अधिवेशन में आलोचनाएं होती थीं। आत्मीय सभा केवल ब्रह्म-धर्म प्रचार अथवा ब्रह्मोपासन की सभा ही नहीं थी, समाज सुधार की भी सभा थी।

(5) राजा राममोहन राय को अपमानजनक अप-भाषा कभी भी प्रिय नहीं थी। उन्होंने सदैव संसदीय और विनम्र भाषा का समर्थन किया। जब ईसाई धर्म प्रचारकों से उनका वाद-विवाद हुआ तो आरोपों के उत्तर में उन्होंने डॉ० जॉन मार्शमैन से साफ कहा, “हमें कदापि यह न भूलना चाहिए कि हम यहाँ गम्भीर धर्म-विवेचना कर रहे हैं। इसमें एक दूसरे के प्रति अशिष्ट भाषा का व्यवहार करना सर्वथा अनुचित है।”

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