कौटिल्य के अनुसार सैन्य बल और युद्ध

कौटिल्य के अनुसार सैन्य बल और युद्ध

कौटिल्य के अनुसार सैन्य बल और युद्ध

(THE ARMY AND WAR)

संगठन-कौटिल्य सैन्य बल को राज्य के लिए बहुत आवश्यक मानता है और अन्य भारतीय आचार्यों की भाँति चतुरंगी सेना का समर्थन करता है। सेना के ये चार अंग पैदल, सैनिक, हाथी, घोड़े और रथ। इन चार बलों में कौटिल्य हस्ति बल (हाथियों की सेना) को सर्वाधिक महत्व देता है। पैदल सैनिकों में वंशानुगत सैनिक (मौल), वैतनिक सैनिक (भृत), श्रेणीगत तथा मित्र एवं कबायली सैनिक हो सकते हैं। इनमें कौटिल्य पश्चत् वाले से पूर्वोक्त को उच्चतर मानता है। उसका विचार है कि सेना मुख्यतया क्षत्रिय वर्ग की होनी चाहिए, किन्तु आवश्यक होने पर इसमें वैश्य एवं शूद्रों को भी सम्मिलित किया जा सकता है। ब्राह्मणों को वह सैनिक सेवा के लिए अनुपयुक्त मानता है। उसने सेना के चारों अंगों की दृड़ता, आवश्यक अस्त्र-शस्त्र, नियमित रसद और अन्य सभी प्रकार की सामग्री पर बल दिया है।

कौटिल्य के अनुसार शत्रु के विरुद्ध युद्ध करने में राजा के पास तीन शक्तियाँ होनी चाहिए- उत्साह शक्ति, प्रभाव शक्ति, एवं मन्त्र शक्ति। उत्साह शक्ति का तात्पर्य सफल युद्ध के लिए आवश्यक सैनिक नैतिक बल, प्रभाव शक्ति का आशय शस्त्र सामग्री और मन्त्र शक्ति का आशय मन्त्रणा एवं कूटनीतिक शक्ति से है। कौटिल्य के अनुसार ये तीनों शक्तियाँ अपने महत्व की दृष्टि से ही इसी क्रम की हैं। यदि राजा उत्साही, वीर, शक्तिशाली और युद्ध कला में प्रवीण होता है और प्रभाव शक्ति या भौतिक साधनों में असक्त, तो भी वह युद्ध में विजयी होता है। यदि उसमें उत्साह शक्ति नहीं है, केवल प्रभाव शक्ति है, तो प्रचुर साधन होते हुए भी उसे शक्तिशाली राजा द्वारा पराजित किया जा सकता है। भौतिक साधनों के अभाव में मन्त्र या सलाह शक्ति व्यर्थ है। इस प्रकार इन तीन शक्तियों में कौटिल्य ने उत्साह शक्ति को प्रधानता दी है।

युद्ध के प्रकार

कौटिल्य ने तीन प्रकार के युद्ध बताये हैं-

  1. प्रकाश या धर्मयुद्ध- यह पूर्ण तैयारी के साथ विधिवत् रूप से घोषित युद्ध है, जिसमें दोनों पक्षों की सेनाएँ युद्धस्थल में नियमानुसार संघर्ष करती हैं। इस युद्ध के कुछ नियम हैं जैसे रणभूमि में शरण में आ गये शत्रु को न मारना, युद्ध में अग्नि का प्रयोग न करना; आदि।
  2. कूट युद्ध- छल-कपट, लूट-मार, अग्नि-दाह आदि तरीकों से किया गया युद्ध कूट युद्ध कहलाता है।
  3. तूष्णी युद्ध- यह निकृष्ट प्रकार का युद्ध है जिसमें सेनाएँ विष सदृश साधनों का प्रयोग करती हैं और छल-कपट द्वारा गुप्त रूप से मनुष्यों का वध किया जाता है। कौटिल्य के अनुसार विजयाभिलाषी राजा परिस्थितियों पर विचार करके इनमें से किसी भी प्रकार के युद्ध का आश्रय ले सकता है। कौटिल्य अत्यधिक यथार्थवादी है और वह में शत्रु के साधनों को नष्ट करने, शत्रु की भूमि में फसलों को नष्ट करने तथा जल को दूषित कर देने को भी न्यायोचित मानता है।

दूत व्यवस्था

कौटिल्य ने न केवल युद्धकालीन वैदेशिक सम्बन्धों वरन् शान्तिकालीन सम्बन्धों का भी विवचन किया है। इस सम्बन्ध में उसने दूत को भेजने तथा गुप्तचर व्यवस्था को अपनाने का सुझाव दिया है। कौटिल्य के अनुसार विभिन्न राज्यों में गुप्तचर भेजकर उन राज्यों की स्थिति तथा नीति का ज्ञान प्राप्त करने और उन्हें अपने अनुकूल करने या बनाये रखने का प्रयत्न किया जाना चाहिए। ये गुप्तचर व्यापारी, शिक्षक, धर्मप्रचारक, आदि रूपों में वहाँ पर रह सकते हैं।

कौटिल्य ने दूतों को उनकी योग्यता तथा कार्य के अनुसार तीन श्रेणियों में रखा है : निसृष्टार्थ, परिमितार्थ व शासनाहार। उसके अनुसार निसृष्टार्थ एक राज्य का पूर्ण अधिकार सम्पन्न राजदूत होता है, परिमितार्थ तीन-चौथाई गुणों तथा शक्तियों से युक्त और शासनाहार निसृष्टार्थ की अपेक्षा आधी शक्ति से युक्त होते थे। कौटिल्य के अनुसार दूत का पद बहुत महत्वपूर्ण है और अधिकाधिक गुण सम्पन्न व्यक्ति को ही इस पद पर नियुक्त किया जाना चाहिए। दूत को चतुर, कूटनीतिज्ञ, कुशल वक्ता, साहसी और निर्भीक होना चाहिए। उसे मद्य और पर-स्त्री आदि बुरी आदतों से मुक्त होना चाहिए, क्योंकि उसका ऐसा आचरण भेद खोलने की दुर्बलता ला सकता है। प्राचीन भारत में यह सुव्यवस्थित परम्परा थी कि दूत को किसी भी स्थिति में प्राणदण्ड नहीं दिया जाना चाहिए, कौटिल्य भी इस परम्परा को मान्यता प्रदान करता है।

दूत के प्रमुख कर्तव्यों के अन्तर्गत ये हैं, पर राजा को अपने राजा का सन्देश देना, सन्धियों के पालन की व्यवस्था करना, मित्र संग्रह तथा शत्रु के मित्रों की मण्डली में भेद उत्पन्न करना, गुप्त रूप से दूसरे राजा की कीर्तियों का ज्ञान करना आदि।

कौटिल्य ने युद्धकाल और शान्तिकाल में वैदेशिक सम्बन्धों के संचालन का जो विशद् विवेचन किया है, वह यथार्थवादी और निश्चित रूप में स्तुत्य है। इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि कौटिल्य अपने समय से कितना आगे था।

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