बर्नी के राजनीतिक विचार

बर्नी के राजनीतिक विचार

बर्नी के राजनीतिक विचार

बर्नी वस्तुत: इतिहासकार हैं लेकिन उन्होंने इतिहास को एक राजनीतिक दृष्टा की तरह भी देखा है। देहली सल्तनत का राजनीतिक इतिहास उनकी दृष्टि में तीन विशिष्ठ प्रवृत्तियों को लिये हुए है-

  1. सुलतान की निरंकुश शक्तियों में वृद्धि,
  2. अधिकाधिक आतंक का प्रयोग एवं
  3. उच्च वंशीय वर्गो एवं सुलतान के सभासदों की परिषद् के गठन में क्रमिक परिवर्तन।

निम्न वर्गों के कुछ लोगों की सभासदों की परिषद् में सम्मिलित किये जाने पर बर्नी बहुत क्रुद्ध थे। उच्च वंशीय परिषद् में निम्न जाति के लोगों का सम्मिश्रण मोहम्मद तुगलक के समय अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गया था, जिसकी बर्नी ने भर्त्सना की है। वह हिन्दुओं को उच्च स्थान दिये जाने के भी विरोधी रहे हैं।

बर्नी ने अलाउद्दीन खिलजी की इस बात पर आलोचना की है कि उसकी प्राथमिकताओं में निजी स्वार्थ, अत्यधिक धन संग्रह एवं विलासिता थी। बर्नी को इस बात की चिन्ता थी कि निरंकुश राजाओं ने सत्ता की प्राप्ति और भोग में सभी नियमों, धार्मिक शिक्षाओं और यहाँ तक कि कुरान द्वारा निर्धारित आयामों का ताबड़तोड़ उल्लंघन किया है।

वह बलवन को उद्धृत करते हैं। सांसारिक मामलों में राजा ईश्वर का प्रतिनिधित्व करता है और राजाओं के हृदय में ईश्वर की दृष्टि का निवास होता है, लेकिन राजाओं द्वारा व्यवहारिक धरातल पर ऐसा न करने पर क्रुद्ध होकर कहते हैं कि “राजा की सत्ता धोखा और प्रदर्शन मात्र है। यद्यपि बाहर से यह आकर्षक लगती है, लेकिन अन्दर से खोखली एवं घृणास्पद है। राजसत्ता आतंक, शक्ति एवं एकाधिकार है। संप्रभुता ईश्वर प्रदत्त न होकर पाशविक शक्ति द्वारा स्थापित एवं ऐतिहासिक प्रक्रिया की उपज है।

शासक वर्ग की दीर्घकालीन सफलता के पीछे निहित स्वार्थी तत्वों (जिन्होंने राजस्व भोगा है) का संगठित प्रयास है और इसको प्रबल समर्थन निरंकुश राज सत्ता से प्राप्त हुआ है। बर्नी के शब्दों में निरंकुश राजसत्ता ही सरकार और प्रशासन को स्थिरता प्रदान करने का एक मात्र साधन बन गया है।

बर्नी निरंकुश राज सत्ता और उससे उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों से व्यथित है और राजसत्ता पर नियंत्रण लगाते हैं। वह राजाओं द्वारा परसियन बादशाहों की नकल करने की भर्त्सना करते हैं चूंकि वे खुदा के विरुद्ध आचरण करने वाले हैं।

सार रूप में हम बर्नी के राजतंत्र की अवधारणा को यहाँ प्रस्तुत करते हैं। मोहम्मद हबीब और खलीक अहमद निजामी के अनुसार ध्यान से देखने पर पता चलता है कि उसने राजतंत्र की दो अवधारणायें दी हैं। प्रथम अवधारणा परम्परा पर आधारित है। वह यह है कि राजा पापी है जिसे इस संसार में ऐसा काम करना पड़ रहा है जिसकी अनुमति कुरान और पैगम्बर नहीं देते। यदि वह बर्नी द्वारा निर्धारित मापदण्डों के मुताबिक चले तो उसका स्थान संतों और पैगम्बरों में होगा। यह तो एक ऐसी बात हो गयी कि मुस्लिम डाकू एक अच्छा डाकू है और उसे ईश्वरीय आशीर्वाद भी प्राप्त है यदि वह गैर मुसलमान को लूटता है और धर्म की रक्षार्थ अपनी आय का बड़ा हिस्सा दान में दे देता है और अपने कार्यों में धार्मिक सिद्धान्तों के अनुसार आचरण करता है।

यह अवधारणा यह भी है कि राजा इस पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि भी है। वह एक प्रकार से ईश्वर की परछाई भी है। उसके एवं उसके सलाहकारों के मस्तिष्क ईश्वरीय प्रकाश से आलोकित होते हैं।

इस अवधारण की तीसरी बात यह है कि राज्य का शासन करते समय राजा परस्पर विरोधी गुणों से प्रभावित होता है। जब वह ईश्वर की भांति शासन करता है तो वह उसके बराबर होने का दावा करता है जो कि कुरान के मुताबिक अक्षम्य पाप है, लेकिन प्रशासन हेतु ये विरोधी गुण होना आवश्यक भी है। अत: उसे अपने हृदय में प्रायश्चित करते रहना चाहिये और निरन्तर ईश्वर से क्षमा माँगत रहना चाहिये।

परम्परा पर आधारित इस अवधारणा के लिए बर्नी को दोषी मानना भी उचित नहीं है। यह अवधारणा प्रचलित धार्मिक मान्यताओं से ओतप्रोत है। राजा पापी है और उसे निरंतर ईश्वर से क्षमा माँगते रहना चाहिये-यह अपराध बोध पर आधारित है। यह इस मान्यता पर आधारित है कि राजा को प्रशासन के संचालन में पाप और अन्याय करना पड़ता है। इसलिये ईश्वर से क्षमा माँगते रहना चाहिये। ईश्वर से क्षमा माँगना बुरी बात नहीं है। लेकिन प्रशासन चलाना एक अनैतिक कार्य है। यह एक खतरनाक सिद्धान्त है। दूसरी दृष्टि से देखने पर यह हास्यास्पद भी लगता है कि राजा अन्याय और पाप करता जाये और ईश्वर से माफी भी माँगता जाये। इसके स्थान पर यह मानना ज्यादा सकारात्मक है कि राजा को समाज के हित में न्यायपूर्वक कार्य करना चाहिये। यदि राज्य कार्य में निष्ठा, ईमानदारी और सेवा भाव होगा, तो राजा अपराध बोध से मुक्त होकर, ज्यादा उत्साह पूर्वक कार्य कर सकेगा।

राजतंत्र

राजतंत्र के सम्बन्ध में बर्नी द्वारा प्रतिपादित दूसरी अवधारणा यह है कि राजा का पद सामाजिक व्यवस्था और विशेष तौर पर न्याय के कार्यान्वयन हेतु जरूरी है। मनुष्य की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु एक केन्द्रीकृत कार्यपालिका होनी चाहिये, जिसके पास आदेश देने की शक्ति हो।

इस्लाम के अनुसार समाज में श्रमिक हों, जिन्हें श्रम के एवज में वेतन मिले, न कि गुलाम आश्रित श्रम। मध्ययुगीन परिस्थितियों में राजा के अधीन केन्द्रीकृत राजसत्ता के महत्व को ही स्वीकार गया।

इसी विचार से राजा की महती शक्तियाँ निहित हैं। राज्य के अस्तित्व एवं उसके संचालन में शारीरिक शक्ति का अत्यधिक महत्त्व है और इसलिये एक विशाल सुसज्जित सेना राज्य की प्रथम आवश्यकता है। राजा को कानून बनाने का भी अधिकार होना चाहिये और अत्यन्त आवश्यक होने पर वह शरियत के विपरीत भी जा सकते हैं।

बर्नी वस्तुतः राजतंत्र का संस्थानीकरण करना चाहते थे। वह राजा को कानून निर्माण एवं प्रशासन संचालन की शक्ति देने के पक्षधर हैं। लेकिन राज सत्ता के निरंकुश उपयोग के भी वह विरुद्ध हैं। राजा की परिषद् सभी राज कार्यों का स्वतंत्रतापूर्वक विवेचन कर अपनी राय राजा को दे। यदि परिषद् कोई सर्वसम्मत राय बनाती है, तो राजा को उसे मान लेना चाहिये। यदि उनमें मतभेद हो, तो उन्हें दुबारा पुनः उस मसले पर राय करनी चाहिये।

बर्नी बहुत अल्पमत की बात नहीं करते, क्योंकि वस्तुतः मंत्रिपरिषद् एक मनोनीत संस्था ही तो है। अतः राजा के लिए बर्नी कोई आदेश देने के पक्ष में नहीं है। मध्य युग में इस प्रकार की परिषद् गठित ही नहीं की गयी। राजा के परामर्शदाता हुआ करते थे, जो कि वस्तुत: सहायक जैसे ही होते थे। बर्नी ने अनेक सुलतानों के शासनकालों को नजदीक से देखा था।

भूमि राजस्व एवं अन्य कई मामलों में अलाउद्दीन खिलजी मजलिसे खास से परामर्श किया करता था, लेकिन कालान्तर में उसने यह परामर्श करना छोड़ दिया। मुहम्मद तुगलक बहस के माध्यम से अपने विरोधियों को निरुत्तर कर दिया करता था। जलालुद्दीन खिलजी अवश्य मजलिस से परामर्श किया करता था, लेकिन वे प्राय: उसके दरबारियों की भांति अधिक व्यवहार करते थे। सुलतान प्रायः उनके मामलों में हस्तक्षेप किया करता था और अपना निर्णय ही थोप देता था, जिसके परिणामस्वरूप मजलिस कभी अपना निर्णय नहीं ले पाती थी। अन्य शासकों के बारे में भी यही है कि वे अपने मर्जीदानों से प्रभावित होते रहते थे, लेकिन अन्ततोगत्वा होता वही था, जो वह चाहते थे।

अपने समय के शासकों के निरंकुश व्यवहार से क्षुब्ध होकर बर्नी ने प्रस्तावित किया कि राजा की परिषद् को अर्द्ध स्वतंत्र संस्था बना दिया जाना चाहिये ताकि बादशाह पर नियंत्रण लगाया जा सके। लेकिन प्रशासन की अंतिम जिम्मेदारी राजा की होने के कारण उसके परिणाम भी उसी को भोगने पड़ते थे। यह ध्यान देने योग्य बात है कि 1200 से 1357 के बीच दिल्ली सल्तनत के सत्रह सुलतानों में से दस को या तो मार डाला गया, जहर दे दिया गया था या जेल में जीवन लीला समाप्त करने के लिए बाध्य किया गया। चूँकि परिषद् अपने द्वारा लिये गये निर्णयों के लिये जिम्मेदार नहीं होती थी। अतः केवल बादशाह की अच्छाई या बुराई के लिए जाना जाता था। वस्तुतः सत्ता भी उसी के हाथ में रहेगी, जिसकी अंतिम जिम्मेदारी होगी।

बर्नी यद्यपि राजतंत्रवादी हैं, लेकिन इसका एक और दोष भी बताते हैं। उनके अनुसार बादशाह अपने विरोधियों को जबर्दस्त दण्ड देता है, जो कि एक प्रकार का राजनीतिक प्रतिशोध है।

बर्नी का कथन है कि खलीफाओं का शासन कुरान या पैगम्बर सम्मत न होकर एक प्रकार के प्रजा के साथ किए गये समझौते पर आधारित है। कुरान में अथवा पैगम्बर के आदेशों में कहीं भी सरकार की आज्ञा मानने या नहीं मानने का प्रावधान नहीं है। बर्नी ने देहली सल्तनत के 95 वर्षों के अध्ययन में यह पाया कि राजा कितने क्रूर, नीच और स्वार्थी थे। इस बात का बर्नी को बहुत ही दुख था। केवल गयासुद्दीन तुगलक में अवश्य संवेदनशीलता थी, जिसने अलाउद्दीन खिलजी की व्यवस्था को बिना आतंक और क्रूरता के बनाये रखा। बर्नी ने एक इतिहासकार के नाते बलवन के शासन काल से प्रारम्भ होने वाले अत्याचारों का उल्लेख किया, जिनका पराकाष्ठा मुहम्मद बिन तुगलक के शासन काल में हो गई। बर्नी ने लिखा है कि निर्दोष महिलाओं और बच्चों तक पर निर्मम अत्याचार हुये।

बर्नी ने बताया कि सिंहासनारुढ़ होते ही बलवन ने यह अहसास किया कि राजा की शक्ति नष्ट होने लगी है, जिसको पुर्नस्थापित करना उसका ध्येय बन गया। बर्नी ने लिखा कि सुल्तान बलवन अपने स्नेह, दया और न्याय की भावना रखने, उपवास और प्रार्थना करने के बावजूद भी क्रूर अत्याचारी था और विद्रोह होने पर भयंकर दण्ड देता था। ऐसा दण्ड देने और सत्ता का उपयोग करते समय वह ईश्वर से भी नहीं डरता था। उसने अपनी अस्थायी शक्ति को बनाये रखने हेतु जो ठीक समझा वही क्रिया चाहे उसकी अनुमति शरियत में हो अथवा नहीं।

अलाउद्दीन खिलजी के बारे में भी बर्नी ने लिखा है कि उसने ताज को हड़पा, युद्ध किये, प्रशासकीय और आर्थिक प्रक्रियायें प्रारम्भ की। बर्नी ने अलाउद्दीन के इस कार्य की सराहना की कि यद्यपि उसने अनेक लोगों को सम्पत्ति से च्युत कर दिया, लेकिन उसने कुलीन लोगों की सम्पत्ति को नहीं छुआ। इन लोगों में जमींदार, जागीरदार, सेना के बड़े अधिकारी, सरकारी अधिकारी, व्यापारी और सेठ साहूकार सम्मिलित थे। लेकिन अलाउद्दीन के अन्य क्रूर कृत्यों को बर्नी ने समर्थन नहीं दिया। इन क्रूर कृत्यों में विद्रोही अधिकारियों की महिलाओं और बच्चों को पकड़ने और उनकी हत्या अथवा परिवारों को अपमानित करने की कार्यवाही सम्मिलित थी। बर्नी ने लिखा है कि ऐसी क्रूरता की अनुमति किसी धर्म में भी नहीं दी गयी है।

वैसे बर्नी के विचारों में विरोधाभास भी है। वैसे वह इस मत के हैं कि राजा को निरंकुश नहीं होना चाहिये। लेकिन हिन्दुओं के प्रति पूर्वाग्रह के कारण वह उनके दमन के लिए एक शक्तिशाली राजा के पद का औचित्य भी बताते हैं । शैतान हिन्दुस्तानियों को नियंत्रण में रखने के लिए एक कठोर और क्रूर स्वभाव का राजा ही चाहिये।

कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि बर्नी राजतंत्र की दुर्बलताओं से सुपरिचित होते हुए भी इसका समर्थन करते हैं, क्योंकि उनके अनुसार समाज में व्यवस्था बनाये रखने का अन्य कोई उपाय नहीं है। लेकिन वह निरन्तर राजा को यह भी राय देते हैं कि उसके दिल में ईश्वर के प्रति भक्ति हो और अपने कार्यों हेतु उसकी कृपा माँगने की आवश्यकता महसूस करे।

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