राममोहन राय के राजनीतिक विचार

राममोहन राय के राजनीतिक विचार

राममोहन राय के राजनीतिक विचार

(THE POLITICAL THOUGHTS OF RAM MOHAN ROY)

“सारी मानव जाति एक विराट परिवार है, असंख्य राष्ट्र तथा उपजातियाँ केवल शाखाएँ हैं। अतः प्रत्येक देश के विदग्ध लोग यह महसूस करते हैं कि सारी बाधाओं को हटाते हुए प्रत्येक दिशाओं से मानवीय मेल-मिलाप को प्रोत्साहित करना तथा सरल बनाना होगा ताकि सारी मानव जाति की पारस्परिक सुविधाओं और आनन्द में वृद्धि हो।”           

-राममोहन राय

राजा राममोहन राय गोखले, तिलक, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी आदि की भाँति एक राजनीतिज्ञ नहीं थे, तथापि देश-विदेश की राजनीति में उनकी गहरी दिलचस्पी थी और उन्हें यूरोप की-विशेष रूप से इंग्लैण्ड की राजनीति का अच्छा ज्ञान था। भारत के राजनीतिक जागरण में उन्होंने जो योग दिया, उसे भुलाया नहीं जा सकता। भारत में सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना जगाने के कारण ही उन्हें ‘नये भारत का सन्देशवाहक’ (Prophet of New India) कहा जाता है। सुरेन्द्रनाथ बनर्जी ने उन्हें ‘भारत में सांविधानिक आन्दोलन का जनक’ (Father of Constitutional Agitation in India) कहा था। राममोहन राय से पूर्व सम्पूर्ण देश की तो क्या बात, कलकत्ता में भी कोई राजनीतिक जीवन नहीं था। जनता में अपने नागरिक अधिकारों के प्रति कोई विचार नहीं था और विदेशी हुकूमत के सामने अपने शिकायतें रखने की बात कोई सोचता भी नहीं था। लेकिन ऐसे प्रारम्भिक काल में भी राजा राममोहन राय ने आश्चर्यजनक रूप से ओजपूर्ण राजनीतिक विचार व्यक्त किये और अपने राजनीतिक आन्दोलनों को वे शासन सत्ता के केन्द्र तक ले गये। उन्होंने देश की राजनीति के विभिन्न पक्षों पर ध्यान दिया और समस्याओं के बुद्धिमत्तापूर्ण निदान प्रस्तुत किए। उन्हें चाहे अपने निदानों और सुझावों के क्रियान्वयन में सफलता प्राप्त नहीं हुई, पर उस युग में अधिक महत्व तो इस बात का था कि एक भारतीय ने प्रशासकीय दोषों के प्रति अपनी और भारतीय जनत की चिन्ता अपने राजनीतिक प्रभुओं के समक्ष रख दी।

राजा रामोहन राय ने समय-समय पर जो राजनीतिक विचार प्रकट किये उनसे हमें उनके राजनीतिक चिन्तन का बोध होता है। अध्ययन-सुविधा की दृष्टि से राय के राजनीतिक चिन्तन को हम विभिन्न शीर्षकों में विभाजित कर सकते हैं।

राजा रामोहन राय ने ‘लॉक, ग्रोशस तथा टॉसस पेन की भाँति प्राकृतिक अधिकारों की पवित्रता को स्वीकार किया। उन्हें जीवन, स्वतन्त्रता तथा सम्पत्ति धारण करने के प्राकृतिक अधिकारों में ही विश्वास नहीं था, अपितु उन्होंने व्यक्ति के नैतिक अधिकारों का भी समर्थन किया। किन्तु उन्होंने अपने प्राकृतिक अधिकारों के सिद्धान्त को प्रचलित भारतीय लोक संग्रह के आदर्श को ढाँचे के अन्तर्गत ही रखा। अतः अधिकारों और स्वतन्त्रता के व्यक्तिवादी सिद्धान्त के समर्थक होते हुए भी उन्होंने आग्रह किया कि राज्य को समाज सुधार तथा शैक्षिक पुनर्निर्माण के लिए कानून बनाना चाहिए। इस प्रकार उन्होंने प्राकृतिक अधिकारों के साथ सामाजिक उपयोगिता तथा मानव कल्याण की धारणाओं का संयोग कर दिया। वैयक्तिक स्वतन्त्रता के महान् समर्थक होते हुए भी राज्य के कार्य क्षेत्र के बारे में राममोहन राय के विचार उदारतापूर्ण थे और वे चाहते थे कि राज्य को निर्बल तथा असहाय व्यक्तियों की रक्षा करनी चाहिए। राज्य का कर्त्तव्य है कि वह जनता की सामाजिक, सांस्कृतिक, नैतिक और राजनीतिक दशाओं के सुधार के लिए प्रयत्न करे।

वास्तव में राममोहन राय के चिन्तन को एक उदारवादी-मितवादी सुधारक का योगदान कहना अनुचित नहीं होगा। उन्होंने अपने इन राजनीतिक मूल्यों का कभी परित्याग नहीं किया। फ्रांस की राज्य क्रान्ति के समय उनकी आयु 17 वर्ष की थी, अतः इस क्रान्ति के महान् मूल्यों का उन पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। वे व्यक्ति की गरिमा के संरक्षण के पोषक थे और स्वतन्त्रता, अधिकार, अवसर, न्याय आदि राजनीतिक वरदानों को सर्वोच्च मानते थे। राज्य के कार्य क्षेत्र को इन्हीं वरदानों की दिशा में प्रेरित करने की वे आकांक्षा करते थे। उनके चिन्तन में व्यक्ति एवं राज्य एक दूसरे के पूरक थे, विरुद्ध नहीं।

वाल्टेयर, माँटेस्क्यू और रूसो की भाँति राममोहन को स्वतन्त्रता के आदर्श से उत्कट प्रेम था। वैयक्तिक स्वतन्त्रता पर प्रबल आग्रह के साथ निजी वार्ता में वे प्रायः राष्ट्रीय मुक्ति के आदर्श की भी चर्चा किया करते थे। उनका कहना था कि स्वतन्त्रता मानव मात्र के लिए एक बहुमूल्य वस्तु है, किन्तु राष्ट्र के लिए भी आवश्यक है। 11 अगस्त, 1821 को उन्होंने ‘कलकत्ता जनरल’ के सम्पादक जे० एस० बकिंघम को लिखे अपने पत्र में विश्वास प्रकट किया था कि अन्ततोगत्वा यूरोपीय राष्ट्र तथा एशियाई उपनिवेश निश्चय ही अपनी स्वाधीनता प्राप्त कर लेंगे। राजा राममोहन राय को स्वतन्त्रता की माँग से गहरी सहानुभूति थी, चाहे वह माँग विश्व के किसी भी कोने में उठी हो । यही कारण था कि जब 1820 में नेपिल्स में निरंकुश शासन की पुनः स्थापना हो गई तो राजा रामोहन को भारी क्षोभ हुआ और उन्होंने जे० एस० बकिंधम के साथ अपना एक पूर्व-निर्धारित कार्यक्रम रद्द कर दिया तथा उन्हें सूचित किया कि यूरोप से प्राप्त ताजा समाचारों ने उनके मन को बहुत खिन्न कर दिया है तथापि उनका दृढ़ विश्वास है कि स्वतन्त्रता के शत्रु और निरंकुशता के मित्र अन्तिम रूप से न तो कभी सफल हुए हैं और न कभी होंगे। राष्ट्रीय स्वतन्त्रता के प्रति राजा राममोहन में इतनी प्रबल लगन थी कि यूरोप जाते समय मार्ग में जब उन्होंने एक फ्रांसीसी स्टीमर देखा तो उनके मुख से ये शब्द फूट पड़े-“यदि मैं स्वतन्त्र फ्रांसीसी राष्ट्र के जहाज में इंग्लैण्ड जा सकता तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होती।” 1821 में राजा फर्डीनेण्ड द्वारा जनता को संविधान दिये जाने के उपलक्ष में राजा राममोहन ने एक सार्वजनिक भोज का आयोजन किया और 1830 की क्रान्ति से उनके हृदय को सन्तोष हुआ । वास्तव में राममोहन राय किसी भी प्रकार के निरंकुश शासन को हेय समझते थे और स्वतन्त्रता की इच्छुक जनता के प्रति संवेदनशील थे।

जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में राममोहन राय की विभिन्न क्रियाओं का स्त्रोत ‘स्वतन्त्रता के प्रति उनका महान् प्रेम’ ही था। धर्म के क्षेत्र में इसने मूर्ति-पूजा के विरुद्ध आन्दोलन का स्वरूप धारण किया, सामाजिक सुधार के क्षेत्र में उसने सती एवं बहुपत्नी विवाह की कुप्रथाओं के विरुद्ध जिहाद बोला, शैक्षणिक क्षेत्र में इसने स्वतन्त्रता से ओत-प्रोत पाश्चात्य पद्धति को मान्यता दी और राजनीतिक क्षेत्र में इसने प्रेस स्वातन्त्र्य, नारी-अधिकार, कार्यपालिका से न्यायपालिका के पृथक्करण आदि की माँगों का रूप धारण किया। स्पष्ट है कि राजा राममोहन का स्वातन्त्र्य प्रेम उनके जीवन के महान् कार्यों का नियामक बन गया। राजा राममोहन ने स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए व्यक्ति से आत्म-अनुशासित होने की बात कही। राष्ट्रीय स्वाधीनता के सन्दर्भ में राजा राममोहन की आकाँक्षा और निष्ठा को इंगित करते हुए बिपिनचन्द्र पाल ने लिखा है-“राजा राममोहन राय ही वह प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने भारत की स्वतन्त्रता का सन्देश प्रसारित किया। “उन्होंने अनिश्चित काल तक के लिए भारत की पराधीनता की कभी कल्पना नहीं की थी। वे चाहते थे कि अंग्रेजों को केवल 40 वर्ष तक ही इस देश में अपना सांस्कृतिक और मानवीय मिशन चलाना चाहिए। इस बीच भारत विश्व के अन्य देशों के साथ सम्पर्क में आकर प्रजातन्त्रात्मक शासन की स्थापना कर सकता है और इस प्रकार विश्व के अन्य सभ्य तथा स्वतन्त्र राष्ट्रों के समकक्ष पहुँच सकता है ।”

यहाँ प्रश्न उठता है कि राममोहन राय की उपरोक्त धारणाओं के आधार पर क्या हम उन्हें ‘स्वराज्य का पैगम्बर’ मान लें? इस सन्दर्भ में डॉ० विश्वनाथ प्रासद वर्मा ने अपना तार्किक विवेचन प्रस्तुत किया है। उन्होंने ‘ब्राह्मनिकल मैगजीन’ (Brahmanical Magazine) नामक पत्रिका में 15 नवम्बर, 1823 को प्रकाशित उस लेख का उल्लेख किया है जो राजा राममोहन राय ने पण्डित शिवप्रसाद शर्मा के नाम से लिखा था। इसमें उन्होंने लिखा था-“हम अपनी गम्भीर भक्ति-भावना से अन्य वस्तुओं के साथ-साथ ईश्वर को भारत में अंग्रेजी शासन के वरदान के लिए प्रायः विनम्र धन्यवाद अर्पित किया करते हैं और प्रार्थना करते हैं कि वह शासन आगे आने वाली अनेक शताब्दियों तक अपना कृपापूर्ण कार्य करता रहे ।” डॉ० वर्मा का तर्कपूर्ण उत्तर है कि-

“यह कुछ आश्चर्य की-सी बात है कि जिस व्यक्ति का देश के कुछ प्रशंसा करने वाले लोग आधुनिक भारत का निर्माता अभिनन्दन करते हैं, और जिसे यूनान तथा नेपिल्स की राजनीतिक स्वाधीनता में गहरी अभिरुचि थी, वही व्यक्ति भारत में ब्रिटिश शासन के शताब्दियों तक कायम रहने के लिए प्रार्थना करे । इसमें सन्देह नहीं कि राममोहन राय को अपने देश से प्रेम था। वे धर्म-शास्त्रों के गम्भीर विद्वान और शक्तिशाली समाज-सुधारक थे, किन्तु वे शहीद नहीं थे। भारतीय इतिहास के विद्यार्थियों को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस समय मराठे (1818) और सिक्ख स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे-उनका, संघर्ष कितना ही स्थानीय तथा सीमित क्यों न रहा हो उसी समय यह ‘आधुनिक भारत का जनक’ ब्रिटिश शासन के गुणगान कर रहा था। राममोहन बौद्धिक तथा सामाजिक मुक्ति के समर्थक थे और राजनीतिक स्वतन्त्रता में भी उनका विश्वास था, किन्तु उन्हें स्वराज का पैगम्बर नहीं कहा जा सकता। आधुनिक भारत में राजनीतिक स्वाधीनता के आदर्श की जड़ें रोपने वाले वास्तव में फड़के, चाकेकर, लोकमान्य तिलक आदि महाराष्ट्रीय नेता थे जिनकी विचारधारा सत्रहवीं तथा अठारहवीं शताब्दी के स्वाधीनता सैनिकों की विचाराधारा का अविच्छिन्न प्रवाह थी। भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम पर यूरोप के विचारों और आन्दोलनों का जो गम्भीर प्रभाव पड़ा उसका हम कम मूल्यांकन नहीं कर रहे हैं। फिर भी यदि हम राजनीतिक स्वतन्त्रता की जड़ें भारत में ढूँढना चाहें तो वे हमें केवल राजा राममोहन राय की रचनाओं में नहीं मिलेंगी, अपितु उनके लिए हमें शिवाजी के राजतन्त्र में निहित स्वराज के आदर्श की भूमिका को समझना होगा। कालान्तर में स्वराज्य की पुरानी धारणा में भारी रूपान्तर हो गया और दादाभाई नौरोजी, बिपिनचन्द्र पाल तथा चितरंजन दास ने अपने लेखों तथा भाषणों द्वारा उसे महत्वपूर्ण विस्तार प्रदान कर दिया, किन्तु जड़ें वही थीं। राजा राममोहन राय बौद्धिक तथा सामाजिक मुक्ति के जिन आदर्शों को प्रतिपादित किया और लोकप्रिय बनाया उनके महत्व को हम स्वीकार करते हैं, किन्तु हम राजा के उन उत्साही प्रशंसकों से सहमत नहीं हैं जो उन्हें राजनीतिक स्वाधीनता का सन्देशवाहक मानते हैं।”

राजा राममोहन को ‘राजनीतिक स्वाधीनता का सन्देशवाहक’ बताना चाहे अतिश्योक्तिपूर्ण हो, तथापि इसमें सन्देह नहीं कि उनका अपने देशवासियों की योग्यता, बुद्धि एवं सामर्थ्य के सम्बन्ध में यह दृढ़ विश्वास था कि वे भी उस ऊँचाई तक पहुँच सकते हैं, जिस तक अन्य कोई सभ्य राष्ट्र पहुँचा है। जैसा कि बिपिनचन्द्र पाल ने कहा है, “व्यक्तिगत स्वाभिमान और राष्ट्रीय स्वाभिमान दो ऐसी सर्वाधिक प्रबल शक्तियाँ थीं जो अन्य जातियों और सुंसस्कृतियों के लोगों के साथ राममोहन के सम्बन्धों का स्वरूप निर्धारण करती थीं।” वे किसी भी दिशा से किसी के भी द्वारा भारतीयों के बारे में की गई अपमानजनक आलोचना को चुनौती दिये बिना कभी नहीं रहे। राममोहन के एक विरोधी ने एक बार यह कह दिया था कि भारतीय “एशियाई व्यक्तित्व के कारण गिरे हुए हैं” तथा भारत “ज्ञान के प्रकाश की एक किरण के लिए” भी इंग्लैण्ड का ऋणी है। उसकी प्रगल्भता का मुँह तोड़ उत्तर देते हुए राममोहन ने कहा कि ईसाइयों के लगभग सभी पूज्य पैगम्बर और पादरी एशियाई थे। ज्ञानाभाव के बारे में केवल इतना कहा जा सकता है कि अंग्रेजों ने उपयोगी यन्त्रकला हमें दी है, जिसके लिए हम उनके कृतज्ञ हैं, परन्तु इससे यह तथ्य नहीं बदलता कि “ज्ञान के प्रथम प्रकाश के लिए सारा संसार हमारे पूर्वजों का ऋणी है ।” दर्शन और साहित्य के क्षेत्र में भारत का अंशदान सर्वोत्कृष्ट है। एक ओर जहाँ राममोहन अपनी पूरी शक्ति और विविध उपायों से अपने देशवासियों में आत्मविश्वास और स्वाभिमान के भाव भरने की कोशिश कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर, वे ऐसे किसी एक प्रशासनिक कानून के विरुद्ध लोहा लेने में नहीं चूके जो राष्ट्रहित के लिए विघातक प्रतीत होता था।

प्रेस एवं भाषण की स्वतन्त्रता

राजा राममोहन राय प्रेस एवं भाषण की स्वतन्त्रता के महान् समर्थक थे। उनका कहना था कि मानव-उन्नति के लिए ज्ञान की ज्योति से मन के अन्धकार को दूर करना आवश्यक है और समाचार-पत्र इस दिशा में महती भूमिका निभा सकती हैं। इन्हीं विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने निश्चय किया था कि समाचार-पत्र द्वारा वे लोगों में शिक्षा और ज्ञान का प्रसार करेंगे ताकि जनमत तैयार किया जा सके और लोगों में समानता, भ्रातृत्व और स्वाधीनता की भावना जगाई जा सके। उनका पत्र ‘संवाद कौमुदी’ बंगला तथा अंग्रेजी भाषा में और दूसरा पत्र ‘मिरात उल-अखबार’ फारसी भाषा में प्रकाशित होता था। वे समाचार-पत्रों में निर्भीक और निष्पक्ष समीक्षा के पक्ष में थे। ‘मिरात-उल-अखबार’ में उन्होंने इंग्लैण्ड द्वारा आयरलैण्ड के प्रति किये गये अन्याय और विरोध में जो विचार प्रकट किये और आयरलैण्ड में अकाल के समय जो चन्दा एकत्रित करके भेजा, उससे उन्हें कुछ समय के लिए अंग्रेजी सरकार का असन्तोष पात्र भी बनना पड़ा।

राजा राममोहन राय प्रेस की स्वतन्त्रता के महत्व को भली-भाँति समझते थे। 1823 में हाईकोर्ट के सामने एक पिटीशन प्रस्तुत करके उन्होंने प्रेस की स्वतन्त्रता की माँग की थी। उस समय गवर्नर जनरल ने प्रेस आर्डिनेन्स जारी कर दिया था कि समाचार-पत्र निकालने के लिए सरकार से विशेष लाइसेंस लेना पड़ेगा। इस प्रतिबन्ध के मूल में यह विचार निहित था कि केवल उन्हीं लोगों को समाचार पत्र निकालने की अनुमति दी जाये जो सरकार के प्रति निष्ठावान हों। राममोहन राय ने अपने कुछ साथियों से मिलकर सर्वोच्च न्यायालय में प्रेस की स्वतन्त्रता के लिए जो अपील की वह निष्फल रही और तब राय ने अपनी अपील ‘किंग-इन-कौंसिल में की, वह भी निष्फल रही। राय का मुख्य तर्क था कि प्रेस की स्वतन्त्रता शासक और शासित दोनों के लिए हितकर है। शासन के लिए यह इस दृष्टि से लाभप्रद है कि उसे अपने शासन-नीति के बारे में जनता के विभिन्न विचारों का पता चल जाता है और जनता शासकों की भूलों की ओर उनका ध्यान आकृष्ट कर सकती है। जनता के लिए प्रेस की स्वतन्त्रता इस दृष्टि से हितकर है कि इससे ज्ञान का प्रसार होता है जिससे मानसिक विकास में सहायता मिलती है। राजा राममोहन ने इस तर्क को ठुकरा दिया कि स्वतन्त्र प्रेस सरकार के विरुद्ध संगठित होने का साधन प्रस्तुत करता है। उन्होंने कहा कि विश्व के किसी भी भाग में स्वतन्त्र प्रेस ने कभी कोई क्रान्ति उत्पन्न नहीं की है, अपितु क्रान्ति को उत्पन्न करने वाले असन्तोष के कारणों को दूर करने में सहायता पहुँचाई है। राममोहन ने कहा कि जो सरकार अपने इरादों के औचित्य के प्रति विश्वस्त है, उसे एक प्रेस द्वारा सार्वजनिक जाँच से डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। जब राममोहन राय की अपील अन्तिम रूप से ठुकरा दी गई तो क्षुब्ध होकर उन्होंने अपना समाचार पत्र ‘मिरात-उल-अखबार’ बन्द कर दिया। सरकार की अनुचित शर्तों के अधीन अपने पत्र को चलाना उन्होंने आत्म-सम्मान के विरुद्ध समझा।

यह ज्ञातव्य है कि राममोहन राय प्रेस की अपरिमित स्वतन्त्रता के समर्थक नहीं थे वरन् उस पर समुचित प्रतिबन्धों को आवश्यक समझते थे। प्रेस की स्वतन्त्रता की माँग वे सांविधनिक सरकार को मजबूत बनाने के लिए करते थे, सरकार के विरुद्ध विषवमन करने अथवा उसे नष्ट करने के लिए नहीं। उनका कहना था कि समाचार-पत्र का उद्देश्य तो जनता और शासन के मध्य एक कड़ी का काम करना और पिछड़े हुए समाज को नई रोशनी देना है। राममोहन राय की पत्रकारिता का मूल्यांकन करते हुए के० दामोदरन ने लिखा है-“उनकी पत्रकारिता ने देश के समस्त भागों में राष्ट्रीय पुनर्जागरण के सन्देश को पहुँचा दिया उनका सन्देश मानवता और विश्व-बन्धुत्व का सन्देश था।”

देश की न्यायिक व्यवस्था

राजा राममोहन राय प्रशासित समाज की आकांक्षाओं के प्रति जागरूक थे। अतः उनकी मान्यता थी कि न्याय की उपलब्धि में ही न्याय का औचित्य है। न्याय की उपलब्धि के लिए उनकी दृष्टि में न्यायिक संस्थाओं, न्यायिक संगठन और न्यायिक प्रक्रिया का जन-कल्याणकारी होना आवश्यक था। इसमें सन्देह नहीं कि राजा राममोहन प्रथम भारतीय थे जिन्होंने शासन और न्याय विभागों को पृथक् करने की आवाज उठाई और ब्रिटिश संसद् की विशिष्ट समिति के सम्मुख महत्वपूर्ण मसविदे प्रस्तुत किये। ‘भारत में राजस्व और न्यायिक व्यवस्था’ (An Exposition of the Revenue and Judicial System of India) नामक अपनी पुस्तिका में उन्होंने निर्भीकता से न्यायिक प्रशासन का मूल्यांकन किया और भारत में न्यायिक व्यवस्था के स्वरूप के बारे में अपने विचार रखे। उन्होंने भारत में न्यायिक व्यवस्था, नागरिक अधिकारों, कानूनों आदि के सम्बन्ध में विभिन्न सुधारों का सुझाव दिया। बी० बी० मजूमदार के शब्दों में, “जीवन और स्वतन्त्रता को सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने कानूनों को संहिताबद्ध करने, शक्ति पृथक्करण, न्यायाधीशों की ईमानदारी, कुशलता, स्वाधीनता, ज्यूरी प्रणाली तथा बन्दी प्रत्यक्षीकरण अधिनियम को अपनाने और अधिकारियों के कानूनी उत्तरदायित्व की माँग की। उनका विचार था कि दीवानी और फौजदारी कानूनों को इस तरह संहिताबद्ध कर दिया जाय कि मुसलमानों व ईसाइयों को किसी भी प्रामाणिक पुस्तक का हवाला देकर व्याख्या करने के आवश्यकता न रहे। शक्ति पृथक्करण उनके लिए अच्छे शासन का एक मूल सिद्धान्त था “कलेक्टर के पद के साथ प्रबन्धकारिणी और न्यायिक शक्ति के सम्मिश्रण का उन्होंने जोरदार विरोध किया।”

राजा राममोहन राय ने न्यायिक प्रशासन की कुशलता में सुधार के लिए विभिन्न सुझाव भेजे और इस बात पर बल दिया कि कानून की नजरों में सभी लोग समान होने चाहिए । उन्होंने पुरातन भारतीय व्यवस्था में प्रचलित न्याय पंचायत का समर्थन करते हुए प्रस्तावित किया कि उसी प्रकार की जन-सम्बद्ध संस्था द्वारा ही न्यायिक प्रणाली चलनी चाहिए। जूरी प्रथा के बारे में उनका विचार था कि अवकाश प्राप्त और अनुभवी भारतीय विधि-विशेषज्ञों को जूरी का सदस्य बनाना चाहिए। उनका विचार था कि भारतीय सन्दर्भ को प्राथमिकता देते हुए जूरी संहिता का निर्माण होना चाहिए, तभी भारत में स्वतन्त्रता और समानता की उपलब्धि की दिशा में बढ़ा जा सकेगा। विधि-संहिता जटिल न होकर स्पष्ट, सरल और जन-कल्याण की संरक्षिका होनी चाहिए। भारतीय जन-समाज को एकसूत्री कानून की उपलब्धियाँ प्राप्त होनी चाहिए। राममोहन ने न्यायिक औचित्य के

संरक्षण हेतु कम्पनी सरकार के 1827 के उस अधिनियम का विरोध किया जिसमें भारत में जूरी द्वारा विचार की प्रथा प्रचलित की गई, किन्तु यह निश्चित किया गया कि ईसाइयों के मुकदमों का विचार केवल ईसाई ही करेंगे, लेकिन हिन्दू या मुसलमानों के मुकदमे में जब विचार करना होगा तब ईसाइयों को भी उसमें भाग लेने का अधिकार होगा । राममोहन को यह व्यवस्था उचित नहीं लगी। इस जूरी व्यवस्था का विरोध उन्होंने एक आवेदन के रूप में किया जिस पर देश के प्रसिद्ध हिन्दू और मुसलमानों के हस्ताक्षर थे। यह आवेदन-पत्र ब्रिटिश संसद के समक्ष 5 जून, 1829 को प्रस्तुत किया गया। लेकिन विदेशी हुकूमत से किसी अनुकूल आदेश की आशा करना व्यर्थ था। पर राममोहन राय ने अपना संघर्ष छोड़ा नहीं। जब वे इंग्लैण्ड गये तो उन्होंने अनेक विद्वानों के साथ इस सम्बन्ध में विचार-विमर्श किया और संसद् में भी इस विषय की चर्चा उठाई गई। अन्त में पर्याप्त वाद-विवाद के बाद 1833 में चार्ल्स ग्रान्ट का जूरी बिल पास किया गया जिसके द्वारा 1827 के जूरी कानून में जो आपत्तिजनक अंश था वह रद्द कर दिया गया। चार्टर एक्ट, 1833 के निर्माण के समय राजा राममोहन को ब्रिटिश संसद् की प्रवर समिति के समक्ष अपने विचार प्रस्तुत करने का अवसर मिला। उन्होंने भारत में प्रचलित न्यायिक

और माल की विवेचना प्रस्तुत की तथा प्रशासन को न्यायिक व्यवस्था से अलग करने की माँग करते हुए समिति के सामने ऐसे अनेक सुझाव पेश किये जो शासक के रूप में भारतीयों के लिए हितकारी सिद्ध हो सके । राजा राममोहन ने इस बात पर बल दिया कि वे ही व्यक्ति न्यायिक अधिकारी बनें जो निष्पक्ष, स्पष्ट और विवेक सम्पन्न तथा निरपेक्ष होकर शासन की हर इकाई के प्रति ईमानदार रह सकें।

मानवतावाद, विश्व भ्रातृत्व और सार्वभौम धर्म

राजा राममोहन राय मानवतावाद की प्रतिमूर्ति थे, विश्व भ्रातृत्व के उपासक थे और धार्मिक मत-मतान्तरों से ऊपर उठकर सार्वभौम धर्म के चिन्तक थे। मोनियर विलयम्स के अनुसार सम्भवत: “वे दुनिया के सबसे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने पूरी गम्भीरता, निष्ठा और लगन से दुनियाँ के धर्मों का तुलनात्मक अध्ययन किया तथा उनमें निहित विज्ञान को समझा। हिन्दू, इस्लाम, बौद्ध और ईसाई धर्म में उन्होंने एकता की खोज की और समन्वय का आदर्श रखा। वास्तव में राममाहन राय सम्पूण मानव जाति का आध्यात्मिक एकता और एक विश्वव्यापी धर्म के स्वप्नदृष्टा थे। किन्तु, डॉ० वर्मा के अनुसार “सार्वभौम अथवा विश्वव्यापी धर्म का विचार उनके चिन्तन का अन्तिम साकार रूप नहीं था, अन्त में उन्होंने आध्यात्मिक संश्लेषण की एक आधारभूत योजना निरूपित की और एक परमेश्वर की आराधना पर आधारित धार्मिक अनुभव की एकता पर बल दिया। इस प्रकार उन्होंने कबीर, नानक, दादू, तुकाराम तथा अन्य सन्तों के सामाजिक एवं धार्मिक समन्वय की परम्पराओं को आगे बढ़ाया ।”

राजा राममोहन राय परम्परागत बन्धनों से मुक्ति के पोषक थे। सहयोग, सहिष्णुता और भातृत्व में उनका अगाध विश्वास थ । उनकी मान्यता थी कि सम्पूर्ण मानव समाज एक ही विशाल परिवार है, और विभिन्न राष्ट्र तथा जातियों के लोग सिर्फ उसकी शाखाएँ हैं। उनका कहना था कि सभी देशों के समझदार लोग अनुभव करते हैं कि मानव समाज के बीच पारस्परिक आदान-प्रदान को सहज बनाना चाहिए और उसे प्रोत्साहित करना चाहिए। राजा राममोहन की कामना थी कि “मनुष्य को सहिष्णुता, सहानुभूति तथा बुद्धि पर आधारित समाज का निर्माण करने के लिए स्वतन्त्र छोड़ दिया जाय ।”

राजा राममोहन ने एक ऐसे विश्व संगठन की कल्पना की थी जिसमें दो राष्ट्रों के बीच के मतभेदों को पंच-फैसले द्वारा निबटाने के लिए भेजा जा सके। उनके ही शब्दों में-“इस प्रकार की काँग्रेस (विश्व संगठन) से सभी प्रकार के मतभेद, चाहे वे राजनीतिक हों, या व्यापारिक, मित्रतापूर्वक एवं न्यायपूर्वक तय किये जा सकते हैं और इसमें दोनों ही पक्षों को सन्तोष हो सकता है ।” राममोहन राय की मृत्यु के बाद लगभग डेढ़ शताब्दी बीत चुकी है तथापि विश्व संगठन की उनकी कल्पना आज पूवपिक्षा भी कहीं अधिक उपयुक्त और सही है। हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि आज के आणविक युग में, आज की अन्तर्राष्ट्रीय राजनीतिक जटिलताओं के युग में हमारे सामने दो स्पष्ट विकल्प हैं- या तो विश्व सरकार अथवा ऐसा ही कोई समन्वयकारी व्यवस्था स्थापित हो या फिर हम संघर्षों और विनाश के मार्ग पर चलते रहें।

वास्तव में राममोहन राय का अन्तर्राष्ट्रीयतावाद बहुत ऊँचे दर्जे पर था। वे परमात्मा से जब प्रार्थना करते थे तो उसमें भी यह अन्तराष्ट्रीयतावाद झलकता था-“परमात्मा, धर्म को ऐसा बना दे जो मनुष्य के बीच भेदों और घृणा को नष्ट करने वाला हो और मानव जाति की एकता तथा शान्ति का प्रेरक हो ।” यदि राममोहन राय के दिखाये मार्ग पर हम चलें तो निःसन्देह एक आदर्श समाज का निर्माण कर सकते हैं जिसमें साम्प्रदायिक वैमनस्यता और धार्मिक कटुता का कोई स्थान न होगा।

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