महाभारत युग में राज्य के कार्य

महाभारत युग 

महाभारत युग में राज्य के कार्य

महाभारत काल में प्रचलित राजनीतिक व्यवस्थाओं और राजा के कर्तव्यों के संदर्भ में यह स्वीकार किया गया है कि राजा विभिन्न अवस्थाओं मे अग्निरूप, कुबेररूप, यमरूप और मृत्युरूप माना जाता था। जो राजा धर्मानुकूल और न्यायपूर्ण आचरण करता हो, वही राजपद का वास्तविक अधिकारी माना जाता था। राजा का प्रमुख कार्य धर्म के अनुसार शासन प्रबंध कर, प्रजा की हितसाधना, रक्षा और लोकरंजन करना है। महाभारत के शांतिपर्व के अनुसार राजा ही प्राणियों का रक्षक और विनाशक होता है। राजा के धर्मात्मा होने पर प्रजा की रक्षा और प्रगति होती है तथा उसके अधर्मी होने पर प्रजा का विनाश होता है। महाभारत युग की मान्यता के अनुसार कष्ट देने वाले राजा की हत्या कर देना घृणित नहीं है।

अरक्षितारं हर्तारं विलेप्तारमनायकम् ।

तं वै राजकत्रिन्युः प्रजा सन्नध्ये निघृणम् ॥

अर्थात् राजा अपनी प्रजा का नेता होता था और उसे प्रजा की सुरक्षा, कष्ट निवारण, प्रजापालन, न्यायपूर्ण व्यवहार, प्रजाहित-साधन और सभी प्रकार के विकास कार्यों को करना पड़ता था। महाभारत के शांतिपर्व में राजा के कार्यों का उल्लेख इस प्रकार किया गया है- कृषि योग्य भूमि तैयार कराना, ग्राम या नगर के पास घोष इत्यादि में पशुओं के निवास की व्यवस्था कराना, आपात स्थिति में कृषकों की सहायता करना, सड़कों का निर्मा करना, यज्ञ करना, दान देना, शांति स्थापित करना, प्रजा के भौतिक तथा नैतिक उत्थान में सहायता करना और सहयोग देना। महाभारत काल की मान्यता के अनुसार यदि राजा अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करता है तो वह अधार्मिक हो जाता है और प्रजा उसे सिंहासनाच्युत कर सकती है।

शासन-प्रबंध-

महाभारत काल में सुव्यवस्थित ढंग से शासन संचालित करने के लिए राज्य को विभिन्न भागों में बाँट दिया गया था तथा प्रत्येक भाग राज्य के उच्च अधिकारियों के अन्तर्गत था। प्रशासन की निम्नतम इकाई ग्राम था। ग्राम में स्थानीय स्वायत्त शासन की व्यवस्था थी जिनका संचालन ग्राम पंचायतों द्वारा होता था। ग्राम का सर्वोच्च अधिकारी ‘ग्रामीण’ कहलाता था। दस ग्रामों के प्रशासन के लिए एक अलग अधिकारी होता था जिसे ‘संग्रामी’ कहा जाता था। इससे ऊपर बीस ग्रामों के लिए एक विंशपति होता था। इससे ऊपर शतनामी एवं अधिपति होता था जो क्रमशः एक सौ और एक हजार ग्रामों की शासन व्यवस्था देखता था। इस तरह राज्य दस, बीस, सौ और एक हजार ग्रामों के समूहों में विभक्त था। महाभारत के सभा पर्व में राजा युधिष्ठिर को यह सुझाव दिया गया था कि वे प्रत्येक ग्राम में पाँच अधिकारी रखें। इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि महाभारत काल में ग्राम-शासन को व्यवस्थित एवं गठित करने के लिए राजा पर्याप्त ध्यान देता था।

मंत्रिपरिषद-शासन-

संचालन की दृष्टि से महाभारत काल में मंत्रिपरिषद का अत्यधिक महत्व था। राजा अपनी राजधानी में शासन सम्बन्धी कार्य मंत्रिपरिषद की सहायता से करता था। महाभारत में परिषद के मंत्रियों की संख्या 36 बताई गई है जिसमें चार ब्राह्मणों के, आठ क्षत्रियों के, इक्कीस वैश्यों के और तीन शूद्रों के वर्ग से शासन-प्रवीण व्यक्ति होते थे। शासन की समस्याओं में राजा इनसे परामर्श लेते थे, परन्तु राज्य-सम्बन्धी गोपनीय विषयों तथा अति महत्वपूर्ण विषयों में राजा केवल अपने मंत्रिमण्डल से ही राय लेता था। मंत्रिमण्डल के सदस्य अंतरंग कोटि के मंत्री होते थे। महाभारत में ऐसे मंत्रियों की संख्या आठ बताई गई है। आमात्य का पद सम्भवतः कुछ कम महत्वपूर्ण रहा होगा। मंत्री एवं आमात्य नीतिकुशल, प्रतिष्ठावान, चरित्रवान और आचारशील व्यक्ति होते थे। राजा का पुरोहित मंत्रिपरिषद और राजा के मध्य कड़ी के रूप में कार्य करता था, इसलिए उसका पद अति महत्वपूर्ण और सम्मानयुक्त होता था। पुरोहित के पद पर धर्मात्मा, विद्वान, बहुश्रुति, नीति निपुण, सत्य-रक्षक, शासन कार्य में कुशल और अधर्म-निवारक ब्राह्मण को रखा जाता था। पुरोहित राजनीति एवं शासन सम्बन्धी कार्यों में परापर्श देने के अतिरिक्त राजकीय यज्ञ, हवन और अन्य धार्मिक कार्यों को करता था।

महाभारत के सभापर्व में शासन के अधिकारियों की संख्या 18 बताई गई है, जो इस प्रकार है-

  1. मंत्री
  2. पुरोहित
  3. युवराज
  4. चमूपति (सेनापति)
  5. द्वारपाल
  6. अन्तर्वेदिक
  7. कारागाराधिकारी
  8. द्रव्यसंचयी
  9. कृत्याकृत्येषुचार्थानां विनियोजक,
  10. प्रदेष्टा (न्यायाधीश)
  11. नगराध्यक्ष
  12. कार्य निर्माणकृत
  13. धर्माध्यक्ष
  14. सभाध्यक्ष
  15. दण्डपाल
  16. दुर्गपाल
  17. राष्ट्रान्तपालक
  18. अटवीपालक

न्याय सम्बन्धी कार्य-

महाभारत काल में राजा सर्वोच्च न्यायाधीश या न्यायाधिपति माना जाता था। उसका न्याय या निर्णय अन्तिम निर्णय माना जाता था। राजा एक मंत्री की सहायता से न्याय कार्य करता था। आवश्यकता के अनुसार न्यायकार्य के लिये अन्य न्यायाधीश भी नियुक्त किये जाते थे। न्याय कार्य के निष्पादन में जाति, कुल, स्थान, सामाजि नियमों, रीति-रिवाजों, परम्पराओं आदि का विशेष ध्यान रखा जाता था। किसी व्यक्ति को निर्दोष प्रमाणित होने के लिए अग्नि और जल-परीक्षा भी देनी पड़ती थी। महाभारत काल में न्याय सरल, सुगम्य और निष्पक्ष रूप में प्राप्त होता था। ग्रामों के छोटे-छोटे विवादों का निर्णय ग्राम पंचायतों की सहायता से पंचनिर्णय द्वारा होता था। अपराधियों को कड़ा दण्ड दिया जाता था। उस समय अपराध अपेक्षाकृत कम होते थे। अपराधियों पर आर्थिक दण्ड भी लगाया जाता था। इस अवधि में न्याय करने में पंचनिर्णय की प्रथा प्रायः सर्वत्र थी।

महाभारत काल में प्रचलित न्याय व्यवस्था में न्यायालयों के क्रियाकलाप में न्यायाधीशों से आशा की जाती थी कि वे मृदुभाषी, मध्यम आयु के, लालच, लापरवाही और अज्ञान जैसे दोषों से दूर रहने वाले हों। न्यायाधीशों अथवा जूरी के सदस्यों को जिन्हें शास्त्रों और प्रथाओं का अच्छा ज्ञान हो, धार्मिक कहा जाता था तथा ये राजा के न्याय-कार्य में सहायता करते थे। महाभारत काल में स्वयं न्यायाधीशों को भी दण्डित करने का उल्लेख है। अकारण ही पक्षकारों को रुष्ट कर देने पर असम्बद्ध बातों को लेकर पक्षकारों को अपमानित करने पर, साथियों को प्रभावित करने पर और किसी पक्ष का साथ देने अथवा उनके अधिकार का हनन करने पर न्यायाधीशों को भी राजा द्वारा दण्ड देने की प्रथा प्रचलित थी।

राजस्व प्रशासन के कार्य-

महाभारत के उद्योगपर्व में इस बात का उल्लेख किया गया है कि राजस्व प्रशासन राजा का महत्वपूर्ण कार्य था। महाभारत के अनुसार राजा से आशा की जाती थी कि वह अपने प्रजा की रक्षा करे, क्योंकि कर-संग्रह की विधि से कभी-कभी करदाता को कठिनाई होती थी, अत: महाभारत में कहा गया है कि राजा को एक मधुमक्खी के समान व्यवहार करना चाहिए, जो फूल को नष्ट किये बिना उसमें से मधुरस ले लेती है। वस्तुतः राज्य प्रशासन का सम्बन्ध भूमि एवं उसके सुधार से, सिंचाई द्वारा कृषि में सुधार से, भूमि के संक्रमण और विक्रय की कार्यविधि से, सूखा तथा अकाल के समय राजकीय सहायता से तथा राजस्व उगाहने की प्रक्रिया एवं अन्य कृषि सम्बन्धी गतिविधियों से था।

महाभारत काल में राज्य की आय का मुख्य स्रोत कृषि आय कर था। महाभारत के शांतिपर्व में राजा को कर सम्बन्धी उपदेश है जिसमें भूमिकर उपज का 1/6 भाग लिये जाने का आदेश है। वाणिज्य तथा उद्योग कर लाभांश पर लिये जाने की परम्परा थी। इसके अतिरिक्त जल कर, नमक कर, अरण्य कर, अपराधियो पर लगाये गये आर्थिक दण्ड, खदानों की सम्पत्ति, पराजित राजाओं से प्राप्त धन, बलि कर और कुछ सामान्य शुल्क आदि भी राजकोष की आय के साधन थे। इसी प्रकार विना उत्तराधिकारी की भूमि या सम्पत्ति भी राजकोष में जमा होती थी। इस काल में राज्य में भूमि पर व्यक्तिगत अधिकार भी मान लिया गया था।

महाभारत के शांतिपर्व में कुछ विशेष आर्थिक व्यवस्थाओं के प्रचलन का भी उल्लेख है। विद्वान ब्राह्मण राजकर से मुक्त होते थे, स्त्रियाँ एवं बालक भी कर से मुक्त होते थे। कर इतना अधिक नहीं लगता था कि प्रजा उसके बोझ से कराहने लगे। कर का उद्देश्य प्रजा की रक्षा और सुख समृद्धि में व्यय होने वाले धन से था । कोषाध्यक्ष एवं राजा सदा इस बात का ध्यान रखते थे कि राज्य का व्यय राज्य की आय से किसी प्रकार भी अधिक न हो।

सैन्य-व्यवस्था-

महाभारत युग के राज्यों में स्वदेशी तथा विदेशी आक्रमणों से रक्षा करने के लिए विशाल सेना रखी जाती थी जो राज्य में शांति-व्यवस्था बनाये रखती थी और आवश्यकतानुसार राज्य-सीमा का विस्तार भी करती थी। यह सेना स्थायी तथा अस्थायी दोनों प्रकार की होती थी। सेना में क्षत्रियों की संख्या प्रायः अधिक होती थी। शूरवीर तथा युद्धकाल में निपुण होने पर ब्राह्मण तथा अन्य वर्ण के लोग भी सेना में सम्मिलित होकर युद्ध में भाग लेते थे। अनार्य केवल पैदल सेना में रहते थे और रथ-चालक प्रायः शूद्र लोग होते थे। सेना के चार अंग होते थे-पैदल, गजदल, अश्वदल और रथदल । इन्हीं चारों अंगों के कारण उस समय सेना को चतुरंगिणी कहते थे। महाभारत के शांतिपर्व में चतुरंगिणी सेना का उल्लेख किया गया है। इसके अतिरिक्त जल सेना, यातायात और गुप्तचर विभाग भी होता था।

महाभारतकाल में राजा ही सेना का सर्वोच्च अधिकारी होता था और उसी के नेतृत्व में युद्ध होते थे। परन्तु सैनिक व्यवस्था और सैन्य संगठन के लिए सेना का एक प्रधान होता था जिसे सेनापति कहते थे। इसके अतिरिक्त अन्य सैनिक अधिकारी भी होते थे जिनके नाम महाभारत के शांति पर्व में वर्णित हैं। सेनापति के पद पर प्रायः राजपरिवार या कुलीनवंश का व्यक्ति होता था। इस काल में अनेक प्रकार के अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग होता था। चक्र और वाणों की तरह अज्ञात प्रक्रिया से जल उठने वाले अस्त्रों का भी प्रयोग होता था । युद्ध में गदा-युद्ध और द्वन्द्व युद्ध की प्रथा भी प्रचलित थी। युद्ध के समय सेना को अनेक आकारों में विभक्त किया जाता था। सेना में व्यूह-रचना की प्रथा भी थी और सेना के सूची, मकर, चक्रादि अनेक व्यूह बनाये जाते थे। महाभारत के प्रमुख धनुर्धर अर्जुन व्यूह-भेदन में प्रवीण थे, परन्तु उनके पुत्र अभिमन्यु को व्यूह-भेदन में अपने प्राणों की बलि देनी पड़ी।

वस्तुतः इस काल तक विशिष्ट युद्धनीति का विकास हो चुका था। महाभारत काल में शस्त्रहीन, कवचहीन, वृद्ध, पतित, भयग्रस्त, स्त्री, नपुंसक, एकपुत्र वाले, अप्रशस्त और शरणागत के साथ युद्ध करना निन्दनीय और वर्जित था। युद्ध-भूमि से भागना कायरता और युद्ध में मर जाना श्रेयस्कर समझा जाता था। इस काल में सूर्यास्त के बाद युद्ध करना सर्वथा वर्जित था। युद्ध के समय घायलों की देखभाल के लिए सभी सुविधायें उपलब्ध थीं और चिकित्सक किसी भी दल में बिना किसी बाधा के आ-जा सकता था। युद्ध-भूमि में वीरगति प्राप्त करने वाले योद्धाओं के परिवार को पेंशन देने का नियम प्रचलित था।

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