कौटिल्य का मन्त्रिपरिषद्

कौटिल्य का मन्त्रिपरिषद्

कौटिल्य का अमात्य या मन्त्रिपरिषद्

(THE COUNCIL OF MINISTERS)

कौटिल्य ने अपने ‘अर्थशास्त्र’ में राजा के लिए मन्त्रिपरिषद् की आवश्यकता पर बहुत बल दिया है। उसके अनुसार राज्य एक रथ है; जैसे रथ एक पहिये से नहीं चल सकता, उसी प्रकार मन्त्रियों की सहायता के बिना अकेला राजा राज्य का संचालन नहीं कर सकता। अतः राजा के लिए यह उचित है कि वह योग्य मन्त्री रखे और उनके परामर्श पर उचित ध्यान दे। कौटिल्य ने सद्भावना पर बल देते हुए यहाँ तक कहा कि, “समस्त कार्यों का प्रारम्भ सद् विषयक मन्त्रणा कर लेने के उपरान्त ही होना चाहिए। उसका विचार है कि मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा किये बिना राजा का कार्य नहीं चल सकता।”

मन्त्र गोपन

मन्त्रणा के सम्बन्ध में कौटिल्य ने मन्त्रणा को गुप्त रखना बहुत अधिक आवश्यक बताया है। कौटिल्य का कथन है कि मन्त्रणा का गुप्त न रहना राजा और मन्त्रिपरिषद् के सदस्यों के कल्याण के लिए घातक होता है। उन्होंने कछुए का उदाहरण देते हुए कहा है कि जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को समेटे रहता है और केवल आवश्यकता पड़ने पर उन्हें बाहर करता है। मन्त्रणा को गुप्त रखने के लिए मन्त्रणा-स्थान इतना एकान्त और सुरक्षित रखना चाहिए कि वहाँ की बातचीत कोई सुने न, आदमी तो तो दूर की बात, पक्षी भी वहाँ न फटक सके । मन्त्रणा गुप्ति हेतु वह सुझाव देता है कि मन्त्रणा अधिक लम्बी न हो और ऐसे व्यक्तियों के साथ मन्त्रणा न की जाय, जिसका राजा अपकार कर चुका. हो अथवा जिनसे इस मन्त्रणा का सम्बन्ध हो। उसके अनुसार मन्त्राधिकारियों को मद, असावधानी, सोते-सोते बड़बड़ाना, काम तृप्ति आदि दुर्गुणों से बचाया जाना चाहिए। मन्त्रणा के बाद जब कोई निर्णय जाय तो उसे कार्य रूप में परिणत करने में विलम्ब नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि विलम्ब से राजकाज में शिथिलता उत्पन्न होती है।

मन्त्रिपरिषद् का गठन

मन्त्रिपरिषद् के गठन के सम्बन्ध में कौटिल्य ने सर्वाधिक बल मन्त्रियों की योग्यता पर दिया है। इस सम्बन्ध में उसने बहुत कठोर और उच्च स्तर निर्धारित किये हैं। उसका विचार है कि सभी प्रकार की क्षमताओं और योग्यताओं से युक्त निष्कलंक व्यक्तियों को ही मन्त्रिपरिषद् में स्थान दिया जाना चाहिए। डॉ० बेनीप्रसाद के शब्दों में, “कौटिल्य के अनुसार निष्कलंक व्यक्तिगत जीवन, बौद्धिक चातुर्य, उचित निर्णय, कर्त्तव्य की उच्च भावना और लोकप्रियता मन्त्रिपरिषद् के लिए आवश्यक योग्यताएँ होनी चाहिए।’ कौटिल्य का विचार है कि किसी व्यक्ति को सहसा ही मन्त्रिपरिषद् का सदस्य नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए।

कौटिल्य ने मन्त्रिपरिषद् के सदस्यों की संख्या निश्चित नहीं की है। इस सम्बन्ध में उनका कहना है कि मन्त्रिपरिषद् के सदस्यों की संख्या समय, परिस्थिति और आवश्यकता के अनुसार होनी चाहिए। उसके अनुसार सामान्यतया 3 या 4 मन्त्रियों के साथ मन्त्रणा की जानी चाहिए। इस सम्बन्ध में यह स्मरणीय है कि अन्य भारतीय आचार्यों जैसे मनु, वृहस्पति और उशान ऋषि ने मन्त्रियों की संख्या इससे काफी अधिक, 8 से 12 के बीच, रखने पर बल दिया है। कौटिल्य मन्त्रियों को पद के अनुसार वेतन देने के पक्ष में है, किन्तु उसके अनुसार मन्त्रियों को इतना वेतन अवश्य ही दिया जाना चाहिए कि उनका परिवार विधिवत् भरण-पोषण कर सके और उन्हें अन्य साधन न अपनाने पड़ें। यदि वेतन न्यून होता है तो अधिकारी कुपित हो जाते हैं जिसके फलस्वरूप राजा और राज्य दोनों ही क्षतिग्रस्त होते हैं।

मन्त्रिपरिषद् द्वारा राजा पर नियन्त्रण

कौटिल्य ने अपने सप्तांग सिद्धान्त में मन्त्रिपरिषद् सहित राज्य के दूसरे 6 अंगों की तुलना में राजा को अधिक महत्वपूर्ण माना है। राजा और मन्त्रिपरिषद् के पारस्परिक सम्बन्ध के विषय में उनका विचार है कि राजा सामान्यतया मन्त्रिपरिषद् के बहुमत के आधार पर कार्य करे, किन्तु मन्त्रिपरिषद् की मन्त्रणा कार्य-सिद्धिकर प्रतीत न होने पर राजा अपनी इच्छानुसार कार्य कर सकता है किन्तु इसके साथ ही कौटिल्य इस बात को नहीं भूला है कि एक दुराचारी, भोग-विलास में लिप्त, अयोग्य या अति धार्मिकता के कारण राज्य के हितों की चिन्ता न करने वाले राजा पर मन्त्रिपरिषद् के नियन्त्रण की आवश्यकता होती है। कौटिल्य का कथन है कि यदि राजा ऐसे कार्यों में लग जाय, जो प्रजा के लिए अहितकर हों, तो मन्त्रियों का यह अधिकार अवश्य है कि वे उसके विरुद्ध उठ खड़े हों। कौटिल्य ने राजा को ऐसी परिस्थितियों से सदैव ही बचे रहने की सलाह दी है, जिसके कारण मन्त्री, प्रजा और सेना विद्रोह कर दें।

भारत में प्राचीन इतिहास में ऐसी घटनाओं का उल्लेख मिलता है, जिनके अन्तर्गत राजा द्वारा राज्य के हितों की अवहेलना किये जाने पर मन्त्रिपरिषद् ने राजा का विरोध किया और इसमें सफलता प्राप्त की। ‘दिव्यावदान’ में इस बात का उल्लेख मिलता है कि जब बौद्ध-धर्म के प्रति अति श्रद्धालु राजा अशोक ने बौद्ध संघों को अन्धाधुन्ध दान देना शुरू कर दिया और राजकोष खाली होने लगा तो मन्त्रियों ने युवराज के साथ मिलकर महान् अशोक को ऐसा करने से सफलतापूर्वक रोका। इस प्रकार कौटिल्य के अनुसार विशेष परिस्थितियों में मन्त्रिपरिषद् के द्वारा राजा पर नियन्त्रण रखा जा सकता है और रखा जाना चाहिए। कौटिल्य ने स्वयं मौर्य साम्राज्य के महामन्त्री के रूप में जिस प्रकार से कार्य किया, उससे भी राज्यकाल में महामन्त्री और मन्त्रिपरिषद् की भूमिका का महत्व नितान्त स्पष्ट हो जाता है।

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