महाभारत की रचना और उसके ऐतिहासिक महत्व का मूल्यांकन

महाभारत की रचना 

महाभारत की रचना और उसके ऐतिहासिक महत्व 

भारतीय महाकाव्यों में रामायण के बाद महाभारत का नाम उल्लेखनीय है। यह अठारह पर्यों में विभाजित है और इसके रचनाकार वेदव्यास हैं। महाभारत के रचनाकाल के सम्बन्ध में विद्वान एकमत नहीं हैं। पुसलकर का मत है कि महाभारत का युद्ध 1400 ई० पूर्व० में हुआ। परन्तु भगवतदत्त, लेखराम और प्रो० रामदेव के अनुसार 1978 ई० तक महाभारत का युद्ध हुए लगभग 5079 वर्ष हो चुके थे। जे० राव के मतानुसार महाभारत का युद्ध 3139 ई० पू० हुआ था। कुछ विद्वान महाभारत का समय 2000 ई०पू० से 1000 ई० पू० मानते हैं, तो कुछ विद्वानों ने महाभारत की युद्ध तिथि 1000 ई० पू० माना है। मैकडोनाल्ड ने महाभारत की रचना का समय 500 ई० पू० बताया है। प्रसिद्ध विद्वान विंटर्निज ने इसका समय 400 ई० पू० निर्धारित किया है। आर० जी० भण्डारकर का मत है कि महाभारत की रचना 500 ई० पू० में हुई थी। डॉ० राधाकुमुद मुखर्जी के अनुसार महाभारत पतंजलि के महाभाष्य (दूसरी शताब्दी ई० पू०) तक पूर्ण हो चुका था।

महाभारत के रचनाकाल की ही तरह कुछ विद्वान महाभारत की ऐतिहासिकता पर भी सन्देह करते हैं। महाभारत के अन्तर्गत कौरवों-पाण्डवों के मध्य संघर्ष का वर्णन और यादवों के राजा श्रीकृष्ण के चरित्र का उल्लेख मिलता है। वस्तुतः महाभारत की ऐतिहासिकता में सन्देह व्यक्त करना भारतीय इतिहास के ज्ञान से परे रहना है। यह असत्य पर सत्य की विजय का वृतान्त है। इसका अत्यधिक ऐतिहासिक महत्व है। भाषा तथा शैली की दृष्टि से यह एक श्रेष्ठ रचना है और इसमें महान् राजाओं की उपलब्धियों का वर्णन है। इसे प्राचीन भारतीय सभ्यता और संस्कृति का अक्षय कोष कहा गया है। इसे ‘पंचम वेद’ की संज्ञा दी गई है। कृष्ण द्वारा रचित गीता, जो हिन्दुओं के पवित्र ग्रंथ के रूप में मान्य है, महाभारत का ही एक भाग है। महाभारत में कौरव-पाण्डव संघर्ष के अतिरिक्त भारतीय संस्कृति और हिन्दू धर्म के सर्वांगीण विकास की विवेचनापूर्ण गाथा है। इससे तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक व सांस्कृतिक दशा पर स्पष्ट प्रकाश पड़ता है। महाभारत को दर्शनों का सार और स्मृतियों का विवेचनात्मक ग्रंथ कहा गया है। महाभारत के प्रमुख पात्र युधिष्ठिर को आज भी सत्य का प्रतीक माना जाता है। भीष्म पितामह को पिता के प्रति समर्पित हो जाने वाले पुत्र और दृढ़ प्रतिज्ञा का पालन करने वाले के रूप में मान्यता प्राप्त है। इसमें सावित्री आदर्श भारतीय महिला का प्रतीक है। इस तरह महाभारत महापुरुषों के चरित्र की खान और आदर्शों का प्रचुर भण्डार सजोने वाला एक महाकाव्य है।

महाभारत भारतवर्ष की हिरण्यगर्भा संस्कृति का सर्वाधिक विशाल ग्रंथ है और ज्ञान का महासागर है। भारतीय संस्कृति के सभी महान आदर्श तथा यथार्थ इसमें छिपे हुए हैं। महाभारत का संदेश महर्षि वेदव्यास ने “यतोधर्मस्ततोजयः” नामक महान् सूक्ति के भीतर दिया है जिसमें मानव संस्कृति का सार छिपा है। इसमें मानवता की जय यात्रा का इतिहास है, इसलिए इसको जयकाव्य भी कहते हैं। इसकी दर्शन विषयक वस्तु का गौतम, कणादि, जेमिनी और उपवृहंग आदि आचार्यों ने सूत्ररूप में किया है। भारतीय यथार्थ, आदर्श, कला, ज्ञान-विज्ञान, शास्त्र, दर्शन, धर्म, नीति, आचरण आदि को सिखाने में यह मानो शाश्वत विश्वविद्यालय है। महर्षि वेदव्यास ने भारतीय संस्कृति का नेतृत्व एक आध्यात्मिक आचर्य की तरह ही नहीं, अपितु एक समाजशास्त्रीय इतिहासकार, एक नीतिकार, एक जीवनद्रष्टा ऋषि की तरह भी किया है। इसीलिए महाभारत हमारे जीवन के सर्वोन्मुखी विकास के लिए सबसे बड़ा प्रकाश स्तम्भ है। उसका अनासक्ति योग निष्काम कर्म, ईश्वरीय सम्पदा तथा कर्म, ज्ञान एवं भक्ति का समन्वय-सूत्र सभी देशों एवं सभी कालों का मानो अमर जीवन का सन्देश बन गया है। इसी महाभारत का एक अंश ‘गीता’ एक ऐसा दार्शनिक कोष है कि प्रत्येक युग में प्रत्येक व्यक्ति के लिए उसकी समस्या का समाधान इसमें मिल जाता है। यह ग्रंथ धार्मिक साम्प्रदायिकता के अभाव में धर्म-नेरपेक्षता का संदेश देता है।

जब भी किसी साहित्यकार अथवा राजनेता ने किसी मूल्य की आस्था को अपना आधार बनाया उस पर रामायण या महाभारत की मुहर ने उसे प्रमाणिक बना दिया। भारतीय साहित्य की कविता हो या दर्शन, राजनीति हो या समाजशास्त्र, बका उद्गम स्थल तथा प्रेरणास्त्रोत रामायण या महाभारत में ही मिलता है। चाहे भास हों या कालिदास, भवभूति हों या माघ, निराला हों या जयशंकर प्रसाद, विवेकानन्द हों या गांधी, भारतीय संस्कृति का प्रत्येक निर्माता रामायण या महाभारत को आधार बनाकर आगे बढ़ता है। वस्तुत: महाभारत अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसमें विभिन्न संस्कृतियों का समन्वय, राष्ट्रीय भावना का उदय, धर्म का सच्चा स्वरूप, अपने अधिकारों के प्रति सजग दृष्टि, आसुरी प्रवृत्तियों के दमन का प्रयास, जीवन-दर्शन की यथार्थवादी दृष्टि, महिलाओं में अबलत्व के परित्याग की प्रवृत्ति, पुरुषों के भाग्य-निर्माण की स्थिति एवं विभिन्न नीतियों के व्यावहारिक प्रदर्शन तथा उसके परिणाम, राजधर्म का सर्वांगीण निरूपण आदि विद्यमान हैं। इसमें एक ओर राजधर्म का उपदेश है तो दूसरी ओर मोक्ष धर्म का, एक ओर युद्ध चर्चा है तो दूसरी ओर शांति का प्रयास, एक ओर प्रवृत्ति मार्ग है तो दूसरी ओर निवृत्ति मार्ग की साधना, एक ओर कर्म मार्ग है तो दूसरी ओर ज्ञान मार्ग।

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