सरकारी कम्पनी की लाभ हानि

सरकारी कम्पनी की लाभ हानि

सरकारी कम्पनी की लाभ हानि

सरकारी कम्पनी के लाभ

(Advantage of Govt. Company)

भारतीय लोक उद्योगों के संगठन, प्रबन्ध एवं संचालन के लिये सरकारी कम्पनी प्रारूप के निम्नलिखित लाभ हैं-

  1. स्थापना में सुगमता (Easy to Establish)-

    सरकारी कम्पनियों की स्थापना हेतु किसी पृथक से अधिनियम पारित करने की आवश्यकता नहीं होती है। सरकारी कम्पनी की स्थापना भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1956 के द्वारा की जाती है तथा कम्पनी अधिनियम के प्रावधान ही इन पर लागू होते हैं। अतः सरकारी कम्पनी की स्थापना सुगमतापूर्वक की जा सकती है।

  2. पृथक वैधानिक अस्तित्व (Separate Legal Entity)-

    सरकारी कम्पनी की स्थापना कम्पनी अधिनियम के अनुसार की जाती है। अतः सार्वजनिक निगम की तरह ही सरकारी कम्पनी में भी पृथक् वैधानिक अस्तित्व एवं स्थायित्व का गुण होता है।

  3. विशेष पंजीयन सुविधा (Special Registration Facility)-

    ऐसे लोक उद्योग जो लाभार्जन से अभिप्रेत नहीं होते हैं, कम्पनी अधिनियम की धारा 25 के अन्तर्गत अपना पंजीयन करा सकते हैं। इस अधिनियम के अनुसार जो संस्था अपने सदस्यों को लाभांश देने का निषेध करती है तथा अपनी आय को अपने उद्देश्यों को प्रोत्साहित करने हेतु प्रयुक्त करती हैं, वे अपने नाम के साथ बिना ‘लिमिटेड’ अथवा ‘प्राइवेट लिमिटेड’ शब्द का प्रयोग किये पंजीयन करवा सकती हैं। उदाहरण के लिये नेशनल रिजनल रिसर्च डवलपमेन्ट कारपोरेशन, इण्डियन डेयरी कारपोरेशन तथा ट्रेड फेयर अथोरिटी ऑफ इण्डिया कम्पनी अधिनियम की धारा 25 के अन्तर्गत पंजीकृत सरकारी कम्पनियाँ हैं।

  4. स्वस्थ प्रतिस्पर्धा (Healthy Competition)-

    सरकारी कम्पनी को निजी क्षेत्र में कार्यरत कम्पनियों के समान सेवाएँ तथा वस्तुएँ उपलब्ध करने के कार्य में प्रतिस्पर्धा करनी पड़ती है। इस स्वस्थ प्रतिस्पर्धा से जनता को उचित मूल्य पर श्रेष्ठतम वस्तुएँ प्राप्त होती हैं।

  5. निजी एवं लोक हितों में सामंजस्य (Adjustment of Private and Public Interest)-

    सरकारी कम्पनी में सरकार के अतिरिक्त निजी क्षेत्र के सहभागियों द्वारा भी अंश पूँजी में हिस्सा बँटाये जाने की सुविधा रहती है। इस सम्बन्ध अनुमान समिति तथा कृष्णा मेनन समिति द्वारा भी सिफारिश की गई। इस प्रकार सरकारी कम्पनी निजी एवं लोक क्षेत्र, दोनों की कार्य-क्षमताओं एवं योग्यताओं का लाभ उठा सकती हैं।

  6. व्यावसायिक सिद्धान्तों पर संचालन (Management According to Business Principles)-

    यद्यपि लोक उद्योगों का मूल उद्देश्य सेवा करना होता है, लाभ कमाना नहीं। सरकारी कम्पनी प्रारूप का विकास प्रमुखतः व्यावसायिक आधार पर चलाये जाने वाले लोक उद्योगों के लिये हुआ है। अतः व्यावसायिक प्रकृति के उपक्रमों के लिये सरकारी कम्पनी प्रारूप ही अधिक उपयुक्त है।

  7. प्रबन्धकों में निरन्तर जागरूकता (Continuous Awareness in Management)-

    सरकारी कम्पनी को अपनी वार्षिक रिपोर्ट संसद एवं सम्बन्धित राज्य की विधानसभा में (यदि कोई राज्य सरकार भी भागीदार हो तो) प्रस्तुत करनी पड़ती है। वार्षिक रिपोर्ट पर विचार-विमर्श किया जाता है तथा आवश्यकता होने पर सम्बन्धित मन्त्री से प्रश्न भी पूछे जा सकते हैं। इस पूछताछ में सामान्यतः कम्पनी की प्रगति, कार्य-संचालन, कुशलता तथा नीतियों के क्रियान्वयन के सम्बन्ध में प्रश्न पूछे जाते हैं। अतः प्रबन्धकों को निरन्तर सतर्क तथा जागरूक रहना पड़ता है।

  8. कार्य में लोच (Flexibility in Working)-

    सरकारी कम्पनी के प्रबन्ध में प्रशासनिक जटिलताओं एवं नौकरशाही के वातावरण से मुक्ति के कारण कार्य-संचालन में स्वतन्त्रता तथा लोच रहती है। इसके अतिरिक्त कम्पनी अधिनियम की कुछ धाराओं (धारा 618 तथा 619) को छोड़कर शेष सभी में केन्द्रीय सरकार को आवश्यक परिवर्तन करने तथा उन्हें सरकारी स्तर पर लागू करने अथवा न करने का अधिकार होता है। इन सभी लाभों के कारण सरकारी कम्पनी प्रारूप अत्यन्त ही लोचपूर्ण है।

सरकारी कम्पनी के दोष

(Disadvantage of Govt. Company)

सरकारी कम्पनी के प्रमुख दोष निम्नलिखित हैं

  1. संवैधानिक उत्तरदायित्वों का अपवंचन (Evasion of Constitutional Responsibility)-

    सरकारी कम्पनी लोक उद्योगों के विधानमण्डल के प्रति संवैधानिक उत्तरदायित्वों का अपवंचन करती है। सरकारी कम्पनी का निर्माण बिना संसद के विशिष्ट अनुमोदन के केवल प्रशासनिक कार्यवाही से ही हो जाता है। यद्यपि सरकारी कोषों की व्यवस्था बजट से की जा सकती है। संसद सार्वजनिक निगम के समान सरकारी कम्पनी के विधान अथवा मुख्य प्रयोजन पर भी विचार-विमर्श नहीं करती है। प्रो० रॉब्सन ने सरकारी कम्पनी की आलोचना करते हुए लिखा है कि “यह प्रजातान्त्रिक समाज का उपकरण कतई नहीं है, बल्कि एक ऐसा तरीका है, जिसमें लोक उत्तरदायित्व एवं नियन्त्रण से छुटकारा लाया जा सके।’

  2. भ्रामक अधिनियम (Confused Law)-

    सरकारी कम्पनी को नियन्त्रित करने वाला अधिनियम सामान्यतः अर्थपूर्ण नहीं होता है। व्यवहार में यह अधिनियम सरकारी कम्पनियों से अनेक अनावश्यक और औपचारिकताएँ तथा अन्य कार्यवाही पूरी करने की अपेक्षा करता है। सरकारी कम्पनी पर सरकार का पूर्णतः स्वामित्व होने के बावजूद भी ‘सीमित उत्तरदायित्व’ (Limited Liability) की विचारधारा स्वयं में प्रामक है। हाल ही में सरकारी कम्पनियों द्वारा सरकार से स्वयं को कम्पनी अधिनियम के कुछ अप्रिय प्रावधानों जैसे अधिनियम 43-ए के मुक्त करने हेतु अनुरोध किया गया। सरकार द्वारा इस अनुरोध पर स्वीकृति प्रदान नहीं की गई।

  3. धन का दुरुपयोग (Misutilisation of Funds)-

    सरकारी कम्पनी पर सरकार का प्रत्यक्ष नियन्त्रण न होने तथा पृथक् वैधानिक अस्तित्व होने के कारण कम्पनी के अधिकारीगण सार्वजनिक कोषों का दुरुपयोग करते हैं। अनुमान समिति द्वारा यह अवलोकन किया गया कि “कई बार कम्पनी की स्थापना के समय प्रारम्भिक खर्चों हेतु धनकोष का प्रावधान आकस्मिक निधि से अग्रिम लेकर किया गया है। इसका परिणाम यह होता है कि संसद वस्तुस्थिति से अवगत होने से वंचित रह जाती है। संसद सरकारी कम्पनी की विगत तथा भविष्य के कार्यक्रमों को इंगित करने वाले बजट से भी अवगत नहीं होती है। समिति ने आकस्मिक निधि से बड़ी धनराशि निकालने के औचित्य को निर्दिष्ट करने तथा इसे संसद की सामान्य नियन्त्रण सीमा में लाने की माँग की।”

  4. गोपनीयता का अभाव (Lack of Secrecy)-

    सरकारी कम्पनी को कम्पनी के वर्ष भर के कार्य-कलापों एवं गतिविधियों का संक्षिप्त विवरण वार्षिक रिपोर्ट के रूप में संसद में प्रस्तुत करना अनिवार्य होता है। इस रिपोर्ट पर संसद में बहस होती है तथा अनेक तथ्य, जिन्हें व्यावसायिक दृष्टिकोण से गुप्त रखना आवश्यक होता है, प्रकाश में आ जाते हैं। इस प्रकार कम्पनी की आर्थिक स्थिति का खुलेआम प्रदर्शन होने पर उनकी प्रतिस्पर्धी शक्ति को धक्का लगता है।

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