केन्द्र-राज्य विधायी सम्बन्ध

केन्द्र-राज्य विधायी सम्बन्ध

केन्द्र-राज्य सम्बन्ध

(Centre-State Relation)

भारत के संविधान ने एक शक्तिशाली केन्द्र की स्थापना की है और केन्द्र-राज्य सम्बन्धों के प्रत्येक क्षेत्र में केन्द्र की प्रधानता है। सांविधानिक प्रावधानों में केन्द्र को एक शक्तिशाली साझेदार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। भारतीय संविधान के भाग 11, 12, एवं 13 में केन्द्र-राज्य सम्बन्धों का विस्तार और स्पष्टता के साथ वर्णन किया हैं। संघवाद और भारतीय प्रशासन के सन्दर्भ में केन्द्र-राज्य सम्बन्ध के प्रशासनिक, विधायी, वित्तीय, न्यायिक और योजना सम्बन्धी पहलू मुख्य हैं, जिनका विवेचना इस प्रकार से है-

केन्द्र-राज्य विधायी सम्बन्ध

भारतीय संविधान विधायी शक्तियों का दो श्रेणियों में विभाजन करता है- 1. विधान-विस्तार की दृष्टि से एवं 2. विधान-विषय की दृष्टि से।

विधान-विस्तार की दृष्टि से-

अनुच्छेद 245 के अनुसार, संविधान के उपबन्धों के अधीन रहते हुए संसद् भारत के सम्पूर्ण राज्य-क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकती है। किसी राज्य का विधान-मण्डल उस सम्पूर्ण राज्य के या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकता है। खण्ड (2) में व्यवस्था है कि संसद् द्वारा निर्मित कोई विधि इस कारण अमान्य नहीं समझी जाएगी कि वह भारत के राज्य क्षेत्र से बाहर भी लागू होती है। संसद् की विधायी शक्ति परिपूर्ण शक्ति है। संविधान में उपबन्धित परिसीमाओं के अधीन विधान-मंडल को भूतलक्षी और भविष्यलक्षी दोनों प्रकार के कानून बनाने की शक्ति प्राप्त है।

विधान-विषय की दृष्टि से-

भारतीय संविधान निर्माताओं ने कनाडा के संविधान में समाविष्ट सबल और सशक्त केन्द्र की प्रणाली का ही अनुसरण किया है। भारत में ऐसी परिस्थितियां मौजूद थीं जिनके कारण केन्द्र का सबल होना आवश्यक था, किन्तु संविधान निर्माताओं ने उसमें समवर्ती सूची को भी जोड़ दिया। भारतीय संविधान में शक्तियों के वितरण की योजना और वितरण के सिद्धान्त प्रायः वही हैं जो 1935 के भारत सरकार अधिनियम में थे। सन् 1935 के अधिनियम में तीन सूचियों का समावेश किया गया था-संघ सूची, राज्य-सूची और समवर्ती सूची। स्वाधीन भारत के संविधान में भी शक्ति-विभाजन की ये तीनों सूचियां इस प्रकार हैं-

  1. संघ सूची (Union List)-

    संघ सूची में राष्ट्रीय महत्व के 97 विषय हैं, जैसे- भारत की सुरक्षा, देशीकरण, सेना, अस्त्र-शस्त्र तथा गोला-बारूद, परमाणु शक्ति, वैदेशिक सम्बन्ध, राजनयिक सन्धियां, रेलें, देशीय जल-मार्गों पर जहाजरानी तथा नौ-परिवहन, वायु मार्ग, डाक एवं तार, टेलीफोन एवं बेतार, मुद्रा निर्माण, लोक ऋण, विदेशी ऋण, भारत का रिजर्व बैंक, विदेशी व्यापार, अन्तर्राज्यीय व्यापार एवं वाणिज्य नियमन तथा उनका विनियमन, आयात एवं निर्यात, तम्बाकू एवं अफीम आदि पर कर, बैकिंग, बीमा, शेयर बाजार, तोल तथा अन्य कार्यों के प्रतिमान का निर्धारण, उद्योग नियंत्रण, खानों, खनिज पदार्थों एवं तेल संसाधनों का विनिमय तथा विकास, राष्ट्रीय संग्रहालयों का आरक्षण, ऐतिहिासिक स्मारक, भारत का सर्वेक्षण, संघीय लोक-सेवाएं, संसद् एवं राष्ट्रपति के निर्वाचन, सर्वोच्च न्यायालय का गठन, जनगणना, सीमा-शुल्क तथा निर्यात-शुल्क, निगम-कर, उत्पादन-शुल्क, सम्पदा-शुल्क, समाचार-पत्रों के क्रय-विक्रय पर कर, शांति निकेतन, अलीगढ़, बनारस एवं उस्मानिया विश्वविद्यालय आदि। इन सभी राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर समान विधि का होना परमावश्यक है तथा इन पर कानून बनाने का एकमात्र अधिकार संसद् को दिया गया। इन विषयों पर केन्द्र का अधिकार होने के कारण ही उसे शक्तिशाली स्थान प्राप्त हैं।

  2. राज्यसूची (State List)-

    राज्य सूची में 66 विषय हैं। स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप इन विषयों को राज्य–सूची में रखा गया है। भारत में संघात्मक सिद्धान्त कहां तक लागू किए गये हैं, इसका निर्णय राज्य-सूची में उल्लिखित विषयों अर्थात् राज्यों की विधायी शक्ति के क्षेत्र से भली प्रकार हो सकता है। राज्य-सूची के कतिपय विधायी शक्ति ये हैं-सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस, न्याय-प्रशासन, जेल तथा सुधारालय, स्थानीय प्रशासन, सार्वजनिक स्वास्थ्य और सफाई, मादक पेय, शिक्षा, पुस्तकालय, अजायबघर, कृषि, सिंचाई, पशु-पालन, मछली-व्यवसाय, अस्पताल एवं औषधालय, जंगली पशुओं की रक्षा, ग्राम-सुधार, सार्वजनिक निर्माण कार्य, गैस एवं गैस-निर्माण मण्डियां ओर मेले, साहूकारी, राज्य व्यापार एवं वाणिज्य, कृषि-आयकर, भूमि-कर, मनोरंजन-कर, विलासिता की वस्तुओं पर कर, स्थानीय क्षेत्र के माल के प्रवेश पर कर, समाचार-पत्रों को छोड़कर अन्य वस्तुओं पर बिक्री-कर, विज्ञापन कर, व्यापार-कर,वस्तुओं का उत्पादन और उनका वितरण, नाटकघर आदि। राज्य-सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार राज्यों का है। केवल विशेष परिस्थितियों और प्रक्रिया के आधार पर ही भारतीय संसद् इन पर कानून बना सकती है। इस प्रकार से केन्द्र सरकार का राज्य-सूची पर भी वर्चस्व है।

  3. समवर्ती सूची (Concurrent List)-

    इस सूची में स्थानीय और राष्ट्रीय महत्व के 46 विषय सम्मिलित हैं। इस सूची में प्रमुख विषय शामिल हैं-फौजदारी कानून व प्रणाली, व्यवहार प्रणाली, निवारक निरोध, विवाह और विवाह-विच्छेद, दिवालियापन तथा ऋण शोध-क्षमता, पागलपन, ठेके और साझेदारी,मजदूर संघ, आर्थिक तथा सामाजिक नियोजन,सामाजिक सुरक्षा और बीमा, शरणार्थियों की सहायता, पुनर्वास, खाद्य पदार्थों में मिलावट, रोजगार और बेरोजगारी, विधि, औषधियां, जन्म-मरण के आंकड़े, श्रम-कल्याण, मूल्य नियंत्रण, कारखाने, बिजली, समाचार-पत्र, पुस्तकें तथा मुद्रणालय आदि। संविधान के तृतीय संशोधन (1954) द्वारा समवर्ती सूची के तैतीसवें विषय व्यापार-वाणिज्य का अर्थ निश्चित और व्यापक करते हुए उसमें स्पष्ट रूप से कुछ आवश्यक वस्तुओं के व्यापारिक-वाणिज्य का समावेश कर दिया गया है। समवर्ती सूची में ऐसे विषय हैं जिन पर सम्पूर्ण देश में सामान्य कानून होना वांछनीय तो है, किन्तु अनिवार्य नहीं, इसलिए इन विषयों को केन्द्र और राज्य दोनों ही के क्षेत्राधिकार में रखा गया है, लेकिन यहां केन्द्र की सर्वोच्चता को बरकरार रखा गया है। यदि समवर्ती सूची पर केन्द्र तथा राज्यों द्वारा बनाए गये किसी कानून में अन्तर्विरोध की स्थिति है तो ऐसी स्थिति में केन्द्रीय कानून को प्राथमिकता मिलेगी अर्थात् वही मान्य होगा।

संविधान के 42वें संशोधन अधिनियम (1976) द्वारा सातवीं अनुसूची को संशोधित किया गया है। तदनुसार संघ सूची में संघ और सशस्त्र बल पर संघ का नियंत्रण’ विषय जोड़ा गया है और राज्य-सूची से ‘शिक्षा’ को निकालकर समवर्ती सूची में समाविष्ट कर दिया गया है ताकि शिक्षा के मामले में एक राष्ट्रीय नीति निर्धारित की जा सके।

  1. अवशिष्ट शक्तियां (Residuary Powers)-

    जिन विषयों का वर्णन उक्त तीनों सूचियों में नहीं है अर्थात् अवशिष्ट शक्तियां संघीय सरकार को सौंप दी गई हैं। इस सम्बन्ध में भारत में कनाडा के संविधान का अनुसरण किया गया है। कनाडा में भी अवशिष्ट विधायी शक्तियां केन्द्र में निहित हैं। भारत में इस व्यवस्था के अन्तर्गत केन्द्र ऐसे कर लगा सकता है जिनका राज्य और समवर्ती सूचियों में उल्लेख नहीं हैं। संघ सूची के विषयों पर निर्मित विधि के उपयुक्त प्रशासन की दृष्टि से संसद् न्यायालय भी स्थापित कर सकती है। संसद् किसी देश अथवा अन्तर्राष्ट्रीय संस्था से की गई सन्धि, करार अथवा उपसन्धि की क्रियान्विति के लिए आवश्यक विधि निर्माण का कार्य कर सकती हैं।

शक्ति विभाजन की उपर्युक्त व्यवस्था से स्पष्ट है कि भारत ने कनाडा के संविधान में समाविष्ट सबल केन्द्र की प्रणाली का अनुसरण किया है। यह बात निम्नलिखित तथ्यों से सिद्ध हो जाती है-

  1. राष्ट्रीय महत्व के विषय केन्द्र के पास साधारणतया जो विषय राष्ट्रीय महत्व के हैं वे केन्द्र को दिए गए हैं और जो विषय केवल स्थानीय महत्व के हैं उन्हें राज्यों को सौंपा गया हैं। समवर्ती सूची के विषय केन्द्र और राज्य दोनों ही के क्षेत्राधिकार में रखे गए हैं, किन्तु दोनों सरकारों द्वारा निर्मित विधियों में असंगति अथवा विरोध की स्थिति में केन्द्रीय विधि ही मान्य होती है। राष्ट्रीय महत्व की दृष्टि से नियम का केवल एक अपवाद है और वह यह है कि यदि अनुच्छेद 254(2) समवर्ती सूची के किसी विषय पर किसी राज्य विधान-मण्डल द्वारा पारित कानून में संसद् चाहे तो संशोधन कर, फेरबदल कर सकती है और चाहे तो उसका परिवर्द्धन, परिवर्तन, संशोधन भी कर सकती है।
  2. संसद को सम्पूर्ण देश के लिए कानून बनाने का अधिकार संसद् भारत के सम्पूर्ण राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकती है संसद् द्वारा बनाया गया कोई कानून इस कारण से अमान्य नहीं हो सकता कि वह भारत राज्य क्षेत्र से बाहर भी लागू होता है जबकि कोई राज्य अपने राज्य क्षेत्रातीत (उस राज्य क्षेत्र से बाहर) विधि नहीं बना सकता है। राज्य की विधायिनी-शक्ति का विस्तार राज्य-क्षेत्र तक ही सीमित हैं।
  3. संसदीय विधियों की सर्वोच्चता अगर संसद् निर्मित विधियों और राज्य विधान-मण्डलों द्वारा निर्मित विधियों में असंगति है, तो संसद् निर्मित विधि प्रभावी होती है।
  4. विशेष परिस्थितियों में संसद् को राज्यों पर कानून बनाने का अधिकार कुछ विशेष परिस्थितियों में संविधान के अन्तर्गत संसद् को राज्यों के क्षेत्र में भी कानून बनाने का अधिकार दिया गया है। उदाहरणार्थ, जब भी राज्यसभा विशेष बहुमत से यह घोषणा कर दे कि राष्ट्रीय हित में राज्य-सूची के किसी विशिष्ट विषय पर संसद् द्वारा कानून बनाना आवश्यक और समयोचित है तो संसद् उस विषय पर कानून बना सकती है। आपात् उद्घोषणा के दौरान संसद् की विधायी क्षमता इतनी विस्तृत हो जाती है कि वह राज्य-सूची के किसी भी विषय पर कानून बना सकती है।
  5. राज्यसूची पर भी संसदीय नियन्त्रण संसद् राज्यों के प्रस्ताव पर भी राज्य-सूची के किसी विषय पर कानून बना सकती है। इससे राज्य-सूची भी संसद् के क्षेत्राधिकार में आ जाती है।
  6. केन्द्रीय सरकार की नियन्त्रण शक्तिसंघ सूची में कुछ प्रविष्टियां ऐसी हैं जिनमें संसद् को अधिकार है कि वह कानून द्वारा आवश्यक घोषणा करने के बाद राज्यों के क्षेत्र के कुछ कार्य या विषय अपने हाथ में ले ले। केन्द्रीय सरकार की नियंत्रण-शक्ति को बढ़ाकर भी ‘संघीय सर्वोच्चता’ स्थापित की गई है। संघ-सूची में कुछ ऐसे विषयों का उल्लेख है जिनके द्वारा केन्द्रीय सरकार राज्य सरकारों पर नियत्रण रख सकती है। इनमें दो विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं-प्रथम, चुनाव और द्वितीय, लेखा जांच। राज्य विधान-सभाओं के चुनाव भी संसद् के नियन्त्रण में हैं और राज्यों के हिसाब-किताब की जांच भी केन्द्र का विषय हैं।
  7. संधि,करार या अभिसमय को लागू करने के लिए संसद् का राज्यसूची पर कानून बनाना संसद् किसी देश के साथ की गई संधि, करार या अभिसमय का किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन या संस्था में किए गए किसी भी निर्णय को लागू करने के लिए कानून बना सकती है, चाहे उसका विषय राज्य-सूची के अन्तर्गत ही क्यों न आता हो। जब अनुच्छेद 356 के अनुसार राष्ट्रपति किसी राज्य विशेष के शासन को अपने हाथ में ले लेता है तो राज्य विधान-मण्डल के अधिकार स्वतः ही संसद् को प्राप्त हो जाते हैं।
  8. न्यायिकनिर्णय सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों से भी संघ की सर्वोच्चता सिद्ध होती है। पश्चिमी बंगाल राज्य बनाम भारतीय संघ’ के मुकदमे में पश्चिमी बंगाल सरकार का कहना था कि राज्य सम्प्रभु इकाइयां हैं। अतः संसद् को यह अधिकार नहीं है कि वह राज्यों की सम्पति के अधिग्रहण के सम्बन्ध में विधि बनाए। सर्वोच्च न्यायालय ने पश्चिमी बंगाल की सरकार के दावे को अमान्य करते हुए संसद् की शक्ति को वैध ठहराया। इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया कि राज्य सम्प्रभु इकाइयां नहीं हैं और उन पर केन्द्रीय नियंत्रण हैं।
  9. संविधान संशोधन संविधान के कुछ संशोधनों ने भी संसद् की विधायी शक्तियों में वृद्धि की हैं। उदाहरणार्थ 24वें संशोधन द्वारा गोलकनाथ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से उत्पन्न प्रभाव को ही दूर नहीं किया गया वरन् संसद् की संशोधन-शक्ति को और विस्तृत करने के लिए यह भी जोड़ दिया गया कि संशोधन के अधिकार क्षेत्र में किसी उपबन्ध के जोड़ने, परिवर्तित करने और निरस्त करने की शक्ति भी सम्मिलित है। केशवानन्द भारतीय विवाद में सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि संसद् संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन इसके मौलिक स्वरूप में परिवर्तन नहीं कर सकती है।

उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि विधायी मामलों में केन्द्र का पूर्ण वर्चस्व है।

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