केंद्र और राज्य में नियोजन सम्बन्ध

केन्द्र-राज्य नियोजनीय सम्बन्ध

केन्द्र-राज्य नियोजनीय सम्बन्ध

भारतीय संघवाद पर नियोजन के प्रभाव के सम्बन्ध में विभिन्न मत पाए जाते हैं। अशोक चन्द्रा के अनुसार योजना आयोग ने संघवाद का स्थान ले लिया है। केन्द्र-राज्य सम्बन्धों में केन्द्रीयकरण की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है और इन्हें प्रभावित करने में योजना आयोग की महत्वपूर्ण भूमिका है। भारत में सम्पूर्ण नियोजन इस प्रकार का है कि राष्ट्रीय योजना कार्यान्वित होती है और राज्यीय योजनाएं भी। इस प्रकार राष्ट्रीय हितों की पूर्ति होती है और प्रान्तीय एवं स्थानीय हितों की भी। योजना आयोग का मुख्य उद्देश्य यही रहता है कि दोनों एक-दूसरे के पूरक बनें। इस उद्देश्य की पूर्ति से केन्द्रीयकरण को है। कुछ बढ़ावा मिलता है और केन्द्र-राज्य सम्बन्ध एकात्मकता के लक्षणों से प्रभावित होते हैं।

संघदाद पर नियोजन के प्रभाव को अध्ययन की सुविधा से निम्नलिखित बिन्दुओं में विभाजित करना अधिक उपयुक्त होगा-

  1. नियोजनविषय वस्तु की प्रकृति

    भारत जैसी संघात्मक व्यवस्था के अन्तर्गत शासन के विषय केन्द्र और राज्यों के मध्य विभक्त होते हैं अतः किसी राष्ट्र-व्यापी नियोजन में राज्यों को केन्द्रीय निर्देशों को प्रायः प्राथमिकता देनी पड़ती है। शासन के सभी विषयों पर योजना आयोग योजना बनाता है अर्थात राज्य-सूची के विषयों पर उसका एक सीमा तक अधिकार है। इस प्रकार योजना आयोग के माध्यम से देश में एकात्मकता की प्रवृति का विकास स्वाभाविक है।

  2. योजना निर्माण का स्वरूप

    भारत में राज्यों की समस्याएं अलग-अलग होती हैं और उनके निराकरण के उपायों में भिन्नता होना स्वाभाविक है, लेकिन बहुत-सी समस्याएं केन्द्र और राज्यों में लगभग समान प्रकृति की होती है। अतः इस प्रकार की समस्याओं के निराकरण में केन्द्र की आवाज अपेक्षाकृत अधिक महत्त्वपूर्ण रहती है। योजना-प्रारूप का अन्तिम निर्णय केन्द्रीय संसद के अधिकार में है। राज्यों के पास अपने पृथक योजना-बोर्ड नहीं है अतः केन्द्र द्वारा स्थापित और शासित योजना आयोग का राज्य सरकारों पर व्यापक प्रभाव होता है। प्रशासनिक सुधार आयोग ने राज्यों में योजना-बोर्ड बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन राज्य इस आशंका से सहमत नहीं हुए कि योजना बोर्ड कहीं राज्य में ‘समानान्तर सरकार’ जैसी शक्ति ग्रहण न कर ले। योजना-निर्माण-प्रक्रिया से यह तथ्य स्पष्ट है कि राज्य सरकार से व्यापक विचार-विमर्श किया जाता है और इस बात में अंतिम निर्णय लेते समय राज्य के मुख्यमन्त्रियों की सलाह का विशेष महत्त्व होता है। यद्यपि केन्द्र की प्रमुखता होती है, लेकिन राज्यों की सलाह की उपेक्षा नहीं की जाती। केन्द्र ‘निरंकुश’ नहीं बनता बल्कि ‘अगुआ बना रहता है। वह निर्णय ‘थोपने’ की अपेक्षा ‘नेतृत्व’ करता है।

  3. राष्ट्रीय विकास परिषद का प्रभाव

    योजना सम्बन्धी मामलों में केन्द्र और राज्यों के मध्य समायोजन अथवा समन्वय स्थापित करने के लिए राष्ट्रीय विकास परिषद की स्थापना की गई है। योजना के निर्माण में राष्ट्रीय विकास परिषद से अनिवार्यतः परामर्श लिया जाता है। योजना आयोग द्वारा केन्द्रीय मन्त्रियों एवं राज्य सरकारों से परामर्श करने के बाद योजना का जो प्रारूप तैयार किया जाता है, वह केन्द्रीय मन्त्रिमण्डल की स्वीकृति के बाद राष्ट्रीय विकास परिषद के समक्ष, आवश्यक सुझाव हेतु प्रस्तुत किया जाता है। इस परिषद को सहकारी संघवाद का प्रतीक माना जाता है। राष्ट्रीय विकास परिषद की सिफारिशों के आधार पर योजनाओं तथा कार्यक्रमों में आवश्यक सुधार किया जाता है। इसके पश्चात् उन्हें केन्द्रीय मन्त्रालयों तथा राज्य सरकारों के पास प्रारम्भिक निर्देशों सहित भेज दिया जाता है। बाद योजना निर्माण की वे सभी प्रक्रियाएं पूरी की जाती हैं जिनका वर्णन पहले किया जा चुका है। योजना निर्माण को अन्तिम रूप देने से पूर्व पुनः परिषद की सिफारिशें ली जाती हैं ओर तब योजना अपना अन्तिम स्वरूप और आकार ग्रहण करती है, जिसे बाद में संसद द्वारा स्वीकृति मिलने पर प्रकाशित कर दिया जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि राष्ट्रीय विकास परिषद का योजना निर्माण के सन्दर्भ में बहुत कुछ निर्णायक भाग होता है इसीलिए उसे ‘सुपर कैबिनेट’ (Super Cabinet) तक कहा जाता है। इसके उच्च स्वरूप के कारण ही इसके परामर्श को केन्द्रीय और राज्य सरकारें सर्वाधिक महत्व प्रदान करती है। परिषद के सदस्य सरकारी नीति के निर्माता होते हैं अतः योजना आयोग व कैबिनेट द्वारा परिषद के दृष्टिकोण की प्रायः इसके निर्णयों को स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन अनेक अवसरों पर असहमति के मामले यदाकदा उपस्थित हुए हैं।

  4. योजना आयोग की सदस्यता

    प्रधानमन्त्री आयोग का अध्यक्ष होता है। इसके एक उपाध्यक्ष होता है जिसे कैबिनेट स्तर के मंत्री की दर्जा दिया जाता है। इसके अलावा विशेषज्ञ व्यक्तियों को आयोग के सदस्य के रूप में नियुक्त किया जाता है। आयोग की रचना भारतीय संघवाद को केन्द्र के अनुकूल प्रभावित करने की क्षमता रखती है।

  5. वित्तीय पहलू

    आयोग अपनी प्राथमिकताओं को राज्यों पर अपनी वित्तीय-शक्ति के आधार पर थोपने में सक्षम है तथापि सामान्य प्रवृति ‘सहयोग और सहमति’ की रही है। योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए जो वित्तीय सहायता दी जाती है वह इतनी अधिक मात्रा में होती है कि प्रारम्भिक स्तर पर कोई राज्य केन्द्रीय वित्तीय सहायता की उपेक्षा नहीं कर सकता है। राज्य सरकारें किस हद तक केन्द्रीय अनुदान और सहायता पर निर्भर हैं, कहने की आवश्यकता नहीं है। योजनाएं मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं-प्रथम, राज्य योजनाएं जिनके लिए केन्द्र कुछ आर्थिक सहायता देता है, द्वितीय, केन्द्र निर्मित और अनुदानित योजनाएं, जिन्हें राज्य सरकारों को अपने क्षेत्र में लागू करना पड़ता है और केन्द्र से प्राप्त धन-राशि का उपयोग उन योजनाओं को पूरा करने में करते हैं तथा जो धन प्रदान करता है उसकी नीति माननी पड़ती है। राज्यों के मुख्यमंत्री अपने आय स्रोत बढ़ाने की मांग करते हैं। समय-समय पर वित्त आयोग की सिफारिशों के अनुसार इस दिशा में आवश्यक कदम भी उठाए जाते रहे हैं, लेकिन केन्द्र का रुख सामान्यतः सहानुभूतिपूर्ण रहा है। दूसरी ओर राज्यों की एक बड़ी कमी यह रही है कि वे उपलब्ध वित्तीय साधनों का समुचित उपयोग नहीं कर सके हैं। राज्यों ने अपने प्रशासनिक व्यय में अनाप-शनाप वृद्धि की है, किन्तु केन्द्र की सहायता पर निर्भर रहने की प्रवृति पर प्रभावी अंकुश लगाने का प्रयत्न नहीं किया है। राज्यों को वित्तीय साधनों की दृष्टि से केन्द्र पर बहुत अधिक निर्भर रहना पड़ता है अतः एकात्मकता के लक्षणों का विकास हुआ है जिससे संघवाद की वास्तविक प्रकृति पर करना पड़ा है।

  6. अन्य दृष्टियों से केन्द्र की साधनसम्पन्नता

    इन सबके अतिरिक्त परामर्श, तकनीकी विशेषज्ञता आदि विभिन्न क्षेत्रों में राज्यों की तुलना में केन्द्र बहुत अधिक सम्पन्न है अतः योजनाओं के निर्माण और क्रियान्वयन के सन्दर्भ में राज्य केन्द्र पर निर्भर रहते

  7. राष्ट्रीय नीति

    संविधान में निहित राज्य-नीति के निर्देशक तत्त्वों के क्रियान्वयन के लिए राष्ट्रीय नीति निर्धारित करने का दायित्व केन्द्रीय सरकार पर है। राष्ट्रीय नीति का अनुपालन करने से राज्य इन्कार नहीं कर सकते हैं। अतः केन्द्र निर्मित और केन्द्र निर्देशित योजनाओं को राज्यों को स्वीकार करना पड़ता है।

  8. विदेशी सहायता सम्बन्धी पहलू

    योजनाओं के कुछ पक्षों की पूर्ति के लिए जो विदेशी सहायता ली जाती है, उसके समुचित उपयोग का दायित्व सरकार पर ही है। विदेशी सहायता का कुशल उपयोग हो, इसके लिए केन्द्र के पास राज्यों को समुचित निर्देश देने का अधिकार रहता है।

  9. योजना का कार्यान्वयन

    राज्य केन्द्रीय योजनाओं को लागू करने वाले अभिकरण हैं। राष्ट्रीय योजना की क्रियान्विति के लिए राज्यों को निर्देश देता है और राज्यों में देखभाल के लिए विभिन्न नियुक्तियां करता है, जैसे-विकास आयुक्त आदि, इसीलिए प्रायः राज्य किसी भी असफलता का दायित्व केन्द्र पर मढ़ने का प्रयत्न करते हैं। योजना आयोग अपनी नीतियों में एकरूपता लाने की कोशिश करता है, यद्यपि यह एक अति कठिन कार्य होता है क्योंकि अलग-अलग समस्याएं होती है। अपने कर्तव्यों के अनुपालन में योजना आयोग को एक परामर्शदात्री संस्था के रूप में कार्य करने के साथ-साथ कुछ कार्यकारी कर्त्तव्यों का निर्वहन करना पड़ता है। वास्तव में नियोजनों द्वारा यह एक दोहरी प्रशासकीय मशीनरी की स्थापना हुई है।

योजना क्षेत्र में केन्द्र की प्रमुखता और एकात्मकता की प्रवृति इस मूलभूत-विचार से प्रेरित है कि योजना को राष्ट्रीय स्वरूप देने और सम्पूर्ण देश में नियोजन को समान गति से चलाने के लिए साधन-सम्पन्न केन्द्र का निर्देशन और नियन्त्रण न केवल उपयुक्त है, वरन वांछनीय भी है। स्थानीय योजनाओं का प्रारम्भिक उत्तरदायित्व राज्यों पर है, लेकिन यह स्वीकार कर लिया गया है कि केन्द्र को राज्यों के कार्य में सहायता, समायोजन और निर्देशन करना चाहिए, ताकि राष्ट्रीय नीतियों का क्रियान्वयन और विकास सन्तोषजनक ढंग से हो सके। इस प्रकार के आरोप अतिरंजित है कि योजना क्षेत्र में राज्य सरकारों की स्थिति केन्द्र के हाथ में कठपुतलियों जैसी हो गई। इसके विपरीत पाल एपलबी जैसे विद्वानों का मत है कि विकास के सम्पूर्ण क्षेत्र में केन्द्र किन्ही वास्तविक शक्तियों का उपभोग नहीं करता है। उसका कार्य केवल ‘स्टाफ कर्तव्यों का है न कि ‘लाइन कर्त्तव्यों (Line Functions) का। योजना की सफलता के लिए केन्द्र का राज्यों पर नियंत्रण अत्यावश्यक है।

योजना के क्रियान्यवन तथा आर्थिक नियोजन के प्रशासकीय परिणामों का सार रूप में संकेत करते हुए डॉ. सी. पी. भाम्भरी लिखते है-“योजना के निर्माण के बाद उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी केन्द्रीय तथा राज्यों सरकारों के प्रशासकीय विभागों पर आती है। श्रेष्ठ से श्रेष्ठ योजना भी निरर्थक है, यदि उसे उचित रूप से क्रियान्वित न किया जा सकता हो। योजना में सर्वाधिक बल क्रियान्वयन, व्यावहारिक परिणाम प्राप्त करने में गति एवं पूर्णता तथा अधिकतम उत्पादन, रोजगार एवं मानवीय स्रोतों के विकास के लिए पर्याप्त परिस्थितियां पैदा करने पर होना चाहिए।”

भारत में योजना क्रियान्वयन से सम्बन्धित प्रथम समस्या केन्द्रीय तथा राज्य सरकारों के बीच समायोजन स्थापित करने की है। योजना के क्रियान्वयन के लिए यह आवश्यक है कि केन्द्र स्तर पर तो विभिन्न मन्त्रालयों के बीच और केन्द्र तथा राज्य सरकारों के बीच प्रभावपूर्ण समन्वय कायम हो। इस समन्वय के बिना योजना को सफल रूप से क्रियान्वित करना बहुत ही कठिन हो जायेगा । आर्थिक नियोजन के फलस्वरूप भारतीय प्रशासनिक यन्त्र को एक शक्तिशाली एवं महत्वपूर्ण चुनौती मिली है। स्वतन्त्र भारत में लोक प्रशासन की गतिविधियों का क्षेत्र तथा उनके दायित्वों का क्षेत्राधिकार निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। वर्तमान में प्रशासन को 21वीं शताब्दी में उपस्थित होने वाली चुनौतियों के अनुरूप तैयार करने के लिए प्रयत्न किये जा रहे हैं।

योजना के क्रियान्वयन के सम्बन्ध में भारत में सन्तोष व्यक्त किया गया है। योजना के क्रियान्वयन के दौरान उपस्थित होने वाली कठिनाइयों के लिए प्रशासनिक अकर्मण्यता, विलम्ब, अकार्यकुशलता तथा दोषपूर्ण कार्य-प्रणाली इत्यादि कारण जिम्मेदार ठहराए गए है। मुख्य दोष निम्नलिखित हैं-

  1. क्रियान्वयन की मन्द गति,
  2. समय-सीमा का उल्लंघन एवं खर्चे में वृद्धि,
  3. उचित स्तर तथा अनुभव वाले प्रशिक्षित कर्मचारी-वर्ग का अभाव,
  4. अर्थव्यवस्था के परस्पर सम्बद्ध क्षेत्रों में विस्तृत समायोजन का अभाव,
  5. समाज के व्यापक समर्थन एवं सहयोग-प्राप्ति में असफलता।

इन दोषों पर विजय प्राप्त करने के लिए नई कार्य-प्रणालियां बनानी आवश्यक हैं जिससे कि देश प्रशासनिक यन्त्र एवं आर्थिक नियोजन की चुनौती का सामना कर सके।

आर्थिक नियोजन तथा लोक-कल्याणकारी राज्य की चुनौती का सामना करने के लिए निम्नलिखित प्रशासनिक सुधार आवश्यक प्रतीत होते हैं-

  1. कार्य-प्रणालियों का सरलीकरण,
  2. विलम्ब की प्रवृति का उन्मूलन,
  3. व्यक्तिगत दायित्व का उचित स्पष्टीकरण,
  4. काम के खर्चे में कमी,
  5. प्रशासनिक अनुसंधान तथा मूल्यांकन पर उचित बल,
  6. वित्त-मन्त्रालय की कार्य-प्रणालियों में क्रान्तिकारी परिवर्तन,
  7. मन्त्रालय की वित्तीय शक्तियों का अधिक हस्तान्तरण,
  8. बजट-पूर्व निरीक्षण पर बल,
  9. मन्त्रालयों का पुनर्गठन,
  10. भारत सरकार के मंत्रालयों तथा विभागों में श्रेष्ठतर समायोजन,
  11. जन-सम्पर्क का विकास,
  12. निर्णय लेने की प्रक्रिया में गतिशीलता,
  13. सिविल अधिकारियों का उचित प्रशिक्षण,
  14. लोक प्रशासन में नेतृत्व के योगदान पर उचित बल,
  15. प्रत्येक स्तर पर कार्य की उचित तथा प्रभावशाली देखरेख,
  16. प्रशासन में शीघ्रता की भावना पर बल,
  17. प्रशासन में स्पष्ट संचार व्यवस्था के महत्व की अनुभूति,
  18. लाल-फीताशाही को कम करने के साधनों का विकास इत्यादि।

ये तत्व प्रशासनिक सुधार योजना क्रियान्वयन को सफल बनाने में सहायता देंगे। इनसे योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू करके जन-विश्वसनीयता अर्जित की जा सकती है।

उपर्युक्त विश्लेषण के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत में नियोजन की प्रक्रिया देश की संसदीय शासन-व्यवस्था को बहुत हद तक प्रभावित करती है।

नियोजन प्रणाली की आलोचना

भारत में नियोजन प्रणाली की अनेक आधारों पर आलोचना की जाती है। नियोजन से लोकतन्त्र भी प्रतिकूल ढंग से प्रभावित होता है।योजना के निर्माण में जनता का कोई सहायोग नहीं हैं। संसद निरुपाय है तथा मन्त्रिपरिषद के निर्णय भी योजना आयेग से प्रभावित होते है। मंत्रालय स्वेच्छा से कार्य करने में असमर्थ है। आदि तथ्य लोकतन्त्र को दिखावा मात्र बना देते है। इस तर्क की अंतिम स्वीकृति संसद ही प्रदान करती है स्थिति में गुणात्मक परिवर्तन नहीं करती। योजना आयोग का कोई उत्तरदायित्व नहीं है। प्रजातंत्र का आधार विकेन्द्रीकरण है, केन्द्रीयकरण नही। आर्थिक नियोजन से वित्त आयोग के निर्णय प्रभावित होते हैं, इससे इस आयोग का महत्व कम हो जाता है।

आर्थिक नियोजन ने संघीय व्यवस्था को प्रतिकूल ढंग से प्रभावित किया है। संघवाद विकेन्द्रीकरण का पर्यायवाची है, किन्तु केन्द्रीयकृत नियोजन ने राज्य सरकारों की स्थिति को नगरपालिका सदृश्य बना दिया है। भारतीय संघ में शक्ति-विभाजन केन्द्र के पक्ष में हैं राज्य पहले ही असहाय है, शक्ति और साधन सीमित हैं और उनका महत्व नगण्य हैं। योजना आयोग ने उन्हें पूर्णतः निष्प्रभावी बना दिया है। योजना के निर्माण में वह सहभागी नहीं है, फिर अपने क्षेत्र में वह क्या करके दिखा सकते हैं? यदि राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं तो केन्द्र-राज्य संबंध विवादों का रूप धारण कर लेते हैं। केन्द्र सरकार का दृष्टिकोण स्वाभाविक रूप से पक्षपातपूर्ण हो जाता है और वह प्रत्येक सम्भव उपाय से राज्य सरकार को अकुशल सिद्ध करने का प्रयास करती है। इस कमी को दूर करने के लिए ‘राष्ट्रीय विकास परिषद’ की स्थापना की गई है.। यह परिषद ही योजना को स्वीकृति प्रदान करती है।

योजना आयोग के कारण केन्द्रीयकरण की प्रवृति निरन्तर बढ़ी है। इसमें जन-सहभागिता का प्रश्न समाप्त हो जाता है। वास्तविकता यह है कि कई योजनाएं तो बनी, किन्तु जो लोग जनता को प्राप्त होने चाहिए थे, प्राप्त नहीं हुए। आर्थिक विषमता में कमी नहीं आई अपितु वृद्धि हुई है। क्षेत्रीय असंतुलन व विषमता बढ़ी है। गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों का प्रतिशत आंकड़ों की दृष्टि से घटा है, किन्तु व्यवहार में यह देखने को नहीं मिलता। बेरोजगारों की संख्या में निरन्तर वृद्धि हो रही है। राष्ट्रीय आय में वृद्धि हुई है, किन्तु मूल्यों में वृद्धि के कारण उसका सुख साधारण जनता को नहीं मिला है। व्यक्तिगत आय की स्थिति भी कुछ भिन्न नहीं है अतः यह नहीं कहा जा सकता है कि योजनाएं अपने उद्देश्य में सफल हुई हैं, किन्तु यह कहना असत्य ही होगा कि योजनाएं पूर्णतः विफल हुई हैं। जीवन के कुछ क्षेत्रों में निश्चय ही प्रगति हुई है, औद्योगिक हुआ है, उत्पादन में वृद्धि हुई है, खाद्यान्न में आत्म-निर्भरता प्राप्त हुई है।

भारत में नियोजन की समस्याएं

व्यवहार में, भारत में नियोजन सम्बन्धी निम्नलिखित अनेक समस्याएं उभर कर सामने आई हैं-

  1. यद्यपि भारत में योजनाओं का निर्माण सोच-समझकर और बड़े-विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है, किन्तु इसके बावजूद भी ये योजनाएं जनता के असहयोग एवं उदासीनता के कारण सफल नहीं हो पातीं। भारतीय जनता की सार्वजनिक कार्यों के प्रति बहुत अधिक उदासीनता है।
  2. यहां सरकारी अधिकारियों द्वारा जनता को सार्वजनिक समस्याओं से अवगत कराने का प्रयास नहीं किया जाता है।
  3. भारतीय जनता के चरित्र में बहुत अधिक गिरावट आ गई है। व्यक्तिगत भेदभाव एवं शक्ति का दुरुपयोग आदि अनेक बाधाएं योजनाओं के विकास में आ रही हैं।
  4. योजना आयोग के समक्ष तथ्य और आंकड़े तो होते हैं, वे काफी हद तक मिथ्या होते है। इन आंकड़ों के कारण हमारी सारी योजनाएं असफल हो जाती हैं। इससे योजना के वास्तविक लक्ष्य धूमिल हो जाते हैं।
  5. यहां सिद्धान्त और व्यवहार में बहुत अन्तर पाया जाता है। योजना-निर्माताओं के सामने विदेशी कल्पनाएं और उच्च आदर्श होते हैं, जो कि भारतीय यथार्थ से कहीं अधिक होते हैं। योजना के क्रियान्वयन के समय सारी कठिनाइयां सामने आने लगती है।
  6. सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में हर वर्ष सरकार को करोड़ों रुपयों का घाटा होता है। इनकी हानि को कम करने के लिए दरें बढ़ाई जाती हैं जिसका कुप्रभाव अन्य उत्पादित वस्तुओं के मूल्यों पर पड़ता है। फलतः ये उपक्रम ‘सफेद हाथी’ सिद्ध हो रहे
  7. उत्पादन बढ़ाने हेतु योजनाओं में निर्धारित धन का 40 से 50 प्रतिशत धन ही वास्तव में खर्च हो जाता है। शेष धन नेता, इन्जीनियर, ठेकेदार, कर्मचारियों आदि की जेबों में चला जाता है। इससे जनसाधारण को योजना का पूर्ण लाभ प्राप्त नही होता है।
  8. उत्पादन का 50से 60 प्रतिशत तक भाग उद्योगों में उपयोग किया जाता है।
  9. प्रति वर्ष आने वाली बाढ़ों और महामारी के कारण उत्पादन ठप हो जाता है।

समस्या निवारण के उपाय

भारत में पंचवर्षीय योजनाओं में निर्धारित लक्ष्यों की पूर्ण प्राप्ति नहीं हो पाई है, अतः कुछ ऐसे कदम उठाए जाने आवश्यक हैं जिनसे योजनाओं के लक्ष्यों को साकार किया जा सके। इस सम्बन्ध में मुख्य रूप से निम्नलिखित कदम उठाए जाने चाहिए-

  1. योजना की कार्य-प्रणाली को सरल बनाया जाना चाहिए। इस सम्बन्ध में किसी भी स्थिति में विलम्बकारी प्रवृति को दूर किया जाना चाहिए।
  2. नियोजन में विभिन्न उत्तरदायित्वों का स्पष्टीकरण होना चाहिए, जिससे कि उत्तरदायी व्यक्ति या संस्था का आसानी से पता लगाया जा सके।
  3. प्रशासन में आवश्यकता से अधिक व्यय किया जाता है, अतः प्रशासन में अनावश्यक व्यय पर कठोरता से नियन्त्रण लगाया जाना चाहिए। साथ ही अनेक पद वर्षों से व्यर्थ के साबित हो रहे हैं उन्हें अविलम्ब समाप्त किया जाना चाहिए।
  4. प्रशासन में द्रुत-गति से अनुसंधान किया जाना चाहिए। अनुसंधान के पश्चात अचित मूल्यांकन किया जाना चाहिए।
  5. जन-सम्पर्क का कार्य प्रभावशाली ढंग से सम्पादित किया जाना चाहिए। इससे जनता का योजनाओं की सफलताओं में सहयोग मिल सकेगा और उनकी योजनाओं में रुचि पैदा हो सकेगी।
  6. नौकरशाही में अनुशासन और ईमानदारी की भावना का विकास करना चाहिए क्योंकि उन पर ही योजना की सफलता निर्भर करती है। अपव्यय को रोका जाना चाहिए।
  7. योजना कार्यों का प्रभावशाली सम्पादन तथा निरीक्षण किया जाना चाहिए ।
  8. प्राकृतिक साधनों के विदोहन पर पूरा ध्यान देना चाहिए और ऐसे कुशल प्रबन्धक वर्ग का विकास करना आवश्यक है जो योजनाओं के धन से इन साधनों का देश के विकास हेतु समुचित प्रयोग कर सकें।
  9. सार्वजनिक उपक्रम यदि लाभ और कुशलता से चलाए जाएं तो इनसे प्राप्त लाभों से देश की विकास-दर को बढ़ाया जा सकता है।
  10. योजनाओं में व्यय हेतु रखा गया धन यदि यथा समय व्यय किया जाए तो उत्पादन की वृद्धि-दर 10 प्रतिशत तक बढ़ाई जा सकती है। निर्धारित धन के सदुपयोग हेतु भ्रष्टाचार का उन्मूलन आवश्यक है जो सर्वप्रथम ऊपर से ही प्रारम्भ होना चाहिए।

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