भारत में राजनीति से ग्रस्त योजना

भारत में राजनीति से ग्रस्त योजना

भारत में राजनीति से ग्रस्त योजना

(The Politic of Planning)

भारतीय आयोजना का मुख्य आधार पाँच वर्ष के लिए तैयार की गयी मध्यम अवधि की विकास योजनाएँ हैं। यद्यपि लम्बी अवधि के विकास कार्यक्रम पर विचार करने के लिए ढाँचा प्रस्तुत करने हेतु 15 वर्षीय अथवा लम्बी अवधि के लिए दूरदर्शी योजनाएँ भी बनायी जाती हैं, फिर भी मुख्य जोर पंचवर्षीय योजनाओं पर ही रहता है। दूसरी ओर, अपनाये जाने वाले कार्यक्रम के रूप में प्रतिवर्ष आर्थिक योजनाएँ तैयार की जाती हैं, परन्तु उनका परिक्षेत्र बहुत सीमित होता है एवं उसमें मुख्यतः आगामी वर्ष में केन्द्रीय एवं राज्य सरकारों द्वारा किये जाने वाले सार्वजनिक व्यय के कार्यक्रम ही होते हैं।

नेहरू युग में भारतीय विकास आयोजना के घोर राजनैतिक चरित्र के बारे में कुछ ज्यादा पता नहीं चल सका, क्योंकि राज्य सरकारों एवं केन्द्र सरकार में नेहरू की कांग्रेस पार्टी विच्छिन्न रूप से छायी हुई थी। यही कारण है कि यदि एक बार केन्द्रीय नेतृत्व व विशेषकर पण्डित जवाहर लाल नेहरू की सहमति मिल जाती थी, तो राज्यों के नेता केन्द्रीय योजनाकारों के प्रस्तुतीकरण से पूरी तरह सहमत न होते हुए भी उसका विरोध नहीं कर पाते थे। जैसा कि एक महत्वपूर्ण राज्य के मुख्यमन्त्री ने एक बार कहा था कि “हम यह जानते हैं कि इन सब मामलों को जवाहर लाल नेहरू कहीं ज्यादा अच्छी तरह समझते हैं।” इसके अलावा ज्यादातर मुख्य मन्त्रियों में इतना साहस न था और न वे इतने बड़े नेता थे कि नेहरू जी जो कुछ स्वीकार कर चुके हैं वे उस पर प्रश्न चिह्न लगाएँ।

उस समय राष्ट्रीय विकास परिषद् की बैठकें ‘अनुष्ठान मात्र’ हुआ करती थीं। ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधिगण अपनी-अपनी योजनाओं के लिए और अधिक केन्द्रीय सहायता की जोर-शोर से माँग किया करते थे तथा संसाधनों में वृद्धि करने सम्बन्धी सुझाव देते थे।

सच्चाई यह है कि योजना सम्बन्धी मुख्य प्रपत्र राजनीतिक आवश्यकता को दृष्टि में रखकर तैयार किये जाते थे। यह इस तथ्य से स्पष्ट है कि इसके प्रारूप को पंचवर्षीय आम चुनाव से पूर्व तैयार एवं प्रकाशित कराने का प्रयास किया जाता था। 1951, 56 एवं 61 में ऐसा ही हुआ। परिणामस्वरूप योजना का प्रारूप सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के लिए महत्वपूर्ण चुनाव घोषणा-पत्र बन जाता था। इसमें कोई बुराई भी नहीं है। जब सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी के लिए कोई चुनौती नहीं होती थी तब कुछ हद तक योजना प्रपत्रों के चुनावों के लिए उपयोग से राजनीतिक कार्यकर्ताओं एवं कुछ हद तक मतदाताओं को आर्थिक विकास एवं उससे सम्बद्ध समस्याओं को एक शासकीय रूप में समझाने में सहायता मिलती थी।

केन्द्र में यदि पर्याप्त राजनीतिक स्थिरता है तो राजनीति ज्यादा समस्याएँ पैदा नहीं करती। यह तो नेहरू युग के बाद की बात है कि पार्टियों के अन्दर गुटों की प्रकटता, विचारधारात्मक खींचतान, परन्तु जो वास्तव में सत्ता-प्राप्ति की खींचतान थी, से राजनीतिक एवं विशेषज्ञ तत्वों का तालमेल हुआ एवं योजना आयोग की निरन्तर बढ़ती हुई प्रभावहीनता की स्थिति सामने आयी। राजनीतिक परिवर्तनों के परिणामस्वरूप आयोजना प्रक्रिया में गतिरोध से 1967, 1970, 1977 एवं 1980 में योजना में रुकावट आयी। इससे पाँचवी पंचवर्षीय योजना की समय पूर्व समाप्ति हुई, योजना में पूर्ण रुकावट हुई, लकड़ावाला आयोग द्वारा किया गया कार्य निरस्त हुआ एवं नयी छठी पंचवर्षीय योजना बनायी गयी। राष्ट्रीय कायापलट के प्रमुख उपकरण के रूप में विकास सम्बन्धी आयोजना के सफल उपयोग की बात ऐसी दलीय दृष्टिकोण से सोचना क्या गलत नहीं है?

देश में सार्वजनिक जीवन के इतने अधिक राजनीतिग्रस्त हो जाने, प्रमुख राजनीतिक पार्टियों एवं गुटों में असहयोग एवं द्वन्द्व बढ़ने से एक ऐसी स्थिति पैदा हो गयी है कि यदि हमें विकास के लिए आयोजना करनी है और वास्तव में उस पर अमल करना है तो योजना आयोग को ज्यादा राजनीति मुक्त करना होगा। इसका तात्पर्य है योजना आयोग को कुछ मन्त्रियों और कुछ विशेषज्ञों को मिला-जुला संगठन न होने देना। साथ ही केन्द्र सरकार की पूरी तरह अधीनस्थ इकाई के रूप में भी इसे और ज्यादा नहीं रखा जाना चाहिए।

संविधानिक रूप से स्वतन्त्र संगठन

योजना आयोग को अब संविधानिक रूप से स्वतन्त्र संगठन बना देना चाहिए। जिसके सभी सदस्य पूर्णकालिक हों और उनकी निश्चित सेवा अवधि हो तो तथा इसके सदस्यों की सेवा निवृत्ति एक साथ न होकर कुछ अन्तराल के साथ हो। इस विशिष्ट कार्य के लिए गठित स्वतन्त्र संगठन प्रतीत होना चाहिए। इसे निरन्तर सत्तारूढ़ सरकारों, विशेषकर केन्द्रीय और राज्यों की भी सरकारों से सहयोग करते हुए भी स्वतन्त्र रूप से कार्य करता प्रतीत होना चाहिए। मौजूदा स्थिति में ऐसे संगठन को न केवल राज्य सरकारों का बल्कि विभिन्न औद्योगिक, कृषि और हितों तथा विशेषज्ञों के व्यावसायिक संगठनों का ज्यादा सम्मान मिलेगा।

यह सच है कि अपने पीछे प्रधानमन्त्री की ताकत को रखकर योजना आयोग ने बहुत बार व्यापक प्रभाव डाला है और यह बहुत लाभ की बात है। परन्तु सरकार के साथ निकट सम्बन्धों के कारण कई कमजोरियों भी आयोग के साथ जुड़ गयी हैं जिनका ऊपर सोदाहरण उल्लेख किया जा चुका है। कुल मिलाकर यह प्रतीत होता है कि विशेषज्ञता प्राप्त स्वतन्त्र संगठन जिसके सुस्पष्ट और सुनिर्धारित कार्य और अधिकार हों आयोजना के लिए बेहतर होगा। इस संगठन को वित्तीय अधिकार देना भी आवश्यक होगा जिससे यह प्रमुख परियोजनाओं को स्वीकृति दे सके तथा योजना अनुदान प्रदान कर सके।

यह महसूस करने की आवश्यकता है कि अब भारत 1950 के भारत से बहुत भिन्न है। यदि किसी संस्था को प्रभावशाली बने रहना है तो उसके स्वरूप में परिवर्तन लाना ही होगा। एक और महत्वपूर्ण बात ध्यान देने की यह है कि अर्थ-व्यवस्था का संचालन ज्यादा से ज्यादा जटिल होता जा रहा है, ऐसा कुछ हद तक विकास सम्बन्धी आयोजना की अब तक प्राप्त सफलता के कारण ही है। अतः यह अनिवार्य भी है कि योजना आयोग का ध्यान अनिवार्यतः सर्वाधिक महत्व की परियोजाओं और कार्यक्रमों पर केन्द्रित किया जाये और वह मूलभूत दृष्टिकोणों के विकास पर ध्यान दें। सभी प्रकार की बिखरी हुई और छोटी परियोजनाओं और कार्यक्रमों को भी योजना आयोग के क्षेत्राधिकारों में लाना बहुत-सी केन्द्र-आयोजित अर्थव्यवस्थाओं में भी अनिवार्य नहीं समझा जाता और न ऐसा करना सम्भव ही है। हमारी राजनीतिक व्यवस्था के अन्तर्गत कुछ उदार दृष्टिकोण की आवश्यकता है। ऐसी उदारता व्यवहार में बरती भी जाती है। यथार्थवादी होना और उसके अनुरूप आयोजना के सम्पूर्ण फोकस (focus) का पुनर्गठन करना अच्छा ही समझा जायेगा।

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