केन्द्र-राज्य प्रशासनिक सम्बन्ध

केन्द्र-राज्य प्रशासनिक सम्बन्ध

केन्द्र-राज्य प्रशासनिक सम्बन्ध

संविधान के भाग 11 के दूसरे अध्याय के अनुच्छेद 256 से 263 तक केन्द्र-राज्य प्रशासनिक सम्बन्धों की चर्चा की गई है, केन्द्र को राज्य की तुलना में अधिक कर्त्तव्य और दायित्व सौपे गए हैं। संविधान की धारा 73 के अनुसार केन्द्र की कार्यपालक अथवा प्रशासनिक शक्तियों का विस्तार उन विषयों तक ही सीमित हैं जिन पर संसद् को विधि-निर्माण की शक्ति है। अनुच्छेद 162 के अनुसार राज्यों की प्रशासनिक शक्तियों का विस्तार उन विषयों तक सीमित है जिन पर राज्य विधान-मण्डल को कानून बनाने का अधिकार है, पर साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि जिन विषयों पर राज्य विधान-मण्डल और संसद् दोनों को विधि-निर्माण की शक्ति है उनमें राज्य की कार्यपालिका शक्तियां संघ की उन कार्यपालिका शक्तियों से परिसीमित रहेंगी जो या तो संविधान द्वारा अथवा किसी संसदीय विधि द्वारा प्रदत्त हैं। यह अनुच्छेद 162 जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए लागू नहीं है।

भारत में प्रशासन के लिए केन्द्र और राज्य स्तरों पर अलग-अलग सम्प्रभु अभिकरणों की स्थापना नहीं की गई हैं। भारत पहला स्वतन्त्र देश है जिसने–(क) प्रशासन के जरिए आर्थिक विकास करने, (ख) प्रशासनिक ढांचे में विस्तार करने तथा विविधता लाते हुए भी उसी ढांचे को बनाए रखने, और (ग) इस प्रकार विस्तृत होने वाले प्रशासन का संसदीय लोकतन्त्र और आर्थिक विकास के साथ तालमेल बनाए रखने का प्रयास किया जाता हैं। प्रशासन मुख्य रूप से राज्य-अभिकरणों द्वारा चलाया जाता है। भारत के राज्यों में संघीय कानूनों के कार्यान्वयन और प्रशासन के लिए अलग से कोई संघीय अभिकरण नहीं है। व्यवस्था इस प्रकार की है कि एक ओर राज्यों पर यह उत्तरदायित्व रहे कि वे संघीय कानूनों को लागू करें और दूसरी ओर संघीय सरकार को अधिकार रहे कि वह राज्यों को आवश्यक निर्देश दे सके। इस व्यवस्था का उद्देश्य राज्यों की स्वतंत्रता में संघीय हस्तक्षेप को प्रोत्साहन देना नहीं बल्कि समूचे देश के बहुमुखी विकास में संघ और राज्यों के बीच तालमेल को अधिकाधिक बढ़ावा देना है और अन्ततोगत्वा देश के हित में दोनों सरकारों को एकजुट होकर कार्य करने की प्रेरणा देना है।

केन्द्र-राज्य प्रशासनिक सम्बन्धों को निम्नलिखित सात भागों में बाँट सकते हैं-

  1. संघ द्वारा राज्यों को निर्देश (अनुच्छेद 256, 257, 305, और 339)
  2. संघीय कार्यों को राज्यों को सौंपना (अनुच्छेद 258)
  3. राज्यों द्वारा अपने कृत्यों को केन्द्र को सौंपना (अनुच्छेद 258 ‘अ’)
  4. अखिल भारतीय लोक सेवाएं (अनुच्छेद 311)
  5. केन्द्रीय अनुदान
  6. मतभेदों को कम से कम करने की विधियाँ और परामर्श संगठन
  7. योजना आयोग एवं सघ-राज्य प्रशासनिक सम्बन्ध ।
  1. संघ द्वारा राज्यों को निर्देश-

    भारतीय संविधान निर्माताओं ने 1935 के अधिनियम के भाग 126 से इस विचार को ग्रहण करके संघ को राज्यों को निर्देश देने का अधिकार प्रदान किया है। विश्व के अन्य किसी भी देश में इस प्रकार की व्यवस्था नहीं हैं। आपातकाल की उद्घोषणा के समय तो केन्द्र राज्य सरकारों को आदेश दे ही सकता है, किन्तु शान्तिकाल में भी अपेक्षित है कि राज्य की कार्यपालिका-शक्ति का प्रयोग इस प्रकार हो कि वह संसद्-निर्मित विधियों के अनुकूल हो। संविधान निम्नांकित अनुच्छेदों के अन्तर्गत केन्द्र को राज्यों को निर्देश देने की शक्ति प्रदान करता है-

अनुच्छेद 256 के अनुसार- “प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका शक्ति का इस प्रकार प्रयोग होगा जिससे संसद द्वारा विधियों का तथा किन्हीं वर्तमान विधियों का जो उस राज्य में लागू हों पालन सुनिश्चित रहे तथा संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार किसी राज्य को ऐसे निर्देश देने तक विस्तृत होगा जो कि भारत सरकार को उस प्रयोजन के लिए आवश्यक प्रतीत हो।” केन्द्रीय सरकार को इस प्रकार की शक्ति इसलिए प्रदान की गई है कि राज्यों में केन्द्रीय विधि के कार्यन्वयन में कोई बाधा उत्पन्न न हो।

अनुच्छेद 257(1) में भी केन्द्र द्वारा राज्यों को निर्देश देने के अधिकार का उल्लेख किया गया है, “प्रत्येक राज्य की कार्यपालिका-शक्ति का इस प्रकार प्रयोग होगा जिससे संघ की कार्यपालिका-शक्ति के प्रयोग में कोई अड़चन या प्रतिकूल प्रभाव न पड़े तथा संघ की कार्यपालिका-शक्ति का विस्तार किसी राज्य को ऐसे निर्देशों तक विस्तृत होगा जो भारत सरकार को उस प्रयोजन के लिए आवश्यक प्रतीत हो।” इस व्यवस्था का एक उद्देश्य यह है कि राज्य की कार्यपालिका सत्ता से संघर्ष न होने पाए।

अनुच्छेद 257(2), (3) एवं (4) में भी कुछ ऐसी अवस्थाओं का उल्लेख है जिनमें राज्यों पर संघ का नियंत्रण व्यापक हो जाता है। सामरिक महत्व की सड़कों तथा अन्य संचार-साधनों की देखभाल, मरम्मत, निर्माण आदि के लिए केन्द्र राज्य सरकार को निर्देश दे सकता है। संसद राज-पथों या जल-पथों को, बड़ी सड़कों या नहरों को, नौकागम्य नदियों को राष्ट्रीय महत्व का घोषित कर सकती है। संघीय कार्यपालिका को यह भी अधिकार है वह किसी राज्य-क्षेत्र के अन्तर्गत रेल-पथ की रक्षा के लिए उस राज्य को आवश्यक निर्देश दे। इन सबकी देखभाल, मरम्मत या निर्माण पर जो अतिरिक्त व्यय होगा, उसे संघ सरकार द्वारा वहन किए जाने का प्रावधान है।

अनुच्छेद 256 और 257 को संयुक्त रूप में लेने पर हम देखते हैं कि उनसे केन्द्र सरकार की शक्तियां बड़ी व्यापक हो जाती हैं और राज्यों के अधिकार क्षेत्र में उसका प्रवेश असाधारण रूप से बढ़ जाता है। ये दोनों अनुच्छेद राज्यों की कार्यपालिका-सत्ता पर निश्चित रूप से सकारात्मक और निषेधात्मक प्रतिबन्ध लगाते हैं। ये केन्द्रीय सरकार को विस्तृत अधिकार प्रदान करते हैं कि वे राज्यों में किसी भी प्रकार के प्रशासनिक कार्य निर्बाध रूप से कर सकें।

अनुच्छेद 305 भी केन्द्र सरकार को यह अधिकार प्रदान करता है कि वह राज्य सरकारों को निर्देश दे सके। इस अनुच्छेद में उपबन्धित है कि जहां इस संविधान के उपबन्धों में से किसी के अधीन संघ की कार्यपालिका-शक्ति के प्रयोग में दिए गए किन्हीं निर्देशों का अनुवर्तन करने में या उनको प्रभावी करने में कोई राज्य असफल हुआ है वहां राष्ट्रपति के लिए यह मानना विधि-संगत होगा कि ऐसी अवस्था उत्पन्न हो गई है जिसमें राज्य का शासन संविधान के उपबन्धों के अनुकूल नहीं चलाया जा सकता। अनुच्छेद 356 राष्ट्रपति को अधिकार देता है कि वह राज्य में सांविधानिक व्यवस्था विफल होने की आपात् उद्घोषणा करके राज्य की समस्त शक्तियों को अपने हाथ में ले ले। अनुच्छेद 356 केन्द्र को राज्यों पर अपनी सर्वोच्चता स्थापित करने का महत्वपूर्ण अवसर देता है।

  1. संघीय कार्यों को राज्यों को सौंपना-

    केन्द्र राज्यों को दो प्रकार से संघीय कार्य सौप सकता है-प्रथम, राज्य सरकार की सलाह से और द्वितीय, संसद के माध्यम से। अनुच्छेद 228(1) के अनुसार “संसद किसी राज्य सरकार की सम्मति से, संघीय कार्यपालिका-शक्ति से सम्बन्धित किसी विषय को उस सरकार को अथवा उसके पदाधिकारियों को सशर्त या बिना शर्त सौंप सकती है।” अनुच्छेद 158(2) के अनुसार- “संसद को संघीय विधानों के संचालन के लिए राज्य के प्रशासन-तन्त्र का प्रयोग करने की शक्ति प्राप्त है और इस प्रयोजन के लिए वह राज्य अथवा उसके पदाधिकारियों को ऐसी शक्ति सौंप सकती है जिससे कि संघीय कानूनों को उस राज्य में समुचित रूप में लागू किया जा सके। इस अनुच्छेद के खण्ड 1 और खण्ड 2 में मुख्य अन्तर यही है कि जहां खण्ड । के अन्तर्गत राज्यों को शक्तियां राज्य सरकारें की असहमति से सौंपी जाती हैं वहीं खण्ड 2 के अन्तर्गत राज्यों की सहमति आवश्यक है।”

  2. राज्यों द्वारा अपने कृत्यों को केन्द्र सौंपना-

    केन्द्र की ही तरह राज्य सरकारें भी अपने कृत्यों को संघ सरकार को सौंप सकती हैं। अनुच्छेद 258 (अ) यह उपबन्धित करता है कि किसी राज्य का राज्यपाल भारत सरकार की सम्मति से ऐसे किसी भी विषय सम्बन्धी कृत्य, जिस पर राज्य की कार्यपालिका-शक्ति का विस्तार है, सशर्त या बिना शर्त के उसे सौंप सकता है। यह स्पष्ट है कि जहां किसी भी सरकार के लिए अपने प्रशासकीय कार्यों के सीधे संचालन में असुविधा होती हो तो वे दूसरी सरकार द्वारा उसे सम्पादित करवा सकती है,किन्तु राज्य केन्द्र को अपने कृत्य केन्द्र की सहमति से ही दे सकते हैं, जबकि केन्द्र अपने कृत्यों को राज्यों को उनकी सहमति के बिना भी सौंप सकता हैं। स्पष्ट है कि संविधान ने प्रशासकीय सम्बन्धों में भी केन्द्र की प्रमुखता स्वीकार की है। यहां भी राज्यों की स्थिति केन्द्र की तुलना में कमजोर है।

  3. अखिल भारतीय सेवाएं-

    संघीय सिद्धान्त के प्रतिकूल भारतीय संविधान में केन्द्र और राज्यों के बीच सम्मिलित सेवाओं (Common Services) का भी प्रावधान है जिसे अखिल भारतीय सेवाएं कहा जाता है। यद्यपि संविधान कहता है कि संघ सरकार और राज्य सरकारों के अलग-अलग सार्वजनिक अधिकारी होगें जो अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के कार्य करेंगे, पर साथ ही संविधान में यह व्यवस्था भी है कि संघीय प्रशासन सेवा और भारतीय पुलिस सेवा राज्यों और संघ दोनों में समान रूप से कार्य करेंगी। अखिल भारतीय सेवाओं के सृजन का मुख्य उद्देश्य अधिकतम अन्तर्राज्यीय सहयोग और समन्वय प्राप्त करना तथा इस सेवाओं के पदाधिकारियों द्वारा केन्द्रीय नीतियों को समुचित रूप से क्रियान्वित किया जाना है। अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों पर केन्द्रीय सरकार का विशेष नियंत्रण रहता है और उनका स्थानांतरण भारत में कहीं भी किया जा सकता है। ये अखिल भारतीय सेवाएं राज्य सरकारों पर केन्द्र के नियंत्रण का प्रतीक बन गई हैं।

  4. केन्द्रीय अनुदान-

    केन्द्र की यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण शक्ति है जिसके द्वारा दो मुख्य उद्देश्यों की पूर्ति होती है- (क) केन्द्रीय सरकार राज्य सरकारों पर नियंत्रण रखती है क्योंकि अनुदान रोके भी जा सकते हैं, (ख) केन्द्र तथा राज्यों में सहयोग और समन्वय की भावना का विकास होता है। जन-कल्याण की योजनाओं को प्रोत्साहन मिलता है जिससे राष्ट्रीय समृद्धि में योग मिलता है। जन-कल्याण की योजनाओं को प्रोत्साहन मिलता है जिससे राष्ट्रीय समृद्धि में योग मिलती है। केन्द्र राज्यों को ऋण भी देता है और राज्य जो ऋण लेते हैं उनकी गारन्टी भी कर सकता हैं। इसके फलस्वरूप केन्द्र राज्यों के प्रशासन अथवा राज्यों की कार्यपालिका सम्बन्धी नीतियों को अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। प्रायः सभी राज्य अपनी योजनाओं को पूरा करने के लिए केन्द्रीय अनुदान अथवा सहायता पर निर्भर करते है। फलतः इस निर्भरता ने केन्द्र की स्थिति को सुदृढ़ बनाया है।

  5. मतभेदों को कम करने की विधियां-

    केन्द्र और राज्यों में प्रशासनिक सम्बन्धों का समायोजन एक कठिन कार्य है, सरकारो में मतभेद की अधिक गुंजाइश रहती है। अतः संविधान में केन्द्रीय तथा राज्य सरकार के बीच के मतभेदों को सुलझाने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण उपाय सुझाये गए हैं।

  1. अनुच्छेद 263 के अन्तर्गत राष्ट्रपति सार्वजनिक हित के उद्देश्य से अन्तर्राज्यीय परिषद् की स्थापना कर सकता है।
  2. अनुच्छेद 261 द्वारा व्यवस्था की गई है कि भारत के राज्य-क्षेत्र में सर्वत्र, संघ की और प्रत्येक राज्य की सार्वजनिक क्रियाओं तथा अभिलेखों और न्यायिक कार्यवाहियों को पूरा विश्वास एवं मान्यता दी जाएगी।
  3. अनुच्छेद 131 के अनुसार संघ एवं राज्यों के पारस्परिक विवाद उच्चतम न्यायालय को सौंपे जा सकते हैं।
  4. अनुच्छेद 262 के अन्तर्गत संसद अन्तर्राज्यीय नदी विवादों के निर्णय के लिए उपबन्ध कर सकती है। इन विवादों के सम्बन्ध में उच्चतम न्यायालय अथवा अन्य कोई न्यायालय हस्तक्षेप नहीं कर सकता। अनुच्छेद 262 की शक्ति के प्रयोग में संसद ने नदी बोर्ड अधिनियम, 1956 और अन्तर्राज्यीय जल-विवाद अधिनियम 1956 पारित किए हैं। नदी बोर्ड अधिनियम की स्थापना राज्यों की प्रार्थना पर की गई है। यह अन्तर्राज्यीय नदियों के या नदी-घाटियों के विनियम और विकास के बारे में सरकार को सलाह देता है। जल-विवाद अधिनियम के अन्तर्गत केन्द्र सरकार को ऐसे विवादों के निपटारे के लिए न्यायाधिकरण स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई है। इस न्यायाधिकरण का निर्णय इन विषयों पर अंतिम होगा और पक्षकारों पर बाध्यकारी होगा। बहुत वर्षों से लम्बित दो राज्यों के मध्य कावेरी नदी जल विवाद का निपटारा 1999 इसी भावना से सम्भव हुआ है।
  5. राज्य और संघीय क्षेत्र कई क्षेत्रों में बाँट दिए गए हैं और प्रत्येक क्षेत्र में क्षेत्रीय परिषद् नामक उच्च-स्तरीय परामर्शदात्री संस्था कायम की गई है जिसमें उस क्षेत्र के राज्यों ओर संघीय क्षेत्रों को समान हितों पर विचार-विमर्श का अवसर मिलता है। क्षेत्रीय योजनाएं देश में भावनात्मक एकता लाने, क्षेत्रीय और भाषाई प्रवृत्तियों कों निरुत्साहित करने, पृथक्करण से उत्पन्न प्रभावों को दूर करने, समाज हितों क्षेत्र में एकीकृत और समन्वित प्रादेशिक योजना बनाने, केन्द्र और राज्यों के बीच सहयोग और सद्भाव बढ़ाने और राजनीतिक संतुलन की स्थिति पैदा करने की दिशा में बहुत उपयोगी सिद्ध हुई हैं। क्षेत्रीय परिषदों में सामान्यतया आर्थिक एवं सामाजिक नियोजन, सीमा सम्बन्धी विवाद, अन्तर्राज्यीय यातायात, भाषायी अल्पसंख्यकों की समस्या, राज्यों का पुनर्गठन आदि विषयों पर विचार किया जाता हैं।
  6. उन आरोप-पत्रों के आधार पर जो किसी राज्य के मन्त्रि-परिषद के मुख्यमंत्री या मन्त्रियों के विरुद्ध राष्ट्रपति को दिए जाएं, केन्द्रीय शासन को उनकी न्यायिक जांच कराने या न कराने के लिए अधिकार प्राप्त हैं। यदि जांच कराई जाए और आरोप सिद्ध हो, तो केन्द्रीय सरकार सम्बन्धित मंत्रियों को अपना पद छोड़ने के लिए बाध्य कर सकती है। पंजाब के मुख्यमंत्री सरदार प्रतापसिंह कैरो तथा उड़ीसा के मुख्यमंत्री वीरेन मित्रा को न्यायिक जांच में दोषी सिद्ध होने पर अपना त्यागपत्र देना पड़ा था। फरवरी, 1989 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री अर्जुनसिंह के बारे में ‘चुरहट लाटरी काण्ड’ में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की टिप्पणी को देखते हुए ही कांग्रेस उच्च कमान ने उन्हें त्यागपत्र देने का निर्देश दिया था। सन् 1992 कांग्रेस हाईकमान द्वारा मुख्यमंत्री एस. बंगारप्पा को हटाने के पीछे उनके विरुद्ध की गई भ्रष्टाचार की शिकायतों की प्रमुख भूमिका रही है। 1998 में बिहार के मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव को भी चारा घोटाला काण्ड में अभियुक्त मानकर मुख्यमंत्री पद से हटाया गया था।
  7. विभिन्न परिषदों और सम्मेलनों के द्वारा केन्द्र और राज्यों के मध्य आपस में विचार-विमर्श आवश्यक ही नहीं, अपेक्षित भी है, क्योंकि ऐसा करने से संघात्मक व्यवस्था में केन्द्र-राज्यों के बीच साझेदारी की भावना बढ़ती हैं। केन्द्रीय सरकार ने संस्थात्मक रूप से अपने चारों ओर विभिन्न परिषदों और सम्मेलनों का जाल फैलाया है। इन परिषदों ओर सम्मेलनों के माध्यम से केन्द्रीय सरकार विभिन्न विषयों पर राज्यों के साथ सम्पर्क बनाए रखती है। ये भी संस्थाएं अस्थायी प्रकार की हैं और इन्हें कार्यकारिणी के आदेश द्वारा आहूत किया जाता है। क्षेत्रीय परिषद आदि कुछ परिषदें वैधानिक भी हैं। राष्ट्रीय विकास परिषद, केन्द्रीय स्वास्थ्य परिषद और स्थानीय स्वायत्त शासन की केन्द्रीय परिषद केन्द्रीय सरकार के प्रस्तावों के अन्तर्गत संगठित की गई हैं। इन परिषदों के कार्य क्षेत्र उन विषयों से सम्बन्धित हैं जो संविधान द्वारा राज्यों को सौंपे गए हैं। इन परिषदों के अतिरिक्त प्रायः सभी मंत्रालयों द्वारा राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलन भी बुलाए जाते हैं। राष्ट्रीय स्तर के सम्मेलनों के अतिरिक्त क्षेत्रीय स्तर पर सम्लन बुलाए जाने की परम्परा भी अनेक दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। ये सभी सम्मेलन राजनीतिक, प्रशासकीय और व्यावसायिक स्तरों पर आमन्त्रित किये जाते है।
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