सरकारिया आयोग

सरकारिया आयोग

सरकारिया आयोग

(Sarkaria Commission)

भारत के केन्द्र-राज्य सम्बन्धों का वास्तविक अध्ययन तथा विश्लेषण करने हेतु मार्च 1983 में एक सदस्यीय आयोग की स्थापना की गई। इस आयोग के अध्यक्ष पद पर आर. एस. सरकारिया (R.S. Sarkaria) को नियुक्त किया गया जो कि सर्वोच्च न्यायालय के अवकाश प्राप्त न्यायाधीश थे। आयोग ने 2 नवम्बर, 1987 को 1600 पृष्ठों का अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत किया। इस प्रतिवेदन में आयोग ने केन्द्र-राज्य सम्बन्ध, अखिल भारतीय सेवाएं, वित्तीय प्रशासन, योजना आयोग, राष्ट्रीय विकास परिषद, अन्तर्राज्यीय परिषद तथा राज्य में सशस्त्र बल आदि से सम्बन्धित विषयों पर अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की।

केन्द्र-राज्य सम्बन्धों से सम्बन्धित सिफारिशें

संविधान के तहत केन्द्र को राज्यों की अपेक्षा अधिक कार्यपालिका शक्तियां प्रदान हैं जसका कई विद्वानों ने विरोध किया है। इस सम्बन्ध में सरकारिया आयोग का मानना है कि “संविधान के मूल स्वरूप में कोई प्रबल परिवर्तन न तो उचित है और न ही आवश्यक है।” अतः आयोग ने सुदृढ़ केन्द्र की अपरिहार्यता को स्वीकार किया है। संविधान में प्रदत्त केन्द्र द्वारा राज्य को प्रशासनिक निर्देश देने का अधिकार उचित माना है। यदि राज्य प्रशासन केन्द्र द्धारा प्रसारित निर्देश का पालन न करें तो अनुच्छेद-365 के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लागू करना अनुचित नहीं है।

राज्यपाल पद के सम्बन्ध में सिफारिशें

  1. राज्यपाल के पद पर नियुक्त व्यक्ति राज्य से बाहर का हो, तटस्थ हो, जीवन के किसी न किसी क्षेत्र में प्रतिष्ठित हो, राजनीतिक क्षेत्र में अधिक भाग न लिया हो।
  2. ऐसे व्यक्ति को राज्यपाल न बनाया जाए जो केन्द्र में सत्तारूढ़ पार्टी का राजनेता हो।
  3. राज्यपाल के पद पर किसी व्यक्ति का चयन करते समय उस राज्य के मुख्यमंत्री से प्रभावी सलाह करनी चाहिए।
  4. राज्यपाल को नियुक्त करते समय प्रधानमंत्री को भारत के उप राष्ट्रपति और लोकसभा अध्यक्ष से गुप्त तथा औपचारिक परामर्श लेना चाहिए।
  5. केन्द्र को राज्यपाल के 5 वर्ष के कार्यकाल में बाधा नहीं डालनी चाहिए।
  6. राज्यपाल को निश्चित अवधि से पूर्व हटाने के सम्बन्ध में एक सलाहकार समिति द्वारा (उप राष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष तथा सेवानिवृत्त भारत का प्रधान न्यायाधीश) जांच की जानी चाहिए। इस जांच में राज्यपाल का स्पष्टीकरण भी सम्मिलित किया जाना चाहिए।
  7. यदि राज्यपाल द्वारा समय अवधि पूर्व त्यागपत्र दिया जाता है या उसे अन्य राज्य का राज्यपाल बना दिया जाता है या उसका कार्यकाल समाप्त कर दिया जाता है तो ऐसी स्थिति में सभी स्थितियों का विवरण संसद के दोनों सदनों में रखा जाना चाहिए।
  8. राज्यपाल अपना पद छोड़ने के बाद केवल राष्ट्रपति या उप राष्ट्रपति के पद का चुनाव लड़ सकता है। सक्रिय राजनीति में भाग नहीं ले सकता है और न ही कोई अन्य लाभ का पद ग्रहण करे।
  9. राज्यपाल को सेवा निवृत्त होने पर सेवा निवृत्त लाभ दिए जाएं।
  10. राज्यपाल को मुख्यमंत्री का चयन करते समय बहुमत वाली पार्टी पर विशेष जोर देना चाहिए।
  11. मिली जुली सरकार के गठन के बाद 30 दिन के अन्दर मुख्यमंत्री को विधानसभा में बहुमत सिद्ध करना चाहिए।
  12. राज्यपाल तब तक मंत्रिपरिषद को बर्खास्त नहीं कर सकता जब तक उसे विधानसभा में बहुमत प्राप्त है। यदि बहुमत प्राप्त न होने पर भी मंत्री त्यागपत्र न दे तो उन्हें बर्खास्त किया जाना चाहिए।
  13. जब विधानसभा का सत्र चल रहा हो तो बहुमत का प्रश्न सदन में ही निर्णीत हो जाना चाहिए।
  14. जब तक मंत्रिपरिषद विधानसभा में बहुमत प्राप्त है तब तक उसकी सत्र बुलाने, सत्र स्थगित करने, विधानसभा को भंग करने जैसी सलाह राज्यपाल को बाध्य होकर माननी पड़ेगी।
  15. राज्यपाल कुछ आपातकालीन स्थितियों में सभा बुलाने में मंत्रिपरिषद के निर्णय का प्रयोग कर सकता है। ऐसा वह तभी कर सकता है जब वह यह सुनिश्चित करना चाहता हो कि राज्य में उत्तरदायी सरकार की व्यवस्था संविधान में निर्धारित मानदण्डों के अनुसार चलाई जा रही है।
  16. यदि किसी सरकारी विभाग के विरुद्ध किसी विश्वास प्रस्ताव का नोटिस विधान मण्डल में निलम्बित पड़ा है तथा यह प्रस्ताव विरोधी दल से वैध चुनौती को प्रदर्शित करता है, किन्तु मुख्यमंत्री इस बात की सलाह देता है कि सत्रावसान किया जाना चाहिए तो राज्यपाल को सीधे यह सलाह स्वीकार नहीं करनी चाहिए। राज्यपाल को चाहिए कि वह मुख्यमंत्री को यह सलाह दे कि वह सत्रावसान को स्थगित कर दे तथा प्रस्ताव का सामना करे।
  17. जब किसी ऐसे विभाग द्वारा सभा भंग करने की सलाह हो जिसने बहुमत खो दिया है या उसमें बहुमत का समर्थन खो जाने की संभावना तो राज्यपाल को उपयुक्त कार्यवाही करनी चाहिए।
  18. विधान सभा तथा विधान परिषद के लिए नामांकन के मामले में राज्यपाल के पास कोई स्वविवेकाधिकार नहीं है।
  19. जहां राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम के अन्तर्गत यह व्यवस्था की गई हो कि राज्यपाल इस कार्यालय की हैसियत से विश्वविद्यालय का कुलपति होना तथा राज्य में राज्यपाल के रूप में नहीं अपितु कुलपति के रूप में उसे अधिकार एवं कर्त्तव्य प्रदत्त करेगा तो राज्यपाल पर कोई दायित्व नहीं रहेगा कि वह कुलपति के रूप में अपनी हैसियत से अनुच्छेद 163 (1) के अन्तर्गत हमेशा शासकीय सलाह पर ही कार्य करे।
  20. राष्ट्रपति को तदर्थ या पाक्षिक रिपोर्ट भेजते समय राज्यपाल को सामान्यतः अपने मुख्यमंत्री को विश्वास में ले लेना चाहिए। बशर्ते कि इसके विपरीत अधिक्रमण करने वाले कारण मौजूद न हो।
  21. भारतीय संविधान में अनुच्छेद 163 के तहत राज्यपाल के स्व-विवेक के अधिकार को यथावत रखा जाए।
  22. राज्यपाल को अपने स्व-विवेक के अधिकार का प्रयोग अन्तिम लक्ष्य के रूप में ही करना चाहिए।
  23. जिन राज्यों में राज्यपालों को कुछ विशिष्ट कार्य सौंपे गए हैं उन्हें वह अपनी स्वविवेकीय आधार से पूर्ण करेंगे।
  24. यह न तो व्यावहारिक होगा और न ही वांछनीय होगा कि राज्यपाल को स्वविवेकाधिकारों का प्रयोग करने के लिए मार्ग-निर्देश तैयार किये जायें।
राष्ट्रपति के विचारार्थ राज्यपालों द्वारा विधेयकों का अभिरक्षण तथा अध्यादेश लागू करना

सामान्यतः संविधान के अनुच्छेद 200 में उल्लिखित कार्य करते समय राज्यपाल को अपनी मंत्रिपरिषद् की सलाह माननी होगी। अनुच्छेद 200 में राज्यपाल को सौंपे गए कार्यों के निष्पादन के मामले में स्पष्ट रूप से अथवा आवश्यक निहितार्थ के रूप में सामान्य विवेकाधिकार प्रदान नहीं किया गया है और इन कार्यों से किसी विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ आरक्षित करना भी शामिल है। तथापि यदा-कदा ही और अपवादात्मक मामलों में ही वह अपने विवेकाधिकार का प्रयोग कर सकता है। जहां उसकी राय हो कि विधेयक की विषय-वस्तु स्पष्ट रूप से राज्य विधान मण्डल की विधायी क्षमता से बाहर है अथवा जहां इसमें उपबन्ध प्रत्यक्ष रूप से संविधान की योजना और उसके ढांचे के अनुरूप नहीं है और जिनसे राष्ट्र की प्रभुता, एकता और अखण्डता को खतरा हो सकता है अथवा जिनसे स्पष्ट रूप से मौलिक अधिकारों का हनन हो अथवा जिनसे संवैधानिक सीमाओं और उपबन्धों का अतिक्रमण होता हो।

अनुच्छेद 356 के अधीन आपात उपबन्ध

राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 356 का प्रयोग बहुत कम अवसरों पर तथा अत्यावश्यक मामलों में ही अन्तिम उपाय के रूप में उस समय किया जाना चाहिए जब अन्य उपलब्ध सभी विकल्पों से राज्य में संवैधानिक तन्त्र को भंग होने से रोका न जा सके या उसमें कोई सुधार न किया जा सके। अनुच्छेद 356 के उपबन्धों का सहारा लेने से पूर्व राज्य स्तर पर ही संकट को दूर करने के लिए यथासम्भव हर प्रयास किया जाना चाहिए।

अखिल भारतीय सेवाओं के सम्बन्ध में सिफारिशें

  1. भारत में अखिल भारतीय सेवाएं आज भी उतनी ही आवश्यक हैं जितनी संविधान निर्माण के समय थी। इन्होंने अपनी भूमिकाओं को पूर्णतः सिद्ध किया है।
  2. अखिल भारतीय सेवाओं को विघटित करने या किसी राज्य सरकार को योजना में शामिल न करना देश के वृहतर हितों के लिए हानिकारक होगा।
  3. अखिल भारतीय सेवाओं को अधिक मजबूत किया जाना चाहिए। यह कार्य अखिल भारतीय सेवाओं की भर्ती, प्रशिक्षण, पद-वर्गीकरण, पदोन्नति आदि की नीति से तथा पद्धतियों में सुधार करके किया जा सकता है। लोक प्रशासन के क्षेत्र में सेवाओं का विशिष्टीकरण किया जाना चाहिए। केन्द्र और राज्य सरकारों के उन अधिकारियों के बीच वृहतर समन्वय और समय-समय पर वार्ताएं आयोजित की जानी चाहिए, जो इन सेवाओं के प्रबन्ध के लिए उत्तरदायी है।
  4. अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों की केन्द्र में प्रतिनियुक्ति (Deputation) की जानी चाहिए। इस सम्बन्ध में राज्य सरकारों द्वारा ली जाने वाली स्वीकृति को समाप्त किया जाना चाहिए।
  5. प्रत्येक अखिल भारतीय सेवा में अधिकारी को (चाहे सीधी भर्ती से हो या पदोन्नति से चयनित हो) एक न्यूनतम अवधि तक प्रतिनियुक्ति पर भेजा जाना चाहिए। यह प्रतिनियुक्ति दोनों प्रकार के अधिकारियों के लिए अलग-अलग होनी चाहिए।
  6. राज्य सरकारों द्वारा अधिकारियों की छानबीन करने के बाद ही उन्हें केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर भेजा जाना चाहिए।
  7. राज्य से केन्द्र में प्रतिनियुक्ति पर भेजे गए अधिकारियों तथा राज्य में कार्यरत अधिकारियों की संख्या लगभग समान होनी चाहिए।
  8. अवधि प्रणाली (Tenure System) के पूर्व अनुपालन द्वारा यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों की उत्तम सेवाओं पर केन्द्र का एकाधिकार नहीं है बल्कि उनकी सेवाएं उन राज्य सरकारों को सहज ही उपलब्ध है, जिस संवर्ग के वे है।
  9. केन्द्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों को अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के ‘अनुशासन’ के लिए उनके स्थानान्तरण, पदोन्नति, नियुक्ति, निलम्बन आदि के अधिकारों का प्रयोग रोका जाना चाहिए।
  10. अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों की निलम्बन सम्बन्धी अपीलों की जांच करते समय केन्द्र को संघ लोक सेवा आयोग (P.S.C.) से विचार-विमर्श करके उसके उपयुक्त सुझाव को मानना चाहिए। इस प्रकार का उपबन्ध अखिल भारतीय सेवा (अनुशासन और अपील) नियमावली 1969 ई० मे सम्मिलित किया जाना चाहिए।
  11. केन्द्र सरकार की सहायता से राज्य सरकारें, अखिल भारतीय सेवा संवर्गों के अधिकारियों के लिए प्रोत्साहनों को आधुनिक और विकसित प्रणाली तैयार कर सकती है।
  12. प्रत्येक राज्य में राजनीतिक सत्ता प्राप्त व्यक्तियों को लोक सेवकों के प्रति उचित न्यायसंगत व्यवस्था करके उन्हें प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  13. केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच अखिल भारतीय सेवाओं के प्रबन्ध या नियमित रूप से विचार-विमर्श के लिए “कार्मिक प्रशासन सलाहकार परिषद्” गठित की जानी चाहिए। इस परिषद् में अध्यक्ष के रूप में कैबिनेट सचिव होना चाहिए तथा अखिल भारतीय सेवा के प्रभारी के रूप में केन्द्र के सचिव तथा राज्य सरकारों के मुख्य सचिव सदस्य होने चाहिए।
  14. केन्द्र के ‘कार्मिक तथा प्रशिक्षण विभाग द्वारा परिषद की सहायता की जानी चाहिए।
  15. ‘कार्मिक प्रशासन सलाहकार परिषद् समय-समय पर केन्द्र और राज्य सरकारों को सलाह और सुझाव देगी।
  16. केन्द्र के कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग को परिषद के सुझावों पर सकारान्तक कार्यवाही करनी चाहिए और केन्द्र सरकार के निर्णयों को सुनिश्चित करना चाहिए।
  17. परिषद् द्वारा बताई गई कार्मिकों की समस्याओं की जांच के लिए विशेषज्ञों का एक अध्ययन दल बनाया जाना चाहिए।
  18. जिन मामलों का समाधान कार्मिक प्रशासन सलाहकार परिषद’ न कर सकें उन मामलों को सरकारी परिषद के समक्ष रखा जाना चाहिए।

वित्त प्रशासन के सम्बन्ध में सिफारिश

योजना आयोग में प्रस्तावित “वित्त आयोग प्रकोष्ठ को राज्यों की वित्तीय व्यवस्था को भी नियंत्रित करना चाहिए। यदि वित्त आयोग प्रकोष्ठ योजना आयोग के वित्तीय संसाधन प्रभारी के अधीन कार्य करेगा तो योजना आयोग और वित्त आयोग के मध्य अधिक समन्वय स्थापित हो सकेगा।

योजना आयोग के सम्बन्ध में सिफारिश

योजना आयोग को स्वायत्त संस्था बनाना अनुचित है। अतः योजना आयोग को केन्द्र सरकार के नियंत्रण में कार्य करना चाहिए। इसे स्वायत्त बनाने की अपेक्षा इसके संगठन और कार्य प्रणाली में सुधार किया जाना चाहिए। योजना आयोग का उपाध्यक्ष राजनीतिज्ञ को न बनाकर किसी ख्याति प्राप्त विशेषज्ञ को बनाना चाहिए। इसके अतिरिक्त समुचित संख्या में ऐसे विषय विशेषज्ञ नियुक्त किए जाएं जिनकी पेशेवर निष्ठा और योग्यता की साख स्थापित हो ।

राष्ट्रीय विकास परिषद् के सम्बन्ध में सिफारिश

देश की राष्ट्रीय विकास परिषद् का नाम बदल कर “राष्ट्रीय आर्थिक एवं विकास परिषद्” किया जाना चाहिए। इसमें आवश्यक संगठनात्मक परिवर्तन करके इसे अधिक प्रभावी बनाया जाना चाहिए।

अन्तर्राज्यीय परिषद के सम्बन्ध में सिफारिश

सरकारिया आयोग ने जोर देकर कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 263 के तहत ‘अन्तर्राज्यीय परिषद’ गठित की जानी चाहिए।

राज्यों में सशस्त्र पुलिस बल की तैनाती के सम्बन्ध में सिफारिश

केन्द्र सरकार को राज्य सरकार के अनुरोध से भिन्न नागरिक प्रशासन की सहायतार्थ राज्य में सशस्त्र बलों तथा अन्य बलों को परिनियोजित करने अथवा राज्य को ‘उपद्रवग्रस्त क्षेत्र घोषित करने से पूर्व यह वांछनीय है कि जहां तक सम्भव हो राज्य सरकारों से परामर्श किया जाए और उनका सहयोग प्राप्त किया जाए। हालंकि राज्य सरकार से पूर्व विचार-विमर्श करना अनिवार्य नहीं है। केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल (C.R.P.E.), सीमा सुरक्षा बल (B.S.F.) तथा केन्द्र के अन्य सशत्र बलों से राज्य की सशस्त्र पुलिस बलों के अधिकारियों की अदला-बदली करने की पद्धति होनी चाहिए। उनके क्षेत्रीय प्रशिक्षण एक होने चाहिए ताकि केन्द्र के सशस्त्र बलों को राज्य में नागरिक प्रशासन की सहायतार्थ तैनात करते समय बेहतर तकनीक और सूचना के आदान-प्रदान और संचालन की अधिक एकीकृत पद्धति को सरल बनाया जा सकें।

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