विदेश मंत्रालय- संगठन, कार्य

विदेश मंत्रालय

विदेश मंत्रालय (Foreign Ministry)

आज के अन्तर्राष्ट्रीय युग में संसार के सभी देशों के राजनैतिक नियमन के प्रशासन में विदेश मंत्रालय का महत्वपूर्ण स्थान है। भारत के संदर्भ में यह बात और भी अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की अपनी स्वतंत्र भौगोलिक स्थिति एवं विदेश नीति (गुट निरपेक्ष) के सिद्धांत अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के नियमन एवं संचालन में एक विशेष प्रकार की भूमिका निभाते हैं। भारत का विदेश मंत्रालय देश के प्रमुख मंत्रालयों में से एक है।

भारत में सर्वप्रथम 1783 ई० में ईस्ट इण्डिया कम्पनी के शासन काल में ‘विदेश विभाग की स्थापना की गई। सन् 1914 ई० में इसका नाम विदेश विभाग से बदलकर ‘विदेश एवं राजनीति विभाग’ कर दिया गया। सन! 1946 ई० में विदेशी कार्यों से सम्बन्धित दो विभाग कार्यरत थे-विदेश विभाग तथा राष्ट्रमण्डलीय सम्बन्ध विभाग। स्वतंत्र भारत में 1947 ई० में इन दोनों विभागों को मिलाकर एक ‘विदेश एवं राष्ट्रमण्डलीय सम्बन्ध मंत्रालय बना दिया गया। सन् 1948 ई० में इस मंत्रालय को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का विदेशी प्रचार विभाग भी सौंप दिया गया। सन 1949 में इस मंत्रालय से राष्ट्रमण्डलीय शब्द हटाकर केवल इसे विदेश मंत्रालय का नाम दिया गया। तब से ये विदेश मंत्रालय के रूप में ही कार्यरत है।

विदेश मंत्रालय का संगठन

(Organisation)

विदेश मंत्रालय भारत का एक महत्वपूर्ण एवं विशाल मंत्रालय है। स्वतंत्रता प्राप्ति से पूर्व यह मंत्रालय अथवा विभाग सदैव गर्वनर जनरल के अधीन रहा। स्वतंत्रता के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने इसे अपने पास रखा। इसके बाद इसे इंदिरा गांधी, एच. डी. देवगौड़ा, आई. के. गुजराल तथा अटलबिहारी वाजपेयी सरकार में भी इसे प्रायः प्रधानमंत्री ने ही अपने नियंत्रण में रखा। इन प्रधानमंत्रियों में अतिरिक्त काल में यह मंत्रालय कैबिनेट स्तर के वरिष्ठ मंत्री के अधीन रहा है। वर्तमान में विदेश मंत्रालय का प्रधान एक कैबिनेट स्तर का मंत्री है। इसके कार्यों में सहायता करने हेतु मंत्रालय में विदेश राज्य मंत्री एवं विदेश उपमंत्री भी नियुक्त किये जाते हैं।

प्रशासनिक स्तर पर विदेश मंत्रालय का संगठन एक सचिवालय के रूप में गठित है। इस सचिवालय का नियन्त्रण एवं निर्देशन वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी द्वारा किया जाता है जिन्हें सचिव कहते हैं। वर्तमान में तीन सचिव स्तर के अधिकारी हैं, पहला विदेश सचिव कहलाता है तथा दो अन्य विदेश सचिव-1 तथा विदेश सचिव-II कहलाते हैं। इसके अतिरिक्त इनके कार्यों में सहायता हेतु सचिवालय में अतिरिक्त सचिव (2), संयुक्त सचिव (12), निदेशक (4), उच सचिव (19), अवर सचिव (85), अनुभाग अधिकारी (85) तथा अन्य कर्मचारी गण नियुक्त किये जाते हैं।

विदेश मंत्रालय का सचिवालय कार्यों की दृष्टि से 25 विभागों में विभक्त है। ये सभी कार्यों की दृष्टि से 19 प्रमुख सम्भागों में विभक्त किये गये हैं-

  1. सामान्य प्रशासन संभागयह विदेश मंत्रालय के सचिवालय में कार्यरत लोक सेवकों की प्रशासन व्यवस्था से सम्बन्धित है।
  2. अमेरिकी संभाग इसके अन्तर्गत उत्तरी एवं दक्षिणी अमेरिका सम्बन्धी कार्य किए जाते हैं।
  3. पूर्वी संभागयह संभाग चीन, जापान, कोरिया, भूटान, उत्तरी पूर्वी सीमान्त एजेन्सी तथा नागालैण्ड से सम्बन्ध कार्य देखता है।
  4. पश्चिमी संभागयह संयुक्त राष्ट्र संघ तथा ब्रिटेन के अतिरिक्त अन्य यूरोपीय देशों से सम्बन्धित कार्य देखता है।
  5. अफीकी संभागयह दक्षिणी अफ्रीका तथा उत्तरी अफ्रीका एवं सूडान को छोड़कर ब्रिटेन तथा उसके उपनिवेशों से सम्बद्ध है।
  6. पाकिस्तान संभाग यह केवल पाकिस्तान से सम्बद्ध है।
  7. न्यायाचार संभाग यह संभाग कौंसिल कार्य तथा देशान्तरवास के कार्यों से सम्बद्ध है।
  8. उत्तरी संभागयह संभाग चीन तथा उत्तरी सीमा से सम्बद्ध है।
  9. दक्षिणी संभागयह संभाग पश्चिमी एशिया, दक्षिणी पूर्वी एशिया, उत्तरी अफ्रीका, सूडान, अफगानिस्तान, ईरान, बर्मा (म्यांमार), श्रीलंका, कोलम्बो शान्ति सम्मेलन से सम्बद्ध है।
  10. विदेश प्रचार संभागयह संभाग विदेशों में भारत की विदेश नीति के सिद्धान्तों, उपलब्धियों के साथ-साथ नवीनतम घटनाओं पर देश की सरकार के दृष्टिकोण के प्रचार-प्रसार से सम्बद्ध है।
  11. विदेश सेवा निरीक्षण वर्ग तथा अपहृत व्यक्ति संभाग यह संभाग विदेश सेवा के कुशल संचालन के साथ-साथ देश के अपहृत व्यक्तियों के रख-रखाव से सम्बद्ध है।
  12. ऐतिहासिक संभागयह संभाग विदेशों से सम्बद्ध ऐतिहासिक लेखों, प्रलेखों, संधियों समझौतों से सम्बद्ध है।
  13. बांग्ला देश संभाग यह संभाग बांग्ला देश मामलों से सम्बद्ध है।
  14. संयुक्त राष्ट्र संघ एवं सम्मेलन संभाग यह संयुक्त राष्ट्र संघ तथा उसके सम्मेलनों से सम्बद्ध कार्य देखता है।
  15. अफ्रेशियन सम्मेलन तथा अनुसंधान संभाग यह संभाग अफ्रीका तथा एशियाई देशों में होने वाले सम्मेलनों तथा इन देशों से सम्बन्धों पर होने वाले अनुसंधान कार्य से सम्बद्ध है।
  16. संकटकालीन मामलों का संभाग यह संभाग भारत तथा उसकी विदेश नीति पर आये संकटों के कार्यों से सम्बद्ध है।
  17. आर्थिक संभाग यह संभाग विदेश मंत्रालय तथा विदेश सेवा पर होने वाले व्यय तथा अन्य देशों से प्राप्त सहायता से सम्बद्ध कार्य देखता है।
  18. नीति आयोजन तथा समीक्षा संभाग यह विदेश नीति निर्माण तथा उसकी समय-समय पर समीक्षा से सम्बद्ध है।
  19. पारपत्र, वीसा एवं काउन्सिल संभागयह संभाग देश से विदेशों में जाने वाले तथा विदेशों से भारत आने वाले व्यक्तियों को पासपोर्ट तथा वीसा सम्बन्धी कार्यों से सम्बद्ध है।
अधीनस्थ कार्यालय

विदेश मंत्रालय के चार निम्नलिखित अधीनस्थ कार्यालय भी हैं-

  1. देशान्तरवास संस्थान,
  2. उत्तर-पूर्वी सीमान्त अभिकरण,
  3. नागा पहाड़ी तुएनसांग क्षेत्र,
  4. महानिरीक्षक का कार्यालय।
संलग्न कार्यालय

विदेश मंत्रालय के दो संलग्न कार्यालय भी हैं जो विदेश मंत्रालय के कार्यों को सम्पन्न करते हैं-

  1. केन्द्रीय पासपोर्ट एवं अप्रवासी संगठन, नई दिल्ली।
  2. विदेशी आवास गृह, नई दिल्ली।

विदेश मंत्रालय के कार्य

(Functions)

भारत का विदेश मंत्रालय विदेश सेवा का प्रमुख अभिकरण है। यह विदेश सेवा से सम्बन्धित निम्नलिखित कार्य करता है-

  • विदेशी राज्यों तथा राष्ट्रमण्डलीय देशों से भारत के सम्बन्धों का निर्वहन करना।
  • भारत में स्थित विदेशी राजनयिक तथा वाणिज्य दूतावासों के अधिकारियों एवं कर्मचारियों तथा संयुक्त राष्ट्र संघ के अधिकारियों एवं इनमें विशेष अभिकरणों को प्रभावित करने वाले सभी विषयों पर विचार करना।
  • भारतीय नागरिकों तथा भारत में आने वाले विदेशी नागरिकों के पारपत्र एवं वीसा सम्बन्धी कार्यों का संचालन करना।
  • विदेशों के अपराधियों का भारत से प्रत्यर्पण तथा विदेशों से भारतीय अपराधियों का प्रत्यर्पण करना।
  • विदेशी मामलों के कारण उत्पन्न स्थिति के संदर्भ में भारत में निवारक नजरबंदी कानून लागू करना।
  • भारतीय अधिनियम 1952 के तहत प्रवासियों को भेजना तथा बुलाना।
  • भारत से तिब्बत और तिब्बत से भारत के लिए सभी व्यापारियों, कुलियों तथा तीर्थ यात्रियों के लिए यात्रा का प्रबन्ध करना।
  • नागालैण्ड राज्य से सम्बन्धित विषयों का संचालन करना।
  • विदेशियों को भारत से स्वदेश भेजना तथा भारतीयों को विदेशों से स्वदेश बुलाना।
  • विदेशी शरणार्थियों तथा विदेशों में सेवा अर्पित करने वालों के उत्तराधिकारियों को पेन्शन देना।
  • विदेशी आगन्तुकों, राजनयिकों तथा वाणिज्य दूतावास के प्रतिनिधियों के स्वागत आदि का औपचारिक कार्य सम्पन्न करना।
  • पाण्डिचेरी, गोआ, दमन तथा दीव के उन विषयों का संचालन करना है जो फ्रांस और पुर्तगाल से सम्बन्धित हैं।
  • भूटान जैसे राज्यों के साथ सम्बन्धों का निर्वाह करना।
  • सीमावर्ती क्षेत्रों में विकास कार्यक्रम चलाना।
  • संयुक्त राष्ट्र संघ के विशिष्ट अभिकरणों तथा अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेना।
  • भारतीय विदेश सेवा तथा उसकी शाखा ‘बी’ का संचालन करना।
  • विदेशों में भारतीय विदेश नीति का प्रचार करना।
  • विदेशों के साथ राजनैतिक संधियों, समझौते और अधिवेशनों में शामिल होना।
  • भारत के बाहर स्थित तीर्थ स्थानों पर भारतीय तीर्थयात्रियों को सहयोग देता है। सन् 1955 ई० के पन्त मिर्जा समझौता के अनुसार पाकिस्तान में गैर-मुस्लिम तीर्थ स्थानों तथा भारत में मुस्लिम तीर्थ स्थानों की रक्षा तथा देखभाल करना।
  • पाकिस्तान से गैर-मुस्लिमों के भारत आगमन को नियमित करना।
  • भारत और पाकिस्तान में अल्पसंख्यक वर्गों के अधिकारों की रक्षा करना।
  • युद्ध प्रारम्भ करना अथवा युद्ध विराम करने के सम्बन्ध में सूचनाएं जारी करना।
  • जल, थल, वायु पर अन्तर्राष्ट्रीय कानून के उल्लंघन और महासागरों पर की जाने वाली डकैती तथा अपराधी के सम्बन्ध में आवश्यक कार्यवाही करना।
  • अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए पूछताछ करता है तथा सांख्यिकी एकत्रित करता है।
  • भारत की भूमि सीमाओं का निर्धारण करना।
  • देश की भूमि सीमाओं पर होने वाले आक्रमणों तथा वारदातों का मुकाबला करना।
  • भारत के ऊपर से गुजरने वाले गैर-अनुसूचित विदेशी नागरिक तथा सैनिक विमानों को राजनयिक उड़ान की अनुमति देना।
  • अन्तर्राष्ट्रीय कानून से सम्बन्धित विभिन्न विषयों पर विचार करता है, जैसे- प्रादेशिक जल, संस्पर्शी क्षेत्र, महासमुद्रों में मछली पकड़ने के अधिकारों का समर्थन आदि।

मूल्यांकन

(Evaluation)

भारत की स्थिति अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में जितनी सुदृढ़ होनी चाहिए आज हम अपनी उतनी सुदृढ़ स्थिति अनुभव नहीं करते। मंत्रालय को वास्तविक रूप से जितना काम करना चाहिए उतना वह करने में असमर्थ दिखाई देता है। ए. डी. गोरवाला ने इन असफलताओं की ओर संकेत करते हुए कहा था, ‘कोई भी अनुभवी व्यक्ति जो दिल्ली स्थित विदेश मंत्रालय का निरीक्षण करे वह नेहरू जी की प्रशासकीय अयोग्यता का स्पष्ट रूप से अवलोकन कर सकता हैं। मंत्रालय में काम करने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक है, उनके पास काम बहुत कम है। विदेश स्थित दूतावासों के कर्मचारी उस देश की भाषा को समझने का प्रयास नहीं करते जहां के लिए वह नियुक्त होते हैं। कार्य करने का बहुत कम ज्ञान है। सभी सम्पर्कों के ज्ञान का अभाव है, ऊंचा रहने तथा अनावश्यक प्रदर्शन पर धन का अपव्यय होता रहता है।’

एक कुशल व्यक्ति ने बहुत समय पूर्व इन दोषपूर्ण व्यवस्थाओं को छोड़ दिया होता। जैसे-जैसे समय बढ़ता जा रहा है वैसे ही नेहरू प्रशासन में स्थिति खराब होती जा रही है। आज नेहरू जी नहीं हैं। प्रशासन में परिवर्तन आये हैं. लेकिन विदेश जाने वाले साधारण नागरिक से लेकर संसद सदस्यों तक की यह शिकायतें हैं कि हमारे आवासी कुशलतापूर्वक कार्य नहीं करते। वे अधिक रुचि लेकर भी कार्य नहीं करते। एक छोटा सा शेष बचा पाकिस्तान प्रचार की दृष्टि से बहुत सशक्त दिखाई देता है, उसका परिणाम हमारे विदेशी दूतावासों की अकर्मण्यता नहीं तो यह क्या है।

विदेश मंत्राय में वांछनीय सुधारों के सम्बन्ध में पिल्लई कमेटी ने अनेक महत्वपूर्ण सिफारिशें प्रस्तुत की। इनमें से कुछ प्रमुख सिफारिशें निम्नलिखित हैं-

पिल्लई कमेटी का कहना था इस मंत्रालय में कोई परामर्शदात्री निकाय नहीं है। मंत्रालय में अपने कार्यों के सम्बद्ध में विशिष्ट परामर्श देने वाले विशेषज्ञ अभिकरणों का अभाव एक संगठनात्मक दुर्बलता है। मंत्रालय को चाहिए कि वह विशेषज्ञ सलाहकारों के कुछ ऐसे प्रशासकीय निकाय गठित करे, जिनसे मंत्रालय का कार्य विशेषीकृत ढंग से संचालित किया जा सके। कमेटी की मान्यता थी कि हमारी विदेश नीति जो अब तक विश्व स्तर पर असफल रही है, उसका एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि हमारे प्रधानमंत्री एवं विदेश मंत्री नेहरू ने अपने विदेश मंत्रालय के अधिकतर निर्णय व्यक्तिगत स्तर पर लिये और विशेषज्ञों की सहायता नहीं के बराबर ली। अतः पिल्लई कमेटी का यह सुझाव है कि इस मंत्रालय में कुछ ऐसे परामर्शदाता निकाय होने चाहिए जो नीति निर्माण में निरन्तरता के साथ विशिष्ट सलाह दे सकें।

विदेश मंत्रालय के सम्बन्ध में प्रशासनिक सुधार आयोग ने भी कुछ सिफारिशें की हैं। आयोग का कहना है कि हमारी विदेशी नीति में मौलिक परिवर्तन नहीं हो सके हैं। समय के साथ-साथ विदेश नीति के मूल आधारों में परिवर्तन अत्यन्त आवश्यक है। अतः प्रशासकीय सुधार आयोग का मत था कि भारत की विदेश नीति के आधार क्या हों तथा इस मंत्रालय को विदेशों के साथ कैसे सम्बन्ध स्थापित करने चाहिए इन निर्णयों को लेने के लिए एक नियमित विभाग’ स्थापित किया जाना चाहिए।

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