संगठन के सिद्धान्त

संगठन के सिद्धान्त

संगठन के सिद्धान्त

(Principles of Organization)

संगठन सम्बन्धी यान्त्रिक तथा मानवीय दृष्टिकोण (Mechanistic and human approach about organization)- ‘संगठन का सृजन दो व्यापक रूपों में किया जा सकता है यान्त्रिक (Mechanistic) तथा मानवीय (Humanistic) दृष्टिकोण द्वारा यान्त्रिक दृष्टिकोण को व्यापक समर्थन अमेरिका में प्राप्त है। यह दृष्टिकोण इस बात में विश्वास करता है कि प्रशासन एवं उसके वास्तविक संगठन से उसकी रूपरेखा अधिक महत्वपूर्ण है। इसके अनुसार वैज्ञानिक के कुछ ऐसे निश्चित सिद्धान्तों का निरूपण प्रशासन के क्षेत्र में हो चुका है जिनके आधार पर हम संगठन की रूपरेखा पहले से ही बना सकते हैं और उसी के अनुकूल, तत्पश्चात् उसके लिए कर्मचारियों को उसमें लगा सकते हैं। यान्त्रिक सिद्धान्त यह मानकर चलता है कि स्टाफ नियोजन के लिए है, न कि नियोजन स्टाफ के लिए । मानव तत्व की अपेक्षा यह सिद्धान्त नियोजन की प्राथमिकता प्रदान करता है। मनुष्य का वही स्थान बताता है जो मशीन में उसके विभिन्न भागों अथवा पुर्जी का होता है। मशीन की योजना तैयार हो जाने पर पुर्जों  को उसके अनुसार समायोजित अथवा फिट किया जा सकता है।

यान्त्रिक दृष्टिकोण लूथर गुलिक के इस विचार से अधिक प्रभावित है कि संगठन सत्ता का एक औपचारिक ढाँचा है। उसकी परिभाषा में संगठन के अर्थ कार्यों के विभाजन मात्र से लगाये गये हैं। इस सिद्धान्त को यान्त्रिक दृष्टिकोण इस कारण कहा गया है कि इसके अन्तर्गत संगठन की संरचना को विशिष्ट महत्व दिया गया है। भवन निर्माण की भाँति संगठन की भी एक रूपरेखा तैयार की जाती है। संगठन यन्त्री आपके द्वारा बताये गये लक्ष्य की पूर्ति के लिए नक्शा (Design) तैयार करके दे देता है। ऐसे नक्शा नवीस अमेरिका में खूब पाये जाते हैं। इसके लिए वे अपनी फीस लेते हैं, उदाहरण के लिए आपके सामने समस्या है विस्थापितों को पुनः बसाने की। ‘संगठन यन्त्री’ आपको विभाग की संगठनात्मक रूपरेखा बनाकर दे देगा, किन्तु संगठन के संचालन के लिए आप किस प्रकार के व्यक्ति रखना चाहेंगे इससे उसका कोई सम्बन्ध नहीं होता। इसमें व्यक्ति का कोई महत्व नहीं होता। यान्त्रिक दृष्टिकोण वर्तमान शताब्दी के प्रारम्भ की देन है, मार्क्स साइमाँ, गुलिक, उर्विक, कैथोल तथा मूनी आदि लेखकों से व्यापक समर्थन मिला।

यान्त्रिक सिद्धान्त के लक्षण

  1. यह परमाणुवादी अवधारणा पर अवलम्बित है। जिस प्रकार मशीन के पुर्जों में परस्पर सम्बन्ध नहीं होता उसी प्रकार संगठन में रत व्यक्तियों में परस्पर मेल नहीं होता।
  2. यह पूर्णतः यन्त्रवादी अवधारणा है।
  3. संगठन की स्थिरता में विश्वास
  4. व्यक्ति प्रत्येक कार्य स्वयं की इच्छा से करता है।
  5. वैज्ञानिक एवं विवेक पूर्ण सिद्धान्तों में विश्वास ।

यांत्रिक दृष्टिकोण की आलोचना

(Criticism of Mechanistic Approach)

  1. मनुष्य तथा मशीन के पुर्जों की स्थिति एकसी नहीं है (The Position of man and the parts of machine is not identical)- संगठनकर्ता मशीन के पुर्जे की भाँति मानव तत्व को अपनी इच्छानुकूल प्राप्त एवं परिवर्धित नहीं कर सकता। मनुष्य तथा मशीन के पुर्जों की स्थिति एक सी नहीं है। यह आवश्यक नहीं है कि हमें अपनी योजनानुकूल पदाधिकारी प्राप्त हो जाएं। यह बात पदार्थों से बनी हुई वस्तुओं के विषय में चाहे सत्य हो परन्तु मानव तत्व के सम्बन्ध में उसे उचित तथा विवेकपूर्ण नहीं माना जा सकता।
  2. मनुष्य संगठन के लिए नहीं है वरन संगठन मनुष्य के लिए है (Man is not for organization but vice versa)- संगठन वास्तव में मनुष्य के द्वारा तथा मनुष्य के लिए है। यह इस सिद्धान्त की बहुत बड़ी दुर्बलता है तथा बौद्धिक दिवालियापन है कि यह मनुष्य को संगठन का साध्य न मानकर साधन मान बैठा है। संगठन की रचना मनुष्य की योग्यताओं तथा क्षमताओं के अनुकूल होनी चाहिए। संगठनकर्ताओं को नियोजन करने से, पूर्व मानव सामग्री को भी देखना चाहिए जिसके द्वारा संगठन कार्य करेगा, वह लोहे अथवा लकड़ी का संगठन नहीं है जिसे हम अपनी इच्छानुसार मोड़ सकते हैं। प्रशासकीय संगठन में तो हमें मनुष्यों की इच्छाओं का भी ध्यान रखना पड़ता है।
  3. संगठन को हम पूर्णत यान्त्रिक रूप प्रदान नहीं कर सकते (We cannot assign complete mechanistic shape to the organization)- किसी भी संगठन को हम मानव जगत में स्पष्ट स्लेट की भाँति प्रारम्भ नहीं कर सकते। यद्यपि उर्विक ( Unwick) ने कहा है कि संगठन बिना नियोजन के आततायी, व्यर्थ तथा अकुशल (cruel, wasteful and inefficient) है, परन्तु वास्तविकता यह है कि संगठन की रूपरेखा तैयार करते समय मानवीय तत्व का भी हमें ध्यान रखना चाहिए।

मानवीय दृष्टिकोण

(Humanistic Approach)

20 वीं शताब्दी के चौथे दशक में संगठन के परम्परावादी अथवा यान्त्रिक दृष्टिकोण के विरुद्ध एक संगठनात्मक क्रान्ति ने जन्म लिया। परम्परावादी दृष्टिकोण में मानवीय तत्व का अभाव था। वह औपचारिक था। इसमें व्यक्ति को प्रधानता प्रदान नहीं की गयी थी। उसमें व्यक्ति पर शिक्षा, परम्परा सामाजिक मान्यताएं परिस्थिति आचरण, व्यवहार, जीवन स्तर, नैतिक आदर्श, कार्य सम्पादित करने की अवस्थाओं तथा वातावरण आदि का अध्ययन नहीं था, व्यक्ति को निरीह यन्त्रवत एवं शुष्क माना गया था। किन्तु संगठन के इस औपचारिक स्वरूप के खिलाफ हरबर्ट साइमां तथा इल्टन मेयो आदि लेखकों ने अपनी कलम उटाई । यह कलम हाईयोर्म प्रयोगों के पश्चात 38 ई0 में उठाई गई, इन प्रयोगों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि प्रशासकीय संगठन की संरचना तथा प्रशासकीय उत्पादन में मानवीय व्यवहार की महत्वपूर्ण करने से ही निर्णय लेने की प्रक्रिया समाप्त नहीं हो जाती। प्रशासन के सामान्य सिद्धान्तों में निर्णय लेने के सिद्धान्तों का भी समावेश होना चाहिये। संगठन में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर जिन बातों का प्रभाव होता है, उनका भी अध्ययन होना चाहिए। निर्णय लेने की प्रक्रिया में व्यक्ति का महत्व भी कम नहीं हो जाता। संगठन में निर्णय लेना भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

  1. सूचना सिद्धान्त 

    (Information Theory)- संगठन द्वारा जो निर्णय किये जाते हैं उनकी प्रकृति उसके अधिकारियों द्वारा प्राप्त होने वाली सूचना पर अवलम्बित है। निर्णायकों को संगठन की विविध समस्याओं के सम्बन्ध में सूचित रहना चाहिए। स्वस्थ एवं प्रमाणिक सूचनाओं के आधार पर बुद्धिपूर्ण निर्णय किए जा सकते हैं, मनुष्य को पूर्ण बुद्धिशील प्रणाली मान लेना हमारी मूल है, वह प्रायः भावना तथा प्रवृत्ति के मिश्रित स्वरूप से आचरण करता हैं निर्णय करने में केवल सूचना उपलब्धि से ही काम नहीं चलता वरन उन सूचनाओं को समझकर विश्लेषण करने की क्षमता पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। यह सत्य है कि सीमित ज्ञान एवं योग्यता के परिपेक्ष में जो मनुष्य व्यवहार करता है उसका बौद्धिक विश्लेषण नहीं किया जा सकता। संगठन के व्यवहार का विश्लेषण करते समय मनुष्य के सीमित ज्ञान तथा वातावरण का जिसमें कि वह रहता है, ध्यान रखना होगा।

  2. संचार सिद्धान्त 

    (Communication Theory)- संगठन की सफलता सूचना सिद्धान्त की भाँति उनकी संचार व्यवस्था पर भी बहुत कुछ निर्भर करती है। यह संचार व्यवस्था जितनी प्रभावशाली एवं स्वस्थ होगी, उतना ही सशक्त तथा कुशल संगठन होगा। संचार दोनों ही प्रकार के होते हैं – अनौपचारिक तथा औपचारिक संचार व्यवस्था पदसोपान व्यवस्था में दोनों ओर से होती है। नीचे से संगठन के कर्मचारी ऊपर के पदाधिकारियों को सूचना भेजकर वास्तविक स्थिति से अवगत कराते हैं और दूसरी ओर ऊपर से अधिकारी वर्ग नीचे के कर्मचारियों को सूचनाएँ भेजता जिनका स्वरूप आदेश, परामर्श तथा निर्देशन का होता है। संचार व्यवस्था शीघ्रगामी होनी चाहिये, संचार का माध्यम मौखिक तथा लिखित दोनों ही प्रकार का हो सकता है, संगठन अधिकारियों के निर्णय संचार व्यवस्था की व्यापकता तथा निर्विग्ध स्वस्थता पर निर्भर करते हैं।

  3. समूह सिद्धान्त 

    (Group Theory)- इस सिद्धान्त की मान्यता है कि हित तथा सामाजिक सम्बन्धों के आधार पर संगठनों में गुटों का निर्माण हो जाता है। संगठन में निर्णय लेने की प्रक्रिया पर इनका विशेष प्रभाव होता है, इन गुटों की अवस्थिति का संगठन सम्बन्धी निर्णयों पर भी प्रभाव होता है। इन गुटबन्दियों के कारण यह आवश्यक नहीं है कि संगठन में पदसोपान के नियमों के अनुसार कार्य होता रहे, उनमें औपचारिक रूप से ये गुटबन्दियाँ भी कार्य करती हैं। कभी-कभी इनका प्रभाव इस सीमा तक होता है कि निम्न अधिकारी वास्तविक सत्ता हथिया लेता है और वास्तविक पदाधिकारी केवल नाममात्र का हस्ताक्षर कर्ता मात्र रह जाता है। इस प्रकार इन गुटबन्दियों के कारण निम्न अधिकारी ही औपचारिक रूप से वास्तविक सत्ता के अधिकारी बन बैठते हैं।

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