बजट- आशय, परिभाषा एवं बजट के सिद्धांत

बजट (Budget)

बजट (Budget) का आशय 

प्रत्येक कार्यपालिका राजकीय कार्यों को संचालित करने के लिए प्रति वर्ष आय-व्यय का हिसाब बजट के रूप में प्रस्तुत करती है। भारत के संविधान में बजट शब्द कहीं भी उल्लिखित नहीं है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 112 में कहा गया है कि—“राष्ट्रपति, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के सम्बन्ध में संसद के दोनों सदनों के समक्ष एक वार्षिक वित्तीय विवरण (एनुएल फाइनेन्सियल स्टेटमेण्ट) रखवायेगा। यही वार्षिक वित्तीय विवरण जिसमें सरकार की प्राप्तियों और व्यय का विवरण होता है, बजट कहलाता है।

बजट शब्द की उत्पत्ति फ्रांसीसी शब्द बोजते’ से हुई है, जिसका अर्थ है “एक चमड़े का थैला।” यह शब्द सर्वप्रथम 1773 में इंग्लैंड की संसद में व्यंग्य स्वरूप बोला गया था जो आज विश्व भर में प्रचलित हो गया है। उस समय जब वित्त मंत्री ने अपनी वित्तीय योजना संसद में प्रस्तुत की तो एक सदस्य ने व्यंग्य में कहा “वित्त मंत्री ने अपना बजट अर्थात् चमड़े का थैला खोला है।’ सामान्य अर्थों में बजट, वार्षिक आय तथा व्यय का विवरण होता है।

बजट की परिभाषा

विलोबी के अनुसार, “बजट, सरकार के आय-व्यय का अनुमान मात्र नहीं है बल्कि यह एक प्रतिवेदन, एक अनुमान तथा एक प्रस्ताव तीनों है या इसे होना चाहिए। यह एक ऐसा लेखापत्र है जिसके माध्यम से कार्यपालिका, व्यवस्थापिका के सम्मुख आती है और विस्तार के साथ अतीत, वर्तमान और भविष्य की वित्तीय स्थितियों का प्रतिवेदन प्रस्तुत करती है।

रेने स्टार्म के शब्दों में- “बजट, एक ऐसा परिपत्र है जिसमें सार्वजनिक राजस्व और व्यय की प्रारम्भिक योजनाएँ प्रस्तुत की जाती हैं।”

जी० जेजे के द्वारा दी गई परिभाषा के अनुसार- “बजट, सम्पूर्ण सरकारी प्राप्तियों तथा अनुमानों की एक स्थूल रूपरेखा है जिसमें कुछ प्राप्तियों को संग्रहीत करने तथा कुछ को व्यय करने का आदेश भी होता है।”

इस प्रकार, बजट की मुख्य विशेषताएं संभावित आय का अनुमान लगाना, प्रस्तावित खर्चों का वर्णन करना, सरकार की वित्तीय नीति की व्याख्या करना तथा सरकार की प्रमुख योजनाओं की उद्देश्यपरक जानकारी प्रदान करना है। वस्तुतः वार्षिक बजट किसी भी सरकार की कार्य-शैली, चिन्तन, नीति तथा परिपक्वता का परिचायक होता है क्योंकि आम बजट देश की जनता को व्यापक रूप से प्रभावित करता है।

बजट के सिद्धान्त

बजट चाहे केन्द्र सरकार द्वारा प्रस्तुत किया जाए अथवा राज्य सरकार द्वारा निर्मित हो, सभी स्थानों पर बजट के कतिपय सामान्य सिद्धान्त ऐसे हैं जिनका पालन किया जाता है। ये सिद्धान्त इस प्रकार हैं-

  1. प्रथम सिद्धान्त बजट की नियमितता से सम्बन्धित है जिसके अन्तर्गत प्रति वर्ष जहाँ तक हो सके बजट के अनुमान एक निश्चित समयावधि के दौरान लगा लेने चाहिए तथा सभी विभागों के अनुमानों को एकीकृत स्वरूप प्रदान करके राजनीतिक कार्यपालिका के सम्मुख प्रस्तुत कर देना चाहिए। भारत में बजट का निर्माण तो नियमित रहता है किन्तु सरकारों के पतन के कारण कई बार बजट निश्चित समय पर पारित नहीं हो पाता है।
  2. दूसरा सिद्धान्त बजट की प्रकृति तथा प्रावधानों की स्पष्टता के क्रम में है। बजट के प्रत्येक भाग में वर्णित तथ्य पूर्णतया स्पष्टता लिए हुए होने चाहिए क्योंकि असमंजसता या उलझाव की स्थिति संकट उत्पन्न कर सकती है।
  3. बजट से सम्बन्धित तीसरा सिद्धान्त एकता और व्यापकता से सम्बन्धित है जिसके अनुसार बजट में दर्शाए गये सभी आय-व्यय विवरण एकीकृत रूप से वर्णित हों तथा उनमें सम्पूर्ण राजकोषीय कार्यक्रमों का सारांश प्रस्तुत किया जाना चाहिए।
  4. चौथा सिद्धान्त बजट के संतुलन को प्राथमिकता देता है। संतुलित बजट से तात्पर्य अनुमानित व्यय, अनुमानित आय से अधिक नहीं होना चाहिए। व्यय से अधिक आय होने पर “अतिरिक्त बजट’ नाम दिया जाता है जबकि आय से अधिक व्यय होने पर “घाटे का बजट’ कहलाता है। भारत में विकास कार्यक्रमों, व्यापारिक मन्दी तथा अन्य कई कारणों से निरन्तर घाटे का बजट प्रस्तुत होता रहा है जो एक सीमा तक आवश्यक भी माना गया है क्योंकि विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में यह परिस्थितिजन्य है।
  5. पाँचवाँ सिद्धान्त बजट में लोचशीलता को महत्व देता है अर्थात् बजट केवलअनुमानित होता है, उसके अनुमानों में संशोधन की संभावना बनी रहती है। पूर्णता एक-एक पैसे का हिसाब संभव नहीं होता है केवल स्थूल अनुमान ही अंत तक यथावत रहते हैं।
  6. छठा सिद्धान्त यह मानता है कि बजट की प्रभावशीलता नियतकालिक हो अर्थात् सरकार को विनियोजन तथा व्यय करने की अनुमति एक निश्चित अवधि के लिए होनी चाहिए। इस अवधि तक यदि व्यय नहीं हो पाता है तो उसका पुनर्विनियोजन होना चाहिए।
  7. सातवाँ सिद्धान्त बजट की सत्यता तथा शुद्धता को महत्व देता है क्योंकि बजट में जैसा दर्शाया जाए वैसी ही क्रियान्विति होनी चाहिए, साथ ही बताये गये राजस्व प्राप्ति के आँकड़े पूर्ण शुद्ध हों ताकि बजट की विश्वसनीयता बनी रह सके। करों का भुगतान सावधानी से हो।
  8. आठवाँ सिद्धान्त बजट की सम्पूर्णता को अनिवार्य बताता है जिसके अनुसार बजट अनुमानों में प्राप्तियों तथा व्यय एवं लेन-देन की स्थिति सम्पूर्ण रूप से वर्णित की जाये। अतः बजट के एक भाग में चालू व्यय और आय तथा दूसरे में पूँजीगत भुगतान तथा प्राप्तियाँ दिखलानी चाहिए। प्रथम भाग “राजस्व बजट’ तथा दूसरा भाग “पूँजीगत बजट” का पर्याय माना जाता है।
  9. बजट का नवम् सिद्धान्त इसके नकद आधार को आवश्यक मानता है अर्थात् बजट के आय और व्यय के अनुमान वर्ष की वास्तविक प्राप्ति या व्यय से सम्बन्धित होने चाहिए। इसकी वित्तीय वर्ष के लेखों की अन्तिम तैयारी वर्ष के समाप्त होते ही की जा सकती है।
  10. दसवाँ सिद्धान्त बजट में लेखा विधि तथा बजट मैनुअल के नियमों की पालना करने पर बल देता है ताकि उपर्युक्त वर्णित सिद्धान्तों को व्यावहारिक रूप मिल सके।
  11. बजट को व्यापक रूप से प्रचार दिया जाना चाहिए। यह सिद्धान्त भी बहुत-से अर्थशास्त्री मानते हैं।

अधिकांश देशों में बजट निर्माण के इन सिद्धान्तों का पालन किया जाता है क्योंकि ये सामान्य प्रक्रिया के ही भाग हैं तथापि बजट की प्रकृति तथा आवश्यकता के अनुसार अन्य सिद्धान्त भी अपनाये जा सकते हैं।

बजट निर्माण की प्रक्रिया (बजट-प्रक्रिया)

सामान्यतः बजट-प्रक्रिया के तीन भाग माने जाते हैं। प्रथम, बजट का निर्माण, द्वितीय, बजट की स्वीकृति तथा तृतीय, बजट का कार्यान्वयन। इन तीनों भागों में कुछ उपचरण भी सम्मिलित हैं, जैसे-

(A) बजट का निर्माण-
  1. बजट अनुमान तैयार करना
  2. बजट अनुमानों को एकीकृत करना
  3. मंत्रिपरिषद् निर्णय।
(B) बजट की स्वीकृति-
  1. बजट का विधानमंडल में प्रस्तुतीकरण
  2. बजट पर सामान्य चर्चा
  3. अनुदान मांगों पर मतदान
  4. मतदान
  5. लेखानुदान
  6. विनियोग विधेयक
  7. वित्त विधेयक।
(C) बजट का कार्यान्वयन-
  1. वित्तीय साधनों का एकत्रीकरण
  2. एकत्रित कोषों का संरक्षण वितरण
  3. लेखा संधारण।

(A) बजट का निर्माणभारत में बजट निर्माण की प्रक्रिया विस्तृत तथा गहन है जिसमें सरकार के प्रत्येक कार्यालय का अपना विशिष्ट योगदान होता है।

  1. बजट अनुमान तैयार करना भारत में वित्तीय वर्ष (एक अप्रैल) की शुरुआत के 7-8 माह पूर्व ही बजट अनुमानों की तैयारी शुरू हो जाती है। वित्त मंत्रालय सभी मंत्रालयों तथा विभागों को आगामी वर्ष का बजट तैयार करने हेतु एक प्रपत्र भेजता है। इसके पश्चात् मंत्रालयों के कार्यकारी विभागों के विभागाध्यक्ष अपने अधीनस्थ सभी कार्यालयों के कार्यालयाध्यक्षों के पास सितम्बर माह में बजट के अनुमान तैयार करने हेतु निर्धारित प्रपत्र भिजवाते हैं। प्रत्येक कार्यालय की लेखा शाखा बजट मैनुअल में दिये गये नियमों के अनुसार अपनी-अपनी इकाई के आय-व्यय आंकड़े एकत्र कर प्रपत्रों में प्रस्तुत करती है। ये प्रपत्र मुख्यतः योजना तथा गैर-योजना मदों के पृथक्-पृथक् तैयार किये जाते हैं। इन प्रपत्रों में लेखा शीर्षक, कार्मिकों के नाम, पद, वेतनमान, वेतनवृद्धि, संभावित आगामी व्यय, अन्य भत्ते, कार्यालयी व्यय इत्यादि का वर्णन होता है। दूसरे प्रकार के प्रपत्र में कोषागार, मासिक राजस्व या नकद प्राप्ति का विवरण तथा आय के मुख्य अनुमानों का हिसाब होता है। तत्पश्चात् एकीकृत रूप से आय-व्यय अनुमान वर्णित करने कार्यालयाध्यक्ष अपने विभागाध्यक्ष के पास प्रेषित कर देते हैं। विभागाध्यक्ष अपनी सभी इकाइयों या कार्यालयों के बजट अनुमानों को सामूहिक रूप से संकलित करके मंत्रालय को प्रस्तुत करते हैं जिन्हें वित्त मंत्रालय के पास भेजा जाता है।

विभागाध्यक्ष इन आंकड़ों को निम्नांकित प्रारूप में प्रस्तुत करते हैं-

  • विनियोग के शीर्षक तथा उपशीर्षक
  • गत वर्ष की वास्तविक आय तथा व्यय
  • वर्तमान वर्ष के स्वीकृत अनुमान
  • वर्तमान वर्ष के संशोधित अनुमान
  • आगामी वर्ष के बजट अनुमान
  • घटत-बढ़त का विवरण।
  1. बजट अनुमानों को एकीकृत करना सभी प्रशासनिक विभागों से प्राप्त बजट अनुमानों का वित्त मंत्रालय सूक्ष्मता से परीक्षण करता है। इस सम्बन्ध में महालेखाकार कार्यालय से भी सहायता प्राप्त की जाती है। नवम्बर माह में वित्त मंत्रालय प्रत्येक विभाग के अनुमानों के परीक्षण के समय मुख्यतः मितव्ययिता, सरकार की नीति, नियमों तथा कार्यकुशलता को ध्यान में रखता है। सभी विभागों के बजट अनुमानों को सामान्यतः तीन भागों में विभक्त कर लिया जाता है-
    1. स्थायी प्रभार ( व्यय)- इसके अन्तर्गत संवेतन, भत्ते, कार्यालय व्यय तथा संस्थापना इत्यादि स्थायी व्यय सम्मिलित किये जाते हैं। बजट का लगभग आधा हिस्सा सरकारी तंत्र के रख-रखाव या वेतन भत्तों पर ही व्यय होता है।
    2. प्रवर्तित कार्यक्रम या योजनाएँ इस भाग के अन्तर्गत निरन्तर वर्ष-दर-वर्ष जारी योजनाओं का व्यय सम्मिलित होता है। वित्त मंत्रालय का व्यय विभाग प्रचलित योजनाओं की प्रगति, कुशलता तथा उपादेयता का समय-समय पर मूल्यांकन करता है तथा निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति का विश्लेषण भी करता है।
    3. नये कार्यक्रम इस भाग में विभागों या सरकार द्वारा प्रस्तावित नये कार्यक्रमों के अनुमानित व्यय का आकलन किया जाता है। आर्थिक मामलों का विभाग, योजना आयोग तथा अन्य विशेषज्ञ अभिकरणों से परामर्श लिया जाता है क्योंकि नये कार्यक्रम या प्रस्ताव बजट या बोझ बढ़ाते हैं अतः सूक्ष्म परीक्षण आवश्यक है।

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