राज्य स्तर पर नियोजन तन्त्र | जिला एवं खण्ड स्तरीय नियोजन की आवश्यकता

राज्य स्तर पर नियोजन तन्त्र

राज्य स्तर पर नियोजन तन्त्र

(Planning Machinery at The State Level)

भारत में प्रशासन की संघात्मक व्यवस्था है, अतः योजना निर्माण और क्रियान्वयन का दायित्व केन्द्र के साथ-साथ राज्यों पर भी है। देश का योजना आयोग एक राष्ट्रीय योजना का निर्माण करता है तो साथ ही संघीय प्रदेशों की सरकारें अपने-अपने प्रदेशों से सम्बन्धित योजनाओं को बनाती हैं। राज्य स्तर पर नियोजन तन्त्र राज्य योजना का प्रारूप बनाकर उसे केन्द्रीय सरकार के योजना आयोग और राज्य व्यवस्थापिका के समक्ष प्रस्तुत करता है। राज्य योजना का निर्माण राज्य सरकार का नियोजन विभाग ही करता है। लेकिन समय-समय पर योजना आयोग से राज्य योजना के बारे में विचार-विमर्श करता रहता है। देश के सभी राज्यों में अपना-अपना नियोजन तन्त्र है, जो अपने राज्य की योजना का प्रारूप तैयार कर योजना आयोग को भेजता है।

राज्यों में ‘नियोजन विभाग‘ सचिवालय स्तर पर राज्य विकास कार्यक्रमों, योजनाओं के निर्माण एवं समन्वय के लिए मुख्य उत्तरदायी संस्था है। प्रायः यह विभाग मुख्यमन्त्री अथवा कैबिनेट स्तर के मन्त्री की अध्यक्षता में रहता है। कई राज्यों में नियोजन मन्त्री नियोजन विभाग का राजनैतिक मुखिया होता है। उपनियोजन मन्त्री, योजना सचिव एवं नियोजन मन्त्री के बीच पुल का कार्य करता है। मुख्य सचिव नियोजन विभाग का प्रशासनिक अध्यक्ष या मुखिया होता है, जो विभाग के कार्यों के लिए उत्तरदायी होता है। कई बार एक विशेष सचिव (नियोजन की नियुक्ति मुख्य सचिव को सहायता प्रदान करने के लिए की जाती है। उप सचिव नियोजन मुख्यतः चार कार्य करता है (1) संदर्श नियोजन तथा दीर्घकालीन नियोजन, (2) योजना देखरेख, (3) न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम, (4) जिला नियोजन ।

राज्य योजना विकास की सहायता के लिए कुछ अभिकरणों की स्थापना की गयी है- (1) योजना मण्डल, (2) राज्य स्तरीय समन्वयकारी शक्तियाँ, (3) राज्य स्तरीय संलग्न बोर्ड।

राज्य के लिए वार्षिक एवं पंचवर्षीय योजनाओं के निर्माण हेतु नियोजन विभाग उत्तरदायी होता है।

भारत में जिला एवं खण्ड स्तरीय नियोजन की आवश्यकता

(Need for District and Block level planning in India)

भारत में अब तक आर्थिक नियोजन की प्रक्रिया मुख्यतः केन्द्र एवं राज्य सरकार के स्तर तक ही सीमित रही है और राज्य से निचले जिला एवं खण्ड स्तर तक आर्थिक नियोजन की सार्थक प्रक्रिया को विकेन्द्रित नहीं किया जा सकता है। यद्यपि गुजरात एवं कर्नाटक जैसे कुछ राज्यों में जिला स्तरीय नियोजन की दिशा में सराहनीय कदम उठाये गये हैं, लेकिन राजस्थान समेत अधिकांश अन्य राज्यों में इस दिशा में प्रभावी कदम अब नहीं उठाये जा सके हैं। भारत एवं विभिन्न राज्यों के विशाल आकार को देखते हुए विश्वास के साथ कहा जा सकता है कि आर्थिक नियोजन की प्रक्रिया को जिला एवं खण्ड स्तर तक विकेन्द्रित करना ही होगा। स्थानीय नियोजन की प्रक्रिया को स्वीकार करके आसानी से विकास कार्यक्रमों में जनसहयोग जुटाया जा सकता है। केन्द्र एवं राज्य स्तर पर योजनाएँ बनाकर जब उन्हें क्रियान्वित करने का प्रयास किया जाता है तो वह मात्र सरकारी प्रशासन तन्त्र का ही कार्यक्रम बनकर रह जाता है और जन साधारण का इन कार्यक्रमों के साथ कोई भावात्मक लगाव स्थापित नहीं किया जा सकता है। इस तादात्म्य के अभाव में विकास योजनाओं के क्रियान्वयन में कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। ऐसे में यदि स्थानीय आवश्यकताओं को देखते हुए जनसहयोग को जुटाकर परियोजनाएँ बनायी जायें तो उनका क्रियान्वयन त्वरित गति से किया जा सकता है। यह भी सत्य है कि स्थानीय साधनों एवं सुविधाओं का उचित विदोहन की ही आवश्यकता पड़ती है। कुशल भू-प्रबन्ध, सिंचाई की क्षमता का अधिकतम प्रयोग, उप-विभाजन एवं उप-खण्डन का निराकरण आदि केन्द्र अथवा राज्य की राजधानी में बैठकर सम्पादित करने के बजाय सरकारी अधिकारियों एवं जनसहयोग के माध्यम से अधिक कुशलतापूर्वक सम्पादित किया जा सकता है। पिछले वर्षों में गहराते हुए ऊर्जा संकट को देखते हुए हम यह कह सकते हैं कि आने वाले वर्षों में गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोतों का अधिकाधिक विदोहन करना होगा। यह तभी सम्भव होगा जब स्थानीय संसाधनों की उपलब्धि को देखते हुए उनके अनुरूप परियोजना बनायी जाये और उनका क्रियान्वयन किया जाये।

स्थानीय नियोजन के अभाव में अब तक ग्रामीण विकास की प्रक्रिया पर केवल एक ही पहलू में सोचा जाता रहा है, जबकि आवश्यकता यह है कि किसी योजना विशेष का क्रियान्वयन करते समय उसे स्थानीय जनजीवन के समग्र परिवेश से जोड़ने का प्रयास किया जाय।

स्थानीय नियोजन को उचित महत्व नहीं दिये जाने का ही एक परिणाम यह देखने में आता है कि ग्रामीण विकास की विभिन्न परियोजनाओं का मूल्यांकन उनके क्रियान्वयन के पहले चरण में ही कर लिया जाता है। उदाहरण के लिए, निर्धनता निवारण के विभिन्न कार्यक्रमों की सफलता इस आधार पर आंकी जाती है, कितने परिवारों को ऋण उपलब्ध किया गया, कुल कितनी राशि के ऋण बांटे गये, अनुदान की मात्रा कितनी रही अथवा कितने लोगों को चयनित करके लाभान्वित किया गया। वस्तुतः ग्रामीण विकास कार्यक्रमों की सार्थकता इसमें है कि कितने निर्धन परिवारों को सतत् मिलने वाली आय में वृद्धि हो सकी, उपभोग में कितनी वृद्धि हो सकी या सामान्य जीवन-यापन के स्तर में कितना सुधार हुआ। वर्तमान परिस्थितियों में इन मुद्दों को नजर अन्दाज करके उपलब्धियों का आधार विभिन्न परियोजनाओं के क्रियान्वयन के प्रथम चरण को ही बना दिया जाता है। यही स्थानीय नियोजन की प्रक्रिया को अपनाया जाये तो न केवल विकास कार्यक्रमों के अन्तर्गत व्यय की जाने वाली राशि पर नियन्त्रण रखा जा सकता है वरन् स्थानीय लोगों को वास्तव में मिलने वाले लाभ का आंकलन भी किया जा सकता है।

एक इसी तरह ट्राइसम योजना के अन्तर्गत ग्रामीण परिवारों को दस्तकारी अथवा अन्य किसी व्यवसाय का प्रशिक्षण दिय जाता है, बैंक से ऋण की सुविधाएँ उपलब्ध की जाती हैं और स्वयं रोजगार प्रारम्भ करने की प्रेरणा भी दी जाती है। रोजगार की सफलता प्रशिक्षण तथा ऋण की सुविधा के अलावा भी अन्य कई तत्वों पर निर्भर करती है, जैसे लाभान्वित व्यक्ति के गाँव का आकार, शहर अथवा कस्बे से दूरी, गाँव का व्यावसायिक ढाँचा, प्रेरणा एवं जोखिम का स्तर, शहर में सम्पर्क सूत्र आदि। इन महत्वपूर्ण पहलुओं पर ध्यान नहीं दिये जाने का ही यह परिणाम निकलता है कि अधिकांश प्रशिक्षित युवा अपना स्वयं का लाभदायक व्यवसाय प्रारम्भ नहीं कर पाते और उनके प्रशिक्षण पर किया गया व्यय व्यर्थ जाता है।

इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए यदि जिला, खण्ड एवं गाँव के स्तर पर आर्थिक नियोजन की सार्थक प्रक्रिया को अपनाया जा सके तो आर्थिक विकास की गति को तीव्र किया जा सकेगा और निर्धनता निवारण के कार्यक्रमों को भी बल मिलेगा। गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक ने जिला स्तरीय नियोजन के लिए आवश्यक प्रशासनिक प्रबन्ध किये हैं, लेकिन राजस्थान में इस दिशा में महत्वाकांक्षी योजना की आवश्यकता अब भी बनी हुई है।

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