अम्बेडकर के धार्मिक विचार

अम्बेडकर के धार्मिक विचार

डॉ. अम्बेडकर के धार्मिक विचार

अम्बेडकर को किसी विशेष अर्थ में धार्मिक व्यक्ति नहीं कहा जा सकता, किन्तु धर्म को वे मनुष्य के लिए आवश्यक मानते थे। धर्म आवश्यक इसलिए नहीं है कि उससे मुक्ति मिलती है अथवा आत्मसाक्षात्कार की प्रक्रिया सम्भव होती है, बल्कि इसलिए आवश्यक है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और उसके पास बौद्धिक क्षमतायें हैं। उनके अनुसार धर्म के दो स्रोत हैं। मनुष्य की सामाजिकता और उसकी बौद्धिकता अगर मनुष्य को समाज की आवश्यकता न होती और उसके पास बुद्धि न होती, तो धर्म की कोई अनिवार्यता न होती। जिन प्राणियों में बुद्धि का अभाव है और सामाजिक वृत्ति भी नहीं है, उनको धर्म की कोई आवश्यकता नहीं है। इसलिए उनके लिए धर्म अनिवार्य भी नहीं है। किन्तु मनुष्य धर्म के अभाव में मनुष्योचित व्यवहार नहीं कर सकता, इसलिए धर्म उसके लिए अनिवार्य है, स्पष्ट है अम्बेडकर के विचार में धर्म कोई गहरी आध्यात्मिक आस्था नहीं है, न ही किसी अदृश्य या अज्ञात का समस्यात्मक संकेत। यह महज एक मानवोचित आस्था है, जो हमारी सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति करता है।

अम्बेडकर के धार्मिक विचारों की विवेचना निम्नशीर्षकों के अन्तर्गत की जा सकती है-

धर्म और नैतिकता

इनके विचार में सामाजिक व्यवहार ही नैतिक व्यवहार है। क्योंकि मनुष्य की बुद्धि इसी व्यवहार की आज्ञा देती है। इस अर्थ में धर्म का सम्बन्ध राजनीति और अर्थनीति से भी हो जाता है। बिना सही सामाजिक व्यवस्था के, न तो राजनीति, न ही अर्थनीति सही मार्ग पर जा सकती है। इसलिए धर्म एक ऐसी आवश्यकता है, जो मानव को सही अर्थ में मानव बनाने के लिए अनिवार्य है।

अगर धर्म का आधार सामाजिकता है, तो धर्म का मुख्य लक्ष्य क्या है? बिना समानता के सिद्धान्त के सामाजिकता का कोई अर्थ नहीं है। इसलिए धर्म की अवधारणा, समानता के आधार पर अवस्थित है। जो धर्म समानता का लक्ष्य प्राप्त करने में असमर्थ हो वह धर्म नहीं हो सकता। वह अधर्म है। चूँकि हिन्दू धर्म समानता के आधार पर नहीं टिका है, हिन्दू धर्म सही अर्थ में धर्म नहीं है। हिन्दू धर्म में कर्मकाण्ड की प्रधानता है और इसी के माध्यम से वर्ण-व्यवस्था की उत्पत्ति हुई है। इसलिए इसका आधार समानता नहीं है और यह अपेक्षित सामाजिकता की स्थापना नहीं कर सकता।

धर्म परिवर्तन विषयक विचार

जिस स्तर पर अम्बेडकर ने धर्म की अपनी अवधारणा को अवस्थित किया, उस स्तर पर उनकी बात बिल्कुल ठीक है। जो धर्म मनुष्य-मनुष्य में भेद करे, वह धर्म नहीं हो सकता, किन्तु इस प्रश्न का एक दूसरा पहलू भी है। क्या हिन्द्र धर्म वास्तव में वही है, जिसे हम साधारण व्यावहारिक जीवन में पहचानते हैं और जिसमें कर्मकाण्ड, पुरोहितवाद, दकियानूसीपन जैसे तत्व ही मुख्यतया दिखायी पड़ते हैं? धर्म में- वह चाहे जो भी धर्म हो-विकृतियाँ आ ही जाती हैं। यदि हम किसी धर्म की विकृतियों के आधार पर ही उसका मूल्यांकन करें, तो गलत होगा। हिन्दू धर्म-वास्तविक हिन्दूधर्म ने कभी भी अस्पृश्यता की इजाजत नहीं दी। अस्पृश्यता तो कुछ आर्थिक रूप से सम्पन्न तथा शक्तिशाली लोगों के षड्यंत्र का परिणाम है। मात्र ‘मनुस्मृति’ को ही हिन्दूधर्म का प्रतिनिधि ग्रन्थ क्यों मान लिया जाये? ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’, ‘वसुधैव कुटुम्बकम’, ‘ईशावास्यमिदं सर्व’ आदि वाक्य भी हिन्दू ग्रन्थों से ही आये हैं। यह वास्तव में एक आश्चर्य की बात है कि अम्बेडकर जैसे महान विद्वान ने, ऐसा एकांगी चिन्तन किया। जिस वक्त उनके धर्म परिवर्तन की बात गाँधी तक पहुँची, उन्होंने कहा था-“धर्म कोई ऐसी चीज नहीं जिसे बदला जा सके।”

किन्तु अम्बेडकर ने धर्म परिवर्तन कर ही लिया। उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार कर लिया। उल्लेखनीय है कि उस वक्त के दलितवर्ग के कई नेताओं (जगजीवन राम सहित) ने इसका विरोध किया। सम्भवतः अम्बेडकर का विचार था कि बौद्ध-धर्म की नैतिक मान्यतायें तो वही है, जो हिन्दू-धर्म की हैं। अन्तर सिर्फ यह है कि उसमें छुआछूत की बात नहीं आयी है और मानव मूल्यों पर अधिक जोर दिया गया है।

कुछ ऐसे संकेत भी उपलब्ध हैं, जिनसे यह प्रकट होता है कि कुछ लोगों ने उनको इस्लाम-धर्म स्वीकार करने की राय दी थी। ईसाई धर्म भी एक विकल्प हो सकता था। किन्तु बौद्ध-धर्म ही को अम्बेडकर ने क्यों स्वीकार किया? सम्भवतः इसलिए क्योंकि उनकी संस्कारगत आस्थायें हिन्दू-धर्म के ही निकट थीं और बौद्ध धर्म, कुछ ही बातों को छोड़कर, हिन्दूधर्म के ही समान है। किन्तु अम्बेडकर के इस निर्णय का काफी व्यापक प्रभाव पड़ा उनके साथ, कई लाख लोगों ने धर्म-परिवर्तन कर लिया और यह प्रक्रिया कुछ वर्षों तक चलती रही। कुछ लोगों ने, खासतौर पर मद्रास में, इस्लाम-धर्म स्वीकार कर लिया। इस तरह के धर्म-परिवर्तनों का भारतीय हिन्दू-समाज पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ा, दलित-वर्ग के लोगों के अन्दर यह भावना घर कर गई कि दलित-वर्ग के लोग हिन्दू समाज के हिस्से नहीं हैं। अम्बेडकर के सवर्ण-विरोध में, जितनी भी सत्यता हो, इस वृत्ति का प्रभाव अवश्य ही स्वतंत्रता संघर्ष में हितकर नहीं साबित हुआ।

डाक्टर अम्बेडकर में हिन्दू-दर्शन में प्रयुक्त ‘धर्म’ को नकार कर बौद्धधर्म में स्वीकृत ‘धम्म’ शब्द की व्याख्या की है। धम्म में, ईश्वर के स्थान पर नैतिकता की स्थापना की गयी है। इसलिए अम्बेडकर के अनुसार, बौद्धधर्म सम्पूर्ण मानवता का धर्म है। ‘धम्म’ के अनुसार सब लोग समान हैं। कोई नीचा या ऊँचा नहीं है। इसके अलावा बौद्ध-दर्शन में करुणा और दया को महत्व दिया गया है। वर्ण-व्यवस्था को नहीं। इन मुख्य तर्कों के आधार पर अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया है कि दीक्षा के वक्त जब अम्बेडकर ने “मैं हिन्दू धर्म छोड़ता हूँ का एलान किया, तो उनका गला रूंध आया था। कहीं ऐसा तो नहीं कि एक व्यक्तिगत मजबूरी के अहसास में, उन्होंने पैदायशी धर्म त्यागा हो? जो भी हो, इस धर्म-परिवर्तन में निहित जिस पीड़ा का अनुभव होता है, वह सारे हिन्दू-समाज के लिए एक चुनौती है। कोई भी धर्म जो अपने ही अनुयायियों को ऐसी गहरी यन्त्रणा का अनुभव कराये, उसमें प्रश्न चिह्न तो लग ही जाता है। हिन्दूधर्म के मानने वालों को अवश्य ही अपनी सीमाओं का आभास होना चाहिए। एक वर्ग-विशेष को या किसी भी अन्य वर्ग को तिरस्कृत कर कोई धर्म, धर्म कहलाने के योग्य नहीं।

अम्बेडकर के हिन्दूधर्म त्यागने का यह अर्थ कतई नहीं समझना चाहिए कि वे भारतीय संस्कृति के विरुद्ध थे। उन्होंने खुद ही कहा था- “बौद्धधर्म भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। मैंने इस बात का ख्याल रखा है कि मेरे धर्म-परिवर्तन से इस देश की परम्पराओं, संस्कृति और इतिहास पर आघात न पहुँचे”। हिन्दूधर्म में जो असमानता का भाव उन्होंने देखा उसी से रुष्ट होकर उन्होंने अपना पैतृक धर्म त्याग दिया। दीक्षा लेने के समय उन्होंने कहा-“गले सड़े धर्म को त्याग कर, जो असमानता और उत्पीड़नु को मान्यता देता है, मैं आज एक नया जन्म ले रहा हूँ और नरक से मुक्ति प्राप्त कर रहा हूँ।” उन्होंने सोचा होगा कि स्वर्ग मिले चाहे न मिले, परन्तु नरक से मुक्ति आवश्यक है।

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