भारतीय राजनीतिक चिन्तन की प्रमुख धाराएँ

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भारतीय राजनीतिक चिन्तन की प्रमुख धाराएँ

भारतीय राजनीतिक चिन्तन की प्रमुख धाराएँ

(Main Currents of Indian Political Thought)

भारतीय राजनीतिक चिन्तन को दो प्रमुख धाराओं में विभाजित किया जा सकता है-

  1. प्राचीन भारतीय राजनीतिक चिन्तन, तथा
  2. आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन

प्राचीन भारतीय आचार्यों ने राज्य के स्वरूप, संगठन, कार्य एवं विभिन्न पहलुओं पर पर्याप्त सोचा था किन्तु उनके राजनीतिक विचारों की प्रक्रिया धार्मिक चिन्ताओं से अधिक प्रभावित रही। भारत में अंग्रेजी शासन की स्थापना तथा उसके जनजीवन पर पड़ने वाले प्रभाव ने कई जीवन पाश्चात्य राजनीतिक विचारों को भारत में प्रचलित होने का अवसर प्रदान किया है। आधुनिक चिन्तन प्राचीन भारतीय चिन्तन से एकदम विच्छिन्न नहीं है तथापि काल-विभाजन की दृष्टि से मुख्यतः 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से वर्तमान तक का भारतीय सामाजिक एवं राजनीतिक चिन्तन ही ‘आधुनिक’ कहा जाता है।

आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन को कतिपय प्रमुख धाराओं या विचारधाराओं में विभक्त किया जा सकता है जो इस प्रकार है-

  1. सर्वप्रथम, धार्मिक-सामाजिक सुधार आन्दोलन को लिया जा सकता है जिनके प्रमुख चिन्तक राजा राममोहन राय, स्वामी दयानन्द सरस्वती, एनी बेसेण्ट आदि हैं। इन महान विभूतियों का चिन्तन भारतीय पुनर्जागरण और सुधारवाद का प्रतीक है। इन कार्य संस्थागत था। विभिन्न संस्थाओं के माध्यम से अपना कार्यक्रम प्रस्तुत कर अपने विचारों को इन्होंने स्थायी संस्थागत आधार प्रदान किया ताकि भविष्य की पीढ़ियाँ उनसे मार्ग-दर्शक प्राप्त कर सकें। आज भी ब्रह्म समाज, आर्य समाज, राकृष्ण मिशन तथा थियोसोफिकल सोसायटी का कार्य अपने संस्थापकों को नीति के अनुसार यत्किंचित परिवर्तन के साथ चल रहा है।
  2. दूसरी विचारधारा में आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन के उन विचारकों को सम्मिलित किया जा सकता है जो उदारवादी एवं मितवादी विचारों के हैं। इनमें दादाभाई नौरोजी, गोविन्द रानाडे, सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, फिरोजशाह मेहता, गोपालकृष्ण गोखले आदि प्रमुख हैं। इन विचारकों ने संविधानवाद संसदीय लोकतन्त्र, स्थानीय स्वशासन, प्रशासनिक सुधार एवं नागरिक सेवाओं के भारतीयकरण के सन्दर्भ में अपने विचार प्रकट किये।
  3. आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन की तीसरी विचारधारा के अन्तर्गत उग्रवादी विचारकों का अध्ययन किया जाता है। इस धारा के प्रमुख स्तम्भ लाला लाजपत राय, लोकमान्य तिलक, विपिनचन्द्र पाल तथा अरविन्द घोष है। इन्होंने बहिष्कार, स्वदेशी, राष्ट्रीय शिक्षा तथा स्वराज्य के कार्यक्षेत्र प्रस्तुत किये। निष्क्रिय प्रतिरोध का विचार इनका प्रमुख योगदान है। स्वराज्य प्राप्ति इनका मूल लक्ष्य था।
  4. आधुनिक भारतीय राजनीतिक चिन्तन की चौथी विचाराधारा धर्म और राजनीति के समन्वय पर जोर देती है। उदारवाद तथा उग्रवाद दोनों ही से असन्तुष्ट विचारकों की मान्यता थी कि भारत में अंग्रेजी शासन की समाप्ति के लिए कोरे राजनीतिक प्रयास अपर्याप्त हैं, अतः सांस्कृतिक आधारों का स्पष्टीकरण और राष्ट्रीय व्यक्तित्व का पुनर्निर्माण आवश्यक है। इस प्रकार की चिन्तन शैली से प्रभावित हिन्दू चिन्तकों में विनायक दामोदर सावरकर आदि ने ‘हिन्दूत्व’ सिद्धान्त को आगे रखा तो इस्लामी चिन्तकों में सर सैय्यद अहमद खाँ, मोहम्मद इकबाल, जिन्ना आदि ने राष्ट्रीय समग्रता के स्थान पर मुस्लिम अस्तित्व संरक्षण के संकीर्ण विचार प्रस्तुत किये।
  5. आधुनिक भारतीय चिन्तन की पाँचवीं विचारधारा समन्वयवादी है। इस धारा के प्रमुख विचार अरविन्द घोष, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, महात्मा गाँधी तथा जवाहरलाल नेहरू हैं। इनके विचारों में उदारवाद तथा उग्रवाद का समन्वय मिलता है। ये पूर्व तथा पश्चिम की वैचारिक सन्धि के परिचायक हैं। मानव गरिमा, व्यक्तिगत स्वतन्त्रता, शोषण का विरोध, विश्व बन्धुत्व, धार्मिक सहिष्णुता आदि विचारकों से इन चिन्तकों ने भारत को नवीन दिशा दी।
  6. आधुनिक भारतीय चिन्तन की छठी विचारधारा समाजवाद तथा सर्वोदयवाद से सम्बन्धित है। मानवेन्द्रनाथ राय, महात्मा गाँधी, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण आदि इस धारा के आधार-स्तम्भ माने जा सकते हैं। एम० एन० राय की मौलिकता नव-मानवतावाद में तथा साम्यवाद की कटु आलोचना में परिलक्षित होती है। विनोबा भावे ने गाँधीजी के विचारों को व्यावहारिक रूप देने का सफल प्रयोग किया।

यहाँ यह प्रश्न विचारणीय है कि राजनीतिक चिन्तन के क्षेत्र में आधुनिक भारतीय राजनीतिक विचारकों का क्या योगदान है ? डॉ० अप्पादोराय के अनुसार भारत का निम्नलिखित दृष्टि से चिन्तन के क्षेत्र में मौलिक योगदान है

  • पराधीन व्यक्तियों की सरकारों को भी सहमति, न कि शक्ति, को अपनी सरकार का आधार बनाना चाहिए।
  • स्वशासन सुशासन से न केवल उत्तम है अपितु सुशासन के लिए अत्यावश्यक भी है।
  • वांछित साध्य के लिए उचित साधनों को प्राप्त तथा ग्रहण करना चाहिए।
  • राज्य का उद्देश्य मात्र अधिकतम व्यक्तियों का अधिकतम सुख न होकर प्रत्येक व्यक्ति का कल्याण होना चाहिए।
  • न्यासकारिता के सिद्धान्त के अनुसार धनाढ्य वर्ग को अपने अतिरिक्त धन का उपयोग दरिद्रहित में करना चाहिए।
  • जहाँ साधारण राजनीतिक तर्क तथा आग्रह पद्धतियाँ विफल हो जाती हैं, वहाँ व्यक्तिगत यातना द्वारा इच्छित शुभकामना एवं अन्य व्यक्तियों का सहयोग प्राप्त हो सकता है।
  • समाजवादी सिद्धान्त को पूँजीवाद तथा साम्यवाद से अपने मूलभूत उद्देश्यों को उधार लेने के स्थान पर एक स्वशासित दिशा में राजनीतिक एवं आर्थिक विकेन्द्रीकरण प्राप्त करना चाहिए।

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