स्वामी विवेकानन्द के राजनीतिक विचार

विवेकानन्द का राजनीतिक दर्शन

विवेकानन्द का राजनीतिक दर्शन

(POLITICAL PHILOSOPHY OF VIVEKANAND)

विवेकानन्द राजनीतिक आन्दोलन के पक्ष में नहीं थे, तथापि वे हृदय से चाहते थे कि एक शक्तिशाली बीर और गतिशील राष्ट्र का निर्माण हो। वे धर्म को राष्ट्रीय जीवन रूपी संगीत का स्थाई स्वर मानते थे।”

संन्यासी स्वामी विवेकानन्द में राजनीतिक दार्शनिकता अथवा राजनीतिज्ञता जैसी कोई बात नहीं थी। राजनीति में उनका कोई विश्वास न था और न ही उन्होंने किन्हीं राजनीतिक कार्यकलापों में कभी कोई भाग लिया। विभिन्न स्थलों पर उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया कि-“मैं न राजनीतिज्ञ हूँ, न राजनीतिक आन्दोलन मचाने वालों में से हूँ। मैं केवल आत्मत्तत्व की चिन्ता करता हूँ-जब वह ठीक होगा तो सब काम अपने आप ठीक जाएँगे।” जब कतिपय राजनीतिक एवं स्वार्थी तत्वों ने उनके कार्यकलापों को राजनीतिक जामा पहनाना चाहा तो उन्होंने इसका विरोध किया और ऐसा करने वालों को चेतावनी भी दी। पर इस सबके बावजूद, हम इस तथ्य से इन्कार नहीं कर सकते कि उनके भाषण और विचारों में राजनीति का जो दर्शन मिलता है वह उन्हें बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों और राजनीतिक चिन्तकों से भी कहीं आगे ले जाता है। यत्र-तत्र उन्होंने प्रसंगवश राजनीतिक दर्शन से सम्बन्धित जो भी उल्लेख किये अथवा जो भी राजनीतिक विचार प्रस्तुत किये उनसे यही ध्वनि निकलती है कि महात्मा गाँधी की भाँति ही राजनीति का आध्यात्मीकरण करना चाहते थे। देशवासियों को शक्ति, निर्भयता और कर्म की जो प्रेरणा उन्होंने दी वह प्रच्छन्न रूप से भारतीय राष्ट्रवाद को जगाने और आगे बढ़ाने में बड़ी सहायक हुई। व्यक्ति के गौरव, चिन्तन की स्वतन्त्रता, नारी के जागरण, दलितों के उद्धार, विश्व बन्धुत्व आदि पर उन्होंने जो विचार प्रकट किये वे प्रस्थापित करते हैं कि विवेकानन्द, एक राजनीतिक विचारक के रूप में, लोक कल्याणकारी राजनीति के समर्थक थे और गाँधी के समान ही राष्ट्रवाद को धर्म तथा सार्वदेशिकता के धरातल पर खड़ा करना चाहते थे।

राष्ट्रवाद का धार्मिक अथवा आध्यात्मिक सिद्धान्त

विवेकानन्द धर्म को राष्ट्रीय जीवन रूपी संगीत का स्थाई स्वर मानते थे। राष्ट्रीयता के आध्यात्मिक पक्ष में उनका अडिग विश्वास था। जनवरी, 1895 में शिकागो से एस० सुब्रह्मण्य अय्यर को उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा था-“प्रत्येक राष्ट्र के जीवन में एक मुख्य प्रवाह रहता है; भारत में वह धर्म है। उसे प्रबल बनाओ, बस दोनों ओर के अन्यान्य. स्रोत उसी के साथ-साथ चलेंगे ।” भारतीय राष्ट्रवाद के एक आध्यात्मिक अथवा धार्मिक सिद्धान्त की नींव का निर्माण करने के लिए विवेकानन्द ने किसी भी अन्य समाज सुधारक अथवा राजनीतिक चिन्तक की अपेक्षा अधिक कार्य किया। आगे चलकर उसी सिद्धान्त का बिपिनचन्द्र पाल तथा अरविन्द ने समर्थन और पक्ष-पोषण किया। विवेकानन्द ने धर्म और संस्कृति की दुहाई देकर भारतीयों में अपने गौरवमय अतीत के प्रति एक प्यार जगा दिया; उनमें स्वाभिमान की अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी। “विश्व के सम्मुख भारतीय संस्कृति तथा सभ्यता की श्रेष्ठता और सर्वोपरिता की साहसी घोषणा करने से उन हिन्दुओं में नवीन प्रेरणा और शक्ति का संचार हुआ जो यूरोपीय संस्कृति एवं सभ्यता के सम्मुख अपने को हेय समझते थे। इससे भारतीयों के मन में आत्म-गारव का एक सशक्त भाव उदित हुआ जिससे राष्ट्रीय पुनरुत्थान के मार्ग के प्रशस्त होने में निर्दिष्ट सहायता प्राप्त हुई।”

विवेकानन्द के हृदय में देश के लिए असीम प्रेम था, किन्तु तत्कालीन परिस्थितियों में वे खुलकर न तो राजनीतिक मुक्ति का समर्थन करने और न राष्ट्रवाद के सिद्धान्त को अभिव्यक्त करने के पक्ष में थे। प्रथम तो एक संन्यासी होने के कारण वे राजनीतिक अथवा कानूनी वाद-विवाद में उलझने से दूर रहना चाहते थे, और दूसरे “उन दिनों ब्रिटिश साम्राज्यवादी शक्ति भारत में दृढ़ता से जमी हुई थी। यदि विवेकानन्द खुलकर राजनीतिक स्वायत्तता का समर्थन करते तो उन्हें निश्चय ही कारागार में डाल दिया गया होता, इसका परिणाम यह होता कि उनकी शक्ति व्यर्थ में नष्ट होती, और देशवासियों के धार्मिक तथा नैतिक पुनरुत्थान का जो काम उन्हें सबसे अधिक प्रिय था उसमें विघ्न पड़ता किन्तु यद्यपि विवेकानन्द ने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के मुकाबले में भारतीय राष्ट्रवाद के विरोधी सिद्धान्त का समर्थन नहीं किया, तो भी देश की दरिद्र और पद-दलित जनता की मुक्ति के कार्य में उनकी गहरी रुचि और लगन थी।” विवेकानन्द ने, प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक आन्दोलन अथवा राजनीतिक सिद्धान्त प्रतिपादन में लिप्त न होते हुए भी, अपने विभिन्न प्रयत्नों से सम्पूर्ण देश में राष्ट्रीयता की वह नींव रख दी जिस पर देश धैर्यपूर्वक आगे बढ़ा और अन्य में पराधीनता के बन्धन से मुक्त हो सका। क्या यह भारतीय राष्ट्रवाद को उठ खड़े होने की ललकार नहीं थी के विवेकानन्द ने देशवासियों को शक्ति और निर्भयता का सन्देश दिया, उनमें यह विश्वास जाग्रत करने का प्रयल किया कि देश अपनी ऐतिहासिक विरासत की सुदृढ़ नींव पर ही अपनी रक्षा कर सकेगा, अपनी राष्ट्रीयता का महत्व खड़ा कर सकेगा ? निश्चय ही विवेकानन्द तब भारतीय राष्ट्रवाद के महान सन्देशवाहक थे जब उन्होंने देशवासियों को कहा-“बंकिमचन्द्र को पढ़ी तथा उसके सनातन धर्म और उनकी देश-भक्ति को ग्रहण करो।” जन्म भूमि की सेवा को अपना सबसे बड़ा कर्त्तव्य समझो। भारत पहले राजनीतिक रूप से स्वतन्त्र होना चाहिए, आदि। विवेकानन्द ने राष्ट्रवाद को एक नये स्वरूप में प्रस्तुत किया, उसे अपनी ही धरती पर, अपने ही पैरों पर खड़े होने की प्रेरणा दी, अन्धे बनकर यूरोपीयकरण से बचने की सीख दी, धर्म में विश्वास और कर्म में लगत का मन्त्र फूंका | बंकिम की भाँति विवेकानन्द ने भी भारत माता को एक आराध्य देवी माना और उसके चरणों में अपना सब कुछ न्योछावर करने की प्रेरणा दी। धार्मिक पृष्ठभूमि के आधार पर ही विवेकानन्द ने आह्वान किया कि भारत के राष्ट्रीय जीवन का संगठन यहाँ के आध्यात्मिक आदर्शों पर ही किया जाना चाहिए। भारत में अतीत से किसी भी राजनीतिक सत्ता का स्थायित्व धर्म के आधार पर ही रह सका और आध्यात्मिकता ही अब भी भारतीयों को वह शक्ति और ओज दे सकती है जिसकी उन्हें सबसे अधिक आवश्यकता है।

स्वामी विवेकानन्द ने बताया कि शाश्वत सिद्धान्तों और सत्य को समझ लेना ही धर्म या आध्यात्मिकता है। धर्म अथवा आध्यात्मिकता किसी प्रकार के पूजा-पाठ, दिखावे या कर्मकाण्ड में निहित नहीं है, वरन मनुष्य के देवत्व के विकास में है। भारत में समस्त सुधार कार्य धर्म के माध्यम से ही किये जा सकते हैं अत: धर्म अथवा अध्यात्म को भला दिया जाए तो भारत की आत्मा ही विनिष्ट हो जाएगी। देश में एक नैतिक चेतना का संचार करके वास्तविक अर्थों में उन्होंने सोते हुए भारत को जगा दिया। उनके इस सन्देश को बिपिनचन्द्र पाल, तिलक और अरविन्द जैसे महापुरुषों ने ग्रहण करके उस अभिनव राष्ट्रवाद के लिये मार्ग प्रशस्त किया जिसमें धर्म ने अपने श्रेष्ठतम और विशुद्धतम अर्थ में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। आगे चलकर महात्मा गाँधी ने भी राजनीति में आध्यात्मिकता को उतारा। उन्होंने भी राजनीति को सत्य और अहिंसा पर आधारित किया जो कि सच्चे धर्म के मूल तत्व हैं। देश के इन कर्णधारों ने जनता की इस धार्मिक भावना को जगाया और राष्ट्रीय काँग्रेस को एक जन आन्दोलन का रूप दिया तथा स्वराज की माँग के पीछे एक दृढ़ नैतिक शक्ति उत्पन्न की। स्वामी विवेकानन्द के प्रयास विफल नहीं हुए। उन्होंने देश के नवयुवकों देश के लिए अपना जीवन समर्पण कर देने का जो निमन्त्रण दिया था, वह निष्फल नहीं गया। यह कहने में कोई अत्युक्ति नहीं होगी कि यदि “विवेकानन्द की मृत्यु के तीन वर्ष बाद ही जनता ने बंगाल का विद्रोह देखा जो तिलक और गाँधी के महान् आन्दोलन की पूर्व सूचना थी और यदि भारत ने जन-स्वामी विवेकानन्द के शक्तिपूर्ण सन्देश को ही है।” साधारण को संगठित करने के लिए निश्चित रूप से सामूहिक कार्रवाई की तो इसका श्रेय

विवेकानन्द ने भारतीयों को यह सोचने को विवश कर दिया कि यदि भारत ने अपनी आध्यात्मिकता का परित्याग कर दिया तो उसका विनाश हो जाएगा। उन्होंने कहा-“ध्यान रखो, यदि तुम इस आध्यात्मिकता का त्याग कर दोगे और इसे एक और रखकर पश्चिम की जड़वादपूर्ण सभ्यता के पीछे दौड़ोगे, तो परिणाम यह होगा कि तीन पीढ़ियों में तुम एक मृत जाति बन जाओगे; क्योंकि इससे राष्ट्र की रीढ़ टूट जाएगी, राष्ट्र की वह नींव जिस पर इनका निर्माण हुआ है, नीचे फंस जाएगी और इसका फल सर्वांगीण विनाश होगा।”

स्वतन्त्रता का सिद्धान्त

राजनीतिक चिन्तन के क्षेत्र में विवेकानन्द का दूसरा महत्वपूर्ण अनुदान उनकी स्वतन्त्रता विषयक अवधारणा है। उनकी वाणी और उनके कर्मों में उनकी स्वातन्त्र्यप्रियता सदैव गूंजती रही। उन्होंने कहा “जीवन, सुख और समृद्धि की एकमात्र शर्त-चिन्तन और कार्य में स्वतन्त्रता है। जिस क्षेत्र में यह नहीं है, उस क्षेत्र में मनुष्य जाति और राष्ट्र का पतन होगा ।” विवेकानन्द का कहना था कि सम्पूर्ण विश्व अपनी अनवरत गति द्वारा मुख्यतः स्वतन्त्रता की ही खोज कर रहा है। उन्हीं के शब्दों में, “शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिकता स्वतन्त्रता की ओर अग्रसर होना तथा दूसरों को उसकी ओर अग्रसर होने में सहायता देना मनुष्य का सबसे बड़ा तिरस्कार है। जो सामाजिक नियम इस स्वतन्त्रता के विकास में बाधा डालते हैं वे हानिकारक हैं और उन्हें शीघ्र नष्ट करने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। उन संस्थाओं को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए जिनके द्वारा मनुष्य स्वतन्त्रता के मार्ग पर आगे बढ़ता है ।” विवेकानन्द की व्यावहारिकता इस बात में थी कि उन्होंने अपनी आध्यात्मिक भावना के साथ-साथ मानव की सामाजिक और सर्वांगीण प्रगति के लिए स्वतन्त्रता को अत्याज्य समझा। स्वर्गीय श्री नेहरू ने स्वतन्त्रता के प्रति उनके गहन प्रेम को व्यक्त करते हुए लिखा है-“वे राजनीति से अलग रहे, उन्हें अपने वक्त के राजनीतिज्ञ नापसन्द थे। लेकिन उन्होंने आजादी, बराबरी और जनता को उठाने की जरूरत पर बार-बार बल दिया। सिर्फ सोच-विचार और काम-काज की आजादी ही जिन्दगी, तरक्की और खुशहाली की शर्त है।” स्वतन्त्रता को विवेकानन्द ने मनुष्य का प्राकृतिक अधिकार माना और कामना की कि समाज के सभी सदस्यों को यह अवसर समान रूप से प्राप्त होना चाहिए। सम्पत्ति, ज्ञान और शिक्षा के अर्जन में किसी पर किसी भी प्रकार का बन्धन नहीं होना चाहिए।

विवेकानन्द ने अपने एक अत्यन्त जोशीले, देशभक्ति-पूर्ण और उच्च भावनाएँ उत्पन्न करने वाले व्याख्यान में अपने देश को इस तरह सम्बोधित किया था-

“हे भारत, क्या तू दूसरों की संस्थाओं की नकल पर निर्भर रहेगा और दूसरे की प्रशंसा पाने के लिए व्यग्र रहेगा और पद के अधिकार के लिए मूढ़, दासता, घृणित नृशंसता में फँसा रहेग ? क्या तू इस प्रकार की निर्लज्ज कायरता से वह स्वतन्त्रता प्राप्त कर सकता है, जिसके योग्य केवल वीर होते हैं ? यह न भूल कि तेरा समाज महानता की भ्रान्ति में भूला हुआ है। अपने गिरे हुए गरीब, अज्ञ, भंगी, मेहतर को न भूल, वे तेरे रक्त-माँस हैं, वे तेरे भाई हैं। हे वीर, साहस कर, गर्वित हो कि तू भारतीय है और बड़े गर्व के साथ यह कह कि मैं भारतीय हूँ और हरेक भारतीय मेरा भाई है, भारत की भूमि मेरे लिए सर्वोच्च स्वर्ग है, भारत की भलाई मेरी भलाई है।”

स्वतन्त्रता के प्रति अपनी गहनतम अनुभूति और देश के प्रति अपनी राजनीतिक आस्था विवेकानन्द ने इन शब्दों में व्यक्त की “विश्वास करो, विश्वास करो, यह आदेश हुआ है, ईश्वर का यह आदेश हुआ है कि भारत उठ कर रहेगा, गरीब जनता सुखी होगी और खुशी मनाओ कि ईश्वर ने तुमको इस महान् कार्य के लिए चुना है।”

शक्ति और निर्भयता अथवा प्रतिरोध का सिद्धान्त

विवेकानन्द का राजनीतिक चिन्तन के क्षेत्र में तीसरा महत्वपूर्ण अनुदाय उनका शक्ति एवं निर्भीकता का सिद्धान्त था जिसे “राजनीति शास्त्र की पदावली में हम प्रतिरोध का सिद्धान्त (Theory of Resistance) कह सकते हैं ।” विवेकानन्द उत्कट देशभक्त और संवेगात्मक देशभक्ति के मूर्त रूप थे जिन्होंने अपने देश, उसकी जनता तथा उसके आदर्शों के साथ अपनी चेतना का तादात्म्य स्थापित कर लिया। विवेकानन्द ने भारतीयों को शक्ति और निर्भीकता का सन्देश दिया और उनके हृदय में यह भावना भरने की कोशिश की कि शक्ति तथा निडरता के अभाव में न तो व्यक्तिगत अस्तित्व की रक्षा हो सकती है और न अपने अधिकारों के लिए संघर्ष ही किया जा सकता है। इस तरह अपने प्रतिरोध के सिद्धान्त द्वारा विवेकानन्द ने अप्रत्यक्ष रूप से यह सन्देश दिया कि भारतवासी शक्ति, निर्भीकता और आत्मबल के आधार पर ही विदेशी सत्ता से लोहा ले सकते हैं और अपनी राष्ट्रीय स्वाधीनता प्राप्त कर सकते हैं। पर इस सम्बन्ध में यह दोहराना फिर आवश्यक है कि एक संन्यासी होने के कारण तथा तत्कालीन ब्रिटिश साम्राज्य की निरंकुश प्रकृति के कारण विवेकानन्द ने प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक स्वाधीनता अथवा राष्ट्रीय आन्दोलन को समर्थन नहीं दिया और न ही वे राजनीतिक विवादों में फँसे।

विवेकानन्द जब भारतीयों को कमजोर, कायर और आलसी देखते थे तो उनका खून खौल जाता था। उन्होंने कहा था-“मैं कायरता को घृणा की दृष्टि से देखता हूँ। कायर तथा राजनीतिक के साथ मैं अपना सम्बन्ध नहीं रखना चाहता। विवेकानन्द ने शक्ति और निर्भीकता का दर्शन वेदान्त की व्याख्याओं के आधार पर प्रस्तुत किया और देश के नवयुवकों को विश्वास दिलाया कि कर्ममय और स्वार्थ रहित जीवन से ही व्यक्ति और राष्ट्र दोनों का विकास हो सकता है। उन्होंने ‘आत्मा की सबलता’ का पाठ देशवासियों को पढ़ाया तथा निर्भयतापूर्ण राष्ट्रीयता की ज्योति देश के कोने-कोने में जगा दी। उन्होंने स्वदेशवासियों को सन्देश दिया-“उत्साह से हृदय भर लो और सब जगह फैल जाओ। काम करो, काम करो-पचास सदियाँ तुम्हारी ओर ताक रही हैं भारत का भविष्य तुम पर निर्भर है। काम करते जाओ ।’ विवेकानन्द के व्याख्यानों पर सर्वोपरि कथ्य यह था-‘तगड़े बनो, मर्द बनो, इत्यादि ।’ उन्होंने कहा-“जो कुछ भी तुम्हें भौतिक रूप से, बौद्धिक रूप से अथवा आध्यात्मिक रूप से कमजोर बनाता है, उसे तुम जहर समझो। उसमें जीवन नहीं तो वह कभी सत्य नहीं हो सकता। सत्य बल देता है, सत्य शुद्ध है, सत्य सम्पूर्ण ज्ञान है।” विवेकानन्द ने भारतीयों को ललकारा-“अगर दुनिया में कोई पाप है तो वह है दुर्बलता, दुर्बलता को दूर करो, दुर्बलता पाप है दुर्बलता मृत्यु-अब हमारे देश को जिन वस्तुओं की आवश्यकता है, वे हैं लोहे के पुढें, फौलाद की नाड़ियाँ और ऐसी प्रबल मन शक्ति जिसको रोका न जा सके ।”

स्वामी विवेकानन्द अपने देशवासियों को जिस प्रकार की शक्ति देना चाहते थे, वह केवल शारीरिक शक्ति नहीं थी वरन् वह यथार्थ चारित्रिक शक्ति थी जो पवित्रता, निर्भीकता और त्याग की भावना से उत्पन्न होती है। उनका विश्वास था कि एक राष्ट्र की भाँति एक व्यक्ति का बल भी मूलत: चरित्र और उदात्त आदर्शों का अनुसरण करने में निहित है, बाह्य वस्तुओं पर अधिकार करने में नहीं। इसलिए राष्ट्रीय शक्ति के निर्माण के लिए उन्होंने शिक्षा प्रसार पर बड़ा बल दिया। उनकी मान्यता थी कि सच्ची शिक्षा द्वारा ही एक राष्ट्र अपनी वास्तविक शक्ति का विकास कर सकता है। आत्मा की शक्ति ही वास्तविक शक्ति होती है और इसके लिए आध्यात्मिक अथवा नैतिक शिक्षा का अद्वितीय महत्व है। समुचित शिक्षा के द्वारा आत्मा में जब पर्याप्त बल उत्पन्न हो जाता है तो उसके समक्ष किसी प्रकार का अत्याचार या दबाव नहीं टिक सकता।

विवेकानन्द के लिए कर्ममय जीवन शक्ति और निर्भीकता की ओर ले जाने वाला था। अतः उन्होंने लोगों को कर्म के लिए आह्वान किया। पलायनवाद में उनका विश्वास नहीं था। उन्होंने कहा-“संसार में डूबकर कर्म का रहस्य सीखो। संसार-यन्त्र के पहियों से भागो मत । उसके भीतर खड़े होकर देखो वह कैसे चलता है। तुम्हें उससे निकलने का रास्ता अवश्य मिलेगा।”

व्यक्ति के गौरव में विश्वास

विवेकानन्द मनुष्य के नैतिक गुणों, दाक्ति के गौरव के पोषक थे। राष्ट्र का निर्माण व्यक्तियों की इकाइयों के मिलने से होता है, अतः यदि इन इकाइयों में अच्छे गुणों का विकास होगा-मानव में सम्मान और पुरुषत्व की भावना का जागरण होगा तभी राष्ट्र सच्चे रूप में शक्तिशाली बन सकेगा। विवेकानन्द ने एकाधिक अवसर पर स्पष्ट शब्दों में कहा-“मानव स्वभाव के गौरव को कभी न भूलो। हममें से प्रत्येक व्यक्ति यह घोषणा करे कि-मैं ही परमेश्वर हूँ जिससे बड़ा न कोई हुआ है और न होगा । क्राइस्ट और बुद्ध उस असीम महासागर की तरंगें मात्र हैं। जो मैं हूँ ।” विवेकानन्द ने मनुष्य को स्वाधीनता के उच्चतम रूप का प्रतिनिधि मानते हुए उसके गौरव में गम्भीरतम आस्था प्रकट की।

आदर्श राज्य की कल्पना

एक नवम्बर, 1896 को लन्दन से कुमारी मेरी हेल को लिखे गए अपने एक पत्र में स्वामी विवेकानन्द ने आदर्श राज्य की अपनी कल्पना प्रस्तुत की और देश के पिछड़े वर्ग के उदय में-शूद्र-राज्य के उदय में विश्वास व्यक्त किया। उन्होंने लिखा-

“मानवीय समाज पर चारों वर्ण-पुरोहित, सैनिक, व्यापारी और मजदूर- बारी-बारी से राज्य करते हैं। हर अवस्था का अपना गौरव और अपना दोष होता है। जब ब्राह्मण का राज्य होता है तब जन्म के आधार पर भयंकर पृथकता रहती है-पुरोहित स्वयं और उनके वंशज नाना प्रकार के अधिकारों से सुरक्षित रहते हैं उनके अतिरिक्त किसी को कोई ज्ञान नहीं होता और उनके अतिरिक्त किसी को शिक्षा देने का अधिकार नहीं। इस विशिष्ट काल में अब विद्याओं की नींव पड़ती है, यह इसका गौरव है। ब्राह्मण मन को उन्नत करता है, क्योंकि मन द्वारा ही वह राज्य करता है।

क्षत्रिय-राज्य क्रूर और अन्यायी होता है, परन्तु उनमें पृथकता नहीं रहती और उनके काल में कला और सामाजिक शिष्टता उन्नति के शिखर पर पहुँच जाती है।

उसके बाद वैश्य-राज्य आता है। उनमें कुचलने की और खून चूसने की मौन-शक्ति अत्यन्त भीषण होती है। उसका लाभ यह है कि व्यापारी सब जगह जाता है इसलिए वह पहली दोनों अवस्थाओं में एकत्रित किये हुए विचारों को फैलाने में सफल होता है। उनमें क्षत्रियों से भी कम पृथकता होती है, परन्तु सभ्यता की अवनति आरम्भ हो जाती है।

अन्त में आयेगा मजदूरों का राज्य । उसका लाभ होगा भौतिक सुखों का वितरण और उससे हानि होगी (कदाचित्) सभ्यता का निम्न स्तर पर गिर जाना । साधारण शिक्षा का बहुत प्रचार होगा, परन्तु असामान्य प्रतिभाशाली व्यक्ति कम होते जायेंगे।

यदि ऐसा राज्य स्थापित करना सम्भव हो जिसमें ब्राह्मण-काल का ज्ञान, क्षत्रिय-काल की सभ्यता, वैश्य काल का प्रचार भाव और शूद्र-काल की समानता रखी जा सके- उनके दोषों को त्याग करें तो वह आदर्श राज्य होगा । परन्तु क्या यह सम्भव है ?

परन्तु पहले तीनों का राज्य हो चुका है। अब शूद्र-राज्य का काल आ गया है-वे अवश्य राज्य करेंगे, और उन्हें कोई रोक नहीं सकता।”

अन्तर्राष्ट्रीयवाद

स्वामी विवेकानन्द अन्तर्राष्ट्रीयतावादी थे-विश्व बन्धुत्व के समर्थक थे। उनकी बात पर टिप्पणी करते हुए शिकागो में धर्म संसद के समाप्त होने के बाद कहा गया-“जहाँ अन्य सब प्रतिनिधि अपने अपने धर्म के ईश्वर की चर्चा करते रहे, वहाँ केवल विवेकानन्द ने ही सब के ईश्वर की बात की ।” विवेकानन्द को निःसन्देह भारत से असीम प्यार था और वे हिन्दू धर्म तथा समाज के उत्थान के अभिलाषी थे, लेकिन दुनियाँ की अन्य किसी भी जाति से अथवा दुनियाँ के अन्य किसी भी राष्ट्र से उन्हें घृणा नहीं थी। उन्होंने एक बार कहा था-“निःसन्देह मुझे भारत से प्यार है, पर प्रत्येक दिन मेरी दृष्टि अधिक निर्मल होती जाती है। हमारे लिए भारत या इंग्लैण्ड या अमेरिका क्या है ? हम तो ईश्वर के सेवक हैं जिसे अज्ञानी मनुष्य कहते हैं। जड़ में पानी देने वाला क्या सारे वृक्ष को नहीं सींचता है ?” विवेकानन्द को मनुष्य-मनुष्य का भेद अखरता था। इससे उन्हें बड़ी पीड़ा पहुँचती थी। उनका कहना था “कोई मनुष्य, कोई जाति दूसरों से घृणा करते हुए जी तक नहीं सकती। भारत के भाग्य का निपटारा उसी दिन हो चुका जब उसने ‘म्लेच्छ शब्द को ढूंढ़ निकाला, दूसरों से अपना नाता तोड़ दिया एक अन्य स्थल पर उन्होंने प्रश्न किया-“क्या हमें पश्चिम से कुछ भी नहीं सीखना है ?” और स्वयं ही उसका उत्तर भी दिया-“हमें बहुत-सी बातें सीखनी हैं, हमें जीवन भर नई और ऊँची बातों के लिए संघर्ष करना है। जो व्यक्ति और समाज दूसरों से कुछ नहीं सीखता, वह मौत की डाढ़ों में पहुँच जाता है।”

समाजवाद

लगभग 40 वर्ष पूर्व विवेकानन्द की एक पुस्तक प्रकाशित हुई थी जिसका शीर्षक था-“मैं एक समाजवादी हूँ।” अतः देखना चाहिए कि विवेकानन्द किस रूप में और किस सीमा तक समाजवादी थे। इस प्रसंग में के० दामोदरन ने लिखा है-“यूरोप में विकसित हो रहे पूँजीवाद की दुप्रवृत्ति से विवेकानन्द अत्यधिक निराश हुए। वे नये क्रान्तिकारी विचारों की ओर आकर्षित हुए, जो अभी निर्माणावस्था में थे। वे रूस के क्रान्तिकारी अराजकतावादी विचारक प्रिन्स क्रोपोटिकिन से मिले। समाजवादी विचारों ने उनके मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव डाला और उन्होंने स्वयं को एक समाजवादी कहना प्रारम्भ कर दिया।”

विवेकानन्द के हृदय में गरीबों और पद-दलितों के प्रति असीम संवेदना थी। समाज में उनके लिए समुचित स्थान दिये जाने की उन्होंने जबरदस्त वकालत की और जन-साधारण के उत्थान को अपने कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण अंग बनाया। उन्होंने कहा कि राष्ट्र का गौरव महलों से सुरक्षित नहीं रह सकता। झोंपड़ियों की दशा भी सुधारनी होगी, गरीबों को उनके दीन-हीन से ऊँचा उठाना होगा। देशभक्त बनने की दिशा में सबसे पहला कदम यही है कि हम भूख और अभाव से पीड़ित कराड़ों व्यक्तियों के प्रति वास्तविक संवेदना का अनुभव करें और उनके उस्थान की दिशा में कुछ करके दिखाएँ। यदि गरीबों और शूद्रों को दीन-हीन ही रखा गया तो देश और समाज का कोई कल्याण नहीं हो सकता। विवेकानन्द के समाजवादी हृदय ने इन शब्दों में चीत्कार किया-“मैं उस भगवान या धर्म पर विश्वास नहीं करता जो न विधवाओं के आँसू पोंछ सकता है और न अनार्थी के मुँह में एक टुकड़ा ही पहुँचा सकता है ।” पूँजीवादी और शोषणवादी निष्ठुर अमीरों के प्रति उन्होंने कहा “वे लोग, जिन्होंने गरीबों को कुचल कर धन पैदा किया है और अब ठाठ-बाट से अकड़ कर चलते हैं, वे उन 20 करोड़ देशवासियों के लिए जो इस समय भूखे और असभ्य बने हुए हैं यदि कुछ न करें, तो वे लोग घृणा के पात्र हैं।”

अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस की भाँति ही विवेकानन्द ने भारत की निर्धनता, शिक्षा और अज्ञानता को एक कलंक माना और घोषणा की कि भूखे पेट को धर्म की शिक्षा देना अर्थहीन है तथा जन साधारण को ऊँचा उठाये बिना कोई भी राजनीतिक उत्थान सम्भव नहीं है। जन साधारण की अवहेलना करना एक महान् राष्ट्रीय पाप है और हमारे राष्ट्र के पतन का कारण है। मनुष्य की साधुता ही सामाजिक तथा राजनीतिक व्यवस्था का आधार है। संसद् द्वारा बनाये गये कानूनों से ही कोई राष्ट्र भला या उन्नत नहीं हो जाता। वह उन्नत तब होता है जब वहाँ के मनुष्य उन्नत और सुन्दर स्वभाव वाले होते हैं। कानून, सरकार या राजनीनि मानव जीवन का परम उद्देश्य नहीं है। कानून का प्रतिपालन ही उन्नति का मूल नहीं है बल्कि पवित्रता और सच्चरित्रता ही शक्ति-लाभ का एकमात्र उपाय है। यह पवित्रता और सच्चरित्रता मानवमात्र के प्रति पददलितों के प्रेम, त्याग और कल्याण की भावना से उद्भूत होती है। विवेकानन्द ने मार्मिक शब्दों में कहा-“जितनी भी राजनीति अपनाई जाय वह उस समय तक सफल नहीं हो सकती। जब तक कि भारत की जनता शिक्षित, सन्तुष्ट और सुप्रशासित नहीं होती जब तक भारत के लाखों नर-नारी भूख और अज्ञान से ग्रस्त हैं, मैं हर आदमी को देशद्रोही कहता हूँ ।” वस्तुतः विवेकानन्द का समाजवाद आध्यात्मिक मान्यताओं से परिपुष्ट था। इस दृष्टि से वे महात्मा गाँधी के अग्रवाहक थे क्योंकि उनका समाजवाद भी बहुत कुछ उसी मार्ग से आगे बढ़ा।

विवेकानन्द ने श्रमिक वर्ग के प्रति गहन सहानुभूति प्रकट की । “उनके जीवनकाल में भारत में श्रमिक वर्ग का आन्दोलन अथवा संगठन मौजूद नहीं था क्योंकि उस समय इस वर्ग की स्वयं रचना हो रही थी। लेकिन एक महान् क्रान्तिकारी की भाँति विवेकानन्द ने श्रमिक वर्ग अडिग आस्था प्रकट की और अपनी मातृभूमि के महान् भविष्य के लिए, न केवल स्वतन्त्रता की वरन् समाजवाद की, भविष्यवाणी की । वास्तव में इस अविस्मरणीय व्यक्ति ने भारत में समाजवाद का नारा रूस में समाजवादी क्रान्ति के दो दशकों पूर्व ही दे दिया।” उन्होंने एक भविष्य द्रष्टा की भाँति देख लिया कि किसी न किसी रूप में समाजवाद निकट आ रहा है, और वह दिन दूर नहीं जबकि शूद्रों के रूप में ही शूद्र शासक वर्ग बन जाएँगे। विवेकानन्द की आदर्श राज्य सम्बन्धी कल्पना के सन्दर्भ में हम बता चुके हैं कि उनका मत था कि मानव समाज पर धर्म-पुरोहितों, सैनिकों, व्यापारियों तथा श्रमिकों का बारी बारी से राज्य होता है। पहले तीन वर्णों का राज्य हो चुका है और अब शूद्र राज्य का युग आ गया है-वे अर्थात् शूद्र अवश्य राज्य करेंगे, उन्हें कई रोक नहीं सकता। विवेकानन्द ने कहा कि शूद्रों में “कर्म करने की क्षमता है, वे परिध करते हैं, लेकिन उनके श्रम के फल का अधिकाँश दूसरे लोग छीन लेते हैं। अब वे इस तरह से परिचित हो चले हैं और अपने शोषण के विरुद्ध एक संयुक्त मोर्चा बना रहे हैं। उच्च वर्ग अब निम्न वर्गों का दमन नहीं कर सकेंगे, अतः उच्च वर्ग का हित इसी में है कि वे सन वर्गों को अपने समुचित अधिकारों को प्राप्त करने में उनकी सहायता करें”

स्वामी विवेकानन्द उस अर्थ में समाजवादी नहीं थे जिस अर्थ में हम आधुनिक किसी राजनीतिक दार्शनिक को समाजवादी कहते हैं। उनकी दृष्टि में समाजवाद कोई एकदम निर्दोष या आदर्श व्यवस्था नहीं थी। उन्होंने लिखा था-“मैं समाजवादी हूँ, इसलिए नहीं कि मैं इसे पूर्ण रूप से निर्दोष व्यवस्था समझता हूँ, परन्तु इसलिए कि रोटी न मिलने से आधी रोटी ही अच्छी है। अन्य व्यवस्थाओं को आजमाया जा चुका है और वे विफल अथवा दोषयुक्त सिद्ध हुई हैं। अब इसकी (समाजवाद की) भी परीक्षा होने दो-यदि और किसी कारण से नहीं हो तो केवल नवीनता के लिए ही सही। दुःख और सुख का पुनर्वितरण उस स्थिति की अपेक्षा तो अच्छा ही है जिसमें कि कुछ व्यक्ति सदैव दुख और कुछ सदैव सुख का अनुभव करते हैं। इस कष्टमय संसार में प्रत्येक व्यक्ति को कभी न कभी सुख प्राप्त होना चाहिए।” विवेकानन्द को जन-साधारण की शक्ति से असीम विश्वास था। वे इस बात भाँप चुके थे कि सामान्य जनता में जब तक जागति का संचार नहीं होगा तब तक समाज में घोर विषमता व्याप्त रहेगी और अमीर उनका शोषण करते रहेंगे। उन्होंने निष्ठुर पूँजीपति और शासक समुदाय को चेतावनी दी-“जब जन-साधारण जाग पड़ेगा, तो वह तुम्हारे द्वारा किये गये दमन को समझ जायेगा और उसके मुख की एक फूंक तुमको पूरी तरह उड़ा देगी।”

डॉ० विश्वनाथ प्रसाद वर्मा ने स्वामी विवेकानन्द को दो अर्थों में समाजवादी माना है-

“प्रथम, इसलिए कि उनमें यह समझने की ऐतिहासिक दृष्टि थी कि भारतीय इतिहास में दो उच्च जातियों-ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों का आधिपत्य रहा है। क्षत्रियों ने गरीब जनता का आर्थिक तथा राजनीतिक शोषण किया और ब्राह्मणों ने उसे नवीन तथा जटिल धार्मिक क्रियाकलाप और अनुष्ठानों के बन्धन में जकड़ कर रखा। उन्होंने खुले तौर पर जातिगत उत्पीड़न की भर्त्सना की और आत्मा तथा ब्रह्म में आस्था रखने के नाते मनुष्य तथा मनुष्य के बीच सामाजिक बन्धनों को अस्वीकार किया। उनके आध्यात्मिक पूर्णता के सिद्धान्त में यह भाव और विश्वास अनिवार्य रूप से निहित है कि सभी आत्माएँ अपने आध्यात्मिक जन्म-सिद्ध अधिकार अर्थात शाश्वत प्रकाश, ज्ञान और अमरत्व को। साक्षात्कृत करने के लिए अपने-अपने ढंग से आगे बढ़ रही हैं, यद्यपि उनका ढंग कितना ही अपूर्ण क्यों न हो। वास्तविक आध्यात्मिक आत्माओं के बीच किसी प्रकार की श्रेष्ठता अथवा ऊँच-नीच की दीवार खड़ी करना पाप है। विवेकानन्द की रचनाओं में सामाजिक समानता का जो समर्थन देखने को मिलता है वह प्रबल पुरातनवाद तथा ब्राह्मणों की स्मृतियों में व्याप्त सामाजिक ऊँच-नीच के सिद्धान्त का सबल प्रतिवाद है, उनका सामाजिक समानता का सिद्धान्त तत्वतः समाजवादी है।”

“द्वितीय, विवेकानन्द समाजवादी इसलिए थे कि उन्होंने देश के सब निवासियों के लिए ‘समान अवसर’ के सिद्धान्त का समर्थन किया। उन्होंने लिखा, “यदि प्रकृति में असमानता है, तो भी उसके लिए समान अवसर होना चाहिए-अथवा यदि कुछ को अधिक और कुछ को कम अवसर दिया जाय तो दुर्बलों को सबलों से अधिक अवसर दिया जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में, ब्राह्मण को शिक्षा की उतनी आवश्यकता नहीं है जितनी कि चाण्डाल को। यदि ब्राह्मण को एक अध्यापक की आवश्यकता है तो चाण्डाल को दस की है, क्योंकि जिसको प्रकृति ने जन्म से सूक्ष्म बुद्धि नहीं दी है उसे अधिक सहायता दी जानी चाहिए। वह मनुष्य पागल है जो बरेली को बाँस ले जाता है। पददलित, दरिद्र और अज्ञानी इन्हीं को अपना देवता समझे । “समान अवसर का सिद्धान्त निश्चय ही समाजवादी दिशा का द्योतक है। विवेकानन्द इस सिद्धान्त का समर्थन करके समाज के निम्न वर्गों का उत्थान करना चाहते है। यह हमें लोकतान्त्रिक समाजवाद के विभिन्न सम्प्रदायों में प्रतिपादित अवसर की समानता की धारणाओं का स्मरण दिलाता है।

यदि हम स्वामी विवेकानन्द तथा अन्य आधुनिक समाजवादी दार्शनिकों की तुलना करें तो निम्नलिखित तीन बड़े स्पष्ट और आधारभूत अन्तर दिखाई देते हैं-

प्रथम, विवेकानन्द का, मार्क्स के समान, इतिहास की भौतिकवादी व्याख्या में विश्वास नहीं था और न ही उन्होंने मार्क्स तथा उसके अनुयायियों की भाँति वर्ग-संघर्ष के सिद्धान्त को मानव इतिहास को समझने की कुंजी माना था। विवेकानन्द आध्यात्मिक पुरुष थे, वेदान्ती थे और वेदान्त पर आधारित किसी भी सामाजिक दर्शन में वर्ग संघर्ष के सिद्धान्त के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता। विवेकानन्द की दृष्टि अन्तर्राष्ट्रीयतावादी थी, वे विश्व प्रेम, पारस्परिक सहयोग और सहिष्णुता के सन्देशवाहक थे और किन्हीं भी वर्गों में तथा किन्हीं भी जातियों में विरोध और संघर्ष उनके हृदय को पीड़ित करता था। उन्होंने अत्याचार और अन्याय का मुकाबला करने की प्रेरणा दी, लेकिन हिंसा या क्रान्ति को हेय समझा। उन्होंने वर्ग-संघर्ष का नहीं वर्ग-सहयोग का मन्त्र दिया।

द्वितीय, विवेकानन्द का अन्य समाजवादी दार्शनिकों के समान वर्गहीन समाज के सिद्धान्त में विश्वास नहीं था। उन्होंने भारत में प्रचलित तत्कालीन जाति प्रथा का विरोध किया, लेकिन जातियों के उन्मूलन की बात नहीं कही बल्कि उनका यह विश्वास बना रहा कि हर समाज में किसी न किसी प्रकार के वर्ग अवश्य ही होने चाहिएँ । वे भूतकाल की मूल वर्ण-व्यवस्था के पक्ष में थे और साथ ही चाहते थे कि निम्न वर्ग को उच्चतम स्थिति तक उठने का अवसर मिलना चाहिए और यह वेदान्त का सन्देश है।

तृतीय, विवेकानन्द न केवल मात्र आर्थिक समानता को ही सर्वाधिक महत्व नहीं दिया वरन् “उनका आदर्श तो एक सांस्कृतिक तथा आध्यात्मिक भ्रातृत्व था जिसमें आर्थिक समाजवाद के अतिरिक्त नैतिक तथा बौद्धिक आत्मीयता भी होगी। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि स्वामी विवेकानन्द के मतानुसार भारत में किसी सुधार के लिए सबसे पहले धर्म में एक क्रान्ति लाना आवश्यक है। उन्होंने कहा था कि हमें देश में समाजवादी विचारों की बाढ़ लाने से पहले यहाँ आध्यात्मिक विचारों की धारा प्रवाहित करनी चाहिए।”

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