दयानन्द का सामाजिक चिन्तन एवं शैक्षिक विचार

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दयानन्द का सामाजिक चिन्तन

दयानन्द का सामाजिक चिन्तन

(SOCIAL THOUGHT OF DAYANAND)

“दयानन्द ने यह स्पष्ट रूप से अनुभव कर लिया कि जब तक हिन्दू धर्म और समाज में विविध अन्यविश्वासों और कुरीतियों का प्रचलन रहेगा तब तक भारत में बृहतर विश्व में एक आधुनिक व्यक्ति के धर्म के रूप में अपनी स्थिति सुदृढ़ बनाने का उसके समक्ष कोई अवसर नहीं हो सकता। अतः दयानन्द का आन्दोलन केवल धर्म-सुधार आन्दोलन नहीं था बल्कि समाज-सुधार आन्दोलन भी था।”

बिपिनचन्द्र पाल

स्वामी दयानन्द में यह प्रबल अनुभूति थी कि देश की जनता में और नरेशों तथा बुद्धिजीवी वर्ग में सामाजिक एवं राजनीतिक जागरण लाकर ही अंग्रेजों को देश से बाहर निकाला जा सकता है। वे समाज सुधार को राजनीतिक चेतना की जागृति और राष्ट्रीयता के विकास के लिए अनिवार्य मानते थे। अपने अथक प्रयासों से उन्होंने देश में प्रचलित विभिन्न बुराइयों के खिलाफ एक आन्दोलन खड़ा कर दिया जो उनकी मृत्यु के बाद भी फलता-फूलता रहा।

(1) स्वामी दयानन्द ने यह विश्वास व्यक्त किया कि व्यक्ति और समाज एक दूसरे के पूरक हैं। व्यक्ति का सर्वांगीण विकास समाज में रहकर ही सम्पन्न हो सकता है। विकास के सम्बन्ध को केवल व्यक्ति तक ही सीमित कर देना एक प्रान्त धारणा है। हमें यह मानकर चलना चाहिए कि विकास का लाभ समाज के प्रत्येक सदस्य को प्राप्त हो । समाज एक संगठित इकाई है और समान आदर्शों के भवन में सभी के लिए स्थान है। सामाजिक जीवन में विभिन्न स्तरों पर असमानता का अनुभव करके, ऊँच-नीच को देखकर वस्तुतः उनके हृदय को बड़ा आघात पहुँचता था।

(2) स्वामी दयानन्द ने वेदों के सहारे हिन्दुओं के वर्णाश्रम धर्म का समर्थन किया। लेकिन वर्णाश्चम धर्म ने जिस जाति प्रथा और छूआछूत की बुराई को पैदा किया, उसकी उन्होंने कटु आलोचना की। उन्होंने कहा कि जाति-व्यवस्था का तात्कालिक रूप उस वर्ण-व्यवस्था के एकदम विपरीत था जिस पर वैदिक समाज आधारित था। जन्म को जाति की कसौटी मानने के भयंकर दुष्परिणाम हुए थे। इसलिए दयानन्द इस पक्ष में थे कि मनुष्य का वर्ण उसकी मानसिक प्रवृत्तियों, गुणों तथा कर्मों के अनुसार निर्धारित किया जाय। वस्तुतः दयानन्द का यह विचार क्रान्तिकारी था। इसने जन्म पर आधारित श्रेष्ठता के आधार पर घातक चोट की। इसके विपरीत वर्ण के सम्बन्ध में उनकी कसौटी सचमुच लोकतान्त्रिक थी। दयानन्द का मत था कि मनोवैज्ञानिक तथा व्यावसायिक कसौटी पर आधारित वर्ण का सिद्धान्त अनेक सामाजिक तथा व्यावसायिक संघर्षों का समाधान कर सकता है। वर्ण-निर्धारण करने की कसौटी जन्म नहीं, बल्कि किसी विशिष्ट कार्य को करने की मानसिक क्षमता है। इस प्रकार भारत के सामाजिक जीवन में दयानन्द का लोकतान्त्रिक आदर्शवाद जन्म के स्थान पर योग्यता को महत्व देने में व्यक्त हुआ। स्वामी दयानन्द वस्तुतः प्राचीन वर्ण-व्यवस्था को पुनर्जीवित करना चाहते थे, तथापि उन्होंने यह नहीं बताया कि आधुनिक जीवन की अत्यधिक जटिल स्थितियों में ऐसा किस प्रकार सम्भव हो सकेगा।

जन्मना जाति-व्यवस्था के विरोध में आवाज उठाकर स्वामी दयानन्द ने दलित वर्ग के सामने निश्चय ही एक नई आशा की लहर बिखेर दी और उन्हें विश्वास होने लगा कि अब वे सुकर्म करके समाज में अपने आप को ऊँचा उठा सकते हैं। दयानन्द के आदर्श स्वप्न को पूरा करने की दिशा में महात्मा गाँधी के विशेष प्रयत्ल हुए और भारत के दलितोद्धार की दिशा में जो वैधानिक और अन्य प्रयास हुए हैं, वे दयानन्द की दूरदर्शिता का स्मरण कराते हैं। जन्म से न कोई अछूत है और न कोई हीन-यह सन्देश देकर स्वामी दयानन्द मनुष्य मात्र में समानता के आदर्श के स्वप्नदृष्टा थे।

(3) दयानन्द ने वेदों से प्रमाण देकर सिद्ध किया कि परमेश्वर के शुद्ध स्वरूप का ज्ञान वेदों में है और वेदाध्ययन का अधिकार सब मनुष्यों को है। उन्होंने यह दृढ़ विश्वास व्यक्त किया कि समुचित शिक्षा के अभाव में भारतवासी किसी भी प्रकार की प्रगति नहीं कर सकते। शिक्षा को उन्होंने व्यापकतम अर्थ में लिया और बतलाया कि शिक्षा का अर्थ है-शरीर का निर्माण, इन्द्रियों की साधना एवं बौद्धिक शक्तियों का विकास’। ब्रह्मचर्य-पालन को उन्होंने एक सच्ची शिक्षा पद्धति की अनिवार्य शर्त बतलाया और यह मत रखा कि शिक्षण कार्य चरित्रवान और विद्वान व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न होना चाहिए। 18 वर्ष की आयु तक वे शिक्षा को निःशुल्क और अनिवार्य बनाना चाहते थे। ब्रह्मचर्य को सच्ची शिक्षा की आवश्यक शर्त मानने के कारण उन्होंने गुरुकुलों की स्थापना की आवश्यकता पर बल दिया। नारी-शिक्षा के ऊपर भी उन्होंने उतना ही बल दिया जितना पुरुषों की शिक्षा के ऊपर।

(4) स्वामी दयानन्द ने हिन्दू समाज में व्याप्त नाना कुरीतियों और दोषों को मिटाने की प्राणपण से चेष्टा की। मूर्ति पूजा को उन्होंने वेद-विरुद्ध और धर्म विरुद्ध बतलाया। उन्होंने मूर्ति-पूजा के समर्थकों को शास्त्रार्थ में पराजित किया और बहुत से मूर्ति पूजक विद्वान तो मूर्तियों को गंगा में प्रवाहित करके दयानन्द के शिष्य बन गए । दयानन्द ने नारी की गरिमा का समर्थन किया और हिन्दू समाज में प्रचलित इस विचार का खण्डन किया कि नारी पुरुष के समान नहीं है, उसे प्रकृति ने ही शरीर तथा स्वभाव से पुरुष से भिन्न बनाया है और यह भिन्नता उसे पुरुष की तुलना में हेय बनाती है। स्त्रियों के सामाजिक जीवन पर लगे अनुचित प्रतिबन्धों की उन्होंने निन्दा की और स्त्री जाति को मातृ-शक्ति के रूप में पूजने पर बल दिया। वेदों के अध्ययन से स्त्रियों को अलग रखना उनकी दृष्टि में सर्वथा अनुपयुक्त और अनुचित था। स्त्रियों को पढ़ने का निषेध उनकी दृष्टि में मूर्खता, स्वार्थ और निर्बुद्धिता का प्रभाव था । स्वामी दयानन्द ने वस्तुतः स्त्रियों के गौरव को बढ़ाया और उनके लिए समान अधिकारों की घोषणा की। वे स्त्री जाति के पूर्ण स्वतन्त्रता के पक्के पक्षपाती थे। स्त्रियों को दीन-हीन दशा से ऊपर उठाने में दयानन्द ने जीवन-पर्यन्त कोई शिथिलता न आने दी। उन्होंने बाल विवाह का घोर विरोध करते हुए यह विचार रखा कि 16 वर्ष से कम आयु वाली स्त्री और 25 वर्ष से कम आयु वाले पुरुष में गर्भाधान करने की योग्यता नहीं होती और इन नियमों के विपरीत चलने वाले दुःख के भागी होते हैं। स्वामीजी का कहना था कि 16 और 25 वर्ष की आयु क्रमशः स्त्री और पुरुष के लिए एक ऐसी अवस्था है जिनमें वे विवाह के अर्थ और स्वरूप को समझ सकते हैं तथा अपने विवेक के अनुसार अपने जीवन साथी को चुन सकते हैं। दयानन्द ने सामाजिक बुराई के हर पहलू को स्पर्श किया। उन्होंने कहा कि समुद्र-यात्रा, खान-पान और अन्तर्जातीय विवाह वर्जित नहीं है। विधवा विवाह भी उचित है और अस्पृश्यता त्याज्य है।

(5) दयानन्द वेदों के आधार पर भारतीय जीवन का पुनरुद्धार चाहते थे, किन्तु यूरोपीय संस्कृति के कुछ पक्षों के प्रशंसक भी थे। उनका कहना था कि यूरोपीय लोगों की उन्नति बारह कारणों से हुई है-उनमें बाल-विवाह की प्रथा नहीं है, वे लड़के लड़कियों सबकी शिक्षा देते हैं, उनमें स्त्रियाँ स्वयं पति चुनती हैं, वे अपने बच्चों को बुरी संगति में नहीं पड़ने देते, वे जो कुछ करते हैं आपसी सलाह से और प्रतिनिधि सभा को पूछ कर करते हैं, वे अपनी जाति के लिए सर्वस्व त्याग करने को तैयार रहते हैं, वे सुस्त नहीं होते और कर्मठ जीवनयापन करते हैं, वे स्वदेश-निर्मित वस्तुएँ प्रयोग में लाते हैं वे अपनी जीवन-शैली का परित्याग नहीं करते और दूसरों की नकल नहीं करते, उनमें प्रत्येक व्यक्ति अपने फर्ज को भली प्रकार निभाता है, वे अपने बड़ों की आज्ञा मानते हैं, तथा वे अपने देशवासियों की हर काम में मदद करते हैं।

वास्तविकता यही है कि दयानन्द अपने चारों ओर फैले हुए पाखण्ड को देख कर तिलमिला उठे थे और उसको दूर करने के लिए उन्होंने चारों ओर से प्रहार करना आरम्भ कर दिया था पर इस प्रहार में या घृणा को कोई स्थान नहीं था। उन्होंने खुले तौर पर घोषणा की “मेरी कोई नवीन कल्पना या मतमतान्तर चलाने का लेश-मात्र भी अभिप्राय नहीं है किन्तु जो सत्य है उसे मानना-मनवाना और जो असत्य है, उसको तोड़ना-तुड़वाना अभीष्ट है। यदि पक्षपात मैं करता, तो आर्यावर्त के प्रचलित मतों में से किसी एक मत का आग्रही होता किन्तु जो जो आर्यावर्त व अन्य देशों में अधर्मयुक्त चाल-चलन हैं, उनको स्वीकार और जो धर्मयुक्त बातें हैं उनका त्याग नहीं करता, न करना चाहता हूँ, क्योंकि ऐसा करना मनुष्य धर्म के बाहर है।”

दयानन्द के शैक्षिक विचार

(EDUCATIONAL IDEAS OF DAYANAND)

महर्षि दयानन्द ने शिक्षा के क्षेत्र में जितनी व्यावहारिक रुचि ली, उतनी बहुत कम समाज सुधारकों ने ली । उनका दृढ़ विश्वास था कि समुचित शिक्षा के अभाव में देशवासी कभी प्रगति नहीं कर सकेंगे। दयानन्द ने शिक्षा को व्यापक अर्थ में लिया। उनके लिए शिक्षा का अर्थ था शरीर का निर्माण, इन्द्रियों की साधना और बौद्धिक शक्तियों का विकास । ब्रह्मचर्य पालन को इन्होंने सच्ची शिक्षा पद्धति की एक अनिवार्य शर्त माना और शिक्षण कार्य को चरित्रवान तथा विद्वान् व्यक्तियों के हाथ में रखना चाहा। शिक्षण-आयु के सम्बन्ध में उन्होंने मनु के इस कथन का समर्थन  किया कि राज्य तथा समाज दोनों को सब लोगों के लिए अनिवार्य कर देना चाहिए कि वे अपने बच्चों को पाँचवें अथवा आठवें वर्ष के बाद विद्यालय भेजें। इस अवस्था के बाद बालक को विद्यालय में न भेजना एक दण्डनीय अपराध होना चाहिए।

महर्षि दयानन्द ने सेवा-निवृत्ति व्यक्तियों को जन-जातियों के बीच शिक्षा-प्रसार करने की सलाह दी और शिक्षा को अन्य सभी सुधारों का मूल माना। प्रारम्भिक शिक्षा के विषय में इन्होंने माता-पिता को बालक का प्रथम गुरु बताया और लिखा कि माता-पिता के उपदेश से सन्तान को जितना लाभ हो सकता है, उतना और किसी से नहीं हो सकता। दयानन्द सह शिक्षा के पक्ष में नहीं थे क्योंकि उनका विचार था कि लड़के-लड़कियों के चरित्र पर अनुकूल प्रभाव नहीं पड़ता। उनका आग्रह था कि प्रत्येक समाज में छात्र-छात्राओं के लिए अलग-अलग शिक्षणालय होने चाहिए। लड़कों और लड़कियों के लिए शिक्षा-पद्धति और शिक्षा के विषयों में भी आवश्यकतानुसार भिन्नता जरूरी है। दयानन्द ने नारी-शिक्षा पर उतना ही बल दिया जितना कि पुरुषों की शिक्षा पर। उन्होंने गुरुकुलों की स्थापना की सिफारिश की जहाँ तरुण ब्रह्मचारीगण आचार्यों की निगरानी में विद्योपार्जन कर सकें। उनका कहना था कि गुरुकुलों में सभी वर्गों और जातियों के बच्चों को समानता के आधार पर प्रवेश मिलना चाहिए और धनी तथा निर्धन के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए।

दयानन्द ने एक ऐसी शिक्षा पद्धति पर बल दिया जो पूर्ण रूप से राष्ट्रीय हो और जो ऐसे नागरिक उत्पन्न करे जिनमें समाज के प्रति कर्त्तव्यपरायणता और उत्तरदायित्व की भावना विद्यमान हो । दयानन्द ने देश को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए हिन्दी का पूरे देश में प्रचलन आवश्यक माना, यद्यपि अपनी शिक्षा योजना में अंग्रेजी के अध्ययन के लिए भी स्थान रखा | आर्य समाज द्वारा संस्थापित शिक्षण संस्थाएँ, गुरुकुल और डी० ए० वी० कॉलेज वस्तुतः स्वामी दयानन्द के सच्चे स्मारक हैं। स्वामी दयानन्द ने आर्य समाज के उप-नियमों में भी हिन्दी को आर्य समाज के व्यवहार की भाषा बताया इसीलिए भारत में और भारत से बाहर भी जिन देशों में आर्य समाज की शाखाएँ हैं वहाँ हिंदी में काम होत है।

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