अम्बेडकर के आर्थिक विचार

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अम्बेडकर के आर्थिक विचार

अम्बेडकर के आर्थिक विचार

अम्बेडकर का मुख्य विषय ही अर्थशास्त्र था। अर्थशास्त्र के संदर्भ में ही उनको समाजशास्त्र के अध्ययन का भी सुअवसर मिला। उनके पास विदेशों की बड़ी-बड़ी उपाधियाँ थी, जो अपने आप में एक गरीब तथा अछूत कहलाये जानेवाले व्यक्ति के लिए एक महान उपलब्धि थीं। ये सभी उपाधियाँ अर्थशास्त्र के क्षेत्र में उनके शोधकार्यों पर प्राप्त की गई थी। उन्होंने भारतीय जन-जीवन के संदर्भ में अर्थशास्त्र के सिद्धान्तों का गहन अध्ययन किया। इस विषय पर उन्होंने कई पुस्तकें तथा लेख लिखे। इन कृतियों का अर्थशास्त्र के संदर्भ में समुचित अध्ययन नहीं किया गया है। कई प्रसिद्ध अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अगर अम्बेडकर का कार्य केवल अर्थशास्त्र के ही क्षेत्र में भी होता, तो वे एक महान विद्वान् के रूप में प्रतिष्ठित होते। यह दुर्भाग्य की बात है कि उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष को प्राय: गौण मान लिया जाता है।

अम्बेडकर का मुख्य क्षेत्र भारतीय अर्थशास्त्र था। यह उनकी महान उपलब्धि है कि उन्होंने पश्चिमी सिद्धान्तों की सहायता से भारतीय अर्थशास्त्र का अध्ययन करने का प्रयास किया। इस विवेचनात्मक अध्ययन से उन्हें भारत के परम्परागत अर्थ-तन्त्र को समझने का अवसर मिला। वे प्रो० सेलिगमैन, प्रो० केन्नान तथा कई अन्य अमेरिका, इंग्लैण्ड तथा जर्मनी के अर्थशास्त्रियों के सम्पर्क में आये और उनकी सहायता से उन्होंने कई महत्वपूर्ण शोध किये।

अम्बेडकर का प्रथम उद्देश्य था भारतीय समाज में एकता के सिद्धान्त को महत्ता दिलवाना। वे यह जानते थे कि सामाजिक असमानता का मुख्य कारण आर्थिक शोषण है। जब तक अछूतों तथा दलितों की आर्थिक स्थिति में सुधार नहीं किये जायेंगे, सामाजिक एकता का आदर्श प्राप्त नहीं किया जा सकता। वे कहा करते थे कि अछूत और दलित वर्ग के लोग इसलिए निर्धन है, क्योंकि उनके लिए कई प्रकार के व्यवसायों के द्वार बन्द है। उनसे वही नीच समझे जाने वाले कार्य करवाये जाते हैं, जिनमें शारीरिक मेहनत तो खूब है, पर उनसे जीवन-यापन पूरी तरह से नहीं हो पाता। इसके अलावा, उनका ध्यान भारत की कृषि की समस्याओं की ओर भी गया। उन्होंने कहा कि कृषि योग्य भूमि का समुचित बँटवारा न होने की वजह से भारत का दलितवर्ग हमेशा गरीबी के दलदल में फँसा रहा। इस समस्या के निदान के लिए उन्होंने भूमि-सुधार सम्बन्धी कानूनों को तुरन्त लागू किये जाने की बात कही। उनका निश्चित मत था कि जब तक जमींदारी प्रथा का उन्मूलन नहीं होता, कृषकों की गरीबी दूर नहीं की जा सकती। जब तक भूमिपति रहेंगे तब तक भूमिहीन किसान भी रहेंगे। जिन किसानों के पास भूमि होती भी है वह क्षेत्रफल में इतनी कम है कि वे चौथाई वर्ष का खाना भी उससे उपलब्ध नहीं कर सकते। इसलिए उनकी खुशहाली के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है कि जमींदारी प्रथा का अन्त किया जाये। इस विषय में तत्कालीन कई अन्य नेता भी उनके पक्षधर थे। यही कारण है कि इस प्रथा के उन्मूलन की दिशा में विस्तृत कार्यक्रम लागू किया गया।

अम्बेडकर ने कृषि सम्बन्धी कई विचारों को जनता के सम्मुख रखा। कुछ समय तक उन्होंने सहकारिता पर आधारित खेती (Co-operative farming) की भी खूब चर्चा की। इस विषय में पंडित जवाहरलाल नेहरू भी उनसे सहमत थे। कई अंचलों में इसके सफल प्रयोग भी किये गये, किन्तु इसका अधिक प्रसार नहीं हो सका। अम्बेडकर का मत था कि सहकारी खेती की प्रथा के माध्यम से भूमिहीन दलित किसानों की समस्या का समुचित हल निकल सकेगा। एक समय तो वे कृषि राष्ट्रीयकरण की बात भी करने लगे थे, किन्तु जब उनको यह अहसास होने लगा कि इस प्रथा का रुख वैज्ञानिक समाजवाद (scientific socialism) की ओर मुड़ जाने का खतरा है, तो उन्होंने अपनी दलीलों को छोड़ दिया। वे महसूस करते थे कि साम्यवादी तरीकों से भारत की समस्याओं का हल सम्भव नहीं है। सम्भवतः अन्त में वे कृषि के क्षेत्र में भी उस मिश्रित अर्थव्यवस्था (mixed economy) के पक्षधर हो गये थे, जिसको नेहरू ने लागू किया और किसी हद तक उसके अच्छे परिणाम भी सामने आये।

अम्बेडकर एक ऐसे अर्थतन्त्र की कल्पना करते थे, जिसके माध्यम से गरीबी का उन्मूलन तो हो ही, साथ ही कृषि तथा उद्योगों से पैदा की जानेवाली सम्पत्ति कुछ ही हाथों में केन्द्रित न हो जाये। अर्थशास्त्र के क्षेत्र में भी उनकी मूल चिन्ता का विषय अछूतोद्धार की समस्या ही थी। उन्होंने जिन आर्थिक परिवर्तनों की बात की उनके पीछे भी यही भावना विद्यमान थी। वे देश की आर्थिक सम्पन्नता का मूल्य भी इसी आधार पर आंकते थे। वह अर्थव्यवस्था जो अपने आप में चाहे जितनी सही हो, अगर उससे पिछड़ी जातियों के हितों का सम्पादन नहीं होता और सामाजिक न्याय का आदर्श नहीं प्राप्त होता, तो ऐसी व्यवस्था अवांछनीय है।

अन्त में, यह बात याद रखनी चाहिए कि अम्बेडकर का मुख्य विषय यद्यपि अर्थशास्त्र था, किन्तु वे सामाजिक समस्याओं से इस कदर जूझते रहे कि वे अपने प्रिय विषय को अधिक समय न दे सके। फिर भी, जब भी हम उनके इधर-उधर बिखरे विचारों का अध्ययन करते हैं, तो उनकी सूझ-बूझ का परिचय मिल जाता है।

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