अरविन्द का मानव एकता का आदर्श

अरविन्द घोष का मानव एकता का आदर्श

अरविन्द घोष का मानव एकता का आदर्श

(AUROBINDO’S IDEAL OF HUMAN UNITY)

प्रथम महायुद्ध से उत्पन्न संकटों और परिस्थितियों में विश्व के दार्शनिकों का ध्यान एक ऐसे विश्व संघ की ओर आकृष्ट हुआ जो सम्पूर्ण मानव जाति को अपने में एकाकार कर ले। अरविन्द ने अपनी धारणा को ‘मानव एकता के आदर्श‘ (The Ideas of Human Unity) अपनी महान् कृति में स्पष्ट किया। उन्होंने मानव एकता के आदर्श को प्रकृति की योजना का अंग मानते हुए विश्वास व्यक्त किया कि यह स्वप्न भविष्य में एक दिन अवश्य ही साकार होगा। अरविन्द ने इस आदर्श को प्रकृति की योजना का अंग इसलिए बताया क्योंकि उनकी मान्यता कि हम सब एक दूसरे के घटक हैं और एक यान्त्रिक तथा बाह्य आवश्यकता हमें एक दूसरे के प्रति इतना आकर्षित करती है कि हम स्वयं को क्रमश: परिवार, कबीले और ग्राम जैसे उत्तरोत्तर समूहों में संगठित करने को बाध्य हो जाते हैं। इतिहास बताता है कि मनुष्य की प्रवृत्ति सदैव उत्तरोत्तर बड़ी इकाइयों का निर्माण करने की रही है, गाँव अपने आप को राज्यों में और राज्य अपने को साम्राज्य में संगठित करते रहे हैं।

अरविन्द का महत्व इस बात में निहित है कि उनके पहले अरस्तु ने या उससे भी लगभग दो हजार वर्ष बाद हीगल ने इस प्रकार का चिन्तन नहीं किया। अरस्तु नगर राज्य के इर्द गिर्द घूमता रहा और हीगल ने भी राष्ट्र राज्य को ही विकास की प्रक्रिया में सामाजिक संगठन का सर्वोच्च और अन्तिम रूप बताया जबकि अरविन्द ने स्वयं को इन दार्शनिकों से ऊपर उठाते हुए यह अनुभव किया कि राज्य का विचार अपने आप में अपर्याप्त और अपूर्ण है। अरविन्द इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि यदि मानव का चरम विकास करना है तो हमें राज्य के विचार का अतिक्रमण करके यह स्वीकार करना होगा कि सम्पूर्ण मानव जाति एक इकाई है। इस प्रकार अरविन्द ने हमारे समक्ष मानव एकता का महान् आदर्श प्रस्तुत किया। उन्होंने यह भी कहा कि इस महान् आदर्श को हम विश्व-राज्य के निर्माण द्वारा प्राप्त कर सकते हैं अथवा राष्ट्र राज्यों को एक प्रकार के संघ में संगठित करके हम इस आदर्श को साकार बना सकते हैं। अरविन्द ने इस सम्बन्ध में एक कल्पना भी की और बताया कि भविष्य में एक ऐसा समय आए जब हम एक संयुक्त राज्य यूरोप, एक संयुक्त राज्य एशिया और एक संयुक्त अफ्रीका के दर्शन करें और इन सब राज्यों को संयुक्त करके एक संघ (Federation) बना लें।

अरविन्द ने एक स्वतन्त्र विश्व संघ की धारणा प्रकट की, पर वे इस बात को नहीं भूले कि यह संघ पूर्ण रूप से एक जैसा नहीं हो सकता। उन्हें ध्यान रहा कि स्वयं आत्म-निर्णय के सिद्धान्त पर आधारित इस प्रकार का संघ विविधताओं पर आधारित होगा। उसमें सामान्य सामन्जस्यपूर्ण जीवन के नियम को सर्वोच्चता मिलेगी ताकि मानव जाति के आदर्श एकीकरण का स्वप्न भी भली प्रकार पूरा हो सके। अपने समूह बनाने का अधिकार होगा, लेकिन ये स्वतन्त्र समूह निजी स्वार्थ की पूर्ति में न डूब कर सम्पूर्ण मानव जाति के हितों को ध्यान में रखते हुए कार्य करेंगे । शक्ति पर आधारित तथा कृत्रिम समूहों को इस व्यवस्था मे कोई स्थान न होगा। अरविन्द ने विश्वास प्रकट किया कि स्वतन्त्र और स्वाभाविक समूहों के सिद्धान्त को स्वीकार कर लिया जाय तो हमारे आदर्श एकीकरण की व्यवस्था पूर्ण हो जाएगी जिसमें आन्तरिक संघर्षों और कलहों के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा। तब हमारे मानवीय सम्बन्ध मानवीय आधार पर पुष्ट होंगे और वर्तमान कटुता का वातावरण समाप्त हो जाएगा। स्पष्ट है कि अरविन्द ने मनोवैज्ञानिक एकता के सिद्धान्त को सामने रखा क्योंकि मनोवैज्ञानिक एकता स्थापित होने पर ही मानव जाति का आदर्श एकीकरण सम्भव है। अरविन्द का कहना था कि राष्ट्रवाद के विचार में राजनीतिक एकता का तत्व उतना अनिवार्य नहीं है जितना कि मनोवैज्ञानिक एकता का तत्व है। यदि एक राष्ट्र में मनोवैज्ञानिक एकता का तत्व विद्यमान है तो उसका कभी विनाश नहीं हो सकता। जिस साम्राज्य में मनोवैज्ञानिक एकता का प्रभाव जिस सीमा तक विद्यमान है उस सीमा तक वह साम्राज्य भी शक्तिशाली और स्थिर बन जाता है।

अरविन्द ने स्वतन्त्र विश्व संघ के आदर्श को प्रस्तुत ही नहीं किया वरन् इसके मार्ग में आने वाली बाधाओं के प्रति चेतावनी भी दी। इनमें सबसे बड़ी बाधा राष्ट्र राज्य की अतिवादी धारणा को बताया। उन्होंने इस धारणा को ‘सामूहिक अहंवाद’ की संज्ञा दी और कहा कि स्वतन्त्र विश्व संघ की स्थापना यदि करनी है तो इस सामूहिक अहंवाद में आवश्यक संशोधन करना होगा और मानवता का आध्यात्मिक धर्म अपनाना होगा। यदि एक बार मानव जाति में आध्यत्मिक एकता की अनुभूति पैदा हो गई तो एक ऐसी प्रबल मनोवैज्ञानिक एकता का उदय होगा जो मानव जाति के आदर्श एकीकरण को पूरा कर सकेगी। अरविन्द के विचारों से हम असहमत नहीं हो सकते । हम इस बात से इन्कार नहीं कर सकते कि यदि राष्ट्र राज्य की अतिवादी धारण पर बढ़ते रहे तो निःसन्देह हम अपने लिए विनाश को आमंत्रित करेंगे । संसार आज एक बारूद के ढेर पर खड़ा है और यदि मानव जाति नष्ट न होकर जीवित रहना चाहती है तो उसे परस्पर मिलकर इस बारूद के ढेर को समुद्र में डुबो देना होगा, सहअस्तित्व का मार्ग अपनाना होगा।

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