कौटिल्य के राजनैतिक विचार

कौटिल्य के राजनैतिक विचार

कौटिल्य के अर्थशास्त्र में राजनैतिक विचार

(Political Ideas in Arthshastra)

कौटिल्य का अर्थशास्त्र मूल रूप से राजनीति का ग्रन्थ है। इसकी विषय-वस्तु में जिन अन्य बातों को समाहित किया गया है वे सभी राजनीति से सम्बद्ध होने के कारण इसमें स्थान पा सकीं। अर्थशास्त्र के प्रमुख राजनैतिक विचार निम्नलिखित हैं :

राज्य की उत्पत्ति-कौटिल्य ने राज्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में सामाजिक समझौते के सिद्धान्त को स्वीकार किया है। एक स्थान पर उन्होंने बताया है कि राज्य से पूर्व समाज में मत्स्य-न्याय का प्रभाव था। जिस तरह से बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है उसी तरह समाज के सबल पुरुष निर्बल पुरुषों के विनाश में हमेशा सक्रिय रहा करते थे। इस व्यवस्था से तंग आकर लोगों ने विवस्वान् के पुत्र मनु को अपना राजा बनाया। ये लोग उसे अपनी अन्न की उपज का छठा भाग, व्यापार द्वारा प्राप्त धन का दसवाँ भाग और सोने की आय का कुछ भाग कर के रूप में देने लगे। मुन को राजा नियुक्त करते समय इन लोगों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि ‘कर’ वे लोग राजा को तभी देंगे जबकि वह उनके योग क्षेम की समुचित व्यवस्था करता रहेगा। इस प्रकार राज्य की उत्पत्ति एक सामाजिक समझौते का परिणाम थी। कौटिल्य, हॉब्स द्वारा वर्णित प्राकृतिक अवस्था के लक्षणों को मान्यता दी है। वे उस काल में मनुष्य के जीवन को अस्थिर, अरक्षित, यातनायुक्त एवं पशुवत मानते हैं। इस युग का व्यक्ति स्वार्थ साधन के एक दूसरे के विनाश में लगा हुआ था। प्राकृतिक अवस्था में तंग होकर उसने राज्य का निर्माण किया तथा राजा को स्पष्ट रूप से बता दिया कि यदि वह प्रजा के योग-क्षेम की व्यवस्था के अपने कर्तव्य से विमुख हो जायेगा तो उसे लोग धन और जन की सहायता देना बन्द कर देंगे और वह इस प्रकार उनका राजा नहीं रहेगा। कौटिल्य ने राज्य की उत्पत्ति के अपने इस सिद्धान्त में लोक वित्त पर जनता का अधिकार माना। उनके अनुसार राजा द्वारा बिना प्रजा की पूर्व अनुमति के उस पर कर नहीं लगाये जा सकते थे, वह धन एकत्रित करने और उसे खर्च करने का अधिकार प्रजा में निहित मानता था। इस प्रकार कौटिल्य राजा की निरंकुशता पर एक महत्वपूर्ण प्रतिबन्ध लगाते हैं जो कि उनकी सूझबूझ को प्रदर्शित करता है।

राज्य का सावयव स्वरूप

कौटिल्य राज्य के सावयवी रूप में विश्वास करते हैं। उनके मतानुसार राज्य की सात प्रकृतियाँ हैं- स्वामी, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, दण्ड और मित्र । इन प्रकृतियों को कौटिल्य ने राज्य के अवयव कहकर सम्बोधित किया है। इस प्रकार उनके मतानुसार राज्य एक ऐसा सावयवी है जिसकी रचना सात अवयवों से मिलकर होती है। राज्य के इस सावयवी रूप का वर्णन कौटिल्य से पूर्व भी प्राप्त होता है। ऋग्वेद में इस विचार की थोड़ी झलक मिलती है। यजुर्वेद में बताया गया है कि विराट पुरुष की पीठ राष्ट्र है और उसके उदर, कन्धे, कटि, जंघा तथा घुटने आदि सभी उसकी प्रजा है। महाभारत के भीष्म और मनु ने भी राज्य के सावयवी रूप का वर्णन किया है किन्तु उनमें कौटिल्य जैसी स्पष्टता नहीं है।

कौटिल्य द्वारा वर्णित राज्य का सावयवी रूप कोई विदेशी आयात नहीं है। वरन् यह शुद्ध रूप से भारतीय है। इसका उद्गम स्थान ऋग्वेद का पुरुष सूक्त है। कौटिल्य के इस सिद्धान्त की तुलना पाश्चात्य सिद्धान्त से करना अनुचित होगा।

कौटिल्य ने राज्य की विभिन्न प्रकृतियों के गुणों और उनके सापेक्ष महत्व का भी विभिन्न अध्यायों में विवेचन किया है। उसने राजा को सर्वप्रथम स्थान दिया है, वह राज्य की सर्वोच्च कार्यपालिका का मूर्तरूप है। उसके बाद मन्त्री आते हैं जो राजा को आवश्यक परामर्श देते हैं और शासन का संचालन करते हैं। दुर्ग राज्य की प्रतिरक्षा का प्रमुख साधन होते हैं और उनके द्वारा ही जनता की सुरक्षा सम्भव है। जनपद अथवा भू-भाग राज्य के अस्तित्व का भौतिक आधार है। राज्य व जनता के सुख व समृद्धि के लिए कोष का होना अति आवश्यक है। बिना दण्ड (अथवा राजशक्ति) के राज्य में शान्ति और व्यवस्था सम्भव नहीं। अन्त में मित्र अर्थात् पड़ोस में मित्र राज्यों का होना भी राज्य के अस्तित्व एवं सुरक्षा के लिए आवश्यक है। आधुनिक राज्यशास्त्री राज्य के चार तत्व मानते हैं-जन समूह, भू-भाग, सरकार और प्रभुसत्ता। इस दृष्टि से ऊपर वर्णित राज्य के सात अंगों अथवा तत्वों में कोष, दुर्ग और मित्र को स्थान दिया जाना उपयुक्त प्रतीत नहीं होता। परन्तु साधारण रूप में यह स्वीकार किया जा सकता है कि प्राचीन काल में कोष और दुर्ग के अस्तित्व एवं सुरक्षा तथा जनता की समृद्धि के लिए आवश्यक तत्व रहे होंगे। यही बात मित्र के विषय में भी कही जा सकती है। वर्तमान युग की स्थिर राजनीतिक दशाओं में छोटे राज्यों के अस्तित्व को विशेष खतरा नहीं, किन्तु प्राचीन काल में छोटे-छोटे राज्य बिना मित्र राज्यों के अपना अस्तित्व बनाये रखने में असमर्थ थे।

राज्यों के प्रकार

(Types of States)

अर्थशास्त्र के अध्ययन से स्पष्ट है कि कौटिल्य राजतन्त्र का पोषक था और वह समस्त भारत पर एक सशक्त और सम्पन्न राजा का शासन स्थापित करना चाहता था। उसी की मान्यता है कि राजतन्त्र में राज्यभक्ति कुलीन वर्ग के हाथ में रहती है और उपयुक्त अनुशासन और प्रजा में स्वामिभक्ति की स्थापना की जा सकती है। परन्तु अर्थशास्त्र में अन्य प्रकार के राज्यों का उल्लेख भी मिलता है, क्योंकि उस काल को द्वैराज्य, वैराज्य तथा संघराज्य कहा जाता था।

राज्य का उद्देश्य

(Objectives of The State)

कौटिल्य द्वारा वर्णित राज्य केवल पुलिस राज्य न था अर्थात् राज्य केवल शान्ति, व्यवस्था और सुरक्षा बनाये रखना ही अपने कार्य नहीं समझता। राज्य का उद्देश्य व्यक्ति को उसके पूर्ण विकास में पूरी तरह से सहायता देना है। अच्छा राज्य स्वस्थ और सुदृढ़ अर्थ-व्यवस्था पर आधारित होता है। कौटिल्य ने जनपद के गुणों का वर्णन करते हुए समृद्धिशाली जनपद के आवश्यक गुण इस प्रकार बतलाये हैं-राज्य का भूमि क्षेत्र इतना हो कि वह निवासियों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके और उनकी शत्रुओं से भी रक्षा कर सके। उसमें देशभक्ति भावना से प्रेरित व्यक्ति रहते हों, जंगली पशु उसके निवासियों को हानि न पहुँचा सकें, उसमें कृषि योग्य भूमि, चरागाह और वन आदि काफी हों, आवागमन के समुचित साधन हों, विभिन्न प्रकार की आवश्यक वस्तुएँ उत्पन्न होती हों और सभी वर्गों के परिश्रमी व्यक्ति रहते हों । कौटिल्य के अनुसार राज्य के कार्यों का क्षेत्र अति विस्तृत होना चाहिए। अच्छे राज्य का आधार सुदृढ़ अर्थ व्यवस्था है, जिससे कि उसके निवासी अपने जीवन के लक्ष्यों की प्राप्ति कर सकें।

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