बाल गंगाधर तिलक का जीवन परिचय

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बाल गंगाधर तिलक

बाल गंगाधर तिलक 

प्रारम्भिक दिनी के राष्ट्रीय मच पर बाल गंगाधर तिलक का अद्भुत स्थान था और लोग स्नेह तथा सम्मान से उन्हें ‘लोकमान्य’, जनता के प्रिय नायक, ‘सर्व सम्मानित कहकर पुकारते थे- मानों यह एक पूरे राष्ट्र की श्रद्धान्जलि हो। लोकमान्य तिलक का राजनीतिक मन्त्र-“स्वशासन मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं उसे लेकर रहूँगा” अधिकाँश सजग भारतीयों के होठों पर था। तिलक के पहले नेता थे जिन्होंने राजनीतिक आन्दोलन को शक्तिशाली बनाने के लिए धार्मिक जोश का प्रयोग किया। वे काँग्रेस के उग्रवादी नेता थे, कर्मठ और साहसी सेनानी थे जिन्होंने अपनी अनवरत भावना और महान् बलिदान के द्वारा भारतीय स्वाधीनता के भव्य भवन की नींव डालने में महती भूमिका अदा की। वे जीवन के प्रत्येक पहलू में खरे उतरे, उन्होंने आदर्श और यथार्थ दोनों का निर्वाह किया। काँग्रेस के मंच पर जो विशाल प्रबुद्ध व्यक्तित्व अब तक आए तिलक उनसे बिल्कुल निराले थे, क्योंकि सक्रिय क्रान्तिकारी होने के साथ ही वे एक महान् विद्वान भी थे। गीता-दर्शन पर उनकी टिप्पणी और ‘आर्कटिक होम इन दि वेदाज’ नामक वह ग्रन्थ जिसमें हिन्दुओं के आदि ग्रन्थ वेदों का जन्म स्थान आर्कटिक प्रदेश में सिद्ध किया गया है-उनके विशाल अध्ययन तथा अनुसंधान में उनकी गहरी रुचि का प्रमाण है।

जीवन-परिचय

(Life-Sketch)

लोकमान्य तिलक (1856-1920) का जन्म एक ऐसे महाराष्ट्रीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था जिसका सम्बन्ध इतिहास गौरवशाली पेशवाओं से था। बाल्यावस्था से ही तिलक बड़े नेधावी और प्रखर बुद्धि के थे। 1879 में उन्होंने एल० एल० बी० (LLB) की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। कॉलेज जीवन से ही उनकी रुचि सार्वजनिक कार्यों की ओर बढ़ती गई, और जब उनसे पूछा गया कि गणित में एम० ए० न करके (चूँकि तिलक को गणित में अत्यधिक रुचि थी) वे कानून क्यों पढ़ रहे हैं, तो उनका उत्तर था-“मैं अपना जीवन देश के जन-साधारण में लगाना चाहता हूँ और मेरा विचार है कि इस काम के लिए साहित्य अथवा विज्ञान की किसी उपाधि की अपेक्षा कानून का ज्ञान अधिक उपयोगी होगा । मैं एक ऐसे जीवन की कल्पना नहीं कर सकता जिसमें मुझे ब्रिटिश शासकों से संघर्ष न करना पड़े।”

अपने सार्वजनिक जीवन के लगभग चार दशकों में तिलक की शक्तियाँ विभिन्न गतिविधियों और कार्यों में प्रस्फुटित हुई। एक शिक्षाशास्त्री के रूप में उन्होंने पूना न्यू इंगलिश स्कूल, दक्षिण शिक्षा समाज (Deccan Education Society) तथा फरग्यूसन कॉलेज के व्यवस्थापक के रूप में ख्याति अर्जित की। अपने अथक परिश्रम से उन्होंने वस्तुतः महाराष्ट्र में एक शैक्षणिक क्रान्ति ही उत्पन्न कर दी। ओरियण्टल सोसायटी के लिए ज्योतिष शास्त्र के आधार पर वेदों की प्राचीनता सिद्ध करने वाले एक विद्वत्तापूर्ण निबन्ध के कारण देश-विदेश में उनकी ख्याति फैल गई।

लोकमान्य तिलक ने आर्थिक अन्याय के विरुद्ध लोहा लिया। 1896 के अकाल में लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जागरुक बनाने की दिशा में उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने स्वदेशी का जबरदस्त समर्थन किया और काँग्रेस के रंगमंच से आर्थिक मामलों से सम्बन्धित अपने महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखे, जैसे वित्तीय विकेन्द्रीकरण, स्थाई बन्दोबस्त आदि के प्रस्ताव ।

1889 में काँग्रेस में अपने प्रवेश के बाद से ही एक राजनीतिक नेता के रूप में काँग्रेस के कार्यकलापों में तिलक ने उल्लेखनीय भूमिका अदा की। उदारवादियों की नीतियों से असन्तुष्ट तिलक ने अपनी शक्ति महाराष्ट्र के राष्ट्रीय आन्दोलन को सुसंगठित करने में लगाई और भारतीय नवयुवकों में यह भाव भरने की चेष्टा की कि देश अपनी स्वतन्त्रता किसी की दया पर नहीं बल्कि अपनी सामर्थ्य के बल पर अर्जित करे। “अपने ‘केसरी’ तथा ‘मराठा’ नामक दो पत्र तथा शिवाजी और गणपति उत्सवों द्वारा उन्होंने जनता में देशभक्ति की भावना फूंक दी तथा उसमें अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करने की प्रवृत्ति उत्पन्न की।” 19 दिसम्बर, 1893 के ‘केसरी’ में तिलक ने स्पष्ट घोषणा की-“भारत में अंग्रेजी नौकरशाही से अनुनय-विनय करके हम कुछ भी नहीं था सकते। ऐसे प्रयत्न करते रहना तो पत्थर पर सिर टकराने के समान है।” 1897 में तिलक बम्बई विधान परिषद् के सदस्य चुने गए जहाँ उन्होंने बड़ी निडरता के साथ सरकारी रवैये की कटु आलोचना की। महाराष्ट्र में अकाल और पूना में प्लेग के समय जनता के कष्टों के प्रति सरकार के उपेक्षापूर्ण रवैये से क्षुब्ध होकर दो नवयुवकों ने पूना के प्लेग कमिश्नर रैंड तथा एक अन्य अंग्रेज अधिकारी की हत्या कर दी। तिलक का इस हत्या काण्ड से कोई सम्बन्ध नहीं था, किन्तु ब्रिटिश सरकार ने उन पर हिंसा और राजद्रोह भड़काने का आरोप लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 18 मास का कठोर कारावास का दण्ड दे दिया। तिलक की गिरफ्तारी न केवल महाराष्ट्र को वरन् सम्पूर्ण भारत को उग्र बना दिया और सरकार को यह अनुभव हो गया कि तिलक का जनता पर कितना प्रभाव है। तिलक की महानता इस बात में थी कि सरकार के प्रतिशोधपूर्ण और बर्बर रवैये के बावजूद उन्होंने कभी सार्वजनिक जीवन से मुख नहीं मोड़ा और न वे कभी निराशावाद से अभिभूत होकर बौद्धिक अन्तर्मुखी ही बने । प्राचीन युग के महान् ऋषियों की भाँति उन्होंने सब कुछ आवश्चर्यजनक अविचलता के साथ सहन कर लिया।

1905 में बंग-भंग के समय तिलक का राजनीतिक कार्यक्षेत्र महाराष्ट्र से बढ़कर सम्पूर्ण भारत हो गया। ‘केसरी’ के माध्यम से उन्होंने स्वदेशी बहिष्कार और स्वराज्य का सन्देश जन-जन तक पहुँचाया। लाल बाल पाल ने देश में वस्तुतः एक संगठित उग्रवादी और राष्ट्रवादी दल को राष्ट्रीय रंगमंच पर ला खड़ा किया। काँग्रेस के उदारवादी नेता तिलक के उग्र और यथार्थवादी विचारों से सहमत नहीं हो सके, फलस्वरूप काँग्रेस के नरम और गरम दल में मतभेद की खाई चौड़ी होती गई और अन्ततः 1907 में ‘सूरत की फूट’ सामने आई। बाद में 1915 तक, जब तक कि मुख्यतः एनीबीसेन्ट के प्रयासों से दोनों दलों में पुनः एकता स्थापित न हो गई, उग्रवादी काँग्रेस के बाहर ही रहकर कार्य करते रहे। 1908 में तिलक को राजद्रोह के मिथ्या आरोप में पुनः गिरफ्तार करके 6 वर्ष के कठोर कारावास का दण्ड देकर माण्डले जेल में भेज दिया गया जहाँ उन्होंने अपने दो विख्यात ग्रन्थ-रत्नों-‘गीता रहस्य’ और ‘दि आर्कटिक होम इन वेदाज’ की रचना की। ये दोनों ही ग्रन्थ लोकमान्य तिलक के विशाल ज्ञान, ऐतिहासिक शोध-गाम्भीर्य और विचारों की उत्कृष्टता के परिचायक हैं।

मृत्यु

1914 में कारावास से मुक्त होने पर तिलक पुनः राष्ट्रीय संगठन के कार्य में पिल गये। 1916 से 1920 तक उन्होंने होम रूल लीग का प्रचार करके काँग्रेस के कार्य को-देश के स्वाधीनता संग्राम को आगे बढ़ाया । एनीबेसेन्ट के प्रयत्नों से तिलक पुनः काँग्रेस में शामिल हो गये और अन्त तक इसी में रहे। 1918 में वे सर्व सम्मति से काँग्रेस के अध्यक्ष चुने गए, लेकिन शिरोल केस के सिलसिले में इंग्लैण्ड चले जाने से वे इस गौरवशाली पद को स्वीकार न कर सके। सितम्बर, 1920 में कलकत्ता-काँग्रेस के विशेष अधिवेशन में जब लोग तिलक के सभापति चुने जाने की आशा कर रहे थे तभी मृत्यु ने उन्हें आ घेरा। 21 जुलाई, 1920 बम्बई में आकस्मिक बीमारी से स्वाधीनता संग्राम के इस विकट योद्धा का स्वर्गवास हो गया। पर इस समय तक “तिलक सचमुच काँग्रेस का रूपान्तरण कर चुके थे और उसे एक सुदृढ़ नौकरशाही विरोधी मोर्चे में परिवर्तित कर चुके थे।”

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