बाल गंगाधर तिलक की तुलना अरविंद और गाँधी के साथ

तिलक और अरविन्द | तिलक और गांधी

तिलक और अरविन्द | तिलक और गांधी

तिलक और अरविंद

(Tilak and Aurobindo)

तिलक और अरविंद दोनों ही राष्ट्रीय आन्दोलन के अग्रणी नेता थे और उग्रवादी चिन्तन के पोषक थे। वास्तव में तिलक ही वह पहले व्यक्ति थे जिन्होंने अरविंद को भारतीय राजनीति में एक नवीन शक्ति के रूप में देखा। अरविंद के उन लेखों से वे बड़े प्रभावित हुए जिनमें उन्होंने काँग्रेस की याचना पद्धति और कोरे विरोध प्रदर्शन की नीति की खिल्ली उड़ाई। भारत में बंग-भंग के समय से राष्ट्रवाद की जो अभिनव लहर बही, उसमें तिलक और अरविद दो महान् व्यक्तियों के रूप में प्रकट हुए। तिलक ने महाराष्ट्र में तो अरविंद ने बंगाल में अपनी तूफानी क्षमताओं का परिचय दिया। तिलक ने ‘केसरी’ के माध्यम से तो अरविद ने ‘वन्दे मातरम्’ के द्वारा राष्ट्रवाद और देशभक्ति की भावनाओं को जगाया तथा नवयुवकों में एक नवीन स्फूर्ति पैदा की।

तिलक ने अरविंद के आध्यात्मिक और बौद्धिक उपहारों के पुनः प्रस्थापन की चेष्टा की। अरविंद ने तिलक को महान् विवेकी और महान् राष्ट्रवादी माना। इन दोनों ही सेनानियों ने उदारवादियों की कार्य-पद्धतियों को ‘भिक्षावृत्ति’ की संज्ञा दी और जनता को इस बात के लिए प्रेरित किया कि राजनीतिक अधिकारों तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति के लिए अपने ही प्रयत्नों पर निर्भर बनो। पर इन समानताओं के बावजूद दोनों नेताओं के चिंतन में एक अन्तर था। जहाँ अरविंद मन और मस्तिष्क से भावात्मक अधिक थे, वहाँ तिलक के विचारों में आध्यात्मिकता के साथ विचार और तर्क की प्रधानता थी। अरविंद कल्पना और भावात्मकता में अधिक डूबे हुए थे जबकि तिलक वास्तविकता और अस्तित्व पर विश्वास करने वाले थे। अरविद पर बंकिमचन्द्र की शिक्षाओं का अधिक प्रभाव था तो तिलक पर शिवाजी और नाना फड़नवीस की शिक्षाओं का। यह अन्तर दो प्रान्तों की परम्पराओं का भी अन्तर था । बंगाल की भानावातला अरविंद में साकार थी तो महाराष्ट्र की यथार्थता तिलक में। दोनों में एक और भी बड़ा अन्तर था। अरविंद देश की आजादी के लिए सशस्त्र क्रान्ति के साधन को उपयोगी मानते थे और उन्होंने गुप्त संगठनों के माध्यम से जनता को क्रान्ति के लिए तैयार करने का भी प्रयत्न किया। इसके विपरीत तिलक की दृष्टि में तत्कालीन परिस्थितियों में क्रान्ति अनुपयोगी थी, हालाँकि भविष्य में सशस्त्र क्रान्ति की सम्भावना से वे इन्कार भी नहीं करते थे। तिलक एक यथार्थवादी राजनीतिज्ञ थे जिनका विश्वास था कि भारत अभी उतना परिपक्व नहीं था कि वह क्रान्ति की पद्धति को अपनाता । इसलिए तिलक ने अपनी सम्पूर्ण जन-जागरण और जन-संगठन में केन्द्रित कर दी।

तिलक और अरविंद दोनों में राष्ट्र प्रेम की प्रबल ज्योति जल रही थी। हाँ, दोनों के मार्गों में कुछ भिन्नता थी। तिलक राष्ट्रीयता के मनोवैज्ञानिक पक्ष पर अधिक बल देते थे, जबकि अरविंद का आग्रह राष्ट्रीयता के धार्मिक और आध्यात्मिक पक्ष पर अधिक था। अरविंद भारत के आध्यात्मिक विकास में मानवता की मुक्ति के दर्शन करते थे जबकि तिलक की ललकार थी कि देश की स्वतन्त्रता और आजादी के लिए स्वराज्य आवश्यक है। इन अन्तरों के बावजूद दोनों ने ही निष्क्रिय प्रतिरोध को स्वीकार किया था और स्वदेशी तथा बहिष्कार को प्रभावी माना था। अरविंद ने निष्क्रिय प्रतिरोध में स्वदेशी और बहिष्कार के साथ अन्यायपूर्ण नियमों का विरोध भी सम्मिलित किया था।

विधाता ने अरविंद और तिलक को अन्ततोगत्वा अलग-अलग भूमिकाएँ अदा करने भेजा था। जहाँ तिलक मृत्युपर्यन्त सक्रिय रूप से राष्ट्रीय आदोलन में जूझते रहे वहाँ अरविंद की आध्यात्मिकता उन्हें राष्ट्रीय आन्दोलन से घसीट कर पाण्डिचेरी ले गई जहाँ योग दिया। उन्होंने आध्यात्मिकता में लीन रह कर राष्ट्रीयता के विकास में एक भिन्न रूप में अपना योग दिया।

तिलक और गाँधी

(Tilak and Gandhi)

एन० जी० जोग ने लिखा है कि “तिलक या गाँधी-किसी के भी सर पर किसी का सेहरा नहीं बँधा था । नेपोलियन की तरह, जिसने अपनी तलवार के बल पर राजमुकुट प्राप्त किया था, उन दोनों ने भी राष्ट्रीय नेतृत्व अपने प्रयास और प्रतिभा से ही प्राप्त किया था। अत: गाँधीजी और तिलक की राजनीतियों में साम्य और समन्वय दिखाने की कोशिश करना निरी बौद्धिक अटकलबाजी होगी, क्योंकि दोनों ने अपने अलग-अलग मार्गों का अनुसरण किया था।” इसके अतिरिक्त तिलक और गाँधीजी ने केवल लगभग साढ़े पाँच वर्ष तक ही साथ-साथ काम किया और इस अवधि में भी तेरह मास तक तिलक देश से बाहर इंग्लैण्ड में रहे। साढ़े चार वर्षों की अवधि में भी दोनों नेता कुछ अवसरों पर ही एक-दूसरे से मिले।

तिलक जन्म योद्धा थे और राजनीति में उनकी आस्था ‘जैसे को तैसा’ की नीति में थी। राजनीति में उनके आदर्श श्रीकृष्ण, कौटिल्य, शिवाजी और पेशवा जैसे थे। 28 जनवरी, 1920 को अपने एक पत्र में गाँधी जी को स्पष्ट लिखा था कि “राजनीति दुनियादार लोगों का खेल हैं न कि साधु-सन्तों का, अतः बुद्ध के इस उपदेश-क्रोध को प्यार से जीतो के स्थान पर श्रीकृष्ण के इस उपदेश पर आस्था रखता हूँ कि जो मुझे जिस रूप और जिस मात्रा में पूजते हैं, उसी रूप और उसी मात्रा में मैं उन्हें पुरस्कृत करता हूँ।” तिलक का राजनीति के प्रति बराबर ऐसा ही दृष्टिकोण रहा । वे ब्रिटिश शासन के कुटिल स्वभाव को भलीभाँति समझते थे और ब्रिटिश न्यायप्रियता में उनका कोई विश्वास नहीं था। अतः उनका सन्देश था कि भारतीयों को स्वराज्य पाने के लिए ब्रिटिश शासकों से डट कर संघर्ष करना है। उनका मत था कि यदि हमारे आदर्श और साध्य श्रेष्ठ हैं तो उन्हें प्राप्त करने के लिए हमें स्वेच्छानुसार साधनों का प्रयोग करना चाहिए। फिर भी यह अवश्य है कि तिलक ने हिंसा और सशस्त्र क्रान्ति को कभी प्रोत्साहन नहीं दिया।

तिलक के विपरीत महात्मा गाँधी स्वभाव से राजनीतिज्ञ नहीं बल्कि धार्मिक पुरुष थे। उनकी मान्यता थी कि धर्म को राजनीति से पृथक् नहीं किया जा सकता । यद्यपि प्रारम्भ में ब्रिटिश न्यायप्रियता में विश्वास करने वाले गाँधीजी को भी आगे चलकर विश्वास हो गया कि अंग्रेजों से भारतीयों को स्वराज्य दान के रूप में नहीं मिल सकता और उसे पाने के लिए संघर्ष करना होगा, तथापि तिलक के विपरीत गाँधीजी की मान्यता थी कि श्रेष्ठ साध्य की प्राप्ति के लिए श्रेष्ठ साधनों का ही प्रयोग होना चाहिए। गाँधीजी साध्य और साधन की अभिन्नता में विश्वास करते थे और तिलक के इस विचार से सहमत नहीं थे कि यदि हमारे आदर्श श्रेष्ठ हैं तो उन्हें पाने के लिए हम स्वेच्छानुसार साधनों का प्रयोग कर सकते हैं। गाँधीजी की दृष्टि में सत्य का साधन देश-भक्ति से ऊपर था जबकि तिलक देशभक्ति के लिए सत्य का बलिदान कर सकते थे। इसका आशय यह नहीं है कि गाँधीजी देश-भक्त नहीं थे वरन् इसका अर्थ यह है कि गाँधीजी की देश-भक्ति सत्य पर आधारित थी और सत्य तथा अहिंसा के आधार पर ही वे स्वाधीनता संग्राम चलाना चाहते थे।

तिलक के मन में सत्याग्रह की जो रूपरेखा थी वह विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक अब के रूप में ही थी। लेकिन गाँधीजी ने जिस सत्याग्रह की खोज की और जिसका उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में प्रयोग परीक्षण किया था, वह अपेक्षाकृत अधिक महत्व का था। इसी प्रकार हालाँकि गोखले ने ही सर्वप्रथम ‘राजनीति के आध्यात्मीकरण’ की बात की थी, लेकिन गाँधीजी ही ऐसे पहले व्यक्ति तो जिन्होंने उसे असली जामा पहिनाया। यह भी ध्यान रहना आवश्यक है कि तिलक को सत्याग्रह की व्यावहारिक उपयोगिता पर सन्देह या। उन्होंने आध्यात्मिक दृष्टि से उसकी सराहना भले ही की हो लेकिन एक राजनीतिज्ञ के नाते उन्होंने इसे कभी भी अंगीकार नहीं किया। मूलतः उनके लिए राजनीति एक प्रकार का युद्ध थी, ठीक उसी तरह, जैसे कलाज विट्ज के लिए युद्ध राजनीति कासकता । उपलब्ध साधनों के आधार पर ही युद्ध नीति निर्धारित करनी चाहिए और बदली विस्तार था। अत: उनका विश्वास था कि कोई भी युद्ध निश्चित ठिकानों से नहीं लड़ा जा हुई स्थिति के अनुसार ही अपनी व्यूह रचना करनी चाहिए। यदि युद्ध जीतना है, तो आगे बढ़ने के लिए कभी पीछे भी हट जाना चाहिए। गाँधीजी का राजनीति के ऐसे भौतिकवादी और व्यावहारिक दृष्टिकोण से मौलिक मतभेद था। उनकी राजनीति उनके धर्म के अनुरूप थी-“आपको यह समझ लेना चाहिए कि मैं राजनीति को अपने जीवन की गहनतम वस्तुओं से, जो सत्य और अहिंसा से अभिन्न रूप में जुड़ी हुई है, अलग नहीं कर सकता।” “इसी तरह उनकी देश-भक्ति भी मानवता के साथ एकाकार थी।”

भारतीय संस्कृति के प्रति तिलक और गाँधी दोनों ही में अगाध श्रद्धा थी, लेकिन जहाँ तिलक कठोर हिन्दू थे और उनका हिन्दू धर्म आक्रामक हिन्दू धर्म था वहाँ गाँधीजी सर्व धर्म समन्वय में विश्वास करते थे और धार्मिक विश्वासों में उन्हें पुराण-प्रियता कतई पसन्द न थी। इसी प्रकार, गाँधीजी मनसा-वाचा कर्मणा अहिंसा में विश्वास करते थे जबकि तिलक अहिंसा के शस्त्र को निरंकुश और अविचिलित रूप में नहीं करते थे और यह मानते थे कि यदि एक व्यक्ति की राय सत्य है तो बहुमत की राय की अपेक्षा उसे अधिक महत्व देना चाहिए।

स्पष्ट है कि तिलक और गाँधी में बहुत भिन्नता थी। पर इसमें सन्देह नहीं कि कुछ बातों में तिलक के विचारों और कार्यों को गाँधीजी ने आगे बढ़ाया। तिलक ने गाँधीजी से वर्षों पूर्व ही स्वदेशी बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा जैसे कार्यक्रमों को देश के सामने रख दिया था और महात्मा गाँधी ने अपने ढंग से तिलक के कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। तिलक ने राष्ट्रीय आन्दोलन को मध्यम वर्ग तक फैलाया और उसके क्षेत्र को अत्यधिक विस्तृत कर दिया। गाँधीजी ने तिलक के काम को आगे बढ़ाया और राष्ट्रीय आन्दोलन को एक जबर्दस्त जन-आन्दोलन में बदल दिया। यह भारत का दुर्भाग्य था कि जब महात्मा गाँधी ने राष्ट्रीय आन्दोलन में सक्रिय रूप से प्रवेश किया तभी तिलक का स्वर्गवास हो गया।

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