एम एन राय का मौलिक लोकतन्त्र, राष्ट्रवाद और आर्थिक विचार

एम एन राय 

मानवेन्द्र नाथ राय और मौलिक लोकतन्त्र

(M. N. Roy and Radical Democracy)

राय पूँजीवादी लोकतन्त्र और साम्यवाद दोनों ही के विरुद्ध थे, क्योंकि इन दोनों के द्वारा व्यक्ति की स्वतन्त्रता का ह्रास होता है। राय का कहना था कि वर्तमान सामाजिक ढाँचा ही ऐसा है जिसमें व्यक्ति अपने जन्मसिद्ध अधिकार अर्थात् स्वतन्त्रता का समुचित उपभोग नहीं कर पाता। राज्य भी एक ऐसा संगठन है जिसने एक बाध्यकारक संस्था का रूप ग्रहण कर लिया है। राज्य का निर्माण स्वतन्त्र और शान्तिपूर्ण जीवन के लिए मनुष्यों के सहकारी प्रयास द्वारा हुआ है, यह शक्ति पर नहीं बल्कि व्यक्ति की नैतिक भावना पर आधारित है, अतः आवश्यक है कि यह एक बाध्यकारक संस्था के रूप में न रहे अपितु ऐसे वातावरण की सृष्टि में सहायक हो जिसमें मनुष्य मानसिक रूप से स्वयं को स्वतन्त्र अनुभव करते हुए स्वतन्त्रता का निर्माण करने में प्रयत्नशील रहे।

राय ने 19वीं शताब्दी के उदारवादी लोकतन्त्र को एक ऐसा औपचारिक लोकतन्त्र माना जिसके अन्तर्गत अधिकाँश लोगों की स्थिति निर्जीव अणुओं के समान होती है, जन-साधारण का सार्वजनिक मामलों के प्रशासन में कोई भाग नहीं होता, प्रशासनिक शक्तियाँ चोटी के कुछ मुट्ठी भर नेताओं के हाथ में केन्द्रित होती हैं और वे अपने-अपने दलों के हित-साधन में लगे रहते हैं। जहाँ विश्व के बहुसंख्यक राजनेता और विद्वान राजनीतिक दलों को लोकतन्त्र की अनिवार्यता मानते हैं वहाँ राय ने सच्चे लोकतन्त्र की स्थापना के लिए राजनीतिक दलों की कार्यपद्धति को ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि यदि नैतिक उत्थान करना है तो वर्तमान दल-पद्धति को समाप्त करना ही होगा। विश्व के नैतिक पतन का एक मूल कारण यह वर्तमान दाल-पद्धति ही है। राजनीतिक दल अपने चुनाव अभियानों द्वारा जन साधारण को वास्तविक राजनीतिक शिक्षा नहीं देते, अपितु राजनीतिक चालबाजियाँ और कुशिक्षा सिखाते हैं। इन दलों से जन-साधारण में विवेक जाग्रत नहीं होता बल्कि उनकी उच्छृखल भावनाएँ उमड़ती हैं। ये दल जनता को उकसा कर इस प्रकार का वातावरण पैदा करते हैं जिसमें राजनीतिक-आर्थिक-सामाजिक समस्याओं पर विवेकपूर्ण विचार सम्भव नहीं होता। राजनीतिक दलों का उद्देश्य केवल शासन-सत्ता के लिए छीना झपटी करना है, उन्हें जनता के वास्तविक हितों की कोई परवाह नहीं होती। अपनी हित-पूर्ति के लिए नैतिकता और न्याय की बलि चढ़ा दी जाती है। राय ने कहा कि सच्चे लोकतन्त्रवाद की रक्षा करनी है तो उसे दल रहित बनाना होगा अर्थात् एक ‘दल विहीन लोकतन्त्र‘ (Party-less Democracy) की स्थापना करनी होगी और सार्वजनिक मामलों में प्रशासन में जन साधारण को अधिकाधिक भाग लेना होगा। राय ने अपने इस प्रकार के लोकतन्त्र का नाम ‘संगठित लोकतन्त्र’ (Organised Democracy) रखा।

बिनोबा, जयप्रकाश नारायण आदि सर्वोदयी विचारक भी राजनीति को समाज के रोगों का मूल कारण मानते हुए उसके स्थान पर लोक नीति को प्रतिष्ठित करना चाहते हैं और सभी राजनीतिक आर्थिक शक्तियों का विकेन्द्रीकरण करना चाहते हैं तथा गाँवों को स्वशासी और आत्म-निर्भर इकाइयाँ बनाना चाहते हैं। मौलिक मानववादियों की व्यवस्था का चित्र भी बहुत कुछ ऐसा ही है। मुख्य अन्तर यही है कि वे स्वायत्त शासन ग्राम गणराज्यों के स्थान पर ‘जन समितियों’ (Peoples Committees) को प्रतिछित करना चाहते हैं। राय की मान्यता थी कि जन समितियों अथवा स्थानीय व्यक्तियों की समितियों के विकास से दल-विहीन यथार्थ लोकतन्त्र (संगठित लोकतन्त्र) की स्थापना का मार्ग प्रशस्त होगा। जन-समितियों के माध्यम से सार्वजनिक मामलों के प्रबन्ध में जन-साधारण को अधिकाधिक भाग मिल सकेगा। उन्होंने आग्रह किया कि हमें अपने मस्तिष्क से यह धारणा निकाल फेंकनी चाहिए कि राजनीति का एकमात्र रूप ‘सत्ता-प्रधान राजनीति’ है।

राय ने अपनी योजना की रूपरेखा भी प्रस्तुत की। तदनुसार, हमें अपने को कुछ समूहों में संगठित कर लेना चाहिए। इन समूहों का उद्देश्य किसी दल विशेष के लिए वोट की माँग करना नहीं अपितु जन साधारण को इस रूप में शिक्षित करना होना चाहिए कि उनमें स्वयं सोचने और निर्णय करने की शक्ति का विकास हो सके। राय ने कहा कि शिक्षा के प्रसार से एक श्रेष्ठ और नैतिक वातावरण विकसित हो जाएगा जिसमें लोग स्व-प्रेरणा से अपनी जनसमितियों का निर्माण करेंगे जिन पर कि स्थानीय मामलों के प्रबन्ध का अधिकाधिक भार डाला जा सकेगा। ये जन-समितियाँ विभिन्न क्षेत्रों में उच्चतर स्तरों पर समितियों का निर्माण करेंगी और उन पर आवश्यक अंकुश भी रखेंगी। इस प्रकार सच्चे राजनीतिक विकेन्द्रीकरण का उदय होगा जिससे राज्य व्यक्ति और समाज के सम्पूर्ण जीवन पर छाया नहीं रहेगा वरन् उसका मुख्य कार्य देश के सामाजिक जीवन में सामंजस्य स्थापित करना ही रह जाएगा। निर्वाचन के समय जन-समितियाँ उम्मीदवार को दलीय आधार पर नहीं बल्कि उसके गुणों के आधार पर मत देंगी। फलस्वरूप विधान-मण्डल अथवा स्थानीय निकायों में सर्वोत्तम उम्मीदवार ही प्रवेश पा सकेंगे। राय ने आर्थिक क्षेत्र में भी विकेन्द्रीकरण का विचार प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि लोकतान्त्रिक समाज को आर्थिक समाज के खतरों से बचाए रखना होगा। यदि जन-शक्ति आर्थिक समस्याओं के निदान में ही लगी रही तो लोकतन्त्र के उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकेगी। एक सुखी, शान्तिपूर्ण और श्रेष्ठ संस्कृतिमय समाज का अस्तित्व तभी सम्भव है जब उसके सदस्य मौलिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए परेशान न रहें और राष्ट्रीय उत्पादन तथा उसके वितरण की समुचित व्यवस्था हो। यदि समाज में धन का विषम वितरण होगा, धनिकों और निर्धनों के बीच की खाई काफी चौड़ी होगा तो हम एक स्वस्थ लोकतन्त्र की बात नहीं कर सकते। इस विषमता को समाप्त करने के लिए नियोजित अर्थव्यवस्था का मार्ग अपनाना होगा। यह नियेजित अर्थव्यवस्था रूसी या अमेरिकी पद्धति पर नहीं होगी अपितु सच्चे अर्थ में लोकतन्त्रात्मक होगी जिसका उद्देश्य व्यक्तिगत लाभ के स्थान पर सामाजिक कल्याण को प्रतिछित करना होगा। इस नियोजित अर्थव्यवस्था के माध्यम से धन के विषम वितरण को समाप्त किया जाएगा। सामाजिक अतिरिक्त धन का प्रयोग जन-कल्याणकारी और समाजोपयोगी सेवाओं पर किया जाएगा। यह भी आवश्यक है कि सच्चे लोकतन्त्र में उत्पादन सहकारिता के आधार पर किया जाए। सामाजिक धन के उत्पादन, वितरण, विनिमय आदि सभी क्षेत्रों में विभिन्न सहकारी संस्थाएँ अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी। राजनीतिक और आर्थिक दोनों क्षेत्रों में वास्तविक विकेन्द्रीकरण होने पर ही सच्चा लोकतन्त्र अस्तित्व में आ सकेगा।

एम एन राय और राष्ट्रवाद

(ROY AND NATIONALISM)

मानवेन्द्र नाथ राय प्रारम्भ में मार्क्सवादी रहे और बाद में मौलिकतावादी । ये दोनों ही विचारधाराएँ राष्ट्रवाद से मेल नहीं खातीं, अतः स्वाभाविक है कि राय ने राष्ट्रवाद को एक प्रतिक्रियावादी प्रवृत्ति बताते हुए प्रत्येक समाज और प्रत्येक देश को इससे बचने का संदेश दिया। द्वितीय महायुद्ध में ब्रिटिश सत्ता के साथ काँग्रेस के सहयोग की नीति से राय को बड़ा कष्ट पहुँचा । उनकी धारणा थी कि धुरी शक्तियाँ फासीवाद अथवा अधिनायक तन्त्र की स्थापना के लिए लड़ रही हैं जबकि मित्र-राष्ट्र लोकतन्त्र की रक्षा के लिए युद्धरत हैं, अतः भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस को मित्र-राष्ट्रों की हर प्रकार से सहायता करनी चाहिए। राष्ट्रीय हित और गौरव की आड़ लेकर ब्रिटिश सरकार से सौदेबाजी न करके फाँसीवाद का अन्त करने के लिए काँग्रेस को ब्रिटिश सरकार को पूरी सहायता देनी चाहिए। जब काँग्रेस ने इन बातों की कोई परवाह न की और गाँधी के नेतृत्व में ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ चलाया तो मानवेन्द्र नाथ की निराशा का कोई ठिकाना न रहा। उन्होंने काँग्रेस को ‘फासिस्ट संगठन (Fascist Organisation) तक कह दिया और ब्रिटिश सरकार से अपील की कि ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ को निर्ममतापूर्वक कुचल दिया जाए। राय का यह व्यवहार निःसन्देह देशद्रोहपूर्ण, अराष्ट्रीय और निन्दनीय था। वे इस बात को भूल गए कि ब्रिटिश सत्ता अनेक दशाब्दियों से भारतीयों को स्वशासन देने अथवा उत्तरदायी शासन की स्थापना करने के बारे में कैसे झूठे आश्वासन देती आ रही थी और अंग्रेजों ने देश के स्वाधीनता आन्दोलन को दबाने के लिए लोगों पर कितने अत्याचार किए थे। ब्रिटिश साम्राज्यवाद की हिमायत करके और राष्ट्रवादियों को कुचलने की अपील कराय ने अपने उज्ज्वल पक्ष पर कभी न मिटने वाला एक काला धब्बा लगा दिया।

एम एन राय के आर्थिक विचार

(ROY’S ECONOMIC IDEAS)

राय ने आर्थिक शोषण के प्रत्येक रूप का विरोध किया। उन्होंने कहा। मनुष्य अपनी भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति की परेशानियों से मुक्त रहने पर ही अपना स्वतन्त्र बौद्धिक एवं सर्वांगीण विकास कर सकता है। आर्थिक सुरक्षा मिलने पर ही व्यक्ति वास्तविक स्वतन्त्रता का उपभोग कर सकता है। अतः आवश्यक है कि तमुचित आर्थिक नियोजन का मार्ग अपनाया जाए, औद्योगीकरण द्वारा भौतिक समृद्धि प्राप्त की जाए, आन्तरिक व्यापार बढ़ाया जाए। राय ने विदेशी व्यापार-अभिवृद्धि पर अधिक जोर नहीं दिया, क्योंकि उनका विचार था कि विदेशी व्यापार हर समय साथ नहीं देता और कभी भी कोई भी देश अन्तर्राष्ट्रीय जगत में बढ़ती हुई व्यापारिक प्रतिस्पर्धा का शिकार हो सकता है। राय ने नियोजन के रूप को सामान्य ठहराया कि जिसमें स्वस्थ लोकतान्त्रिक प्रक्रिया का समावेश न हो। नियोजन की समाजवादी पद्धति उन्हें इसलिए रुचिकर थी कि इसमें नियोजन कएक सशक्त राजनीतिक यंत्र के माध्यम से किया जाता है और सामाजिक प्रगति के नाम पर व्यक्तिगत स्वतन्त्रता की बलि चढ़ा दी जाती है। उन्होंने पूँजीवादी व्यवस्था को इसलिए पसन्द नहीं किया क्योंकि यह व्यवस्था अधिकाधिक लाभ-अर्जन करने के सिद्धान्त पर आधारित है जिसमें निर्धनों का शोषण होता है।

राय ने जनता की क्रय-शक्ति बढ़ाने की वकालत की। इसके लिए नए-नए उद्योगों की स्थापना को आवश्यक बताया ताकि अधिकाधिक संख्या में लोगों को रोजगार मिल सके, कृषि भूमि पर दबाव कम सके और किसानों की स्थिति में स्थानीय सुधार हो सके। किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए राय ने भूमि के समुचित वितरण पर काफी बल दिया। उन्होंने अधिकाधिक सार्वजनिक निर्माण कार्य कराने का पक्ष लिया ताकि जनता को आय के साधन उपलब्ध हों। राय ने प्रचलित आर्थिक सिद्धान्तों को अनुचित ठहराया क्योंकि ये सिद्धान्त व्यक्ति को एक स्वार्थी प्राणी मानते हुए चलते हैं। राय ने कहा कि मानव तो स्वभाव से ही एक सहयोगी प्राणी है और उसके सहयोगी रूप का विकास करके ही स्वस्थ और आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न समाज का निर्माण किया जा सकता है। राय ने उत्पादन-साधनों का नियन्त्रण जनता में निहित करना उचित समझा। उन्होंने व्यक्तिगत सम्पत्ति का विरोध नहीं किया बशर्ते कि इसके द्वारा सामाजिक शोषण न किया जाए। सम्पत्ति का राष्ट्रीयकरण भी उन्हें रुचिकर न था क्योंकि इससे एक सर्वाधिकारी राज्य की स्थापना को बल मिला है। राय ने, वास्तव में, निजी सम्पत्ति की मान्यता के साथ-साथ सम्पत्ति के सहकारी स्वामित्व पर बल दिया और आर्थिक नियोजन को ऐच्छिक सहकारिता पर आधारित किया। उन्होंने आर्थिक विकेन्द्रीकरण की नीति का पक्ष लिया। राय की दृष्टि में यह उचित था कि राज्य अपना नियन्त्रण केल्ल विद्युत उत्पादन, कोयला, इस्पात, यातायात आदि विभागों तक ही सीमित रखे । राजय शिक्षा को राज्य के नियन्त्रण से मुक्त रखने के पक्ष में थे। इस क्षेत्र में राज्य का कार्य केवल विभिन्न शिक्षा संस्थाओं में समन्वय करने का ही रहे-ऐसा विचार राय का था। राय ने राज्य को कानून सुरक्षा आदि के अधिकार देकर शेष व्यवस्था मानव-सहकारिता पर छोड़ देने का समर्थन किया।

देश की आर्थिक स्थिति को सुधारने की दृष्टि से राय ने औद्योगिकीकरण के साथ ही कृषि के विकास को अत्यधिक महत्व दिया, लेकिन उन्होंने कृषि के यंत्रीकरण का समर्थन नहीं किया। उनका विचार था कि यदि का यंत्रीकरण किया गया तो ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी फैलेगी। राय उर्वरक बनाने के विशालकाय कारखानों के पक्ष में नहीं थे। उनका कहना था कि इन कारखानों पर विपुल व्यय लगाने के स्थान पर उचित यही है कि गोबर की खाद काम में लाई जाए जो कि ग्रामीणों को सुगमता से प्राप्त हो सकती है। ग्रामीण क्षेत्र में ईंधन के लिए गोबर की जगह यदि कोयला काम में लाया जाए तो गोबर खाद पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हो सकेगा। राय ने बड़ी सिंचाई योजनाओं के स्थान पर छोटी सिंचाई योजनाओं को स्थान दिया। उन्होंने सहकारी आधार पर गाँवों में ट्यूबवेल लगाने का पक्ष लिया। सहकारी ऋण व्यवस्था, सहकारी क्रय-विक्रय समितियाँ, सहकारी खेती, सहकारी फार्म आदि की स्थापना और विकास भी राय के आर्थिक चिन्तन के मुख्य मुद्दे थे। उन्होंने जोत की सीमा निर्धारित करने का भी समर्थन किया।

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