कौटिल्य की न्यायिक-व्यवस्था तथा कानून

न्यायिक-व्यवस्था 

कौटिल्य की न्यायिक-व्यवस्था 

(JUDICIAL SYSTEM)

कौटिल्य समुचित न्याय प्रणाली को राज्य का प्राण समझता है और उसका विचार है कि जो राज्य अपनी प्रजा को न्याय प्रदान नहीं कर सकता, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। उसके अनुसार राज्य का उद्देश्य प्रजा के जीवन तथा सम्पत्ति की रक्षा करना तथा असामाजिक तत्वों एवं अव्यवस्था उत्पन्न करने वाले व्यक्तियों को दण्डित करना है।

दो प्रकार के न्यायालय

कौटिल्य अपने ‘अर्थशास्त्र‘ में दो प्रकार के न्यायालयों का उल्लेख करता है। धर्मस्थलीय तथा कण्टकशोधन, जिन्हें वर्तमान समय के दीवानी तथा फौजदारी न्यायालयों का लगभग पर्यायवाची कहा जा सकता है। धर्मस्थलीय का अभिप्राय नागरिकों के पारस्परिक व्यवहारों में उत्पन्न होने वाले विवादों का निर्णय करने से है। इस श्रेणी के विवादों को कौटिल्य ने व्यवहार की संज्ञा दी है और इसके अन्तर्गत सम्पत्ति, संविदा, उत्तराधिकार, विवाह, गाँवों का बन्दोबस्त, ऋण, धरोहर, मजदूरी और साझेदारी आदि वर्तमान समय के दीवानी विवाद और मारपीट, बलात्कार, डाका और जुआ आदि वर्तमान समय के फौजदारी विवाद आते हैं।

दूसरे प्रकार के न्यायालयों को कौटिल्य ने कण्टकशोधन का नाम दिया है अर्थात् वे न्यायालय जिनका उद्देश्य राजा अथवा राज्य में कण्टकों अर्थात् शत्रुओं को दूर करना हो। इनका कार्य राजा अथवा राज्य के विरुद्ध किये जाने वाले सभी अपराधों पर विचार करना। कण्टकशोधन न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में प्रमुख रूप से ये विवाद रखे गये हैं- प्रजा के दिन-प्रतिदिन के सम्पर्क में आने वाले धोबी, जुलाहे, रंगरेज, सुनार, वैद्य, नट-नर्तक आदि द्वारा किये गये प्रजा के शोषण तथा धनहरण से सम्बन्धित विवाद, दुष्टजनों द्वारा किये गये प्रजा पीड़न के कार्य और राज कर्मचारियों द्वारा किये जाने वाले प्रजा पीड़न के कार्य आदि । कौटिल्य ने इन सभी अपराधों को कण्टक की श्रेणी में रखा है और यह व्यवस्था दी है कि ऐसे अपराधियों का पता लगाने के लिए राजा के द्वारा गुप्तचरों और पुलिस की व्यवस्था की जानी चाहिए और न्यायालयों द्वारा इन्हें दण्डित किया जाना चाहिए।

न्यायिक संगठन और प्रक्रिया

कौटिल्य ने न्यायिक संगठन का भी विधिवत् विवेचन किया है और उसके द्वारा वर्णित न्यायिक संगठन प्रशासिनक विकेन्द्रीकरण का सूचक है। 10 ग्रामों के समूह के लिए संग्रहण, 400 ग्रामों के बीच द्रोणमुख, 800 ग्रामों के मध्य स्थानीय एवं समूचे जनपद के लिए सर्वोच्च न्यायालय की व्यवस्था की गयी है। ग्रामों के लिए पंचायती न्यायालयों का सुझाव दिया गया है, जिनमें वृद्ध ग्रामीण और सामन्त मिलकर ग्रामीणों के बीच उत्पन्न होने वाले छोटे-छोटे विवादों का निर्णय कर सकते हैं। उसने व्यवहार विवादों की मध्यस्थता द्वारा निबटाने की सलाह दी है और प्रशासनिक कर्मचारियों के मध्य उत्पन्न होने वाले विवादों का निर्णय विभागाध्यक्षों की अध्यक्षता में विभागीय प्रशासनिक न्यायालयों द्वारा किये जाने का सुझाव दिया है। राजा कौटिल्य के समस्त न्यायिक संगठन का सर्वोच्च पदाधिकारी है और वही विभिन्न स्तरों के न्यायाधीशों की नियुक्ति करता है। कौटिल्य एक ही न्यायाधीश वाले न्यायालयों को उचित नहीं मानता क्योंकि उसके न्यायाधीशों के द्वारा मनमानी की जा सकती है। उसके विचार से उच्चतर न्यायालयों में 3 धर्मस्थ (न्यायाधीश) तथा 3 अमात्य होने चाहिए, जो एक-साथ बैठकर विवादों को सुनें और निर्णय दें।

न्यायिक प्रक्रिया में उसके द्वारा वादी तथा प्रतिवादी के वक्तव्य, साक्षी और गुप्तचर व्यवस्था को अपनाने का सुझाव दिया गया है। उसका कथन है कि वादी तथा प्रतिवादी के वक्तव्य लिखे जाने चाहिए। तथ्यों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए लिखित प्रमाणों को सर्वाधिक महत्व दिया जाना चाहिए और उसके अभाव में साक्षी को प्रामाणिक माना जाना चाहिए। साक्षी एक से अधिक होने चाहिए और तथ्यों का ज्ञान प्राप्त करने में न्यायाधीशों द्वारा गुप्तचरों का भी उपयोग किया जाना चाहिए।

कौटिल्य ने न्यायाधीशों के द्वारा अधिकाधिक निष्पक्षता अपनाये जाने पर बल दिया है और कहा है कि न्यायाधीशों द्वारा वादी या प्रतिवादी को सहायता पहुँचाकर न्यायिक कार्यवाही को गलत दिशा देने का कोई प्रयत्न नहीं किया जाना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही उसका विचार है कि न्याय प्रदान करने में व्यवस्था, लिंग तथा वर्णगत आधार पर भेदभाव किया जा सकता है।

कौटिल्य ने न्यायाधीश के आचरण की निगरानी रखने पर भी बल दिया है और यह कार्य गुप्तचर विभाग को सौंपा है। कौटिल्य का विचार है कि जो न्यायाधीश न्यायिक प्रक्रिया के नियमों के विरुद्ध आचरण करे, उन्हें दण्डित किया जाना चाहिए।

कानून

(Law)

कानून के सम्बन्ध में भी कौटिल्य ने निश्चित धारणाएँ व्यक्त की हैं। उसके मतानुसार राज्य के कानून के चार मूल स्रोत हैं-

  1. धर्म अथवा धर्मशास्त्र
  2. व्यवहार
  3. प्रजा और
  4. न्याय

कानून के स्रोत की सापेक्षिक प्रधानता के विषय में वह कहता है कि यदि धर्म-कानून तथा व्यावहारिक-कानून या प्रथा में संघर्ष हो तो राजा को धार्मिक कानून के अनुसार विवाद का निर्णय करना चाहिए। यदि धर्म-कानून तथा न्याय में विरोध हो तो न्याय को मान्यता दी जानी चाहिए। कानून के इन स्रोतों के अतिरिक्त कौटिल्य राजा के आदेश को भी कानून के स्रोत के रूप में स्वीकार करता है। वह राजा को कुप्रथाओं के उन्मूलन का अधिकार देता है और प्रशासनिक व्यवस्था के संचालन हेतु राजा को विभिन्न प्रकार के आदेश जारी करने का सुझाव देता है।

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