गाँधीजी के सामाजिक विचार

गाँधीजी के सामाजिक विचार

गाँधीजी के सामाजिक विचार

(Social Ideas of Mahatma Gandhi)

राजनीतिक और आर्थिक विचारों के साथ-साथ समाज सुधार के क्षेत्र में गाँधीजी के विचार और कार्य बहुत महत्वपूर्ण हैं। गाँधीजी ने स्वराज्य आन्दोलन के साथ-साथ सामाजिक जीवन के लिए रचनात्मक कार्यक्रम को अपनाया। उनके प्रमुख सामाजिक विचार इस प्रकार हैं-

  1. वर्णव्यवस्था या वर्णधर्म का सिद्धान्त

    यह गाँधीजी के अहिंसक समाज के संगठन का एक प्रमुख मौलिक सिद्धान्त हैं। वर्ण-व्यवस्था का अभिप्राय सामान्य रूप से यह लिया जाता है कि समाज का संगठन ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र नामक चार वर्णों के आधार पर होना चाहिए। किन्तु गाँधीजी ने इस प्राचीन शब्द का प्रयोग करते हुए भी उसमें कुछ नवीन भावों को भरने का प्रयल किया है। उनके अनुसार, “वर्ण का अर्थ इतना ही है कि हम सब अपने वंश और परम्परागत काम को केवल जीविका के लिए ही करें, बशर्ते कि वह नैतिकता के मूल सिद्धान्तों के विरुद्ध न हो।” इसकी व्याख्या करते हुए वे कहते हैं कि, “मेरा विश्वास है कि मनुष्य इस जगत में कुछ स्वाभाविक योग्यताएँ लेकर पैदा होता है। इन्हीं के आधार पर वर्ण का सिद्धान्त बनाया गया है। इसके अनुसार सबको काम करना चाहिए। इससे अनावश्यक प्रतियोगिता समाप्त हो जाती है।

गाँधीजी की वर्ण व्यवस्था के सिद्धान्त का सार निम्न तीन बातों में निहित है-

  1. पहली बात वंश परम्परागत संस्कारों से लाभ उठाना है। प्रत्येक व्यक्ति अपने परम्परागत पेशे की कुछ स्वाभाविक योग्यताएँ लेकर उत्पन्न होता है और बचपन में इस पेशे के वातावरण में रहते हुए इसे जल्दी से ग्रहण करता है और शीघ्र ही इसमें दक्ष हो जाता है। यह व्यवस्था समाज के लिए हितकर है।
  2. दूसरी बात इस कारण होड़ या प्रतियोगिता का समाप्त होना है। आजकल समाज में बड़ी अव्यवस्था और अराजकता है। प्रत्येक व्यक्ति उसी पेशे की ओर जाना चाहता है, जिसमें अधिक पैसा मिलने की आशा हो, भले ही उसके लिए आवश्यक योग्यता उसमें न हो। उदाहरणार्थ, सभी लोग आर्थिक लाभ की दृष्टि से वकील, डाक्टर या इंजीनियर बनना चाहते हैं, इस कारण बेकारी में वृद्धि होती है। यदि पैतृक पेशों को ही करने का नियम कठोरता से लागू कर दिया जाय तो यह बन्द हो सकती है। सभी पेशे इस दृष्टि से समान हैं कि वे समाज के लिए आवश्यक हैं, उनमें किसी प्रकार की ऊँच-नीच का भाव नहीं है।
  3. तीसरी बात, मजदूरी की या पारिश्रमिक की समानता है। गाँधीजी का यह विचार है कि समाज को लाभ पहुँचाने की दृष्टि से सब पेशे बराबर हैं। अतः इनके पारिश्रमिक में कोई भेदभाव या विषमता नहीं होनी चाहिए। इस समय एक डाक्टर या वकील को नाई या भंगी की अपेक्षा अधिक पैसा दिया जाता है। यह व्यवस्था समाज में अनावश्यक विषमता को उत्पन्न करती है। सामाजिक दृष्टि से सभी को समाज पारिश्रमिक या वेतन दिया जाना चाहिए। इससे डाक्टरी और वकालत जैसे पेशों के लिए होने वाली होड़ समाप्त हो जायेगी।

इस सिद्धान्त की इस दृष्टि से कड़ी आलोचना की जाती है कि यह जात-पाँत के दुष्परिणामों को स्थायी बनाकर समाज में नीच समझी जाने वाली जातियों को ऊँचा उठाने तथा उन्नति करने के अवसरों से वंचित करता है, क्योंकि इसके अनुसार भंगी तथा नाई के लड़कों को सदैव अपने पिता के ही पेशे करने चाहिए किन्तु गाँधीजी के मतानुसार यह आलोचना कई कारणों से सही नहीं है, जैसे-

  1. वे नाई व भंगी के प्रतिभा सम्पन्न लड़कों द्वारा अन्य पेशे किये जाने में दोष नहीं समझते हैं, बशर्ते कि वे यह पेशा आर्थिक लाभ की दृष्टि से नहीं अपितु समाज की सेवा के उद्देश्य से करें।
  2. गाँधीजी अपने वर्ण धर्म की धारणा में ऊँच-नीच की कल्पना को कोई स्थान नहीं देते हैं। गाँधीजी कहते हैं कि “मेरी समझ मे कोई मनुष्य न तो जन्म से और न कर्म से ही बड़ा बन जाता है। मेरा विश्वास है कि जन्म के समय सभी मनुष्य बराबर होते हैं मेरी राय में दूसरे किसी मनुष्य से श्रेष्ठ होने का दावा करना मनुष्यता को लांछन लगाना है। जो अपनी उच्चता का दावा करता है, वह उसी क्षण मनुष्य होने का अधिकार भी खो देता है।”

गाँधीजी के उक्त कथन से स्पष्ट है कि वे वर्तमान समय में समाज में प्रचलित ऊँच-नीच के विचारों को नहीं मानते हैं, सभी पेशों को समानता की दृष्टि से देखते हैं, वे भंगी तथा ब्राह्मण के लड़के में प्रतिष्ठा और वेतन की दृष्टि से कोई भेद नहीं रखना चाहते। यदि समाज में यह व्यवस्था लागू हो जाये तो सामाजिक एवं आर्थिक विषमता तथा इससे उत्पन्न होने वाले भीषण वर्ग संघर्ष समाप्त हो जायेंगे।

  1. अस्पृश्यता का अन्त

    अस्पृश्यता भारतीय समाज का एक गम्भीर दोष रही है। गाँधीजी ने अस्पृश्यता के अन्त का बीड़ा उठाया और इसमें उन्हें सफलता भी मिली।

गाँधीजी अस्पृश्यता को भारतीय समाज के लिए एक कलंक मानते थे और उनका कथन था कि यह एक ऐसा घातक रोग है, जो समस्त समाज को नष्ट कर देगा। वे अछूतों के समान राजनीतिक और आर्थिक अधिकार दिलाने के पक्ष में तो थे ही, उनके द्वारा सबसे अधिक जोर इस बात पर दिया गया कि अछूतों को भी सवर्ण हिन्दुओं के समान मन्दिर प्रवेश और पूजा आराधना का अधिकार मिलना चाहिए। उनका विचार था कि इससे अछूतों में आत्मसम्मान की भावना जागृत होगी और उनके प्रति सवर्ण हिन्दुओं का दृष्टिकोण बदलेगा। गाँधीजी ने सवर्ण हिन्दुओं और अछूतों के बीच विवाह सम्बन्ध तथा गोद लेने के सम्बन्ध स्थापित करने पर बल दिया। अछूतों को ‘हरिजन’ का सम्मानप्रद नाम गाँधीजी ने ही प्रदान किया था और हरिजनों की स्थिति में सुधार के लिए उन्होंने जितने प्रयल किये सम्भवतया उतने अन्य किसी भी व्यक्ति ने नहीं किये हैं।

  1. साम्प्रदायिक एकता

    सामाजिक क्षेत्र में गाँधीजी का एक प्रमुख आदर्श भारत के सभी सम्प्रदायों (हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई और पारसी) को एकता के सूत्र में आबद्ध करना था। उन्होंने साम्प्रदायिकता विशेषकर हिन्दू मुस्लिम एकता पर जोर दिया और वे मि० जिन्ना के ‘द्विराष्ट्र सिद्धान्त’ को मानने के लिए कभी तैयार नहीं हुए। गाँधीजी का कहना था कि धर्म को राष्ट्रीयता का आधार नहीं माना जा सकता। उन्होंने अन्त तक भारत के विभाजन का विरोध किया और जब भारत का विभाजन हो गया, तो उन्होंने हिन्दू मुस्लिम दंगों को रोकने की भरसक चेष्टा की। वे सभी धर्मों का समान समझते थे और उन्होंने साम्प्रदायिक एकता बनाये रखने के लिए ही अपने प्राणों की आहुति दे दी।

  2. स्त्रीसुधार

    राजा राममोहन राय के बाद स्त्री सुधार की दिशा में उल्लेखनीय कार्य करने वाले व्यक्ति महात्मा गाँधी थे। उनका कथन था कि स्त्रियाँ किसी भी दृष्टि से पुरुषों से हीन नहीं होती और कमजोर कहना उसके प्रति अन्याय और उसका अपमान है। उनका कथन था कि यदि सत्य, अहिंसा, सहिष्णुता और नैतिकता आदि जीवन के सर्वोच्च गुणों की दृष्टि से विचार किया जाय तो स्त्रियाँ पुरुषों से भी श्रेष्ठ हैं।

गाँधीजी ने पर्दा प्रथा, बाल-विवाह और देवदासी प्रथा आदि स्त्री जीवन से सम्बन्धित बुराइयों का डटकर विरोध किया और इस बात का प्रतिपादन किया कि स्त्रियों को कानून तथा व्यवहार में पुरुषों के समान ही अधिकार प्राप्त होने चाहिए। किन्तु गाँधीजी इस बात के पक्ष में नहीं थे कि स्त्रियाँ आर्थिक दृष्टि से स्वतन्त्र होने का प्रयत्न करें और घर से बाहर पुरुषों से प्रतियोगिता करें। उनका विचार था कि स्त्रियों का एकमात्र व पूर्ण कार्यक्षेत्र घर ही है।

  1. बुनियादी शिक्षा

    शिक्षा के क्षेत्र में भी गाँधीजी का महत्वपूर्ण योगदान है। उनका विचार था कि शिक्षा का उद्देश्य शरीर, आत्मा व मस्तिष्क का सम्बन्धित विकास है और इस दृष्टि से वे अंग्रेजों द्वारा भारत में स्थापित शिक्षा पद्धति को बहुत अधिक दोषपूर्ण मानते थे। उनका विचार था कि यह पद्धति युवकों का शारीरिक, बौद्धिक या अत्यधिक किसी प्रकार का विकास करने में असमर्थ है। शिक्षा का माध्यम विदेशी भाषा होने के कारण विद्यार्थियों का और अहित होता है।

देश की आवश्यकताओं की दृष्टि में रखते हुए उनके द्वारा एक नवीन शिक्षा प्रणाली का सुझाव दिया गया जो ‘बुनियादी शिक्षा’ के नाम से प्रसिद्ध है। इस शिक्षा प्रणाली की विशेषताएँ निम्न प्रकार हैं-

  • शिक्षा के अन्तर्गत प्रत्येक विद्यार्थी को मूलरूप में कोई न कोई दस्तकारी सिखायी जानी चाहिए और सब विषयों की शिक्षा उस दस्तकारी के द्वारा दी जानी चाहिए जिसे ‘सह सम्बन्ध का सिद्धान्त’ (Theory of Correlation) कहते हैं।
  • शिक्षा का माध्यम मातृभाषा हो।
  • शिक्षा स्वावलम्बी हो अर्थात् विद्यार्थी जिस दस्तकारी के आधार पर शिक्षा प्राप्त करते हैं, उस दस्तकारी से विद्यार्थी जीवन में और उसके बाद भी अपना भरण-पोषण कर सकें।

गाँधीजी द्वारा शिक्षा में चरित्र निर्माण पर बहुत अधिक बल दिया गया था।

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