महात्मा गाँधी का जीवन-परिचय

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गाँधीजी

गाँधीजी का जीवन-परिचय

(Life History of Mahatma Gandhi)

2 अक्टूबर, 1869 को राजकोट में मोहनदास करमचन्द गाँधी का जन्म हुआ। इनके पिता राजकोट के दीवान थे। माता धार्मिक विचारों से ओतप्रोत सुशील महिला थीं। अपने परिवार में उनको विशुद्ध भारतीय संस्कार विरासत में मिले। 12 वर्ष की अल्पायु में ही इनका विवाह कर दिया गया।

सन् 1887 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद उन्हें वकालत की शिक्षा प्राप्त करने के लिए विलायत भेज दिया गया। विलायत जाने के पूर्व उन्होंने अपनी माता सम्मुख यह प्रतिज्ञा ली कि “मैं मांस, मदिरा और नारी का स्पर्श नहीं करूँगा।” सन् 1891 में गाँधीजी बैरिस्टर बनकर लन्दन से भारत लौटे। अभी उन्होंने काठियावाड़ में वकालत प्रारम्भ ही की थी कि उन्हें दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा।

दक्षिण अफ्रीका के काले व्यक्तियों पर गौरांग महाप्रभुओं द्वारा भयंकर अत्याचार किये जा रहे थे । गाँधीजी ने सम्पूर्ण शक्ति के साथ इस अत्याचार के विरुद्ध आवाज उठायी। वह शक्ति, आत्मा और सच्चाई की शक्ति थी। दक्षिण अफ्रीका की अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा। यहीं पर सर्वप्रथम गाँधीजी ने सत्याग्रह आन्दोलन का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। बाद में यही आन्दोलन भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का प्रतीक बन गया।

सन् 1914 में गाँधीजी एक सफल आन्दोलनकारी और राजनीति के रूप में भारत पहुँचे। परन्तु तत्काल ही राजनीति में छलांग लगाने की अपेक्षा उन्होंने परिस्थितियों का दूर से अध्ययन करना अधिक उचित समझा। अहमदाबाद के पास उन्होंने साबरमती सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की। इन दिनों गाँधीजी अंग्रेजों की शराफत और उदारवादिता से बहुत प्रभावित थे। इसलिए प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान में उन्होंने भारत में घूम-घूमकर भारतीयों को युद्ध में अंग्रेजों का साथ देने को कहा परन्तु विश्वयुद्ध के पश्चात कुछ घटनाओं ने अंग्रेजों के प्रति उनकी सारी आस्था को समाप्त कर दिया।

रौलट एक्ट, जिसके अनुसार किसी भी भारतीय पर शान्ति-भंग का आरोप लगाकर बिना मुकदमा चलाये जेल में डाला जा सकता था, ने पहले विस्फोटक के रूप में कार्य किया। सामान्य प्रदर्शनों का नेतृत्व करके गाँधीजी ने इस एक्ट का घोर विरोध किया। ऐसा ही एक प्रदर्शन जलियाँवाला बाग में हुआ जहाँ अंग्रेज सरकार के ‘वीर सिपाहियों’ ने ऐसा नृशंस कृत्य किया कि वीरता सदा के लिए लज्जित हो गयी। निहत्थे और निर्दोष भारतीय बालकों, युवकों और वृद्धों पर बिना पूर्व सूचना के गोली वर्षा, अंग्रेजों के गोरे चेहरों पर एक बदनुमा दाग बन गयी। सम्पूर्ण देश में विरोध की अग्नि फैल गयी।

अप्रैल 1921 में खिलाफत आन्दोलन के साथ ही असहयोग आन्दोलन का बिगुल बजा दिया गया । गाँधीजी द्वारा फूंके हुए इस शंखनाद ने देश के नगर-नगर में, गाँव-गाँव में राष्ट्रीय जागरण की लहर दौड़ा दी। प्रारम्भ में अंग्रेजों ने इस सत्याग्रह को ‘मूर्खतापूर्ण कार्य’ (The most foolish of all foolish schemes) कहा । शीघ्र ही उन्हें ज्ञात हो गया कि अहिंसा का अस्त्र बन्दूकों और तलवारों से अधिक प्रभावशाली होता है परन्तु चौरा-चौरी की एक घटना के कारण उस आन्दोलन को उस स्थिति में गाँधीजी ने बन्द करने की घोषणा कर दी जब वह अपने चर्मोत्कर्ष पर था। जब सफलता भारतीय जनता के चरण चूमने को तत्पर थी तब गाँधीजी ने जनता के पैर पीछे हटा दिये। गाँधीजी के व्यक्तिगत सिद्धान्तों की दृष्टि से यह कदम चाहे ठीक हो उनके इस कदम को उचित कहना कठिन है। आन्दोलन की असफलता से सम्पूर्ण देश में साम्प्रदायिकता की अग्नि भड़क उठी। स्थान-स्थान पर आपसी दंगे हुए, पारस्परिक वैमनस्य बढ़ गया।

सन् 1931 में गाँधीजी ने सविनय अवज्ञा आन्दोलन चलाया। जनता की उनके प्रति असीम श्रद्धा और अटूट विश्वास ने आन्दोलन को बहुत व्यापक स्वरूप दिया। उसकी एक आवाज पर लाखों नर-नारी जेल जाने को तैयार हो जाते। अभी यह आन्दोलन सफलतापूर्वक चल ही रहा था कि उनका लाई इरविन से समझौता हो गया। समझते के फलस्वरूप गाँधीजी ने आन्दोलन बन्द करके दूसरी गोलमेज कान्फ्रेंस में भाग लेना स्वीकार किया।

गोलमेज कान्फ्रेंस की असफलता के बाद गाँधीजी 1934 में वर्धा आश्रम में समाज-सुधार के कार्य में फिर जुट गये । सन् 1939 में, दूसरा विश्व युद्ध होने तक वे शान्त ही रहे । परन्तु युद्ध के प्रारम्भ होने पर बिना भारतीयों की इच्छा जाने अंग्रेजों ने भारत को युद्ध में शामिल कर लिया। 8 अगस्त, 1942 को गाँधीजी ने अंग्रेजों ‘भारत छोड़ो’ आन्दोलन चलाया। वे गिरफ्तार कर लिये गये। युद्ध-समाप्ति पर उन्हें रिहा कर दिया गया।

सन् 1947 में भारत का विभाजन और स्वतन्त्रता दोनों घटनाएँ एक साथ हुई प्रारम्भ में गाँधीजी ने विभाजन का विरोध किया। उन्होंने घोषणा की कि-“भारत का विभाजन मेरी लाश पर होगा ।” परन्तु परिस्थितियों के आगे उनकी एक न चली। अपने जीवन में अपने सिद्धान्तों और आदर्शों की यथार्थ द्वारा होने वाली हत्या से वे बहुत दुःखी हुए। 15 अगस्त को स्वाधीनता दिवस पर उनसे खुशियों में शामिल नहीं हुआ जा सका।

स्वाधीनता के पश्चात् दोनों देशों में साम्प्रदायिकता का दावानल भड़क उठा इन्सान पशु बन गया। धर्म, द्वेष, और घृणा के आधार बन गये। इसके नाम पर खून की होली खेली गयी। आजादी के बाद गाँधीजी का सारा जीवन साम्प्रदायिकता की इस भयंकर आग को शान्त करने में लग गया। एक बार फिर उन्हें असफलता हाथ लगी। उनकी प्रार्थनाओं का असर इसानों पर हो सकता था, हिन्दुओं और मुसलमानों पर नहीं। 30 जनवरी, 1948 को एक ‘वज्रमूर्ख’ ने उनकी हत्या का दर्दनाक दुस्साहस किया। ‘राम-राम’ कहते-कहते भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम का अमर सेनानी चल बसा।

वास्तव में देखा जाये तो गाँधीजी का सारा जीवन त्याग और तपस्या की कहानी भारत का वह कृशकाय, अर्धनग्न, सन्त, सत्य और अहिंसा के परम अन लेकर जीवन-पर्यन्त, ‘ब्रिटिश साम्राज्यवाद’ की जड़ों पर प्रहार करता रहा । उसने भौतिकवाद की ओर अग्रसर संसार को एक नवीन सन्देश दिया। अहिंसा की विलक्षण शक्ति गाँधीजी के हाथ में आकर एक बार फिर चमक उठी। सारा भारत उनके चरणों पर न्यौछावार था। उन्हें ‘राष्ट्रपतिा’ कहकर सम्बोधित किया गया।

शताब्दियों तक पराधीनता के पाश में जकड़े हुए भारत को महात्मा गाँधी ने स्वाधीनता का उज्ज्वल प्रकाश प्रदान किया। वह महात्मा गाँधी ही थे जिन्होंने जब मानस में ज्वार उत्पन्न करने का दायित्व अपने कन्धों पर लिया था।

इससे भी बड़ी विशेषता गाँधीजी के जीवन की सादगी और सरलता है। स्वतन्त्रता के पश्चात् और पहले भी गाँधीजी को पदलिप्सा ने कभी नहीं सताया और राजसी ठाट-बाट ने कभी नहीं लुभाया । राष्ट्रपिता आधुनिक शासको की भाँति गगनचुम्बी अट्टालिकाओं और ‘एअर कण्डीशण्ड’ बिल्डिंगों में नहीं रहे किन्तु जनता के बीच ही जनता का अंश बनकर रहे । कोरी भाषणबाजी में उनका विश्वास नहीं था। स्वतन्त्रता के लिए प्रयास के साथ उन्होंने रचनात्मक कार्यों की ओर ध्यान दिया। हरिजन उद्धार, स्त्री शिक्षा, बुनियादी शिक्षा, मद्यपान, निषेध, खादी एवं स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग, कुटीर उद्योगों का विकास आदि क्षेत्रों में उन्होंने विशेष कार्य किया।

पता नहीं उनमें क्या जादू था कि परस्पर विरोधी विचाराधारा के लोग भी उनके चरणो में खिंचे चले आते थे। एक ओर सेठ बिडला और जमनालाल बजाज उनके भक्त थे तो दूसरी ओर आचार्य कृपलानी और जयप्रकाश नारायण जैसे उनके अनुयायी। सरदार पटेल जैसे कर्मयोगी, पण्डित नेहरू जैसे क्रान्तिकारी, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जैसे साधु पुरुष, राजाजी जैसे कूटनीतिज्ञ, मौलाना आजाद जैसे विद्वान और विनोबा जैसे धार्मिक पुरन्धर तथा मोतीलाल नेहरू जैसे नास्तिक सभी तो बिना तर्क वितर्क के उनकी आज्ञा के सम्मुख सिर झुका देते थे। पण्डित मोतीलाल नेहरू ने एक बार उनसे कहा था-“मुझे आपके आध्यात्मिक सिद्धान्त में कोई विश्वास नहीं है। न ही मुझे इस जन्म में भगवान पर विश्वास हो सकता है। मैं पक्का नास्तिक हूँ। फिर भी कठिनाई यह है कि आप हमारे ही शस्त्रों से हमें पराजित कर देते हैं ।”-आखिर क्यों ? इसलिए कि उन्होंने अपने सम्पूर्ण जीवन को अपने आदर्श के अनुसार ढाला था। मरते दम तक उन्होंने राजनीति को पवित्रता के वस्त्र पहनाने का प्रयत्न किया। यही कारण है कि उनके देहावसान पर सोवियत रूस को छोड़कर संसार के सभी देशों ने अपने ध्वज झुकाकर उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की।

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