गांधी जी का प्रेरणा स्रोत और सत्य की अवधारणा

गाँधी जी का प्रेरणा स्रोत

गाँधी जी का प्रेरणा स्रोत : प्रभाव 

(Influence on Gandhi Ji)

गाँधी जी के विचारों के प्रधान स्त्रोतों को दो भागों में बाँटा जा सकता है- पूर्वी और पश्चिमी । पूर्वी स्रोतों में उन्हें अपनी माताजी से प्राप्त वैष्णव हिन्दू धर्म के प्रभाव, जैन व बौद्ध धर्म, गीता व उपनिषदों, भारत के विभिन्न साधु-सन्तों की वाणियाँ तथा उपदेश एवं जैन साधक श्री रामचन्द्र जी का सम्पर्क है। पश्चिमी स्रोतों में बाइबिल, विशेषतः उसका पर्वत प्रवचन (Sermon on the Mount), टालस्टाय (1828-1910), जॉन रस्किन (1819-1900) तथा थोरो (1817-1862) की रचनाएँ हैं। गाँधीजी ने अपने प्रथम चरित्र लेखक एक मिशनरी डोक को बताया था कि अहिंसक प्रतिकार (Passive Resistance) की कल्पना मुझे सर्वप्रथम श्यामल भट्ट रचित गुजराती कविता से सूझी थी। इसका सारांश इस प्रकार था-“यदि कोई तुम्हें पानी पिलावे और तुमने भी उसे बदले में पानी पिलाया तो उसका कोई महत्व नहीं है। अपकार के बदले में उपकार करने में ही सभी खूबी है ।” इसके बाद मैंने बाइबिल के ‘पर्वत-प्रवचन’ वाले भाग को देखा । “अत्याचारी का प्रतिकार मत करो, बल्कि जो तुम्हें सीधे गाल पर चाँटा मारे उसके सामने बाँया गाल भी कर दो, अपने शत्रु से प्रेम करो ।” ऐसे वचन मैंने पर्वत-प्रवचन में पढ़े और मुझे अत्यन्त आनन्द प्राप्त हुआ। भगवद्गीता के द्वारा यह विश्वास अधिक दृढ़ हुआ। जॉन रस्किन के प्रभाव का गाँधीजी ने अपनी आत्मकथा में उल्लेख किया।

गाँधीजी ने 1896 में नेटाल जाते हुए रास्ते में अपने मित्र पोलक द्वारा दी हुई जॉन रस्किन की एक पुस्तक ‘Union This Last’ को बड़े चाव से पढ़ा। उन्हें यह इतनी पसन्द आयी कि उन्होंने ‘सर्वोदय’ के नाम से गुजराती में इसका अनुवाद किया। उन्होंने इस पुस्तक से तीन बाते सीखीं-प्रथम, एक व्यक्ति का हित सभी व्यक्तियों के हित में निहित है;

द्वितीय, वकील के तथा नाई के काम का समान महत्व है क्योंकि सभी व्यक्ति अपने काम से आजीविका कमाने का समान अधिकार रखते हैं; तृतीय, शारीरिक श्रम करने वाले किसान या कारीगर का जीवन ही वास्तविक जीवन है। गाँधीजी ने रस्किन से प्रभावित होकर बुद्धि की अपेक्षा चरित्र पर अधिक बल दिया, मशीनों का विरोध किया, मानवीय चरित्र में उदात्त एवं दैवीय अंश की प्रधानता स्वीकार की, आत्मिक बल का सर्वोच्च स्थान दिया, राजनीति तथा अर्थशास्त्र में धर्म को महत्ता दी, पूँजीपतियों से यह अपेक्षा रखी कि वे मजदूरों के संरक्षक बने तथा उनसे पितृ तुल्य व्यवहार करें।

गाँधीजी पर अमरीकन अराजकतावादी लेखक थोरो का भी प्रभाव पड़ा। उसने 1849 में अपने एक भाषण में ‘सविनय आज्ञा भंग‘ (Civil Disobedience) शब्द का प्रयोग किया था। उसका यह सिद्धान्त था कि भलाई को बढ़ाने वाले सभी लोगों तथा संस्थाओं के साथ सहयोग एवं बुराई को प्रोत्साहन करने वालों के साथ असहयोग करना चाहिए। दास प्रथा के पक्ष पर थोरो ने तत्कालीन अमरीकन सरकार के प्रति निष्क्रिय प्रतिरोध के साथ-साथ सक्रिय प्रतिकार के मत का समर्थन किया था। गाँधीजी ने थोरो के विचारों को संशोधित करके व्यापक बनाया।

गाँधीजी पर रूसी लेखक टॉलस्टाय की रचनाओं का भी प्रभाव पड़ा। टॉलस्टाय की पुस्तक ‘बैकुण्ठ तुम्हारे भीतर है’ (The Kingdom of God is Within You) के बारे में गाँधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि इसने मुझ पर स्थायी प्रभाव डाला । गाँधीजी के शब्दों में इस पुस्तक ने उनके सन्देहों का निराकरण किया तथा उन्हें अहिंसा पर दृढ़ विश्वास करने वाला बना दिया। टॉलस्टाय की भाँति गाँधीजी के सत्य के सतत अन्वेषक वर्तमान सभ्यता के कटु आलोचक, इसे हिंसा और शोषण पर आधारित और इसे अनैतिक मानने वाले, हिंसक उपायों के विरोधी, व्यक्ति के सुधार तथा आत्मशुद्धि, सादगी, सरल जीवन, शरीर-श्रम तथा ब्रह्मचर्य पर बल देने वाले थे। वे साध्य तथा साधन दोनों की पवित्रता पर बल देने वाले थे। टॉलस्टाय के विचारों का अनुयायी होते हुए भी गाँधीजी का दृष्टिकोण अधिक व्यावहारिक और क्रियात्मक था। वे टालस्टाय की भाँति अहिंसा के अन्ध भक्त नहीं थे, अपने आश्रम में मरणासन्न बछड़े की असह्य वेदना कम करने के लिए उन्होंने इंजेक्शन द्वारा उसकी हत्या को हिंसा नहीं अपितु अहिंसा माना था।

गाँधी जी की सत्य की अवधारणा

(The Concept of Truth)

गाँधीजी के अनुसार, ‘सत्य ही ईश्वर है ।’ परन्तु प्रश्न उठता है कि वह सत्य जो ईश्वर है और जिसकी प्राप्ति जीवन का उद्देश्य है, क्या है ?

गाँधीजी के मतानुसार ‘सत्य’ सत शब्द से निकला है, इसका अर्थ है अस्तित्व या होना । सत्य को ईश्वर या ब्रह्म कहने का यह कारण है कि सत्य वही है जिसकी सत्ता होती है, जो सदा टिका रहता है। ब्रह्म या परमात्मा की सत्ता तीनों कालों में बनी रहती है, अतः वह सत्य है। गाँधीजी अपने जीवन का ध्येय सत्य की शोध करना समझते थे। उन्होंने अपनी आत्मकथा का नाम ‘मेरे सत्य के प्रयोग’ (My Experiments with the Truth) रखा है।

सामान्यतः सत्य शब्द का अर्थ केवल सच बोलना ही समझा जाता है। लेकिन गाँधीजी ने सत्य का व्यापकता अर्थ लेते हुए बार-बार यह आग्रह किया है कि विचार में, वाणी में और आचार में सत्य का होना ही सत्य है। गाँधीजी की दृष्टि में सत्य की आराधना ही सच्ची भक्ति है।

गाँधीजी के अनुसार दैनिक जीवन में सत्य सापेक्ष (Relative) है, किन्तु सापेक्ष सत्य के माध्यम से एक निरपेक्ष (Absolute) सत्य पर पहुँचा जा सकता है और यह निरपेक्ष सत्य ही जीवन का चरम लक्ष्य है, इसकी प्राप्ति ही मनुष्य का परम धर्म है।

गाँधीजी के सत्य के परिवेश में केवल व्यक्ति ही नहीं आता है, अपितु इसमें समूह और समाज का भी समावेश है। वे चाहते हैं कि सम्पूर्ण सत्य का पालन धर्म, राजनीति, अर्थ-नीति, परिवार नीति सब में होना चाहिए। राजनीति में सत्य के पूर्ण पालन का उनका नवीन प्रयोग तो विश्व इतिहास के लिए एक अविस्मरणीय घटना है।

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