संगठन के आधार

संगठन के आधार

संगठन के आधार

(Bases of Organization)

संगठन प्रशासन का एक महत्वपूर्ण अंग है। लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सामूहिक प्रयास का नाम ही संगठन है। संगठन विभिन्न कार्यों में समन्वय स्थापित करने की एक प्रक्रिया है। यह भी एक महत्वपूर्ण समस्या है कि प्रशासन का आधार क्या हो ? संगठन का विश्लेषण करने पर हम सामान्यतः निम्नलिखित चार आधार मानते हैं

कार्य के आधार पर

(On the basis of function)-

संगठन की प्रत्येक इकाई अथवा विभाग की अपनी विशेषताएं होती हैं। उनके कार्यों की प्रकृति में एकरूपता पाई जाती है। इस अनुरूपता का आधार है ‘कार्य’ । कार्य का सम्बन्ध व्यापक लक्ष्यों से है, जिसकी पूर्ति करनी है। आधुनिक प्रशासन के व्यापक कार्यों अथवा उद्देश्यों में सुरक्षा, शिक्षा, जन स्वास्थ्य, यातायात कानून एवं व्यवस्था आदि सम्मिलित किये जाते हैं। लोक प्रशासन में विभागीय संगठन करने के लिए सबसे पहले आवश्यक बात ‘कार्य’ समझी जाती है। राज्यों में शिक्षा, जेल, पुलिस, स्वास्थ्य, आबकारी आदि विभागों का संगठन कार्य के आधार पर ही किया जाता है। कभी-कभी छोटे कार्य उपविभागों के संगठन का आधार बन जाते हैं। व्यापक तथा अल्परूपक कार्यों में केवल मात्रा का अन्तर है आकार का नहीं। इन दोनों के बीच कोई विभाजन रेखा नहीं खींची जा सकती। एक कार्य एक राष्ट्र में महत्व का समझा जाता है, और वही कार्य दूसरे राष्ट्र में निम्नतर माना जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि कार्यों पर सामाजिक परम्पराओं तथा राजनैतिक वातावरण का प्रभाव व्यापक रूप से पड़ता है। कार्यों के आधार पर प्रशासकीय संगठन निर्माण के सम्बन्ध में पक्ष एवं विपक्ष दोनों में ही विचार प्रकट किए जा सकते है।

पक्ष में (In favour)-

  1. इस आधार पर अवलम्बित संगठन की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि एक ही प्रकार का कार्य करने वाले व्यक्तियों में लक्ष्य की समता द्वारा समन्वय सरलता से उत्पन्न किया जा सकता है, तथा एक ही संचालक के नियन्त्रण में उन्हें रखा जा सकता है, इससे उनके कार्यों में निपुणता का विकास भी होगा।
  2. कार्यों के आधार पर विभाग निर्माण की प्रणाली लोकतन्त्रीय है। जनता सरलता से किसी भी कार्य में अकार्य कुशलता के लिये एक विभाग को उत्तरदायी ठहरा सकती है। यह बात प्रक्रिया पद्धति में सफलता के साथ सम्पन्न नहीं हो पाती। क्योंकि वहाँ एक ही लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कई विभाग बनाये जाते हैं। पूर्ण उत्तरदायित्व प्रशासन की किसी भी इकाई पर नहीं डाला जा सकता।
  3. विभाग के कर्मचारियों तथा उच्च पदाधिकारियों में अनुशासन की मात्रा का विकास होगा क्योंकि उनमें लक्ष्य की समानता

विपक्ष में (Against)-

  1. इस सिद्धान्त के विरुद्ध यह तर्क दिया जाता है कि यह सिद्धान्त श्रम विभाजन तथा कार्यों में विशेषीकरण के सिद्धान्त के विरुद्ध है।
  2. इस सिद्धान्त के विरुद्ध एक आक्षेप भी लगाया जाता है कि संगठन की इस पद्धति द्वारा निम्न प्रकार के स्थानीय कार्यों के प्रति ध्यान नहीं जाता जिसके फलस्वरूप उनका नुकसान होता है।
  3. कुछ आलोचकों के अनुसार पद्धति में विभाग पूर्ण होता है और जनता के नियंत्रण से वह दूर हो जाता है।

परन्तु इस प्रकार के तर्कों में अधिक तत्व नही है। लोक प्रशासन के क्षेत्र में ऐसी विधियाँ खोज निकाली गई हैं जिनके द्वारा जन-नियन्त्रण तथा विभागों में समन्वय स्थापित किया जा सकता है।

प्रक्रिया के आधार पर

(On the Basis of Process)-

यह एक विशेष प्रकार के कार्य करने की विधि है। इन्जीनियरिंग, एकाउण्टिग, स्टेनोग्राफी, मैडीकल, कानून आदि प्रशासन में विधि अथवा रीति के उदाहरण हैं। इस आधार पर भी प्रशासकीय विभागों को संगठित किया जाता है। यह कार्य करने की विशेष पद्धति है। इसका सम्बन्ध उन विभागों से है जिनमें विशेष प्रकार की योग्यता की आवश्यकता होती है। राष्ट्रीय प्रशासन के विभागों में सार्वजनिक निर्माण तथा कानून आदि इस प्रकार के संगठन के अच्छे उदाहरण हैं। राज्यों के प्रशासन में भी विशेष योग्यता के आधार पर सार्वजनिक निर्माण विभाग तथा जनस्वास्थ्य विभाग आदि संगठित किए जाते हैं। स्थानीय संस्थाओं के नियन्त्रण, में इंजीनियरिंग, बिजली, एकाउन्टस आदि उपविभागों का संगठन विशेष योग्यता के आधार पर किया जाता है। कार्य एवं विधि में कोई विशेष अन्तर नहीं है। कभी-कभी वे दोनों इतने अनुरूप दिखाई देते हैं कि उनमें कोई अन्तर खोजना कठिन हो जाता है। वित्त एक कार्य भी है, जबकि उसके विषय में हम मान लें कि यह प्रत्येक प्रशासन का मुख्य कार्य है और यह विधि संगत भी मालूम पड़ता है जबकि हम इस रूप में विचार करें कि इसकी व्यवस्था के लिये विशेष योग्यता की आवश्यकता है। यही बात सार्वजनिक निर्माण विभाग (P.W.D.) के सम्बन्ध में भी सत्य है। विधि (Process) के आधार पर संगठन के पक्ष तथा विपक्ष दोनों के ही सम्बन्ध में विचार प्रकट किए जा सकते हैं।

पक्ष में (In favour)-

  1. इस प्रकार की व्यवस्था के अन्तर्गत यान्त्रिक तथा महत्वपूर्ण सामग्री का पूर्ण प्रयोग किया जा सकता है।
  2. एक ही प्रकार की विशेष योग्यता रखने वाले व्यक्तियों को एक ही विभाग में संगठित किया जा सकता है। जैसे डाक्टरों को चाहे वे सिविल अस्पताल में हो, चाहे रेलवे अस्पताल में, उनका एक वर्ग अलग बन सकता है।
  3. श्रम विभाजन के सिद्धान्त तथा विशेष योग्यता रखने वाले व्यक्तियों की कार्य प्रदर्शन के अच्छे अवसर प्राप्त हो सकते हैं।
  4. उन व्यक्तियों के कार्यों में जो एक ही प्रकार का कार्य करते हैं समन्वय स्थापित किया जा सकता है। यह करना सरल भी हो सकता है।
  5. जीवन के सन्दर्भ में व्यवसायी सेवा का क्रम भली भाँति स्थापित हो जाता है।

विपक्ष (Against)-

  1. जिस दृष्टि से प्रशासकीय संगठन को स्थापित किया जाता है, वह लक्ष्य इस पद्धति के द्वारा समाप्त हो जाएगा।
  2. प्रशासन सम्बन्धी विशेषीकरण का सिद्धान्त कर्मचारियों के दृष्टिकोण को अत्यन्त संकीर्ण बना देगा। विशेष योग्यता रखने वाले कर्मचारी अन्य सेवाओं के कर्मचारियों से घृणा करने लगेंगे जिससे प्रशासन में प्रत्येक भाग को हानि होगी और उसका स्वस्थ संचालन समाप्त हो जायगा।
  3. इस पद्धति द्वारा कार्यों को सम्पन्न करने में न केवल निपुणता का ही अभाव होगा परन्तु कार्यों को करने में देर लगेगी और वह भी सुविधानुकूल सम्भव न हो सकेंगे।
  4. एक विभाग के भंग होने का प्रभाव समस्त विभागों पर पड़ेगा।
  5. कार्य पद्धति की भाँति प्रक्रिया पद्धति द्वारा संगठन करने में भी लोकतन्त्रात्मक नियन्त्रण का अभाव होगा क्योंकि उत्तरदायित्व असफल कार्यों के होने पर स्थापित करना कठिन हो जायेगा। कार्य तथा विशेषीकरण अथवा प्रक्रिया के आधार पर प्रशासकीय संगठनों को अवलम्बित करने के गुण तथा दोषों को देखने के उपरान्त हम यह निष्कर्ष निकालते हैं कि प्रथम पद्धति दूसरे से अधिक उत्तम है और अधिकांश राष्ट्रों में पाई जाती है।

सेवा करने वाले व्यक्तियों के आधार पर

प्रशासकीय संगठन का यह भी एक आधार माना जाता है। इसके अन्तर्गत किसी भी वर्ग विशेष के सदस्यों की समस्याओं का समाधान करने के लिए भी सरकार विभाग का संगठन करती है। इस प्रकार के संगठनों का मौलिक उद्देश्य उन व्यक्तियों के सामाजिक, राजनैतिक शिक्षा सम्बन्धी तथा आर्थिक हितों की सुरक्षा करना होता है। भारत का केन्द्रीय पुनर्वास विभाग तथा कुछ राज्यों में समाज कल्याण विभाग (Social Welfare Department) आदि इसी प्रकार के उदाहरण हैं। अमेरीका (U.S.A.) में भी Office of Indian Affairs रैड इण्डियनों की समस्याओं का ध्यान रखता है। इस प्रकार के विभाग का महत्वपूर्ण लक्षण यह है कि इसके कर्मचारी उस वर्ग के सदस्यों की लगभग समस्या के सम्बन्ध में विचार करते हैं जिसके लिए वह स्थापित किया गया है।

क्षेत्र के आधार पर

(On the Basis of Area or Territory)-

कभी-कभी संगठन का आधार क्षेत्र पर भी किया जाता है। विदेश विभाग के संगठन में क्षेत्र का विशेष ध्यान रखा जाता है। हमारे विदेश विभाग के संगठन में 17 उपविभागों का आधार क्षेत्र है। भारतीय सेना का संगठन भी तीन क्षेत्रों के आधार पर किया गया है – दक्षिणी कमान, पूर्वी एवं पश्चिमी कमान। यह संगठन राष्ट्र की भौगोलिक स्थिति के अनुरूप है। राज्यों में पुलिस प्रशासन के संगठन का भी यह आधार है। राजस्थान में जैसे अजमेर रेंज, बीकानेर रेंज, उत्तर प्रदेश में मेरठ रेंज, तथा रेली रेंज इत्यादि 1952 में रेलवे प्रशासकीय संगठन का यही आधार (क्षेत्र) रहा है।- पूर्वी क्षेत्र, उत्तर पूर्वी क्षेत्र, पश्चिमी रेलवे, उत्तर रेलवे तथा दक्षिणी रेलवे। ब्रिटेन विदेश का संगठन भी इसी आधार पर किया जाता है। भारतीय डाक व्यवस्था का संगठन भी इसी आधार पर किया गया है। राजस्थान, उत्तर प्रदेश, पंजाब आदि लगभग बहुत से राज्यों में विद्युत मण्डल (Electricity Board) का संगठन भी इसी आधार पर किया गया है।

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