लोक प्रशासन | प्रशासन, प्रबंधन व संगठन में अंतर

लोक प्रशासन

लोक प्रशासन

किसी सामान्य नीति अथवा लक्ष्य विशेष की प्राप्ति के लिए मानवीय तथा भौतिक तत्वों का अनूठा सामंजस्य है। कोई भी संस्था, मिल अथवा कम्पनी अपने विचार के लिए अथवा उत्पादन के लिए विभिन्न श्रेणियों के कर्मचारियों की व्यवस्था करती है, उनके अधिकार और कर्तव्यों का उल्लेख करती है। उसके उच्च कर्मचारी जब अपने से नीचे के स्तर के कर्मचारियों के कार्यों का निरीक्षण करते हैं। तब यही निरीक्षण, निर्देशन तथा उनके कार्यों का व्यवस्थित संचालन लोक प्रशासन कहलाता है। यह आवश्यक नहीं है कि प्रशासन की सीमाएं केवल सरकार की क्रियाओं तक ही सीमित हैं। क्लब अथवा किसी धार्मिक संस्था का संचालन भी प्रशासन है। लोक प्रशासन, प्रशासन का ही व्यापक तथा सार्वजनिक स्वरूप है। जब प्रशासन का प्रयोग राज्य द्वारा सार्वजनिक घटनाओं लिए ही किया जाता है उसे हम लोक प्रशासन कहते हैं। उस स्थिति में प्रशासन सरकारी तथा सार्वजनिक समस्याओं को अपने नियंत्रण निर्देशन तथा समायोजनात्मक परिधि में समेट लेता है। जब कोई भी सरकारी कर्मचारी इन घटनाओं तथा सार्वजनिक हित की समस्याओं के सम्बन्ध में अपने कर्तव्यों का अधिकृत एवं सुचारु रूप से पालन करता है तो वह प्रशासन का ही अंग कहलाता है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रशासन का व्यक्ति से अटूट सम्बन्ध है। अतः लोक प्रशासन लोक हित के लिए सरकार द्वारा संगठित प्रयास है। इसका मूल लक्ष्य सार्वजनिक समस्याओं का सरकारी कर्मचारियों द्वारा सही मूल्यांकन तथा निर्देशन है। लोक प्रशासन की व्याख्या हम इस प्रकार भी कर सकते हैं कि निश्चित कानून के अनुसार जनता की वास्तविक इच्छाओं का सरकारी कर्मचारियों द्वारा कार्य के रूप में परिणत करना ही लोक प्रशासन है। यह लोकहित तथा प्रशासन का समन्वय है। जब प्रशासनिक सूत्रों तथा स्रोतों का प्रयोग लोकहित प्राप्त करने की दृष्टि से किया जाय, जिससे अधिकांश जनता का हित प्रभावित होता हो वही लोक प्रशासन है। लोक प्रशासन में लोकहित के लिए सेवा का भाव विद्यमान है। अस्पताल, करारोपण, अपराधों की रोकथाम के लिए पुलिस की व्यवस्था, पुल तथा नहरों का निर्माण, रेल, वायु, जलपथ एवं जनपथ, भवन निर्माण एवं खाद्य सामग्री की समुचित व्यवस्था सब इसी प्रकार के लोकहितकारी कार्य हैं।

लोक प्रशासन शब्द का प्रयोग व्यापक तथा संकुचित दोनों रूपों में हुआ है। अपने व्यापक रूप में प्रशासन का प्रयोग सरकार के समस्त क्रिया-कलापों के लिए किया जाता है। इसके अन्तर्गत सरकार के कार्यपालिका, विधान मंडल तथा न्यायपालिका सम्बन्धी समस्त कार्य आ जाते हैं। संकुचित रूप में लोक प्रशासन केवल कार्यपालिका के कार्यों तक ही सीमित है। यह मानसिक उलझन केवल इसलिए है कि सामान्यतः लोक प्रशासन के अर्थ हम कार्यपालिका सम्बन्धी कार्यों से लगाते हैं। कार्यपालिका के अधिकारियों को ही प्रशासकों की संज्ञा दी जाती है। इन दृष्टिकोणों को हम एकात्मक तथा प्रबन्धात्मक शब्दों द्वारा भी स्पष्ट कर सकते हैं। लोक प्रशासन के एकात्मक दृष्टिकोण में प्रावधिक एवं अप्रावधिक, बाबू वर्गतथा हाथ से काम करने वाले सभी व्यक्ति सम्मिलित हैं। लक्ष्य की प्राप्ति में सभी सहयोग देते हैं। प्रबन्धात्मक (Managerial) दृष्टिकोण में केवल उच्च पदाधिकारी भी सम्मिलित हैं जो अपने निर्देश तथा नियंत्रण में अपने अधीन कर्मचारियों से कार्य कराते हैं। इन दोनों दृष्टिकोणों का समन्वय ग्लैडन (Gladen) ने यह कह कर किया है लोक प्रशासन बहुरूपीय है। इसलिए उसकी परिभाषा करना कठिन है। सरकार के बदलते हुए कार्यों के सन्दर्भ में इसे समझा जा सकता है।

प्रशासन, प्रबंधन व संगठन में अंतर

(Difference between Administration, Management and Organization)

लोक प्रशासन को सही अर्थों में समझने के लिए हमें प्रशासन, प्रबन्ध तथा संगठन के अन्तर को समझ लेना आवश्यक है क्योंकि इन तीनों शब्दों का प्रयोग प्रायः हम पर्यायवाची शब्दों के रूप में कर देते हैं, इनमें अन्तर प्रावधिक दृष्टि से ही किया जा सकता है, मिलवर्द (Milword) के अनुसार प्रशासन वह प्रक्रिया अथवा माध्यम है जिसका प्रयोग किसी लक्ष्य अथवा उद्देश्य को निर्धारित करने की दृष्टि से किया जाता है, प्रशासन का सम्बन्ध नीति सम्बन्धी रूप रेखाओं से भी है जिनके द्वारा कार्यों पर नियंत्रण स्थापित किया जाता है। प्रबन्ध (Management) वह प्रक्रिया है जिनके द्वारा नीतियों को क्रियान्वित करने की योजना बनाई जाती है, संगठन (Organization) वह विधि है जिसके माध्यम से किसी कार्य को सुविधाजनक कार्यों एवं अंगों में विभाजित किया जाता है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि इन तीनों में अन्तर बहुत सूक्ष्म तथा निकट का है। प्रशासन उद्देश्यों को पूर्व निर्धारित करता है। प्रशासन एक निर्धारक कर्तव्य है। इसके विपरीत प्रबन्ध एक कार्यकारी कर्तव्य है जिसका सम्बन्ध प्रशासन द्वारा निर्धारित व्यापक नीतियों को क्रियान्वित करने से है, संगठन वह यंत्र है जिसके माध्यम से प्रशासन तथा प्रबन्ध में समन्वय स्थापित किया जाता है। शुल्ज (Schulz) के अनुसार प्रशासन का सम्बन्ध उस शक्ति से है जो उस उद्देश्य को निश्चित करती है तथा जिसकी प्राप्ति के लिए संगठन तथा उसके प्रबन्धक प्रयत्नशील रहते हैं। प्रबन्ध वह शक्ति है जो पूर्व निर्धारित उद्देश्य की पूर्ति हेतु संगठन का नेतृत्व, पथ प्रदर्शन व निदेशन करती है। संगठन का आशय किसी वांछित उद्देश्य की पूर्ति हेतु आवश्यक मनुष्यों, यंत्रों, सामग्रियों, साजसज्जा, कार्य स्थल तथा अन्य उपकरणों के संयुक्तीकरण (Combination) से है। अतः प्रशासन का सम्बन्ध उद्देश्यों तथा व्यापक नीतियों से है, प्रबन्ध उन नीतियों के अनुसार उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रयत्नशील रहता है तथा संगठन वह मैकेनिज्म है जिसके द्वारा प्रबन्ध अपने प्रयत्न में सफलता प्राप्त करता है।

लोक हितकारी राज्य में लोक प्रशासन

(Public Administration in a Social Welfare State)

निश्चित रूप से यह कह सकना कठिन है कि लोक प्रशासन का उदय कब हुआ, हम यही कह सकते हैं कि जब से मनुष्यों ने मिल-जुल कर कार्य करना आरम्भ किया तभी से लोक प्रशासन की उत्पत्ति हुई, जिस मात्रा में लोगों में मिल-जुल कर कार्य करने की प्रवृत्ति को बल मिला है ठीक उसी मात्रा में लोक प्रशासन का महत्व भी बढ़ा है और आज तो स्थिति यह है कि हमें यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होता कि सभ्यता की सफलता ही प्रशासकीय कार्यकुशलता पर अवलम्बित है, सार्वजनिक अभीष्ट की पूर्ति केवल योग्य एवं प्रभावशाली प्रशासन पर आधारित है, जब तक कि योजनाओं का क्रियान्वयन सही नहीं होता वे व्यर्थ हैं, सरकार चाहती है कि देश में तस्करी, शराबखोरी तथा सट्टा बन्द हो किन्तु यह तभी सम्भव है, जबकि कर्मचारी इस ओर उत्सुक हो और ईमानदारी से नियमों को लागू करें।

वैसे तो लोक प्रशासन का महत्व प्रत्येक पद्धति में है चाहे उसका स्वरूप कोई भी क्यों न हो। किन्तु अन्य शासकीय प्रणालियों की अपेक्षा उसका महत्व जनतन्त्रीय पद्धति में अधिक है। अन्य पद्धतियों में प्रशासन का प्रयोग हुकूमत करना होता है, जबकि लोकतंत्र में उसका लक्ष्य सार्वजनिक हित को अर्जित करना होता है। लोकतंत्रीय व्यवस्था में जनता प्रशासन पर नियंत्रण रखती है। उस व्यवस्था में उसका स्वरूप एक सामूहिक प्रक्रिया का है। आर्डवेहीड का यह कहना सही है कि जनतन्त्रात्मक शासन वह है जिसमें प्रशासन ऐसी नीतियों को अपनाता है जिनसे प्रभावित व्यक्ति सहमति रखते हों। प्रशासकों के कार्यों की जानकारी बराबर जनता को उपलब्ध होती रहती है। संसदीय माध्यम से जन नियंत्रण स्थापित होता है। जनतंत्रीय प्रशासन के कुछ अपने मानदण्ड हैं।

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