व्यक्तिगत और सार्वजनिक प्रशासन में अन्तर

व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक प्रशासन में अन्तर

व्यक्तिगत तथा सार्वजनिक प्रशासन में अन्तर

(Private and Public Administration Distinguished)

दलीय (Private) तथा सार्वजनिक प्रशासन, प्रशासन की ही दो पृथक् धाराएं हैं। मूल में दोनों का लक्ष्य एक ही है। दलगत कार्यों को गैर-सरकारी कार्य कहा जाता है। बिरला मिल का प्रबन्ध, अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय का संचालन, नवलगढ़ के जयपुरिया अस्पताल का प्रबन्ध, ओरियेंट कम्पनी का संचालन, एलैम्बिक कैमीकल वर्क्स का प्रबन्ध तथा सुलेखा वर्क्स की व्यवस्था दलीय प्रशासन के उदाहरण हैं, इनका लक्ष्य व्यक्तिगत लाभ करना है। इनका संबंध केवल एक पहलू से है। समाज की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति इनमें से किसी एक के द्वारा नहीं होती। एलैम्बिक कम्पनी का कार्य केवल दवाओं का निर्माण करना है। उसका अपना पेटेन्ट ट्रेड मार्क है जिसे अन्य कम्पनियाँ नहीं अपना सकतीं। दलगत प्रशासन का क्षेत्र विशिष्ट है। प्रत्येक कम्पनी के प्रशासन सम्बन्धी नियम भिन्न-भिन्न होते हैं। इसके विपरीत लोक प्रशासन का सम्बन्ध सरकारी कार्यों से है। आन्तरिक व्यवस्था के लिए पुलिस का प्रबन्ध, विदेशी आक्रमण से सुरक्षा के लिए सेना का प्रबन्ध, अस्पताल, यातायात के साधनों का प्रबन्थ, सार्वजनिक निर्माण के कार्य, राज्यकीय विद्युत मंडल का प्रबन्ध, नहर, नलकूपों की व्यवस्था और डाक तथा तार की व्यवस्था आदि सार्वजनिक उपयोगी ऐसे कार्य हैं जिनमें सरकार मुनाफे की नहीं सोचती। सामाजिक हित के लिए तथा समाजवादी व्यवस्था के लिए समस्त कार्यों को करना सरकार अपना कर्तव्य समझती है। सार्वजनिक उपयोग सम्बन्धी किसी वस्तु के खराब अथवा दूषित हो जाने पर और यहाँ तक कि कभी-कभी दलीय प्रशासन के क्षेत्र में अनुचित एवं आतंकपूर्ण कार्य होने पर, इन बातों के लिए सरकार को उत्तरदायी ठहराते हैं। अमरीका में दिन-प्रतिदिन सरकारी प्रशासन क्षेत्र और व्यापक होता जा रहा है। जब प्रशासन का प्रयोग सार्वजनिक समस्याओं के समाधान के लिए किया जाय वह लोक प्रशासन कहलाता है। सार्वजनिक हित को दृष्टि में रखते हुए, आवश्यकता पड़ने पर लोक प्रशासन दलीय प्रशासन में हस्तक्षेप भी करते हैं। दलगत तथा सार्वजनिक प्रशासन के अन्तर को हम निम्नलिखित रूप से स्पष्ट कर सकते हैं:

  1. प्रतिनिधित्व की दृष्टि से

    (From the point of view of Representation)- लोक प्रशासन राज्य की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। उसके निर्णयों में अधिकार की भावना पाई जाती है, जो सब व्यक्तियों पर सामान्य रूप से लागू होते हैं। अतः दलगत प्रशासन में यह विशेषता नहीं पाई जाती है।

  2. लाभ की दृष्टि से

    (Profit Motive)- लोक प्रशासन में कार्य लाभ की प्राप्ति के लिए नहीं किये जाते। इसके विपरीत दलगत प्रशासन में इसे प्राथमिकता दी जाती है। सार्वजनिक हित की अपेक्षा दलगत मुनाफे को अधिक महत्व दिया जाता है। यदि पूँजीपति को कपड़े के उद्योग की अपेक्षा डिसटिलरी खोलने से अधिक लाभ हो सकता है तो वह उसी को खोलेगा चाहे बाजार में कपड़े की कितनी बड़ी कठिनाई उत्पन्न क्यों न हो जाय। परन्तु लोक प्रशासन में हर स्थिति में इसका ध्यान नहीं रक्खा जाता। राजकीय शिक्षण संस्थाओं के खोलने से आमदनी से कहीं अधिक धनराशि खर्च करनी पड़ती है। परन्तु वह फिर भी खर्च करती है, क्योंकि यह उसके ऊपर सार्वजनिक उत्तरदायी है।

  3. व्यापकता की दृष्टि से

    (From the point of view of comprehensiveness)- लोक प्रशासन दलगत प्रशासन की अपेक्षा कहीं व्यापक है। जिन राष्ट्रों ने अपनी सामाजिक तथा राजनैतिक व्यवस्था का आधार समाजवाद को माना है, उनमें शायद ही जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो जो राष्ट्रीयकरण की समस्याओं से प्रभावित होता हो। ऐसे राज्यों में लोक प्रशासन के कार्य अनेकों प्रकार के होते हैं। स्वास्थ्य, व्यापार, शिक्षा, सूचना तथा प्रसार, तथा सार्वजनिक निर्माण आदि सम्बन्धी समस्त कार्य राज्य द्वारा किये जाते हैं। ऐसे राज्यों का उद्देश्य व्यक्तिगत स्वतन्त्रता को राष्ट्रीयकरण द्वारा व्यापक बनानाnहोता है परन्तु दलगत प्रशासन के अन्तर्गत इतनी प्रकार की समस्यायें नहीं आतीं।

  4. एकाधिकार की दृष्टि से

    (From the point of view of rights)- प्रशासन के कार्यों में प्रायः सरकार का सर्वाधिकार होता है। उन कार्यों को कोई भी व्यक्ति घरेलू तौर पर नहीं करता। जैसे अपने घर पर डाकखाने की व्यवस्था नहीं कर सकता। परन्तु दलगत व्यवस्था में इस प्रकार का एकाधिकार नहीं पाया जाता। एक ही वस्तु का उत्पादन करने वाली बहुत सी संस्थाएं होती हैं। जैसे चीनी तथा कपड़े का उत्पादन करने वाले अनेकों मिल हैं परन्तु बहुत ही विशेष परिस्थितियों में यह एकाधिकार दलगत प्रशासन को भी दिया जा सकता है। जैसे लोहे का उत्पादन।

  5. बड़े उद्योगों की दृष्टि से

    (From the point of view of Industries)- बड़े उद्योगों का संगठन लोकतंत्र की विशेषता है। रेलवे, सेना, आकाशवाणी तथा पुलिस आदि ऐसे व्यापक संगठन लोक प्रशासन के विषय हैं परन्तु इसके विपरीत दलगत प्रशासन का क्षेत्र छोटे संगठनों तक ही सीमित है। जैसे मिल अथवा फैक्ट्री, परन्तु विशेष परिस्थितियों में दलगत संगठनों के पास भी बड़े संगठनों के कार्य हो सकते हैं जैसे टाटा आयरन वर्क्स, बिरला टैक्सटाइल मिल्स। परन्तु विशेष बात यह है कि दलगत प्रशासन की परिधि में बड़े पैमानों के संगठन कम पाये जाते हैं।

  6. उत्तरदायित्व

    (Responsibility)- उत्तरदायित्व की दृष्टि से भी दलगत प्रशासन लोक प्रशासन से भित्र हैं। लोक प्रशासन में जनता के प्रतिनिधि मंत्रिमंडलीय उत्तरदायित्व की प्रणाली द्वारा कार्यपालिका के सदस्यों से उनके विभागों में होने वाली बातों का स्पष्टीकरण करा सकते हैं। सरकार को व्यवस्थापिका की इच्छानुकूल अपने आचरण का गठन करना पड़ता है। सरकार के द्वारा रक्षित अभिलेखों की जाँच जनता द्वारा की जाती है। परन्तु यह बात दलगत प्रशासन के सम्बन्ध में सत्य नहीं है। दलगत प्रशासन बहुत ही कम सीमा तक तथा परोक्ष रूप में जनता के प्रति उत्तरदायी है।

  7. सामान्य व्यवहार के दृष्टिकोण से

    (From the point of view of general behaviour)— व्यवहार की समानता लोक प्रशासन का मूल लक्षण है। समान परिस्थितियों में सरकारी कर्मचारियों का व्यवहार सबके प्रति एक सा होता है। इसके विपरीत दलगत प्रशासन में पक्षपात की भरमार रहती है, क्योंकि उसका मूल आधार अतिरिक्त लाभ है। एक दुकानदार उस व्यक्ति को उधार देने में संकोच नहीं करता जो उससे रोज सौदा लेता है। परन्तु एक बुकिंग क्लर्क रोजाना रेल यात्रा करने वाले को टिकट उधार नहीं देता। दलगत प्रशासन में उन व्यक्तियों के प्रति अगाध रुचि प्रकट की जाती है जिनसे फर्म को अधिक से अधिक लाभ हो सकता हो।

  8. सेवा सुरक्षा की दृष्टि से

    (From the point of view of security of service)- लोक प्रशासन में दलीय प्रशासन के विपरीत कर्मचारियों की सेवायें अधिक रक्षित रहती हैं। सरकारी सेवाओं में कर्मचारियों को सुरक्षा का विश्वास होता है। दलगत सेवाओं से मनोवैज्ञानिक रूप से कर्मचारी अपने को सुरक्षित नहीं समझते।

  9. सेवा तथा मूल्य की दृष्टि से

    (Cost and Service)- लोक प्रशासकीय कार्यों में करों द्वारा अनुमानतः उतनी धनराशि ली जाती है जितनी कि सार्वजनिक कार्यों के करने में सरकार को खर्च करनी पड़ती है। भरतपुर से जयपुर तक तार देने का व्यय लगभग सरकार उतना ही लेती है जितना कि उस पर खर्च आता है। सरकारी बजट को देखने से यह पता चल सकता है कि प्रायः उसमें घाटा रहता है इसका मूल कारण क्या है? सेवा सम्बन्धी सरकारी कार्यों में व्यय होने वाले मूल्य से भी कुछ कम ही लिया जाता है। परन्तु इसके विपरीत दलगत प्रशासन में सेवा के बदले में कम मूल्य लेने का प्रश्न ही नहीं उठता। बस में अगर सवारियाँ न हों तो बस मालिक अपनी बस नहीं ले जाता और यदि कम है तो समय की पाबन्दी नहीं रखता। उनका लक्ष्य जनता से अधिक से अधिक पैसा खींचना है।

  10. अतिरिक्त लाभ की दृष्टि से

    (Surplus profit)- लोक प्रशासन में बची हुई धनराशि को पुनः सार्वजनिक हित के कार्यों में लगा दिया जाता है। इसके विपरीत दलगत प्रशासन में अतिरिक्त लाभ की पूँजी को श्रमिकों की दशा को सुधारने के लिए नहीं लगाया जाता वरन् पूँजीपतियों की जेबों में चला जाता है अथवा शोषण के नवीन यंत्रों के उत्पादन में लग जाता है जिससे उसके लाभ की मात्रा ही बढ़ती रहती है।

  11. विधि की दृष्टि से

    (From the point of view of method)- लोक प्रशासन अपने उत्तरदायित्वों को उचित रूप से निभाने के लिए कठोरता एवं सत्य का प्रयोग करता है परन्तु दलगत प्रशासन में खुशामद तथा नैतिक पहुँच से काम लिया जाता है।

  12. महत्वपूर्ण कार्यों की दृष्टि से

    (From the point of view of important works)- लोक प्रशासन का सम्बन्ध ऐसे महत्वपूर्ण कार्यों के करने से है जो मनुष्य के भौतिक अस्तित्व के लिए नितान्त आवश्यक है, ऐसे कार्य जिनके बगैर जीवन सम्भव नहीं हो सकता। इसके विपरीत दलगत प्रशासन का सम्बन्ध ऐसे कार्यों से है जैसे दूध की सप्लाई। सैन्य संगठन जैसे महत्वपूर्ण कार्यों से उनका सम्बन्ध नहीं है।

  13. मनोवैज्ञानिक दृष्टि से

    (From the psychological stand point)– दोनों प्रकार के प्रशासनों में मनोवैज्ञानिक अन्तर भी है। दलगत प्रशासन की भांति लोक प्रशासन के कर्मचारी हड़ताल तथा असहयोग आदि जैसे यंत्रों का प्रयोग उस स्वतंत्रता के साथ नहीं कर पाते अपितु उनके मस्तिष्क में एक प्रकार का मनोवैज्ञानिक भय स्थापित हो जाता है।

  14. कर्तव्यों की सीमा की दृष्टि से

    (From the point of view of limits on obligations)- वैसे तो दोनों ही प्रकार के प्रशासनों में कर्मचारियों के कर्तव्यों एवं अधिकार की सीमाओं का वर्णन होता है परन्तु दलीय प्रशासन के कर्मचारियों के कर्तव्यों तथा अधिकारों का वर्णन राजकीय कर्मचारियों की भाँति व्यापक नहीं होता।

  15. दिखावे की दृष्टि से

    (From the point of view of show and exhibition)- व्यक्ति सरकारी सेवा का चाहे कितना ही विशिष्ट सदस्य क्यों न हो वह अपने नाम का प्रचार आदि नहीं करता जब तक कि नितान्त ही आवश्यक न हो। सरकारी कर्मचारियों की भर्ती के लिए जब वह विज्ञापन देता है तो उसमें अपने नाम की अपेक्षा अपने पद का नाम देना अधिक पसन्द करता है। इस प्रकार जनता उसके नाम विशेष से कम परिचित हो पाती है। इसके विपरीत दलीय प्रशासन में वही सदस्य अपने को विज्ञापनों द्वारा लोकप्रिय बनाने की चेष्टा करता है।

  16. कार्य कुशलता की दृष्टि से

    (From the point of view of efficiency)- कुछ लेखकों के अनुसार इन दोनों प्रकार के प्रशासनों में अन्तर कार्यकुशलता के आधार पर किया जा सकता है। दलीय प्रशासन के कर्मचारी लोक प्रशासन के कर्मचारियों की अपेक्षा अधिक रुचि एवं परिश्रम के साथ कार्य करते हैं। लोक प्रशासन के कर्मचारियों की अपेक्षा उनकी कार्यक्षमता कहीं अधिक होती है। इस सम्बन्ध में दलीय प्रशासन के समर्थक एक बड़े ही उपहासजनक बात कहते हैं। एक बार किसी सरकारी कर्मचारी के मस्तिष्क का आपरेशन किया गया। आपरेशन समाप्त होने पर शल्य चिकित्सक दिमाग को अन्दर रखना भूल गया। वह मेज पर ही रखा रहा। उसने सिर में टाँके भर दिया कई दिन इसी प्रकार बीत गये। उस कर्मचारी ने जिक्र तक नहीं किया। हारकर डाक्टर महोदय ने ही उनको सूचित किया कि वे अपना दिमाग ले जाय जो आपरेशन के समय त्रुटि से बाहर रखा गया था, जब वह कर्मचारी स्वयं आया तो डाक्टर ने विस्मय के साथ पूछा कि वह इतने दिनों बिना दिमाग के कैसे कार्य करता रहा। उस सरकारी कर्मचारी ने हँस कर कहा कि सरकारी नौकरी में दिमाग की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, इसके बिना भी कार्य चल सकता है। यद्यपि सरकारी कर्मचारी का यह मूल्यांकन सत्य नहीं है।

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