लोकतांत्रिक प्रशासन की विशेषताएँ

लोकतांत्रिक प्रशासन की विशेषताएँ

जनतन्त्रीय/ लोकतांत्रिक प्रशासन की विशेषताएँ

(Characteristics of Democratic Administration)

  1. जन इच्छा का सम्मान (Respect of Public Will)-

    लोकतंत्र में प्रशासन जनता के लिए है न कि जनता प्रशासन के लिए, जनता तथा प्रशासन में साझेदारी होनी चाहिए। प्रशासन की सफलता जनइच्छा के विश्लेषण तथा उसे भली भांति समझकर उसके अनुकूल आचरण करने में है। जितनी गहनता के साथ प्रशासन उसे समझने में समर्थ सकेगा, उतना ही सफल वह माना जायेगा। इसके लिए प्रशासन को जन सम्पर्क का एक व्यापक जाल बिछाना होगा। इसीलिए तो यह कहा जाता है कि प्रशासन अन्त में एक मानवीय समस्या है।

  2. प्रचार एवं प्रसार (Propaganda and Broadcasting)—

    जनतन्त्र में प्रशासकीय गुप्त नहीं रखे जाते, प्रशासकीय निर्णयों की पूरी जानकारी जनता को उपलब्ध करायी जाती है और यह जानकारी जितनी व्यापक होगी उसी अनुपात में प्रशासन अपने अभीष्ट की पूर्ति करने में सफल हो सकेगा। इसी कारण लोकतंत्र में विचारों को स्वतन्त्रता के साथ प्रकट करने के अवसर प्रदान किये जाते हैं। जनता क्या चाहती है और उसके द्वारा किये गये निर्णय किस सीमा तक उनके समर्थन को प्राप्त करने में सफल हो सकेंगे, इसका पता लगाने के लिए तथा अपने पक्ष में एक वातावरण उत्पन्न करने के लिए सरकार प्रचार तथा प्रसार का खुलकर प्रयोग करती है। इसके लिए सरकार के पास एक विभाग भी होता है।

  3. समानता एवं सहयोग (Equality and Cooperation)—

    प्रजातंत्र में मित्रता तथा भाई-चारे की भावना उभर कर आनी चाहिए। प्रशासकीय वर्ग में हुकूमत तथा अत्रदाता की बू नहीं रहनी चाहिए, ये सामन्तवादी कृतज्ञता प्रकट करने के माध्यम अब समय के अनुकूल नहीं रहे। प्रशासन सेवक है प्रभु नहीं है। यद्यपि हमने स्वतन्त्रता की रजत जयंती मना ली किन्तु अपने प्रशासकीय वर्ग में से इस सामन्तवादी धारणा का ड्राइक्लीनिंग नहीं कर सके। आज भी शासकीय कर्मचारी अपने को जन सेवक कहने में शर्म महसूस करते हैं। वस्तुतः जनतन्त्र में प्रशासन सहयोग एवं समानता की धारणा पर अवलम्बित है। अतः प्रशासन को व्यक्तियों की आर्थिक एवं सामाजिक समस्याओं में झाँक कर देखना चाहिए।

  4. स्वेच्छाचारिता पर नियंत्रण (Control on Laissez Faire)-

    जनतन्त्र में प्रशासन उद्दण्ड एवं स्वेच्छाचारी नहीं बन सकता। वह नियंत्रण की चहारदीवारी में पनपता है। नियंत्रणों में रहकर अपने कार्यों का सम्पादन करता है। एक ओर उस व्यवस्थापिका का नियंत्रण रहता है तो दूसरी ओर न्यायपालिका का। किन्तु अयुजान्तन्त्रीय राज्यों में कर्मचारी वर्ग उच्छृखल एवं अनुत्तरदायी बन जाता है किन्तु जनतन्त्रीय व्यवस्था में नौकरशाही को नियंत्रण में ही कार्य करना पड़ता है।

लोक प्रशासन व्यक्ति के जीवन का एक आवश्यक तत्व है जिसके अभाव का अर्थ है अराजकता। अराकतावादी तो राज्य को बिल्कुल समाप्त करने के ही पक्ष में हैं। व्यक्तिवादी उस शासन को सर्वोत्तम मानते हैं जो कम से कम हस्तक्षेप तथा शासन करे। राज्य के कार्यों को वे निश्चित करके उसे पुलिस राज्य की संज्ञा प्रदान करना चाहते हैं। आदर्शवादी लेखक व्यक्ति को साधन तथा राजा को साध्य बताकर उसे मानव मस्तिष्क की अभिव्यक्ति कहते हैं, और दोनों के परस्पर द्वन्द्व की कल्पना भी नहीं करते किन्तु राज्य का वर्तमान स्वरूप समाजवादी विचारधारा से प्रभावित होकर व्यापक क्षेत्राधिकार के पक्ष में है। औद्योगिक विकास ने राज्य के भौतिकवादी स्वरूप को प्रबल करके उसे अधिक से अधिक व्यक्ति के सन्निकट ला दिया है। राज्य का वर्तमान स्वरूप लोकहितकारी है जिसमें उत्पादन का ध्येय पोषण न होकर सेवा है। लोकहितकारी राज्य वह है जो कि व्यक्तिगत एवं सार्वजनिक हितों में समन्वय स्थापित करके व्यापक हित की ओर देखता है। लोकहितकारी राज्य का लक्ष्य व्यक्ति का सर्वांगीण विकास है। लोकहितकारी राज्य की उपमा भारत के भूतपूर्व शिक्षामंत्री श्री छागला ने ऐसे पुल से दी है जो कि व्यक्ति और राज्य के मध्य खाई को पाटता है। लोकहितकारी राज्य किसी वर्ग विशेष के हित से सम्बन्धित नहीं होता। जीवन का कोई क्षेत्र ऐसा अवशिष्ट नहीं रहता जिसमें कि राज्य का हस्तक्षेप न हो। प्रो० कैन्ट के अनुसार एक कल्याणकारी राज्य से अभिप्राय “उस राज्य से है जो नागरिकों के लिए विस्तृत सेवाएं प्रदान करता है। कल्याणकारी राज्य से अभिप्राय पूर्ण समानता से नहीं है।’ डॉ० मार्क इब्राहम के शब्दों में “लोकहितकारी राज्य का एक ऐसा समाज है जहाँ प्रत्येक नागरिक के लिए आय का अधिक समान वितरण तथा उसके कार्य उसकी सम्पत्ति के बाजार भाव पर ध्यान न देकर उसके लिए एक न्यूनतम जीवन की न्यूनतम व्यवस्था करने के उद्देश्य से राज्य की शक्ति का प्रयोग जानबूझकर आर्थिक क्रियाओं एवं प्रतिक्रियाओं के सामान्य सन्तुलन में संशोधन करने के लिए किया जाता है।” श्री जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था कि “सबके लिए समान अवसर प्रदान करना, अमीरों तथा गरीबों के बीच अन्तर मिटाना तथा रहन-सहन के स्तर को ऊँचा उठाना लोकहितकारी राज्य के आधारभूत तत्व हैं। प्रो0 …..ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में लोकहितकारी राज्य के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि “वह एक ऐसा समाज है जिसमें जीवन का न्यूनतम स्तर प्राप्त करने का विश्वास तथा अवसर प्रत्येक नागरिक के अधिकार में होते हैं।’ आर्थर सैलेन्जर के अनुसार “लोकहितकारी राज्य वह व्यवस्था है जिसके अन्तर्गत सरकार अपने समस्त नागरिकों के लिए रोजगार, आय, चिकित्सा, सामाजिक सुरक्षा तथा आवास के कुछ स्तर स्थापित करने के लिए तैयार रहती है।” लोकप्रिय इतिहासकार टॉयनबी ने सन् 1951 में कहा था कि बीसवीं शताब्दी की याद होती रहेगी, उसके युद्धों एवं अपराधों के कारण नहीं वरन् इसलिए कि इतिहास में मनुष्य ने प्रथम बार यह सोचा है कि सभ्यता के लाभ से समस्त समाज का हित सम्भव हो सके तथा समस्त मानव जाति लाभ उठा सके। अतः व्यक्ति को राम भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। लोकहितकारी स्वरूप के कारण राज्य का कार्यक्षेत्र दिन-प्रतिदिन व्यापक होता जाता है और निश्चय ही कभी-कभी मन में यह शंका भी होने लगती है कि क्या राज्य इस भार को सहन भी कर पायेगा।

किन्तु लोकहितकारी राज्य की सफलता का रहस्य प्रशासन की कार्यकुशलता में निहित है। इसके माध्यम से ही राज्य लोकहित के विविध लक्ष्यों की पूर्ति करने में सफल हो सकता है इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रशासन की असफलता सभ्यता के प्रसाद को ध्वस्त कर देगी। हार्वर्ड  विश्वविद्यालय के प्रो0 डोनहम ने कहा है यदि हमारी सभ्यता असफल हो जाती है तो हमें समझ लेना चाहिए कि हमारे प्रशासन का पतन हो गया है, प्रशासन के ही प्रयोग से विज्ञान और दर्शन का विकास संभव हो सकता है। आर्थिक जीवन के लक्ष्य प्रशासन की कार्यकुशलता के ही माध्यम से ही प्राप्त किये जा सकते हैं। प्रशासन व्यक्ति के जीवन में इतनी गहराई के साथ घुस गया है कि हम यह अनुभव ही नहीं कर पाते कि वह हमसे कोई प्रथक् वस्तु है। व्यक्ति के जन्म से लेकर उसकी अन्त्येष्टि तक प्रशासन उसके जीवन पर छाया रहता है। संकट में प्रशासन एक सच्चा मित्र है और शांति में एक कुशल सलाहकार। सरकारें बदलती रहती हैं किन्तु प्रशासन स्थायी रहता है। प्रशासन के व्यापक महत्व में औद्योगिक विकास का सबसे बड़ा महत्व है। संचार साधनों की सम्पन्नता ने उसे अत्यन्त व्यावहारिक बना दिया है। योजनाओं ने उसे विशेषीकरणों की ओर अग्रसर किया है। राष्ट्र के समस्त लोगों को काम पर लगाने का उत्तरदायित्व लोक प्रशासन पर आता है। सरकार को दमनकारी समझने का विचार दूर जा चुका है, अधिक से अधिक ही हस्तक्षेप करके राजा व्यक्ति को अधिक से अधिक स्वतन्त्र बना सकता है आज लोक प्रशासन के लिए लोकहितकारी राज्य के दायित्व को एक बहुत बड़ी चुनौती है।

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