मुस्लिम समाज का सुधार आन्दोलन

मुस्लिम समाज में सुधार आंदोलन

मुस्लिम समाज में सुधार आंदोलन

अठारहवीं शताब्दी की शुरूआत के साथ ही मुगल साम्राज्य पतन के रास्ते पर अग्रसर हो गया था। इस शताब्दी के दौरान मुस्लिम समाज में भी पतन की प्रक्रिया स्पष्ट होने लगी। ऐसी ही परिस्थितियों में रायबरेली के सैय्यद अहमद ने शेख अहमद सरहिंदी (1562-1624) की तरह ही मुसलमानों की भलाई के वास्ते इस्लाम को बाहरी तत्वों से मुक्त करने का काम शुरू किया। कुरान को अच्छी तरह समझने के लिए उन्होंने फारसी में उसका अनुवाद किया। सैय्यद अहमद का कार्यक्षेत्र धार्मिक और सामाजिक सुधार तक ही सीमित नहीं रहा, अपितु पंजाब के मुसलमानों को सिखों के प्रभुत्व से निकालने के वास्ते एक सैनिक अभियान पर चल पड़े। लेकिन अभियान विफल रहा और 1831 में बालाकोट में उनकी पराजय एवं मृत्यु हो गई।

रायबरेली के सैयद अहमद के आंदोलन का सबसे बड़ा परिणाम यह हुआ कि उन्होंने मुसलमानों की बिगड़ती दशा की ओर उनका ध्यान आकृष्ट कर दिया। सैयद अहमद को अपनी कोशिशों में जिनका सहयोग मिला उनमें शाह मुहम्मद और मौलाना अब्दुल और मौलाना अब्दुल हई के नाम उल्लेखनीय हैं। सैयद अहमद का दान ‘प्यूरिटन’ और उग्र था। यह आंदोलन वहाबी आंदोलन के नाम से जाना गया। इस दल का मुख्य केन्द्र पटना था।

एक दूसरा दल शांति से सुधार लाने के पक्ष में था। इसकी प्रेरणा शाह वली उल्लााह ने दी थी। इस आंदोलन का भी मुख्य उद्देश्य भारतीय इस्लाम को बाहरी तत्वों से मुक्त कराना था। पूर्वी भारत में इसके मुख्य नेता शेख करामत अली और हाजी शरीयत उल्लाह थे।

19वीं शताब्दी में मुसलिम समाज और धर्म में सुधार के लिए एक आंदोलन चला जिसे ‘अहमदिया आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है। मिर्जा गुलाम अहमद (1838-1908) इसके संस्थापक थे और उन्हीं के नाम पर इसे ‘अहमदिया आंदोलन’ कहा गया। इसके नेता ने अपने को हजरत मुहम्मद की बराबरी में इस्लाम का मसीहा माना। बाद में उन्होंने अपने को कृष्ण का अवतार भी कहना शुरू कर दिया। इन्हीं सब कारणों से इस आंदोलन को शास्त्रविरुद्ध एवं भ्रांत माना गया। यह आंदोलन पंजाब के गुरदासपुर जिले के कादिया नगर से आरंभ हुआ था और मिर्जा गुलाम अहमद ने अपने सिद्धान्तों की व्याख्या अपनी मुख्य पुस्तक बराहीन-ए-अहमदिया में की थी।

अलीगढ़ आंदोलन और सैयद अहमद खाँ

उपर्युक्त आंदोलन अभी तक मुसलिम समाज के निचले स्तर पर ही काम कर रहे थे। अंग्रेजी शासन और पश्चिम के साथ संपर्क की चुनौती को स्वीकार करने के लिए अब तक कुछ भी नहीं हुआ था। इस बीच मुसलमानों की दशा बिगड़ती गई। मुगल शासन का अंत होने से मुसलमान अपने अतीत के गौरव और प्रभुत्व को पुनः स्थापित करने में अंतिम रूप से असफल हो गये। अंग्रेजी प्रभुत्व की स्थापना से मुगलों एवं उनके नवाबों का राज्य उनके हाथ से निकल गया। उनके मुसलमान दरबारियों और कारिंदों की रोजी-रोटी चली गई और मुसलमानों के एक बड़े वर्ग का विशेषाधिकार उनसे छिन गया। अंग्रेजी की मुसलमान-विरोधी नीति और मुसलमानों के आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा के प्रति पूर्वाग्रह ने मुसलमानों को धीरे-धीरे अंग्रेजी सरकार की नौकरियों से भी अलग कर दिया और उनकी भौतिक संवृद्धि के सभी सुअवसर छीन लिए। इसी बीच 1857 के विश्वेह का धमाका हुआ। इसमें मुसलमानों ने अंग्रेजों का सक्रिय विरोध किया। लेकिन अंततः विरोध असफल रहा। मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर को कैद कर उसके शासन को समाप्त कर दिया गयां इसके बाद मुसलमानों का दमन शुरू हुआ। इस प्रकार सारी परिस्थितियाँ मुसलमानों के विरूद्ध होती गई और उनका समाज पतन की ओर बढ़ता गया। ऐसे ही समय में सैयद अहमद खाँ (1817-98) का आविर्भाव हुआ जिन्होंने मुसलिम समाज को पुनर्जीवन प्रदान किया।

सैयद अहमद का जनम दिल्ली के नाममात्र के मुगल दरबार से भी संबद्ध रहे। विरासत में उन्हें मुगलकालीन दिल्ली की सर्वश्रेष्ठ परंपरायें मिली थी। अपने समय के योग्यतम विद्वानों से उन्हें शिक्षा ग्रहण करने का मौका मिला। प्रारंभ से ही उनका मन जिज्ञासु था और उनमें एक सुधारक की विशेषताएं मौजूद थीं।

अपनी जन्मजात जिज्ञासा और पश्चिमी शिक्षा के प्रभाव में सैयद अहमद ने भारतीय मुसलमानों के पुनरूद्धार एवं भलाई के वास्ते पहले अपने धर्म और समाज का अध्ययन किया और फिर लेखन द्वारा अपने सुधारवादी विचारों का प्रचार शुरू किया। उन्होंने कुरान पर एक टीका (कमेंटरी) लिखी तथा तहजीब उल-अखलाक नामक पत्रिका निकाली। वे आधुनिक वैज्ञानिक विचारों से पूर्णरूपेण प्रभावित थे, जिसका वे जिंदगीभर इस्लाम से समन्वय कराने में प्रयत्नशील रहे। इस दृष्टि से उन्होंने घोषित किया कि इस्लाम धर्म के लिए केवल कुरान ही मान्य ग्रंथ है, बाकी सभी लिखित सामग्री गौण है। लेकिन कुरान की व्याख्या उन्होंने आधुनिक विज्ञान और बुद्धि के प्रकाश में की। उनके अनुसार कुरान की कोई भी व्याख्या जो मानव-विवेक और विज्ञान के विरूद्ध हो, सही नहीं है। उन्होंने परंपराओं के अंधाधुंध अनुसरण, रूढ़िवादी रीति-रिवाजों, अज्ञान और विवेकहीनता (Irrationalism) का विरोध किया। उन्होंने धार्मिक कट्टरता, मानसिक संकीर्णता और अलगाववाद का भी विरोध किया और मुसलमानों को सहनशील और उदार होने को कहा।

सैयद अहमद धार्मिक सहिष्णुता और सभी धर्मों की अंतर्निहित एकता में विश्वास रखते थे। वे सांप्रदायिक टकराव के विरोधी थे। उन्होंने 1883 में लिखा था। तत्काल हम दोनों (हिन्दू और मुसलमान) भारत की हवा पर जिंदा हैं। हम गंगा और यमुना का पवित्र जल पीते हैं। हम दोनों भारतीय भूमि की पैदावार खाकर जीवित हैं। हम दोनों एक ही देश के हैं, हम एक राष्ट्र के हैं और देश की प्रगति तथा भलाई हमारी एकता, पारस्परिक सहानुभूति और प्रेम पर निर्भर है। जब कि हमारी पारस्परिक असहमति जिद और अवरोध तथा दुर्भावना हमारा विनाश निश्चित रूप से कर देगी।

फिर भी अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे हिन्दू प्रभुत्व की बात करने लगे थे और उन्होंनेअपने समर्थकों को अंग्रेजों का साथ देने तथा उन्हें भारत के राष्ट्रीय आंदोलन से अलग रहने की सलाह दी थीं निश्चित ही वे हिन्दू-बहुलता से अनावश्यव रूप से भयभीत हो गये थे। पुनः उनका ख्याल था कि बिना अंग्रेजों के सहयोग के तात्कालिक परिस्थितियों में मुसलमानों की प्रगति नहीं हो सकती थी। लेकिन उनके पृथकतावादी दृष्टिकोण के लिए अंग्रेजों की कूटनीति और कुछ हिन्दुओं की कट्टरपंथी नीति भी जिम्मेदार थी।

चूँकि सैयद अहमद का यह पक्का विश्वास था कि मुसलमानों का उत्थान पश्चिम के आधुनिक ज्ञान-विज्ञान और विचारों के सहारे ही हो सकता था, अतः वे आजीवन आधुनिक रूप में उन्होंने विभिन्न शहरों में स्कूलों की स्थापना कराई और कई पश्चिमी पुस्तकों का उर्दू में अनुवाद करवाया। 1864 में उन्होंने एक ‘साइंटिफिक सोसायटी’ (विज्ञान समिति) की स्थापना की। इस सोसायटी ने अंग्रेजी पुस्तकों (विज्ञान और अन्य विषयों पर) का उर्दू अनुवाद प्रकाशित किया और सामाजिक सुधार के संबंध में उदारवादी विचारों के लिए एक अंग्रेजी उर्दू-पत्रिका प्रकाशित की।

1875 में अलीगढ़ में मोहम्डन ऐंग्लो ओरियंटल कॉलेज की स्थापना की। यह उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थीं। आगे चलकर यही कॉलेज अलीगढ़ यूनिवर्सिटी के रूप में विकसित हुआ। कालांतर में यह संस्था भारतीय मुसलमानों का सबसे महत्वपूर्ण शैक्षिक संस्थान बन गया। लम्बे अर्से तक इसने अपने विद्यार्थियों को आधुनिक दृष्टिकोण प्रदान किया और इस प्रकार भारतीय मुसलमानों के जागरण में उल्लेखनीय योगदान किया।

चूँकि सैयद अहमद के कार्यक्रम का मुख्य केन्द्र अलीगढ़ था, अतः इस आंदोलन को प्रायः ‘अलीगढ़ आंदोलन’ के नाम से जाना जाता है। चिराग अली, उर्दू कवि अल्ताफ हुसैन हाली, नजीर अहमद और मौलाना शिवली नोमानी अलीगढ़ स्कूल के प्रमुख नेताओं में से थे।

अलीगढ़ आंदोलन और उसके संस्थापक सैयद अहमद खाँ दोनों की कुछ (मुख्यतः हिन्दू) इतिहासकारों ने भर्त्सना की है। इन इतिहासकारों के अनुसार इस आंदोलन के परिणामस्वरूप ही देश में सांप्रदायिकता की शुरुआत हुई और अंततः देश का विभाजन हो गया। इस तथ्य में आंशिक सत्यता है। मगर इस आंदोलन का एक दूसरा पक्ष भी है। यदि हम इस आंदोलन का मुसलमानों की दृष्टि से मूल्यांकन करें तो यह उतना हिन्दू-विरोधी नहीं लगता जितना मुसलमानों का समर्थक। भारत में मुसलमानों के लिए इस आंदोलन का वही स्थान है जो हिन्दुओं के लिए 19वीं शताब्दी के भारतीय पुनर्जागरण का। इसमें संदेह नहीं कि इस आंदोलन ने मुसलमान समुदाय को 1857 के विद्रोह के बाद की निराशा और दयनीय स्थिति से बाहर निकाला, और उसे उसके मध्यकालीन महौल से बाहर निकालकर आधुनिक युग के मार्ग पर अग्रसर किया। राममोहन की तरह ही सैयद अहमद का भी विश्वास था कि अंग्रेजी शिक्षा तथा पश्चिमी ज्ञान के माध्यम से ही मुसलमानों के समाज को आधुनिक एवं उन्नत बनाया जा सकता है। इतना ही नहीं, इस उद्देश्य की प्राप्ति के मार्ग में उन्होंने उन बाधक तत्वों को भी उखाड़ फेंकने की कोशिश की जो उस समय खुद मुसलमानों के धर्म और समाज में व्याप्त थे। इसका कट्टरपंथी मुसलमानों ने काफी विरोध किया, परंतु सैयद अहमद उनसे भी जूझते रहे। सच तो यह है कि मुसलिम समाज को आधुनिक बनाने के लिए वे कोई भी कीमत चुकाने को तैयार थे। इस उत्साह से उन्होंने तात्कालिक ऐतिहासिक शक्तियों एवं कई सामाजिक परिस्थितियों को नजर अंदाज किया, जिसके घातक परिणाम सिद्ध हुए। उदाहरणार्थ उनकी धारणा थी कि मुसलमानों की उन्नति पश्चिमी शिक्षा और अंग्रेजों के सहयोग के बिना नहीं हो सकती थी। अतः उन्होंने राष्ट्रवादी भारतीयों का साथ न देकर अंग्रेजों के साथ सहयोग किया तथा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का विरोध किया। देश की तात्कालिक राजनीति से दूर रहकर अंग्रेजों के साथ सैयद अहमद के सहयोग करने के

कुछ अन्य कारण भी थे। सैयद अहमद की धारणा थी कि मुसलमानों के उत्थान के लिए उनका सांस्कृतिक (विशेषकर शिक्षा के क्षेत्र में) और सामाजिक उत्थान अति आवश्यक है इसी वजह से उन्होंने मुसलमानों को सामान्यतः राजनीति से अलग रखकर उन्हें शैक्षिक और बौद्धिक उन्नति के कार्य में लगाये रखा। दूसरे, अंग्रेजों के विरूद्ध वे इसलिए भी आवाज नहीं उठाना चाहते थे क्योंकि तब तक मुसलमान राजनीतिक दृष्टि से अनुभवहीन एवं अधकचरे तथा संगठन और सामरिक दृष्टि से बहुत कमजोर थे। इस बात का भरपूर प्रमाण उन्हें वहाबी आंदोलन तथा 1857 के विद्रोह के अंग्रेजों द्वारा दमन में मिल चुका था। व्यावहारिक दृष्टि से यह धारणा एवं उससे संबद्ध कार्यवाहिया गौरवाजिब नहीं थी, लेकिन इसके परिणामस्वरूप हिन्दू और मुसलमानों के बीच दूरी बढ़ती गई। ‘फूट डालो और शासन करो’ की नीति में विश्वास करने वाले अंग्रेजों ने इस स्थिति का नाजायज फायदा उठाया तथा राष्ट्रीय जनजीवन में सांप्रदायिकता की भावना उत्तरोत्तर जड़ जमाती गई। वैसे इसके कई अन्य कारण भी थे, फिर भी सैयद अहमद को इस जिम्मेदारी से बरी नहीं किया जा सकता। हाँ एक बात जरूर है कि यह आपसी अलगाव सैयद अहमद के हिन्दू-विरोधी होने से नहीं बल्कि उनके मुसलमानों के अंध-समर्थक होने की वजह से हुआ।

मुहम्मद इकबाल

जिस तरह सर सैयद अहमद खाँ ने 19वीं शताब्दी में मुसलमानों के धार्मिक एवं राजनीतिक चिंतन को प्रभावित किया था उसी तरह 20वीं शताब्दी में मुहम्मद इकबाल (1875-1935) ने उसे प्रभावित किया। इकबाल आधुनिक भारत की महत्वपूर्ण हस्ती (कवि, दार्शनिक एवं राजनीतिक चिंतक) थे। उन्होंने अपनी कविताओं और दर्शन से मुसलमान तथा हिन्दू दोनों की युवा पीढ़ी के धार्मिक दृष्टिकोण को महत्वपूर्ण ढंग से प्रभावित किया।

इकबाल के व्यक्तित्व के विकास में पहले इस्लाम के क्लासिकल (चिरसम्मत) ज्ञान का प्रभाव पड़ा तथा बाद में लाहौर में पाश्चात्य शिक्षा का। 1905-1908 तक उन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन किया और ‘फारस में तत्वमीमांसा के विकास’ विषय पर म्यूनिख में अपना शोधप्रबंध पूरा किया। कालक्रम से इकबाल ने अलग-अलग विषयों पर कविताएँ लिखीं और उन्हीं के माध्यम से उनका दर्शन प्रस्तुत हुआ। विवेकानन्द की तरह ही इकबाल ने भी सतत परिवर्तन एवं सतत प्रयत्न की आवश्यकता पर बल दिया और आत्मसमर्पण, निष्क्रियता और आत्मतोष की भर्त्सना की। उन्होंने एक ऐसे सक्रिय और गतिशील दृष्टिकोण अपनाने की अपील की जिससे विश्व को बदला जा सके। वस्तुतः इकबाल बड़े मानवतावादी थे। वे मानवीय प्रयत्न को सर्वोच्च गुण मानते थे। उनका कहना था कि इनसान को किसी भी शक्ति, यहाँ तक कि प्रकृति के सम्मुख भी नहीं झुकना चाहिए, बल्कि उसे अपने प्रयत्नों से दुनिया को काबू में करना चाहिए। उनके लिए इहलोक’ ज्यादा महत्वपूर्ण था। अतः उन्होंने कर्मकांड, तप तथा परलोकवादी दृष्टिकोण की आलोचना की और सलाह दी कि आदमी को अपने प्रयत्न द्वारा इसी जीते-जागते संसार में सुख प्राप्त करने की कोशिश करनी चाहिए।

उर्दू काव्य साहित्य के विकास में मुहम्मद इकबाल की देन उल्लेखनीय है। उनकी प्रारंभिक कविताओं में बच्चों की कवितायें है और उनमें प्रकृति के बारे में भी लिखा गया है। एक भारतीय के रूप में उनकी प्रारंभिक कविताओं में देशभक्ति की भावना व्यक्त हुई। पर बाद में उनकी कविताओं की विषय-वस्तु बदलने लगती है। 1905 और 1908 के बीच अपने यूरोपीय प्रवास के दौरान इकबाल भारतीय राष्ट्रीयता से विमुख होकर ‘पान-इस्लामिज्म’ की ओर आकृष्ट होने लगे। 1908 और 1924 के बीच लिखी गई उनकी कविताओं में राजनीतिक समानियत की प्रमुखता है जिसमें आधुनिक विश्व में इस्लाम की दशा पर विचार किया गया है। इस्लाम के प्रति उनका यह आकर्षण बढ़ता ही गया और बाद में उनेंने मुस्लिम पृथकता को भी बढ़ावा दिया।

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