दक्षिण भारत में सुधार आन्दोलन

दक्षिण भारत में सुधार आन्दोलन

दक्षिण भारत में सुधार

उत्तरी और पश्चिमी भारत में होने वाले सुधारों का प्रभाव दक्षिण भारत पर भी पड़ा। केशवचंद्र सेन की मिशनरी गतिविधियों के फलस्वरूप 1864 में मद्रास में ‘वेद समाज’ की स्थापना हुई। 1871 में श्रीधरलू नायडू ने इस संगठन को पुनः संगठित किया और इसका नाम ‘ब्रह्म समाज ऑफ साउथ इंडिया’ रखा गया। 1871 में बंगाल समाज में फूट पड़ने के बाद, साधारण ब्रह्म समाज के नेता शिवनाथ शास्त्री मद्रास गए और आंदोलन को शक्ति प्रदान की। एम० बुचीआह पंतुलू और आर0 वेंकट रत्नम समाज के प्रमुख नेता थे।

परंतु दक्षिण में ब्रह्म समाज आंदोलन बड़ी धीमी गति से बढ़ा। वास्तव में यह आंदोलन वहाँ कभी भी सशक्त नहीं हो पाया। मद्रास में ब्रह्म समाज से ज्यादा प्रार्थना समाज का प्रभाव रहा। दक्षिण में प्रार्थना समाज के प्रसार का सबसे बड़ा श्रेय वीरेसलिंगम पंतुलू को है। 1878 में उन्होंने तेलुगु प्रदेश में आंदोलना की शुरूआत की और ‘राजमुन्द्री सोसल रिफार्म एसोसिएशन’ की स्थापना की। वीरेसलिंगम् अपने समय के तेलुगु के सबसे बड़े विद्वान थे जिनका तेलुगु भाषा की उन्नति में बड़ा योगदान रहा। भारत के परंपरावादी विश्वासों पर अंग्रेजी संपर्क के प्रभाव से लेकर जाति प्रथा एवं मूर्तिपूजा के दोष तक उनके चिंतन के विषय थे। उनका व्यक्तित्व महान था और तत्कालीन आंदोलन के वे स्वयं कर्णधार थे। तब बंबई की तरह मद्रास में सुधारकों का कोई ऐसा दल नहीं था जो किसी आंदोलन को आगे बढाने के लिए कृतसंकल्प हो। वहाँ सुधारकों में वह उत्साह नहीं था जो बंबई या बंगाल में मौजूद था।

दक्षिण में धार्मिक एवं सामाजिक सुधारों की गति उत्तर या पश्चिमी भारत के अनुपात में धीमी रहने के कई कारण थे। 19वीं शताब्दी के शुरू में दक्षिण में आधुनिक शिक्षा का अभाव इसका एक कारण हो सकता है, हालाँकि यह बात निश्चित रूप से कह पाना मुश्किल है। चार्ल्स एच० हैम्सेथ’ के अनुसार वहाँ सामाजिक विद्रोह के अभाव का ज्यादा सही कारण प्रायद्धीपीय भारत का वह तात्कालिक जांतीय ढाँचा प्रतीत होता है जिसमें बहुसंख्यक निम्न वर्गों पर ब्राह्मणों की स्पष्ट प्रमुखता थी। तब सुधारकों की पृष्ठभूमि उच्च वर्ग ही था। लेकिन ब्राह्मण किसी भी ऐसे मौलिक सामाजिक परिवर्तन का समर्थन नहीं कर सकते थे जिसमें उनकी अपनी प्रधानता पर आँच आती। विश्वविद्यालय के स्नातकों में अधिकांश ब्राह्मण ही थे। उनके लिए सामाजिक परंपराओं को तोड़कर अपनी उच्च एवं लाभप्रद सामाजिक स्थिति बनाए रखना कठिन था। बंगाल और बंबई के शहरी इलाकों में ब्राह्मणों का कुछ अन्य उच्चवर्गीय जातियों के साथ सामाजिक मिश्रण शुरू हो गया था। लेकिन दक्षिण में ऐसा नहीं हुआ। वहाँ जातिप्रथा अभी भी कठोर थी। ऐसे में कोई भी उच्चवर्गीय व्यक्ति सुधार के लिए अपनी जाति से बहिष्कृत होना नहीं चाहता था। दक्षिण में सुधार के लिए कुशल नेतृत्व का भी अभाव था। इस प्रकार मद्रास या शायद संपूर्ण दक्षिण में बौद्धिक जीवन या तो देश के अन्य भागों में हो रही गतिविधियों का प्रतिबिंब मात्र था और वह दक्षिण के ईसाई मिशनरियों को शिक्षण संस्थाओं के इर्द-गिर्द सीमित था। जब कभी बाद में वहाँ सामाजिक सुधार आंदोलन ने जोर भी पकड़ा तो वह केवल नाच और मदिरापान जैसे छोटे मुद्दों से ही जूझता रहा। सामूहिक प्रयत्न की दिशा में वहाँ समाज सुधार से ज्यादा समाज कल्याण कार्यक्रम (जिनकी ईसाई मिशनों ने शुरूआत की थी) लोकप्रिय हुए।

आर्य समाज और स्वामी दयानंद सरस्वती

‘उत्तरी भारत में हिंदू धर्म और समाज में सुधार का काम आर्य समाज ने किया। आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में बंबई में की। इस आंदोलन के उदय में पश्चिमी संपर्क कहाँ तक सहायक था, कहना मुश्किल है। साथ ही इस समाज का स्वरूप भी उस समय के अन्य सुधार आंदोलनों से भिन्न था। जो भी हो, निरंतरता और प्रभाव की दृष्टि से यह आंदोलन अपने समय में और आंदोलनों की अपेक्षा ज्यादा लोकप्रिय था।

दयानंद का जन्म 1824 में गुजरात में काठियावाड़ के मौरवी राज्य के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता वेदों के विद्वान थे और उन्होंने ही उनको वैदिक वाङमय तथा न्याय दर्शन आदि की दीक्षा दी थी। छोटी उम्र से ही दयानंद मूर्तिपूजा पर प्रश्न तथा जीवन और मृत्यु जैसे गूढ़ विषयों पर चिंतन करने लगे। बौद्धिक जिज्ञासा में वे 21 वर्ष की आयु में घर से भाग निकले और अगले पंद्रह वर्षों तक देश के कोने-कोने में भटकते रहे। 1860 में मथुरा में उनकी एक अंधे स्वामी विरजानंद से भेंट हुई और वे उनसे प्रभावित होकर उनके शिष्य बन गए। 1868 में दयानंद ने अपने एकांकी संन्यास एवं आध्यात्मिक खोज का जीवन समाप्त कर दिया और सक्रिय धर्म सुधारक एवं समाज सुधारक बन गए।

अपने विचारों की स्थापना एवं प्रसार के लिए उन्होंने सारे देश का भ्रमण किया और समकालीन संतों एवं पंडितों से सफल शास्त्रार्थ किया। शुरू में उनके चिंतन की धारा और विषय वस्तु वैसी ही थी जैसी उस समय के अन्य संन्यासियों की। धीरे-धीरे उनके चिंतन में स्पष्टता आती गई जिसमें जीवन का व्यावहारिक पक्ष महत्वपूर्ण हुआ ओर वे भौतिक जीवन, विशेषकर अपने देश और समाज के बारे में सोचने लगे। अब वे आधुनिक धार्मिक एवं सामाजिक सुधारक के रूप में प्रस्तुत हुए। 1873 में वे कलकत्ता गए और वहाँ बंगाल के कुछ प्रमुख सुधारकों (केशवचंद्र सेन, ईश्वरचंद्र विद्यासागर आदि) से भेंट की। इस संपर्क का उनके भावी कार्यक्रम के लिए लाभकारी परिणाम हुआ। ब्रह्म समाज से ही प्रभावित होकर उन्होंने वैदिक धर्म के प्रसार के लिए एक समाज संगठित करने का निर्णय लिया। केशवचंद्र सेन की सलाह से उन्होंने अपने विचारों को संस्कृत के बदले उत्तर भारत की लोकप्रिय भाषा हिंदी में व्यक्त करने का निर्णय लिया।

सामान्यतः प्रचलित हिंदू धर्म के दोषों को उजागर करने के साथ ही दयानंद ने आंचलिक पंथों और बाकी अन्य धर्मों (ईसाई, इस्लाम, बौद्ध धर्म, जैन धर्म आदि) की भी आलोचना की। वेदों के अध्ययन, अपनी तर्कशक्ति और सबल सुधारवादी प्रवृत्ति की ताकत से उन्होंने अपने विरोधियों को शांत कर एक नए आंदोलन की शुरूआत की।

आर्य समाज की स्थापना 1875 में हुई थी। इसके बाद इसके सामने कई बाधाएँ आई, पर इसकी प्रगति रूकी नहीं। कुछ ही समय में उत्तरी भारत के एक बड़े भाग (पंजाब, संयुक्त प्रांत, राजस्थान, बिहार के कुछ भाग) पर इसका प्रभाव कायम हो गया। सबसे ज्यादा यह उत्तर-पश्यिमी भारत में लोकप्रिय हुआ। प्रारंभ में दयानंद ने अपने विचारों का प्रचार शास्त्रार्थ और सामूहिक भोज आदि के माध्यम से प्रारंभ किया, लेकिन बाद में उन्होंने पुस्तकें लिखकर अपने विचारों का प्रतिपादन किया। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक सत्यार्थ प्रकाश में अपने मूल विचारों को व्यक्त किया।

दयानंद का विश्वास था कि स्वार्थी एवं अज्ञानी पुरोहितों ने पुराणों जैसे ग्रंथों के सहारे हिंदू धर्म को भ्रष्ट किया है। उनके अनुसार वेद ही हिंदू धर्म का वास्तविक आधार है। वे ईश्वर प्रेरित, सभी ज्ञानों के स्रोत और भ्रमातीत है। बाकी सभी धार्मिक विचार, जो वेद-संगत नहीं हैं, त्याज्य हैं। हालाँकि वेद ईश्वर-प्रेरित है, पर उनकी व्याख्या मानव-विवेक द्वारा होनी चाहिए। इसी तर्क के आधार पर उन्होंने कहा कि हर आदमी को भगवान तक सीधे पहुंचने का अधिकार है। हिंदू रूढिवादिता का विरोध करते हुए उन्होंने मूर्ति पूजा, बहुदेववाद, अवतारवाद, पशु बलि, श्राद्ध तथा झूठे कर्मकांडों और अंधविश्वासों का विरोध किया।

आर्य समाज सामाजिक सुधार का भी बड़ा प्रवक्ता था। आर्य समाजियों ने स्त्रियों की दशा सुधारने एवं उनमें शिक्षा का प्रसार करने के लिए काफी प्रयत्न किया। उन्होंने जाति-प्रथा तथा छुआछूत का विरोध किया और सामाजिक समानता एवं एकता को अपना आदर्श माना। चूंकि आर्य समाज जाति-प्रथा का विरोध करता था, अतः उसने उच्च एवं निम्न, दोनों वर्गों के हिंदुओं को एक-दूसरे के करीब तथा समान स्तर पर लाने की कोशिश की। इस तरह समाज जहाँ एक ओर विभिन्न जातियों के हिंदुओं को एक-दूसरे के करीब लाया, वहीं उसने हिंदू समाज के अछूत वर्ग को भी ऊपर उठाने की कोशिश की। इस प्रयत्न का महत्व इसलिए भी ज्यादा हो जाता है क्योंकि तब सरकार भी अछूत एवं दलितों की भलाई करने से कतराती थी क्योंकि इससे ऊंची जाति से आने वाले सरकार के समर्थकों के नाराज होने का भय था।

1883 में दयानन्द की अजमेर में मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके शिष्यों ने उनके कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। समाज सुधार, परोपकार और शिक्षा के क्षेत्र में समाज का काम उल्लेखनीय रहा। समाज ने अनाथालयों एवं विधवा आश्रमों की स्थापना की। पिछली शताब्दी के अंत में समाज द्वारा शुरू किया गया अकाल सहायता कर्या प्रशंसनीय था। इस प्रकार समाज ने सामाजिक कल्याण और सामूहिक उत्थान को अपना मुख्य उद्देश्य बनाया तथा सरकारी सहयोग के अभाव में भी आर्थिक एवं मानवीय साधन जुटाकर उन्हें कार्यरूप देने का उल्लेखनीय प्रयत्न किया। चूँकि ऐसे सामूहिक प्रयत्नों में समाज के अनुयायी निस्वार्थ भाव से लगे हुए थे, अतः इससे सामूहिक उत्थान एवं जन-कल्याण के लिए सेवा और त्याग की भावना को भारी प्रेरणा तथा प्रतिष्ठा मिली। भारत के तात्कालिक ऐतिहासिक संदर्भ में इन तथ्यों का काफी महत्व था।

समाज का ज्यादा स्थायी काम शिक्षा के क्षेत्र में हुआ। इसमें शिक्षा के प्रसार पर बहुत जोर दिया गया। 1886 में लाहौर में दयानंद ऐंग्लों वैदिक स्कूल की स्थापना हुई जो 1889 में दयानंद ऐंग्लो कॉलेज में बदल गया। इस कॉलेज में पठन-पाठन पश्चिमी पद्धति से किया जाता था। भविष्य में देश के अन्य शहरों में भी ऐसे ही डी0ए0 वी0 स्कूल और कॉलेज खोले गए। कुछ समय बाद समाज में फूट पड़ गई। कुछ समाजियों ने शिक्षा के लिए पश्चिमी पद्धति का विरोध किया और परंपरागत भारतीय पद्धति से शिक्षा देने के लिए 1902 में हरिद्धार के नजदीक काँगडी में गुरूकुल विश्वविद्यालय की नींव रखी गई। शिक्षा के प्रश्न पर इस आंतरिक मतभेद के बावजूद समाज द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में किए गए कार्यों के महत्वपूर्ण परिणाम हुए। अपने स्कूलों के माध्यम से उसका स्कूली शिक्षा की विषय वस्तु पर कुछ हद तक नियंत्रण हो गया। डी० ए० वी० या गुरूकुल काँगड़ी दोनों ही पद्वतियों के संस्थानों में भारतीय संस्कृति की उपलब्धियों को उजागर करने और विद्यार्थियों के मन में आत्मगौरव और आत्मसम्मान भरने का प्रयास किया गया। धीरे-धीरे जब ये विद्यार्थी सरकारी नौकरियों में आए तो अंग्रेजी शासन के शोषण एवं भेदभाव ने उनके आत्मसम्मान को चुनौती दी और राष्ट्र प्रेम की भावना से प्रेरित होकर वे अंग्रेजों के विरूद्ध एकता के सूत्र में बंधते गए।

हिन्दी भाषा के विकास की दिशा में भी आर्य समाज की भूमिका उल्लेखनीय है। समाज की स्थापना के कुछ दिन बाद से उसके सिद्धांतों का प्रचार हिंदी भाषा में होने लगा। समाज के सिद्धांतों का आधार-ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश भी हिंदी भाषा में ही लिखा गया। दयानंद जन्म से गुजराती थे लेकिन अपने विचारों को जनता तक पहुँचाने के लिए उन्होंने हिंदी भाषा को अपना माध्यम बनाय प्रसिद्ध आर्य समाजी सूर प्रताप सिंह के प्रयासों के फलस्वरूप राजपूताना के कई राज्यों ने हिंदी लिपि (देवनागरी) को अपने प्रशासन की कार्यवाही के लिए स्वीकार किया। बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में संयुक्त प्रांत ने भी इसे एक वैकल्पिक माध्यम के रूप में अपना लिया। संयुक्त प्रांत तथा पंजाब की आर्य। समाजी शिक्षण-संस्थाओं ने भी हिंदी के माध्यम को लोकप्रिय बनाने का प्रयत्न किया और जहाँ कहीं संभव था, वहाँ इसे स्कूलों में पठन-पाठन का माध्यम बनाया। नारी शिक्षा के लिए तो हिंदी को विशेष रूप से माध्यम बनाया गया।

इस प्रकार आर्य समाज आंदोलन ने न केवल धार्मिक सुधार आंदोलन चलाया, बल्कि उसने उत्तर भारत ने एक बड़े भाग में सामाजिक एकता, आपसी सहयोग और बहुमुखी जागरण का संदेश दिया। समाज के प्रयत्नों के फलस्वरूप सभी वर्गों हिंदू एक-दूसरे के करीब आए तथा समाज द्वारा हिंदी के प्रयोग एवं उसके विकास से वैचारिक एकता को भी बल मिला। सबसे बढ़कर आर्य समाज भारत की प्राचीन उपलब्धियों को प्रकाश में लाया। अतीत में ‘स्वर्ण युग’ की धारणा ने देशवासियों में भरपूर आत्मविशस तथा आत्मसम्मान का भाव उत्पन्न किया। इसका भावी राष्ट्रीय आंदोलन पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। दयानंद ने कभी विदेशी शासन का खुलकर विरोध नहीं किया, फिर भी वें विदेशी शासन के पक्ष में कतई नहीं थे। सत्यार्थ प्रकाश के 1883 के प्रामाणिक संस्करण में उन्होंने लिखा: ‘कोई कितना ही कहे, परंतु स्वदेशी राज्य सर्वोपरि होता है।’ उन्होंने कहा कि ‘विदेशी राज्य चाहे जितना अच्छा हो, लेकिन वह सुखदायक नहीं हो सकता।’

दयानन्द सरस्वती (1824-1883)

समाज का कार्य आगे भी चलता रहा, लेकिन कालांतर में इसकी अंतर्निहित कमियाँ स्पष्ट होने लगीं। समाज के कुछ जन्मजात दोष थे। इसका मुख्य नारा वैदिक युग में लौट चलने का था। मगर 19-20वीं शताब्दी में वैदिक जीवन में वापसी का संदेश तर्कसंगत नहीं था। दूसरे, वेदों के भ्रमातीत होने और उनमें पूर्ण विश्वास का उपदेश मानव-विवेक के विरूद्ध था। यह तथ्य समाज के रूढ़िवादी स्वरूप का प्रतिबिंब था, जो कुछ ही वर्ष बाद धार्मिक कट्टरता में परिलक्षित हुआ। आर्य समाज का एक लक्ष्य यह था कि हिंदुओं का धर्म परिवर्तन न होने दिया जाय। इसके कारण अन्य धर्मों के खिलाफ जेहाद शुरू हो गया। इस जेहाद ने 20वीं सदी के भारत में सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया।

रामकृष्ण मिशन और विवेकानंद

रामकृष्ण मिशन की स्थापना स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरू रामकृष्ण परमहंस की स्मृति में की थी। रामकृष्ण (1834-86) का जन्म बंगाल में हुआ था और वे कलकत्ता में एक छोटे मंदिर के पुजारी थे। वे परंपरागत तरीके से संन्यास, ध्यान और भक्ति के द्वारा मोक्ष प्राप्त करने में विश्वास रखते थे। उन्हें हिंदू दर्शन में श्रद्धा थी, मगर वे बाकी धर्मों का भी सम्मान करते थे। वे सभी धर्मों की मौलिक एकता में विश्वास करते थे। वे सभी धर्मों की मौलिक एकता में विश्वास करते थे। वे मनुष्य की सेवा को ईश्वर की सेवा मानते थे। 1886 में उनकी मृत्यु हो गई। इसके बाद उनके उपदेशों का प्रचार उनके शिष्य विवेकानंद ने किया। विवेकानंद (1862-1902) का पहला नाम नरेन्द्र दत्त था और वे कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्नातक थे। वे आध्यात्मिक जिज्ञासा से रामकृष्ण के संपर्क में आए और प्रभावित होकर उनके शिष्य बन गए। गुरू की मृत्यु के बाद उन्होंने संन्यास धारण कर लिया और धार्मिक ग्रंथों का विषद् अध्ययन किया। 1893 में वे शिकागो (अमरीका) गए जहाँ पश्चिमी संसार के सामने पहली बार भारत की संस्कृति की महत्ता को प्रभावकारी तरीके से प्रस्तुत किया। वहाँ बड़ी संख्या में लोग उनकी ओर आकृष्ट हुए। इसके पश्चात उन्होंने अमरीका और इंग्लैंड में भ्रमण किया और हिंदू धर्म का प्रचार किया।

स्वदेश लौटने पर उन्होंने 1897 में रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। रामकृष्ण मिशन के सिद्धांतों का आधार वेदांत दर्शन है। मिशन के अनुसार ईश्वर निराकार, मानव बुद्धि से परे और सर्वव्यापी है। आत्मा ईश्वर का अंश है। सभी धर्म मौलिक रूप से एक हैं पर वे अपने विभिन्न रूपों में ईश्वर तक पहुंचने के अलग-अलग रास्ते मात्र है। ईश्वर साकार ओर निराकार दोनों है और उसकी अनुभूति विभिन्न प्रतीकों के रूप में भी की जा सकता है।

मिशन मनुष्य (विशेषकर गरीब, अपंग, कमजोर की सेवा को ईश्वर की सेना मानता है, क्योंकि मनुष्य की आत्मा में परमात्मा का अंश है। इसी वजह से मिशन समाज सेवा और परोपकार को काफी महत्व देता है।

उपर्युक्त सिद्धांत ही मिशन के कार्यों का आधार रहा है। जहाँ एक तरफ विवेकानंद हिंदू धर्म एवं संस्कृति की उपलब्धियों को प्रकाश में लाए, वहीं उन्होंने तात्कालिक भारतीय समाज में व्याप्त संकीर्णता एवं अंधविश्वास का बड़े स्पष्ट शब्दों में विरोध किया। उन्होंने हिंदुओं के कर्मकांड एवं जातीय भेद-भाव की भर्त्सना की और स्वतंत्रता, समानता एवं स्वतंत्र चिंतन का उपदेश दिया। धार्मिक सौहार्द के बारे में 1898 में “हमारी अपनी मातृभूमि के लिए दो महान प्रणालियों-हिंदू धर्म और इस्लाम का संगम ही एक मात्र आशा है’ शीर्षक लेख में उन्होंने भारतीयों की इस बात के लिए भी आलोचना की कि वे बाकी संसार से संपर्क खो चुके हैं और गतिहीन और जड़ हो गए हैं।

विवेकानंद अपने गुरू की ही तरह महान मानवतावादी थे जो भारत के पिछड़ेपन, पतन एवं उसकी गरीबी से अत्यंत दुःखी थे। प्रबल मानवतावादी भावनाओं से ही अभिभूत होकर उन्होंने लिखाः “एकमात्र भगवान सभी जातियों के कुष्ठपीड़ित, दरिद्र है”।’ इसी संदर्भ में शिक्षित भारतीय को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा। “जब तक करोड़ो लोग भूख और अज्ञान से पीड़ित हैं तब तक मैं उस हर व्यक्ति को देशद्रोही’ समझेंगा जो उनके खर्च से शिक्षित बनकर उनके प्रति तनिक भी ध्यान नहीं देता।” यही कारण है कि उनके मिशन के कार्यों का मानवतावादी पक्ष काफी महत्वपूर्ण रहा है। मिशन की शाखाएँ आज भी देश के अंदर और बाहर समाज सेवा एवं परोपकार में निरंतर लगी हुई हैं। मिशन विद्यालयों, अस्पतालों, अनाथालयों और पुस्तकालयों आदि का भी संचालन करता है। प्राकृतिक विपत्तियों के समय सहायता कार्य एक प्रशंसनीय विशेषता रही है।

इन सब अच्छाइयों के बावजूद मिशन कभी भी बहुत लोकप्रिय नहीं हो पाया। इसका प्रभाव मध्यमवर्गीय शिक्षित वर्ग तक ही सीमित रहा है। आम आदमी के लिए इसकी बोझिल बौद्धिकता शायद इसके प्रसार में आड़े आई है।

फिर भी, इसके अन्य कार्यों के अलावा, भारतीयों में आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान पैदा कर उन्हें राष्ट्रीय मुक्ति संग्राम ओर प्रेरित करने के लिए रामकृष्ण मिशन और विवेकानंद का नाम अविस्मरणीय रहेगा।

थियोसोफिकल सोसाइटी

थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना 1875 में अमरीका में हुई थी। इसकी स्थापना एक रूसी महिला मैडम हेलना पेट्रोवना व्लावात्सकी (1831-91) और एक अमरीकी सैनिक अफसर कर्नर हेनरी स्टील ऑलकॉट (1831-97) ने की थी। धर्म को समाज-सेवा का मुख्य साधन बनाने और धार्मिक भ्रातृभाव के प्रचार और प्रसार हेतु उन्होंने थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना की।

1882 में मद्रास के समीप अड्यार नामक स्थान पर इस सोसायटी का मुख्यालय बनाया गया, लेकिन भारत में इसकी सफलता का अध्याय तब शुरू हुआ जब 1893 में श्रीमती एनी बिसेन्ट भारत आईं और सोसायटी का कार्यभार संभाला। इस सोसायटी के अनुयायी ईश्वरीय ज्ञान को आत्मिक हर्षोन्माद (Spiritual ecstacy) और अंतर्दृष्टि (Intuition) द्वारा प्राप्त करने का प्रयत्न करते थे। उन्होंने हिंदू धर्म, जो राष्ट्रीय धर्म था और बौद्ध धर्म जैसे प्राचीन धर्मों को पुनर्जीवित कर उन्हें मजबूत बनाने की वकालत की। वे पुनर्जन्म और कर्म के सिद्धांत को स्वीकार करते थे और सांख्य और उपनिषदों के दर्शन को अपना प्रेरणास्रोत मानते थे। वे विश्वबंधुत्व की भावना का समर्थन करते थे। प्रारंभ से ही सोसायटी हिंदू पुनरूत्थान आंदोलन से संलगन रही लेकिन यह धार्मिक पुनरूत्थानवादी के रूप में उतना सफल नहीं रही जितना समाज सुधार, शैक्षिक विकास और राष्ट्रवादी चेतना को जागृत करने में सफल रही। सोसायटी की शाखाएँ संपूर्ण भारत में खुलीं, परंतु दक्षिण भारत में इसका प्रभाव ज्यादा रहा। अपने उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए एनी बिसेंट ने बनारस में सेंट्रल हिंदू स्कूल की स्थापना की और उसकी प्रगति के लिए भरसक प्रयत्न किया। वहीं स्कूल आगे चलकर एक कॉलेज में, और अंततः 1915 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में परिणत हो गया। आयरलैंड के स्वराज्य लीग के नमूने पर बिसेंट ने भारत में भी स्वराज्य लीग बनाई।

एनी बिसेंट के व्यक्तिव के आकर्षण-

उनकी असामान्य वाक् शक्ति, लेखन-शक्ति तथा सुधारवादी उत्साह ने सोसयटी की सफलता में भरपूर योगदान किया। बिसेंट को प्राचीन भारतीय संस्कृति के प्रति बड़ा जबर्दस्त आकर्षण था। अंततः वे हिंदू धर्म और समाज में पूरे तौर पर रम गई और हिंद धर्म तथा भारत का पुनरूत्थान उनका कर्तव्य हो गया। इस दिशा में उन्होंने अदम्य उत्साह से काम किया और भारत की प्राचीन गौरव-गरिमा को पुनः स्थापित करने का यथासंभव प्रयत्न किया। उनके नेतृत्व में सभी धर्मावलंबी एक-दूसरे के नजदीक आए। देखते-देखते ‘थियोसोफिक हिंदुइज्म’ अखिल भारतीय आंदोलन बन गया और इसने नई पीढ़ी के दृष्टिकोण को गंभीर रूप से प्रभावित किया। सबसे बढ़कर सोसायटी ने भारतीयों में उनके प्राचीन गौरव को उजागर कर आत्मसम्मान पैदा किया और राष्ट्रीय चेतना जागृत करने में मदद की।

सोसायटी की हिंदू धर्म की व्याख्या रूढ़िवादी थी और इसके कई भारतीय नेता (जैसे बनारस के डॉ० भगवान दास और मद्रास के सर एस0 सुब्रमण्य अय्यर) हिंदू रूढ़िवादिता के समर्थक थे। सोसायटी के रूढ़िवादी दृष्टिकोण का इसके प्रसार एवं सफलता पर खराब प्रभाव पड़ा। इसके तांत्रिक स्वरूप को देखकर ही कुछ लोग इसमें शामिल नहीं हुए या इससे अलग गए। लेकिन इसके सामाजिक सिद्धांत प्रगतिशील और ज्यादा महत्वपूर्ण थे।

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