शाहजहाँ कालीन वास्तुकला

शाहजहाँ कालीन वास्तुकला

“शाहजहाँ का काल मुगलकाल का स्वर्णयुग था”

शाहजहाँ ने स्थापत्य कला में ईरानी शैली को फिर से अपना लिया था। उसने पूर्ववर्ती कुछ इमारतों में सुधार किया और उनके ऊपर मण्डप, दरबार और स्तम्भयुक्त विशाल कक्ष बनवाये। साथ ही उसने पत्तियोंदार अथवा नोंकदार मेहराबों का निर्माण कराया। शाहजहाँ कालीन स्थापत्य कला के नमूनों के आधार पर डॉ० रामनाथ ने लिखा है, “शाहजहाँ के काल में मुगल-वास्तुकला अपनी परिपक्व अवस्था पर पहुंच गयी थी और कुछ अत्यन्त सुन्दर इमारतों का निर्माण हुआ। निस्सन्देह यह युग वास्तुकला का स्वर्ण-युग था और विकास की यह चरम स्थिति थी।”

दीवाने-आम

आगरा के किले में अनेक इमारतों के निर्माण एवं जीर्वाद्वार का श्रेय शाहजहाँ को है। दीवाने-आम एक विस्तृत इमारत है जिसे शाहजहाँ ने अपने सत्तारूढ़ होने के तुरन्त बाद बनवाया था। यह तीन ओर से खुला हुआ एक विस्तृत हॉल है। इसमें दोहरे खम्भों की 40 कतारें और दाँतेदार मेहराबें है। सम्राट के बैठने के लिए दाहिनी दीवार में एक कक्ष है। सम्पूर्ण इमारत लाल पत्थर की बनी है परन्तु उस पर सफेद चूने का प्लास्टर करके उसे सुनहरी काम के द्वारा सजा दिया गया है। सम्राट के बैठने के स्थान को पीटरा-ड्यूरा के सुन्दर जड़ाऊ काम से सजाया गया है। शाही मण्डप के ठीक नीचे वजीर के लिए स्थान बना है जो एक ऊँचा मंच है।

दीवाने-खास

यमुना की तरफ के ऊँचे उठे चबूतरे पर बनी यह एक शानदार इमारत है। इसमें दो बड़े-बड़े कमरे हैं जो संगमरमर के गलियारों से आपस में जुड़े हुए हैं। यहाँ पर सम्राट अपना विशेष दरबार लगाता था और केवल कुछ चुने हुए अधिकारी ही यहाँ आते थे। डॉ० श्रीवास्तव ने लिखा है, “इसके खम्भा और मेहराबों पर सुन्दर खुदाई व जड़ाई का काम है। इसकी दीवारें उभरे हुए फूलदानों, फूलों और पत्तियों से सुसज्जित हैं……कलामर्मज्ञ दीवाने-खास की गणना सुन्दरतम विशाल कक्षों में करते हैं’ दीवाने-खास के सामने एक विस्तृत आँगन में सफेद संगमरमर का एक विशाल चबूतरा है जिस पर सायंकाल सम्राट शाहजहाँ बैठता था। इसके सामने काले पत्थर का तख्त पड़ा हुआ है।

मच्छी भवन

 मच्छी भवन दीवाने-आम के पीछे है। मूल रूप से यहाँ तालाबों और झरनों का प्रबन्ध था परन्तु अब वह नहीं है। इसके मध्य एक 60 गज x 55 गज चौड़ा सहन है। इस भवन के तीन तरफ इमारतें व कार्यालय हैं जिनमें रत्न कोषागार सर्वप्रमुख है। मच्छी भवन के ऊपर संगमरमर का नक्काशीदार एवं अत्यन्त सुन्दर मण्डप है जहाँ पर बैठकर शाही परिवार के लोग मछली का शिकार किया करते थे। ऐसा कहा जाता है कि मच्छी भवन में निर्मित सरोवर और चौपड़ के बनाने में जो सामग्री प्रयोग में आयी थी, उसे कालान्तर में सूरजमल जाट लूट कर ले गया था और उसकी मदद से उसने डींग में अनेक सुन्दर भवनों का निर्माण कराया था।

शीशमहल

 यह दीवाने-खास के नीचे बना हुआ है। इसमें काँच का अत्यधिक प्रयोग है, इसलिए इसे शीशमहल के नाम से जाना जाता है। इसमें स्नान के लिए दो हौज बने हुए हैं जिन्हें पानी से भरने के लिए एक गज चौड़ी और दस गज लम्बी नहर की व्यवस्था की गयी थी।

खासमहल

दीवाने-खास से लगा हुआ संगमरमर से निर्मित खासमहल है। यह बादशाह और उसकी पत्नी के निवास के लिए बनाया गया था। इसके नीचे का हिस्सा लाल पत्थर द्वारा निर्मित है और मुगल-काल में जमुना की लहरें इससे टकराया करती थी। इसमें निर्मित शाही शयन-कक्ष अत्यन्त विशाल है। इसके स्तम्भों और दीवारों पर सुन्दर पच्चीकारी है। छत एवं दीवारें रंगों से अलंकृत हैं। दीवारों पर फारसी में अभिलेख थे परन्तु अब उनके अवशेष ही दिखायी पड़ते हैं। खासमहल के गलियारे, कक्ष एवं ऊपरी भाग सफेद संगमरमर के हैं। दीवारों पर अनेक प्रकार के सुन्दर तथा मूल्यावान पत्थरों को जड़ा गया है। छत और गुम्बद फ्लोरेन्स जैसे मोजेक के काम से और मुलम्मे के रंगीन चित्रों से सुसज्जित है जिससे इमारत में जो सुन्दर डिजाइन हैं वह “नीचे से देखने पर किनारी-गोटे के किनारों की तरह प्रतीत होते हैं।”

अंगूरी बाग

 खासमहल के समक्ष अंगूरी बाग है। इसमें अनेक कक्ष बने हुए हैं जो अकबरकालीन है, परन्तु शाहजहाँ ने इन्हें अपने स्थापत्य-कला के चाव के कारण नवीन रूप प्रदान किया है। ये कक्ष हरम की महिलाओं के निवास हेतु प्रयोग में आते थे। अंगूरी बाग में अनेकानेक फव्वारे लगाये गये थे जिससे यह अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होता था।

झरोखा-ए-दर्शन

खासमहल व मुसम्मन बुर्ज के मध्य झरोखा-ए-दर्शन है। यहाँ से बादशाह नीचे मैदान में एकत्रित जनता को प्रतिदिन दर्शन देता था और नीचे एकत्रित जनता श्रद्धावश झुककर सलाम करती थी। सफेद संगमरमर की इस इमारत की छत पर मुल्लमे की पालिश थी जो धूप में चमकती थी। झरोखा-ए-दर्शन के माध्यम से बादशाह नित्यप्रति जनता के सम्पर्क में आकर उनकी शिकायतों को व्यक्तिगत रूप से सुनकर दूर करता था। यहीं बैठकर मुगल बादशाह हाथियों के युद्ध को देखा करते थे।

नगीना मस्जिद

यह मच्छी भवन के उत्तरी-पश्चिमी कोने में निर्मित एक छोटी-सी मस्जिद है। यह सफेद संगमरमर की बनायी गयी है। ऐसा कहा जाता है कि इसका निर्माण हरम की महिलाओं के प्रयोग हेतु कराया गया था और सौन्दर्य में यह मोती मस्जिद के समान है, परन्तु डॉ० श्रीवास्तव का मत है कि मोती मस्जिद के अद्वितीय सौन्दर्य की तुलना किसी मस्जिद से नहीं की जा सकती है। नगीना मस्जिद से संलग्न कमरों में शाहजहाँ ने अपने बन्दीकरण के आठ वर्ष व्यतीत किये थे। यहाँ उसके हृदय को सान्तवना देने के लिए उस मकबरे के नजारे के सिवा और कुछ नहीं था जिसे उसने अपनी प्रतिभा से अपनी यौवन की प्रियतमा सुप्रसिद्ध मुमताजमहल की स्मृति में बनवाया था।”

मोती मस्जिद

मोती मस्जिद आगरा के किले की सबसे सुन्दर इमारत है। यह दीवाने-खास के उत्तर में स्थित है। इसका बाहरी भाग लाल पत्थर का बना हुआ है परन्तु अन्दर श्वेत संगमरमर का प्रयोग है।

जामा मस्जिद

आगरा के लाल किले के मुख्य द्वार से लगभग एक फलांग की दूरी पर प्रसिद्ध जामा मस्जिद है जिसका निर्माण कार्य 1648 ई० में 5 लाख रूपये की लागत से था। इसे निर्मित कराने का श्रेय शाहजहाँ की सर्वाधिक प्रिय पुत्री जहाँआरा को है। लाल पत्थर की यह मस्जिद परम्परागत योजना पर बनी है। दालानों और आराधना-स्थलों के ऊपर छतरियां बनायी गयी हैं जो इसके सौन्दर्य में वृद्धि करती हैं। अन्यथा भारी गुम्बदों के प्रयोग से इमारत दब सी गयी प्रतीत होती है। इसके तीन बड़े गुम्बद जो लाल पत्थर के बने हैं, उनमें सफेद संगमरमर का जड़ाऊ काम अत्यन्त सुन्दर प्रतीत होता है। इसका मुख्य मेहराबदार प्रवेश-द्वार 40 फुट चौड़ा है। पर्सी ब्राउन ने आगरा की जामा मस्जिद की तुलना दिल्ली की जामा मस्जिद से करते हुए लिखा है, “अपनी नीची स्थिति और गुम्बदों की कम गोलाई के कारण इस मस्जिद में दिल्ली की जामा मस्जिद के समान पूर्णता का अभाव है।”

ताजमहल

शाहजहाँ ने अपनी, प्रिय बेगम अर्जुमन्द बानू उर्फ मुमताजमहल के स्मृति में ताजमहल का निर्माण कराया, जो स्थापत्य कला की दृष्टि से सम्पूर्ण मुगल-काल की सर्वोत्कृष्ट कृति है। ताजमहल आगरा के किले से लगभग एक मील पूर्व की ओर यमुना के किनारे पर स्थित है। कहा जाता है कि ताजमहल का नक्शा स्वयं बादशाह शाहजहां ने बनाया था और शाहजहाँ के दरबारी कारीगर उस्ताद ईसाखाँ की देख-रेख में इसका निर्माण कार्य हुआ था। परन्तु स्पेन के पादरी मनरीक का कथन है कि ताज का नक्शा वीनस के रहने वाले जिरोनियों विरोनियों ने बनाया था। सहायक भवनों सहित ताजमहल की मुख्य इमारत की सम्पूर्ण योजना आयताकार है। यह ऊंची चहारदीवारी से घिरा है और इसके चारों कोनों पर बड़े-बड़े मेहरावयुक्त मण्डप हैं। साज-सज्जा से परिपूर्ण प्रवेश द्वार है जिसके दोनों ओर मेहराबी कक्ष है। अहाते में एक वर्गाकार उद्यान है जिसके उत्तरी कोने में एक संगमरमर का चबूतरा है। इसकी 22 फुट ऊंची मेधि पर 198 फुट ऊंचा सफेद संगमरमर मुमताजमहल का मकबरा है। इसके प्रत्येक कोने में एक छतरी और बीच में सुडौल गुम्बद है। ऊँची चौकी के चारों ओर 137 फुट ऊँची तिमंजिली छतरीयुक्त मीनारें हैं। डॉ० रामनाथ ने लिखा है कि “ये मीनारे बड़े आकर्षक ढंग से इमारत को चारों ओर से घेरे हुए हैं, जैसे कोई रानी अपनी सहेलियों के बीच खड़ी हो।”

ताजमहल की स्थापत्य कला की प्रशंसा करते हुए डॉ० आर०सी० मजूमदार ने लिखा है, “ताजमहल शाहजहाँ द्वारा मुमताजमहल की कब्र पर निर्मित कराया गया शानदार स्मारक इसके निर्माण पर पचास लाख रूपये व्यय हुए। यह अपने सौन्दर्य एवं वैभाव के कारण संसार के सात आश्चयों में एक स्वीकार किया जाता है।”

दिल्ली का किला

शाहजहाँ ने दिल्ली में शाहजहांनाबाद नामक एक नगर का निर्माण-कार्य 1638 ई० में प्रारम्भ किया। यहाँ पर भी यमुना नदी के तट पर एक बड़ा किला बनवाया गया जो लाल किले के नाम से प्रख्यात है। यह ऊंची और विशाल कंगूरेदार दीवारों से घिरा हुआ है। इसमें दो मुख्य प्रवेश द्वार है-एक व्यक्तिगत प्रयोग के लिए दूसरा आम रास्ता। किले के भीतर निर्मित इमारतें तत्कालीन स्थापत्य-कला का दिग्दर्शन कराती है।

दिल्ली के लाल किले में निर्मित इमारतों में निम्नलिखित प्रसिद्ध इमारतें हैं।

दीवाने-खास- शाहजहाँकालीन इमा में यह इमारत सर्वाधिक अलंकृत है। इसके सौन्दर्य की पुष्टि प्रसिद्ध कवि फिरदौसी के निम्नलिखित शब्दों से हो जाती है।

“अगर फिरदौस बर रूए जमी अस्त।

हमी अस्त, यूँ हमी अस्त, यूँ हमी अस्त॥”

(यदि पृथ्वी पर कहीं स्वर्ग है तो वह यहीं है, यहीं है, यहीं है।)

निर्धारित योजना पर निर्मित इस इमारत के विशाल कक्ष लम्बाई 90 फुट और चौड़ाई 67 फुट है। इसके बाहरी ओर पाँच मेहराबदार विशाल मार्ग है और कुछ छोटे मार्ग है। अतः यह अत्यन्त शीतल रहता है। इसका आन्तरिक भाग 15 विजयमालाओं में विभाजित है। संगमरमर के वर्गाकार खण्डों पर टिकी दाँतेदार मेहराबें इसे विभाजित करती हैं। साफ संगमरमर के फर्श पर फूलों से सज्जायुक्त सेतुबन्धों के प्रतिबन्ब दिखायी पड़ते हैं। स्वर्ण तथा रंगों से सुसज्जित मेहराबें अत्यन्त आकर्षक प्रतीत होती हैं।

रंगमहल- शाहजहाँ के इस रंगमहल के सौन्दर्य की प्रशंसा करते हुए कहा जाता है कि “यह रंग और चमक में स्वयं के महलों में भी अधिक उत्तम है। 153 फुट लम्बाई और 63 फुट चौड़ाई के इस विशाल भवन में अनेक सुन्दर कक्ष है। इसका मुख्य हाल 15 विजयमालाओं में शोभायुक्त सेतुबन्धों द्वारा विभाजित किया गया है। रंगमहल में कमल-सर की शोभा अद्वितीय हैं। बीस फुट में संगमरमर का जड़ाऊ कमल बनाया गया है जिसके मध्य कमल की कली के समान एक फव्वारा है। फव्वारे से पानी जब कमल की पंखुड़ियों पर गिरता है, तब ऐसा प्रतीत होता है मानों पंखुड़ियाँ गतिशील हों। यह भारतीय कला की उस क्षमता का प्रतीक है जिसके अन्तर्गत वह सजीव मूतियों की ही नहीं अपितु फूलों व पत्तियों के निर्माण की भी क्षमता रखती है।

नहर-ए-बहिश्त- इस किले की यह प्रमुख विशेषता है और किले में जल-पूर्ति का ‘साधन है। इसके सौन्दर्य एवं निर्माण-योजना के सम्बन्ध में पर्सी ब्राउन ने लिखा है, “नहर-ए- बहिश्त शाह बुर्ज के केन्द्रीय मेहराबदार मण्डप के संगमरमर के झरने से प्रवेश करती थी और पत्थर अथवा संगमरमर की नालियों द्वारा सभी दिशाओं में बँट जाती थी। कई मण्डपों में यह फव्वारे का रूप ग्रहण करती थी। इनमें सबसे सुन्दर फव्वारा रंगमहल के केन्द्रीय कमरे को पूरा घेरे हुए है।”

दीवाने-आम- यह एक पत्थर की 185 फुट लम्बी और 70 फुट चौड़ी इमारत है। इसमें बैठकर बादशाह शाहजहाँ जनता की फरियाद सुनता था। इसका बाहरी भाग मेहराबों और दोहरे स्तम्भों पर आधारित है। कोने में चार खम्भे हैं। तीन ओर का मार्ग दाँतेदार डाटों व स्तम्भों से बना है। आन्तरिक भाग में एक मेहरावयुक्त ताख है जिसमें मयूर सिंहासन रहता था। ताख की दीवारों पर सुन्दर जड़ाऊ काम है।।

दिल्ली की जामा मस्जिद- दिल्ली के लाल किले के समीप इस विशाल मस्जिद का निर्माण सम्भवतया किले के साथ-साथ हुआ था। यह एक भव्य और विशाल मस्जिद है। इसमें तीन दरवाजें हैं जिन पर एक बुर्ज है। दरवाजों तक पहुँचने के लिए सीढ़ियों की व्यवस्था है। भीतर एक बड़ा आँगन है और बीच में एक जलाशय है। दोनों ओर पाँच मेहराबों की श्रृंखला है और दोनों ओर लम्बी-पतली मीनारें हैं। पर्सी ब्राउन का मत है कि “यह मस्जिद धार्मिक वास्तुकला का सर्वोत्कृष्ट लघु परन्तु परिपूर्ण नमूना है।”

शाहजहाँ ने आगरा के किले की भाँति लाहौर के किले में भी परिवर्तन कराये और लाल पत्थर के स्थान पर संगमरमर की इमारतें बनवायीं। इनमें चालीस स्तम्भों का हॉल, शीशमहल, मुसम्मन बुर्ज, नौलखा आदि प्रसिद्ध हैं।

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