प्रमुख सूफी सम्प्रदाय

प्रमुख सूफी सम्प्रदाय

मध्यकालीन भारत में प्रचलित प्रमुख सूफी सम्प्रदाय

सूफी सम्प्रदाय लगभग 175 शाखाओं में विभक्त है। अबुल फजल ने ‘आइन-ए-अकबरी’ में इनकी चौदह प्रमुख शाखाओं का वर्णन किया है—(1) चिश्ती, (2) सुहरावर्दी, (3) हबीबी, (4) तफरी, (5) करबी, (6) सक्ती, (7) जुनैदी, (8) काजरूनी, (9) तूसी, (10) फिरदौसी, (11) जैदी, (12) इयादी, (13) अदहमी, (14) हुबेरी। परन्तु भारत में निम्नलिखित सूफी सम्प्रदायों का विशेष रूप से प्रभाव था।

चिश्ती सम्प्रदाय

‘आइन-ए-अकबरी’ के अनुसार चिश्तिया शाखा की स्थापना का श्रेय खूरासान-निवासी अबू अब्दाल चिश्ती को है परन्तु भारत में इस शाखा की स्थापना ख्वाजा उस्मान हारून के शिष्य मुईनुद्दीन चिश्ती ने की थी। इनका जन्म ईरान में 1143 ई० में हुआ था और 1190 ई० में वह भ्रमण करते हुए भारत आये थे। लाहौर, दिल्ली आदि स्थानों से होकर इन्होंने अजमेर में अपनी खानकाह बनवायी और मृत्यु-पर्यन्त वहीं पर रहे।

ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती ने हिन्दुओं के प्रति उदार दृष्टिकोण अपनाया। उन्हें हिदू-दर्शन के अद्वैतवादी सिद्धान्त में आस्था थी इसलिए उन्होंने सर्वव्यापी एकेश्वरवाद का सर्वत्र प्रचार किया। वह कहा करते थे, “जब हम बाह्य बन्धनों से ऊपर उठ जाते हैं तब हमें अपने चारों ओर प्रेमी, प्रेमिका और स्वयं प्रेम एक ही प्रतीत होते हैं।” मानवता की सेवा को वह सर्वोच्च भक्ति मानते थे। डॉ० श्रीवास्तव ने उनकी प्रशंसा करते हुए लिखा है, “ख्वाजा ने अपने धर्म-प्रचार के कार्य में जो कठिनाइयाँ उठायीं, उनके लिए वे प्रशंसा के पात्र हैं। साथ ही हिन्दुओं का एक विदेशी के प्रति मैत्रीपूर्ण व्यवहार भी कम प्रशंसनीय नहीं है।’

उनकी मृत्यु 1234 ई० में अजमेर में हुई, जहाँ उनकी मजार पर आज भी हिन्दू और मुसलमान दोनों समान रूप से अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए जाते हैं। उनके देहान्त के पश्चात् उनके प्रचार कार्य को उनके शिष्यों ने आगे बढ़ाया।

हमीबुद्दीन नागौरी- ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के अनेकानेक शिष्यों में दो हमीदुद्दीन नागौरी व कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी अत्यधिक प्रसिद्ध थे। हमीदुद्दीन अपने यौवनकाल में अत्यन्त इन्द्रिय-लोलुप व्यक्ति थे, परन्तु ख्वाजा का शिष्यत्व ग्रहण करने के बाद आप में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ। इनके संयम और धार्मिकता के कारण इन्हें ‘सुल्तान-तारीकिन’ (संन्यासियों के सुल्तान) की उपाधि से विभूषित किया गया था।

कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी- ख्वाजा के शिष्यों में आपका स्थान अग्रगण्य था। इनका जन्म 1186 ई० में फरगना में हुआ था। कुछ समय मुल्तान में निवास करने के बाद इल्तुतमिश के शासनकाल में ये भारत आये।

फरीदुद्दीन गंज-ए-शिकार– फरीदुद्दीन गंज-ए-शिकार शेख बख्तियार काकी के शिष्य थे। इनका जन्म मुल्तान में हुआ था। हाँसी एवं अजोधन में इन्होंने सूफी मत का प्रचार किया। इन्हीं की प्रतिभा के कारण चिश्तिया सम्प्रदाय अखिल भारतीय स्तर तक पहुंचा। ये बाबा फरीद के नाम से अत्यन्त प्रख्यात थे।

निजामुद्दीन औलिया- शेख फरीद के अनेकानेक शिष्यों में निजामुद्दीन औलिया सर्वाधिक प्रसिद्ध थे। 1236 ई0 में बदायूँ में इनका जन्म हुआ। बीस वर्ष की अवस्था में इन्होंने बाबा फरीद का अजोधन में शिष्यत्व ग्रहण किया। इन्होंने दिल्ली के पास गियासपुर में अधिकांश जीवन व्यतीत किया जहाँ अब इनकी दरगाह निर्मित है। उन्होंने सात सुल्तानों के काल को देखा परन्तु कभी भी न तो उनसे सम्पर्क किया और न ही दरबार में गये।

शेख निजामुद्दीन ने सूफी मत का प्रचार-कार्य अत्यन्त सफलतापूर्वक किया। बरनी ने लिखा है, “शेख निजामुद्दीन ने अपने द्वार शिष्यों के लिए खोल दिये थे और उन्होंने अमीरों तथा सामान्य व्यक्तियों, धनी तथा निर्धनों, शिक्षित एवं अशिक्षितों, शहरियों और देहातियों, सैनिक व योद्धाओं, स्वतन्त्र व्यक्तियों एवं गुलामों को अंगीकार कर लिया था।……जनसादारण का झुकाव मजहब और नमाज की ओर हो गया था। स्त्री-पुरुष, वृद्ध और युवक, दुकानदार और नौकर, बच्चे और गुलाम सभी नमाज पढ़ने आते थे। बहुत से लोग जो प्रायः शेख के दर्शनों को आते थे, नियमानुसार अपने चश्त और इशराक की नमाज पढ़ते थे।’

नासिरुद्दीन चिराग- निजामुद्दीन औलिया के प्रमुख शिष्य नासिरुद्दीन महमूद चिराग थे जिन्होंने मुहम्मद हबीब के अनुसार अखिल भारतीय ख्याति अर्जित की। महमूद चिराग का जन्म अयोध्या में हुआ और 45 वर्ष की आयु में इन्होंने औलिया का शिष्यत्व ग्रहण किया। अपना सम्पूर्ण जीवन इन्होंने निर्धनता में व्यतीत किया। कुतुबुद्दीन मुबारकशाह और मुहम्मद तुगलक के शासनकाल में शेख को कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। प्रथम ने उन्हें मीरो मस्जिद में नमाज पढ़ने के लिए बाध्य किया और दूसरा सूफियों से अपनी आज्ञा का पालन कराना चाहता था। मुहम्मद तुगलक की मृत्यु के बाद फिरोज को गद्दी पर बैठाने में शेख साहब ने अन्य उलेमाओं का साथ दिया। फिरोज के सत्तारूढ़ होने के बाद शेख सुल्तान की नीतियों से सन्तुष्ट नहीं हुए परन्तु अपने शिष्यों से घिरे 1336 ई0 तक निरन्तर धर्म-प्रचार एवं ईश्वर-आराधना करते रहे।

शेख सलीम चिश्ती- चिश्ती शाखा के अन्तिम महत्वपूर्ण सन्त शेख सलीम चिश्ती थे। ये सम्राट अकबर के समकालीन थे। इनकी खानकाह सीकरी की पहाड़ी की एक गुफा में थी। इन्हीं के आशीर्वाद से अकबर के पुत्र एवं उत्तराधिकारी सलीम (जहाँगीर) का जन्म हुआ था। शेख सलीम विवाहित थे। उनके कई सन्तानें थीं। शेख सलीम चिश्ती को अत्यन्त ग्ल्याति प्राप्त हुई। अकबर के शासनकाल में ही उनकी मृत्यु हो गयी थी।

सुहरावर्दी सम्प्रदाय

सूफी सन्तों की दूसरी प्रसिद्ध शाखा सुहरावर्दी है, जिसकी स्थापना उत्तरी-पश्चिमी भारत में हुई। इस शाखा की थापना का श्रेय जियाउद्दीन अबुलजीव को है। इस शाखा का प्रमुख महत्व प्रदान कराने में बहाउद्दीन जकरिया ने महत्वपूर्ण भूमिका अभिनीत की।

बहाउद्दीन जकरिया— बहाउद्दीन जकरिया का जन्म मुल्तान के समीप कोट अरोर में 1182 ई0 में हुआ था। युवावस्था में इन्होंने खुरासान, बुखारा, मदीना आदि शिक्षा-केन्द्रों की यात्रा की। बगदाद में वे शेख शिहाबुद्दीन के शिष्य बन गये। आप तेरहवीं शताब्दी के अत्यन्त प्रभावशाली सन्त थे। चिश्ती सम्प्रदाय के सिद्धान्तों, निर्धनता, उपवास, इच्छा-दमन एवं शारीरिक यातनाओं में इन्हें विश्वास नहीं था। इन्होंने चिश्ती सिद्धान्तों के विरुद्ध राजनीति में ही भाग नहीं लिया अपितु धन-संग्रह भी किया और आरामदायक जीवन व्यतीत किया। 1262 ई० में उनकी मृत्यु के बाद यह सम्प्रदाय दो शाखाओं में बँट गया।

जलालुद्दीन सुर्ख बुखारी— ये बहाउद्दीन जकरिया के अत्यन्त प्रभावशाली शिष्य थे। उच में अपने गुरु की गद्दी को ग्रहण करने के बाद इन्होंने अनेक हिन्दुओं को इस्लाम धर्म में दीक्षित किया।

इनका एक पौत्र सैय्यद जलालुद्दीन मखदूम-ए-जहानिया सुहरावर्दी सम्प्रदाय का प्रसिद्ध सन्त था। मुहम्मद तुगलक के शासनकाल में इन्हें शेख-उल-इस्लाम के पद पर नियुक्त किया गया परन्तु कुछ समय के बाद इन्होंने इस पद को त्याग कर मक्का का मार्ग अपनाया। सुल्तान फिरोज तुगलक भी इनका अत्यन्त सम्मान करता था।

मुल्तान की सुहरावर्दी शाखा में सदुद्दीन आरिफ के बाद उनके पुत्र रुकनुद्दीन अबुल फथ ने शेख का स्थान प्राप्त किया। इतिहासकार उनकी तुलना चिश्ती सूफी सन्त निजामुद्दीन औलिया से करते हैं। उनकी श्रेष्ठता व योग्यता के कारण जनसाधारण के साथ-साथ उलेमा-वर्ग के लोग भी उनकी खानकाह में आने लगे।

चिश्ती सम्प्रदाय के सन्तों से भिन्न सुहरावर्दी सम्प्रदाय के सूफियों ने अपने पुत्रों के पालन-पोषण की समुचित व्यवस्था की। राजनीति से जुड़े रह कर इन्होंने धन-संचय भी किया जबकि चिश्ती सूफी निर्धनता में विश्वास करते रहे। ऐसा विश्वास किया जाता है कि बहाउद्दीन जकरिया मध्यकालीन भारतीय इतिहास के सर्वाधिक धनी सन्त थे।

सुहरावर्दी शाखा के अन्य महत्वपूर्ण सन्त शेख मूसा और शाह दौला दरियाई थे। शेख मूसा अधिकतर स्त्री-वेष में रहते थे। नृत्य एवं संगीत से उन्हें विशेष लगाव था। शाह दौला मूसा के शिष्य थे यद्यपि वे शाही-वंश से सम्बन्धित थे, परन्तु सूफी सम्प्रदाय में आने के पश्चात् उन्होंने सभी कुछ त्याग दिया था।

कादिरिया शाखा

12वीं शताब्दी में अब्दुल कादिम जिलामी ने कादिरिया शाखा की स्थापना की। मध्य-एशिया और पश्चिमी अफ्रीका में इस्लाम के प्रचार का श्रेय इसी शाखा को है। भारत में इस शाखा के प्रथम प्रचारक शाह नियामत उल्ला और नासिरुद्दीन महमूद जिलानी थे। मुहम्मद जिलानी सिन्ध के उच प्रदेश में बस गय, परन्तु उनके दो प्रपौत्र आगरा आ गये थे। अकबर ने शेख मूसा को राजकीय सहायता और मनसब प्रदान किया परन्तु दूसरे अब्दुल कादिर ने कोई भी राजकीय पद स्वीकार नहीं किया। अकबर के साथ कुछ असहमति हो जाने के कारण शेख कादिर वापस चले गये थे।

इस शाखा के अन्य प्रसिद्ध सन्त मीर मुहम्मद थे जो मुगल शासक जहाँगीर और शाहजहाँ के समकालीन थे। दाराशिकोह इनसे अत्यन्त प्रभावित था। इन्होंने मियाँ मीर के उत्तराधिकारी मुल्लाशाह बदख्शी का शिष्यत्व ग्रहण किया और तसव्वुफ से सम्बन्धित ग्रन्थ लिखे, उपनिषदों का फारसी में अनुवाद कराया और हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए प्रयास किया।

नक्शबन्दिया सम्प्रदाय

ख्वाजा बहाउद्दीन नक्शबन्द ने 14वीं शताब्दी में इस शाखा की स्थापना की, परन्तु भारत में इस शाखा के प्रचार-कार्य को ख्वाजा बकी बिल्लाह ने पूर्ण किया। 1603 ई0 में उनके देहान्त के बाद इस कार्य को उनके शिष्य अहमद फारुख सरहिन्दी ने आगे बढ़ाया। ये अत्यन्त प्रभावोत्पादक व्यक्तित्व के स्वामी और इस्लाम धर्म के प्रबल सुधारक थे। इन्होंने वहादत-उल-वुजूद (एकात्मवाद) के स्थान पर वहादत-उश-शहूद (प्रत्यक्षवाद) के सिद्धान्त को जन्म दिया। इनकी मान्यता थी कि मानव व ईश्वर के सम्बन्ध आशिक (प्रेमी) और मासूक (प्रेमिका) के न होकर मालिक व नौकर की तरह हैं। इनके पत्रों का संकलन ‘मक्तूवाद-ए-रब्बानी’ के नाम से प्रख्यात है।

शाह वलीउल्ला- इस शाखा के अन्य महत्वपूर्ण सन्त शाह वलीउल्ला थे। इन्होंने अत्यन्त कुशलता से वहादत-उल-वुजूद और वहादत-उश-शहूद के सिद्धान्त को सम्मिश्रित कर दिया था। ये दोनों सिद्धान्तों में मौलिक रूप से कोई अन्तर नहीं मानते थे और दोनों ही मार्गों को एक मंजिल तक ले जाने वाला स्वीकार करते थे। ईश्वर के अतिरिक्त वह अन्य सब चीजों को काल्पनिक मानते थे। शाह वलीउल्ला अत्यन्त प्रसिद्ध लेखक थे। उन्होंने सूफी धर्म से सम्बन्धित अनेक ग्रन्थ लिखे थे और तत्कालीन सभी लेखक उनकी विद्वता से प्रभावित थे।

ख्वाजा मीरदर्द- नक्शबन्दिया सम्प्रदाय के अन्तिम ख्यातिप्राप्त सन्त ख्वाजा मीरदर्द थे। वे वहादत-उल-वुजूद के सिद्धान्त को स्वीकार नहीं करते थे। उनका झुकाव मुस्लिम रूढ़िवादिता की ओर था इसलिए उन्होंने एक नवीन मत का प्रतिपादन किया जिसे वह इल्मे-इलाही मुहम्मद (पैगम्बर के उपदेशों में दैविक ज्ञान) कहते थे। इन्होंने सूफी धर्म पर अनेक ग्रन्थ लिखे।

अन्य सम्प्रदाय

भारत में उपर्युक्त चार प्रमुख सूफी मत की शाखाओं के अतिरिक्त निम्नलिखित अन्य महत्वपूर्ण शाखाएं भी थीं जिनका प्रचार भारत में लगभग नहीं था :

  1. शाद विलिया सम्प्रदाय— इसके संस्थापक आबू-मदयान थे। इसकी प्रमुख प्रचारक शादाविली थी।
  2. निमातुल्लादिया सम्प्रदाय- यह कादरिया सम्प्रदाय की ही एक शाखा थी और इसका केन्द्र इराक में था।
  3. शत्तारी सम्प्रदाय- इसके प्रथम सन्त अब्दुल शत्तार थे। सुमात्रा, जावा और भारत इसके केन्द्र थे।
  4. तेजानिया सम्प्रदाय- इसकी स्थापना का श्रेय अल्जीरिया के अहमद तिज्मनी को
  5. रिफाई सम्प्रदाय— अहमद रफी द्वारा स्थापित यह सम्प्रदाय भारत में लोकप्रिय नहीं हो सका।

सूफी धर्म और निर्गुण भक्ति की समताओं को देखते हुए यह प्रतीत होता है कि कबीर ने सूफी धर्म के सिद्धान्तों के आधार पर निराकार भक्ति के लिए लोगों को प्रेरित किया था।

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