राजपूत कालीन स्थापत्य-कला का विकास

राजपूत कालीन स्थापत्य-कला का विकास

राजपूत कालीन स्थापत्य-कला 

राजपूत शासक बड़े उत्साही निर्माता थे। अतः इस काल में अनेक भव्य मन्दिर, मूर्तियों एवं सुदृढ़ दुर्गों का निर्माण किया गया। राजपूतकालीन मन्दिरों के भव्य नमूने भुवनेश्वर, खुजराहो, आबू पर्वत (राजस्थान) तथा गुजरात से प्राप्त होते हैं। इनका विवरण इस प्रकार है-

उड़ीसा के मन्दिर-

उड़ीसा के मन्दिर मुख्यतः भुवनेश्वर, पुरी तथा कोणार्क में है जिनका निर्माण 8वीं से 13वीं शताब्दी के बीच हुआ। भुवनेश्चवर के मन्दिरों के मुख्य भाग के सम्मुख चौकोर कक्ष बनाया गया है। इनके भीतरी भाग सादे हैं किन्तु बाहरी भाग को अनेक प्रकार की प्रतिमाओं तथा अलंकरणों से सजाया गया है। मन्दिरों में स्तम्भों का बहुत कम प्रयोग किया गया है। इनके स्थान पर लोहे के शहतीरों का प्रयोग मिलता है। मन्दिरों की भीतरी दीवारों पर खुजराहों के मन्दिरों जैसा अलंकरण प्राप्त नहीं होता है। भुवनेश्वर के मन्दिर में लिंगराज मन्दिर उड़ीसा शैली का सबसे अच्छा उदाहरण है। इसमें चार विशाल कक्ष है। मुख्य कक्ष के ऊपर अत्यन्त ऊँचा शिखर बनाया गया है। इसकी गोलाकार चोटी के ऊपर पत्थर का आमलक तथा कलश रखा गया है। इस मन्दिर का शिखर अपने पूर्ण रूप से सुरक्षित है। लिंगराज मन्दिर के अतिरिक्त पुरी का जगन्नाथ मन्दिर तथा कोणार्क स्थिति सूर्य-मन्दिर भी उड़ीसा शैली के श्रेष्ठ उदाहरण है। कोणार्क का सूर्य मन्दिर वास्तुकला की एक अनुपम रचना है। यह रथ के आकार पर बनाया गया है। इसका विशाल प्रांगण 865 x 540 के आकार का है। मन्दिर का शिक्षर 225 ऊंचा था जो कुछ समय पूर्व गिर गया किन्तु इसका बड़ा सभाभवन आज भी सुरक्षित है। सभाभवन और शिखर का निर्माण एक चौड़ी तथा ऊँची चौकी पर हुआ है जिसके चारों ओर बारह पहिये बनाये गये हैं। प्रवेशद्वार पर जाने के लिये सीढ़ियाँ बनायी गयी है। इसके दोनों ओर उछलती हुई अश्व प्रतिमायें उस रथ का आभास करती है जिन पर चढ़कर भगवान सूर्य आकाश में विचरण करते हैं। मन्दिर के बाहरी भाग पर विविध प्रकार की प्रतिमायें उत्कीर्ण की गयी है। कुछ मूर्तियाँ अत्यन्त अश्लील हैं जिन पर तात्रिक विचारधारा का प्रभाव माना जा सकता है। संभोग तथा सौन्दर्य का मुक्त प्रदर्शन यहाँ दिखाई देता है।

गुजरात तथा राजस्थान के मन्दिर-

चौलुक्य (सोलंकी) राजाओं के काल (941-1240 ई०) में गुजरात के अन्हिलवाड़ तथा राजस्थान के आबू पर्वत पर कई भव्य मन्दिरों का निर्माण करवाया गया। ये मुख्यतः जैन धर्म से सम्बन्धित हैं। गुजरात के प्रमुख मन्दिरों में मेहसाना जिले में स्थित मोडेहरा का सूर्य मन्दिर उल्लेखनीय है। इसका निर्माण ग्यारहवीं शती में हुआ था। अब यह मन्दिर नष्ट हो गया है, केवल इसके ध्वंसावशेष ही विद्यमान है। इनमें गर्भगृह, प्रदाक्षणापथ, मण्डप आदि है। इसका निर्माण ऊँचे चबूतरे पर किया गया है। पाटन स्थित सोमनाथ के मन्दिर का भी उल्लेख किया जा सकता है जिसका पुनर्निर्माण इस काल में हुआ। इस वंश के शासक कर्ण ने अन्हिलवाड़ में कर्णमेरू नामक मन्दिर बनवाया था। सिद्धपुर स्थित रूद्रमाल का मन्दिर भी वास्तुकला का सुन्दर उदाहरण है।

आबू पर्वत पर कई मन्दिर प्राप्त होते हैं। यहाँ दो प्रसिद्ध संगमरमर के मन्दिर है जिन्हें दिलवाड़ा कहा जाता है। पहले में आदिनाथ की मूर्ति है। जिसकी आँखें हीरे की है। प्रवेशद्वार पर छः स्तम्भ तथा दस गज-प्रतिमायें है। इसमें 128×75′ के आकार का एक विशाल प्रांगण है। यह मन्दिर अपनी बारीक नक्काशी तथा अदभुत मूर्तिकारी के लिये प्रसिद्ध है। पाषण शिल्पकला का इतना बढ़िया उदाहरण अन्यत्र नहीं मिलता। दूसरा मन्दिर जो तेजपाल कहा जाता है, इसी के पास स्थित है। यह भी भव्य तथा सुन्दर है। पहाड़ी पर तीन अन्य जैन मन्दिर भी बने हुए हैं।’ पश्चिमी भारत के मन्दिरों का निर्माण सामान्यतः ऊंचे चबूतरे पर हुआ है। इनके शिखर छोटी मीनारों से अलंकृत है। मन्दिर की भीतरी छतों पर खोदकर चित्रकारियों की गयी है। सभी मन्दिर अपनी सूक्ष्म एवं सुन्दर नक्काशी के लिये प्रसिद्ध है। इनमें सफेद संगमरमर के पत्थर लगे हुए हैं।

बुन्देलखण्ड के मन्दिर-

बुन्देलखण्ड का प्रमुख स्थल मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में स्थित खुजराहों नामक स्थान हैं। यहाँ चन्देल राजाओं के समय में नवीं शताब्दी से लेकर बारहवीं शताब्दी तक अनेक सुन्दर तथा भव्य मन्दिरों का निर्माण करवाया गया। ये पूर्व मध्ययुगीन वास्तु एवं तक्षण कला के उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते है।

खुजराहों में 25 मन्दिर आज भी विद्यमान है। इनका निर्माण ग्रेनाइट तथा लाल बलुआ पत्थरों से किया गया है। ये शैव, वैष्णव तथा जैन धर्मो से सम्बन्धित है। मन्दिरों का निर्माण ऊंची चौकी पर हुआ है। जिसके ऊपरी भाग को अनेक अलंकारणों से सजाया गया है। दीवारों में बनी खिड़कियों में छोटी-छोटी मूर्तियाँ रखी गयी है। गर्भगृह के ऊपर उत्तंग शिखर है। मन्दिर आकार में बहुत बड़े नहीं है तथा उनके चारों और दीवार भी नहीं बनाई गयी है। प्रत्येक मन्दिर में मण्डप, अर्थमण्डप तथा अन्तराल मिलते है। कुछ मन्दिरों में विशाल मण्डप बने है। जिससे उन्हें महामण्डप कहा जाता है। मन्दिरों के प्रवेश-द्वारा को मकर-तोरण कहा गया है। क्योंकि उनके ऊपर मकर मुख की आकृति बनी हुई है। कुछ मन्दिरों में गर्भग्रह के चारों ओर प्रदक्षिणा मार्ग भी बनाये गये हैं। गर्भग्रह के प्रवेश-द्वार पर भी काफी अलंकरण मिलते हैं। खुजराहों के मन्दिर एक ऐसे पर्वत के समान लगते हैं जिस पर छोटी-बड़ी कई श्रेणियाँ होती है।

खुजराहों के मन्दिरों में कन्डारिया महादेव मन्दिर सर्वश्रेष्ठ है। यह 109-60×116′ के आकार में बना है। इसमें एक ऊँचा शिखर तथा कई छोटे-छोटे शिखर बनाये गये है। इनकी दीवारों पर बहुसंख्यक मूर्तियाँ उत्कीर्ण मिलती है। इसके गर्भग्रह में संगमरमर का शिवलिंग स्थापित किया गया है। जैन मन्दिरों में पार्श्वनाथ मन्दिर प्रसिद्ध है जो 62×31′ के आकार में निर्मित है। इसकी बाहरी दीवारों पर जैन मूर्तियों की तीन पंक्तियाँ खोदी गयी है। वैष्णव मन्दिरों में चतुर्भुज मन्दिर उल्लेखनीय है जो 85×44′ के आकार का है। इसका वास्तु विन्यास कन्डारिया महादेव जैसा ही है। यहाँ के कुछ अन्य मन्दिर इस प्रकार है-चौसठ योगिनी, ब्रह्मा, लालगुओं महादेव, लक्ष्मण, विश्वनाथ मन्दिर आदि। ये सभी वास्तु कला के अत्युत्कृष्ट उदाहरण है।

वास्तु कला के समान खुजराहों के मन्दिर अपनी तक्षण-कला के लिये भी अत्यन्त प्रसिद्ध है। इनकी भीतरी तथा बाहरी दीवारों को बहुसंख्यक मूर्तियों से सजाया गया है। गुम्बददार छतों के ऊपर भी अनेक चित्र उत्खचित है। यद्यपि यहाँ की मूर्तियाँ उड़ीसा की मूर्तियों की भाँति सुदृढ़ नहीं है, तथापि उनसे कहीं अधिक सजीव तथा आकर्षक प्रतीत होती है।

खुजराहों मन्दिर में देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ-साथ कई दिग्पालों, गणो, अप्सराओं, पशु-पक्षियों आदि की बहुसंख्यक मूर्तियाँ भी प्राप्त होती हैं। कुछ मूर्तियाँ अत्यन्त अश्लील हो गयी हैं जिन पर संभवतः तांत्रिक विचारधारा का प्रभाव लगता है।

इस प्रकार समग्र रूप से खुजराहों के मन्दिर अपनी वास्तु तथा तक्षण दोनों के लिये अत्यन्त प्रसिद्ध हैं। के० डी० वाजपेयी के शब्दों में प्रकृति और मानव जीवन की ऐहिक सौदर्यराशि को यहाँ के मन्दिरों में शाश्वत रूप प्रदान कर दिया गया है। शिल्प श्रृंगार का इतना प्रचुर तथा व्यापक आयाम भारत के अन्य किसी कला केन्द्र में शायद ही देखने को मिले।”

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