सल्तनत कालीन समाज के प्रमुख वर्ग

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सल्तनत कालीन समाज के प्रमुख वर्ग

सल्तनत कालीन समाज के प्रमुख वर्ग

चूँकि सल्तनतकालीन शासक कुरान और तलवार लेकर भारत में प्रवृष्ट हुए थे अतः इस युग में हिन्दुओं और मुसलमानों के मध्य अलगाव का होना स्वाभाविक था। साथ ही इस्लाम को राजधानी घोषित किये जाने के कारण हिन्दुओं और मुसलमानों के सम्बन्ध तनावपूर्ण रहे। दोनों समुदायों की सामाजिक संरचना सल्तनत-काल में अलग-अलग थी, क्योंकि मुस्लिम वर्ग शासक था और हिन्दू वर्ग शासित।

सल्तनत कालीन समाज

मुस्लिम समाज- शासक वर्ग से सम्बन्धित होने के कारण मुसलमान अपने आपको श्रेष्ठ समझते थे। निःसन्देह मुस्लिम समाज में जाति-प्रथा का प्रचलन नहीं था परन्तु जन्म, नस्ल और धर्म के आधार पर वे कई वर्गों में बंटे हुए थे। शिया और सुन्नी मुसलमानों में परस्पर तीव्र मतभेद था। विदेशी मुसलमान भारतीय मुसलमानों को घृणा की दृष्टि से देखते थे, परन्तु अल्लाह के समक्ष सभी मुसलमान समान थे। सल्तनतकालीन मुस्लिम समाज मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित था:

(1) विदेशी मुसलमान, (2) भारतीय मुसलमान, (3) दास।

विदेशी मुसलमान-

विदेशी मुसलमान नस्ल के आधार पर ईरानी, तुर्की, अरबी, पठान, मुगल आदि में विभाजित थे। दिल्ली-सल्तनतकाल में राज्य के समस्त महत्वपूर्ण पदों पर उनको ही नियुक्त किया जाता था और सुल्तान के पद पर भी इसी वर्ग के व्यक्ति को आसीन किया जाता था। मुख्य रूप से विदेशी मुसलमानों को पाँचों भागों में विभाजित किया जा सकता है-(i) शासक वर्ग, (ii) सामन्त और अमीर, (iii) उलेमा, (iv) मध्यम वर्ग, (v) जनसाधारण वर्ग।

(i) शासक वर्ग— यह मध्य-युग का सर्वाधिक महत्वपूर्ण वर्ग था जिसके हाथ में शासन की समस्त बागडोर थी। इस वर्ग का सर्वोच्च पदाधिकारी सुल्तान कहलाता था। शासन की सम्पूर्ण प्रभुसत्ता उसमें निहित थी। राज्य की समस्त कार्यकारी, विधायी, सैनिक एवं न्यायिक शक्तियाँ उसमें ही केन्द्रित थी।

सुल्तान की शक्तियाँ असीमित थीं। वह औपचारिक रूप से अपने आप को खलीफा का प्रतिनिधि स्वीकार करता था किन्तु व्यावहारिक रूप से सुल्तान वास्तविक सम्प्रभुता एवं निरंकुशता से शासन करता था। सुल्तान का शाही जीवन अत्यन्त प्रभावोत्पादक तथा वैभवपूर्ण होता था। जिस समय सुल्तान सिंहासन पर बैठता था उसके समस्त वजीर एवं कर्मचारी खड़े रहते थे। छत्र, दूरवास, सायबान उसके राज्य-चिह्न थे। इब्नबतूता ने मध्यकालीन सुल्तानों के ऐश्वर्यपूर्ण दरबारी जीवन का अत्यन्त आकर्षक वर्णन किया है।

दरबार में सुल्तान के मनोरंजन के लिए अनेक कलाकार, भाँड़, संगीतज्ञ, नादिम और विदूषक रहते थे, जो अपनी-अपनी कलाओं के प्रदर्शन के द्वारा सुल्तान का दिल बहलाते थे। सर जादार, सर आबदार और चाशनीगीर आदि प्रमुख पदाधिकारी थे जो सुल्तान की व्यक्तिगत सुरक्षा एवं भोजन व्यवस्था का प्रबन्ध करते थे।

(ii) सामन्त और अमीर- मध्य युग के अन्तर्गत दूसरा महत्वपूर्ण स्थान अमीरों का था जो स्वयं निम्नलिखित श्रेणियों में विभाजित थे—(अ) खान, (ब) मलिक, (स) अमीर, और (द) सिपहसालार।

सुल्तानों की शक्ति का आधार ये अमीर थे और उसे इनके सक्रिय समर्थन पर निर्भर रहना पड़ता था। अमीरों की शक्ति उसकी निरंकुशता एवं स्वेच्छाचारिता पर अंकुश का कार्य करती थी। ये अमीर अपनी बहुमुखी प्रतिभा एवं तकनीकी ज्ञान के कारण राज्य के आधार-स्तम्भ थे, तथा राज्य के लिए उनकी सेवाओं का अत्यधिक महत्व था। वस्तुतः राज्य की वास्तविक शक्ति मुस्लिम योद्धाओं में ही निहित थी। चूंकि ये अपने स्वामी के मान-सम्मान की रक्षा के लिए रक्त बहाते थे, अतः कोई भी शासक इनकी उपेक्षा करके सफलतापूर्वक शासन का संचालन नहीं कर सकता था।

(ii) उलेमा- इस वर्ग का न्याय, धर्म तथा शिक्षा सम्बन्धी समस्त उच्च पदों पर अधिकार था। डॉ0 अशरफ ने उलेमाओं की स्थिति के सम्बन्ध में लिखा है, “कुरान में उलेमा का स्थान सामान्य रूप से मुसलमानों से पृथक् माना गया है जो लोगों को उचित मार्गदर्शन कराते हैं।’ धार्मिक कार्यों के अतिरिक्त उलेमा निजी एवं सरकारी शिक्षण संस्थाओं में अध्यापन कार्य भी करते थे। सामान्यतः ये इस्लाम के प्रचार का कार्य करते थे। उलेमा कुरान, हदीस, फिक आदि में पारंगत होते थे।

उलेमा राजनीति में भी हस्तक्षेप करते थे। महत्वपूर्ण वैधानिक विषयों के साथ-साथ राजनीतिक मामलों में ये सुल्तान को सलाह देते थे। सल्तनतकालीन सुल्तानों में अलाउद्दीन खलजी एवं उसके पुत्र मुबारकशाह को छोड़कर समस्त मुस्लिम शासकों पर इनका अत्यधिक प्रभुत्व था। इनका राजनीति में अत्यधिक हस्तक्षेप शासन के हित में हानिकारक सिद्ध हुआ और  इनके संकीर्ण धार्मिक दृष्टिकोण के कारण सुल्तानों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। वास्तव में, मध्यकालीन सुल्तानों में धार्मिक कट्टरता के जनक ये उलेमा ही थे। इनके प्रभाव के कारण बहुसंख्यक हिन्दुओं को काफिर समझा जाता रहा तथा उन पर अनेक अत्याचार किये गये।

(iv) मध्यम वर्ग– शासक वर्ग एवं जनसाधारण वर्ग के मध्य एक कड़ी के रूप में मध्यम वर्ग भी था जिसकी आर्थिक स्थिति अच्छी ही नहीं थी अपितु समाज में पर्याप्त सम्मान भी था। अमीरों के विलासितापूर्ण जीवन की ओर संकेत करते हुए बर्नियर ने लिखा कि अत्यधिक व्यय और विलासी जीवन के कारण अमीर ऋणग्रस्त थे, परन्तु मध्यम वर्ग सम्पन्न था जिसका प्रमुख कारण यह था कि न तो ये शासक वर्ग की तरह खर्चीले थे और न ही आडम्बरप्रेमी थे। इस वर्ग के अन्तर्गत आने वाले व्यापारियों की समानता की ओर संकेत करते हुए डॉ० यूसुफ हुसैन ने लिखा है, “गुजरात के व्यापारी भारत के समस्त समुद्र तट पर व्यापार करते थे. ……जो पूँजीपति व्यापारी थे।

(v) जनसाधारण— यह वर्ग मध्य-काल का निम्नतम वर्ग था। इसमें मुख्यतः किसान, मजदूर, कारीगर और दुकानदार सम्मिलित थे। इस वर्ग में मुसलमानों में केवल वही लोग थे जिन्होंने बाद में परिस्थितियोंवश इस्लाम को स्वीकार किया था। यद्यपि निम्न जाति के हिन्दुओं ने अपना धर्म त्याग कर राजधर्म इस्लाम को स्वीकार किया था।

दास-

मध्यकालीन भारत में दास-प्रथा प्रचलित थी। हिन्दू और मुसलमान दोनों ही दास रखते थे। दासों के हाट लगते थे जहाँ उनकी पशुओं के समान बिक्री होती थी। हिन्दू-धर्मग्रन्थों में अनेक प्रकार के दासों का वर्णन मिलता है। दासों को रखने का सर्वप्रमुख कारण उनकी सेवा प्राप्त करना था। अमीर और सामन्त निरन्तर चलने वाले युद्धों में व्यस्त रहते थे। अतः गृह-कार्य का दायित्व इन दासों पर डाल दिया जाता था। हिन्दू समाज में दासों के साथ उदारता का व्यवहार किया जाता था।

मुस्लिम समाज में केवल चार प्रकार के दासों का वर्णन मिलता है : (1) खरीदा हुआ दास, (2) दान अथवा उपहार में प्राप्त दास, (3) युद्ध में बन्दी बनाया गया दास, और (4) आत्मविक्रेता दास।

मध्य-काल में दासों का व्यापार आर्थिक रूप में अत्यन्त लाभप्रद होता था। तुर्किस्तान से दास भारत में भेजे जाते थे। भारत के दासों में शारीरिक शक्ति के आधार पर असम के दासों का महत्व अधिक था। इससे उनका विक्रय-मूल्य अधिक होता था। दासों से हर प्रकार का कार्य लिया जाता था। जिन दासों को शाही हरम में सुरक्षा की दृष्टि से नियुक्त किया जाता था उनका पुरुषत्व-हरण कर लिया जाता था।

अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में दासों की संख्या में पर्याप्त वृद्धि हो गयी थी, परन्तु तुगलक-काल में यह संख्या पराकाष्ठा को प्राप्त हुई। फिरोज तुगलक दासों को रखने का विशेष चाव रखता था जिसका प्रमुख कारण उसकी धर्मान्धता थी। दासों को अपने धर्म में दीक्षित करके वह इस्लाम धर्म के प्रचार में सहयोग दे रहा था। शम्से शिराज अफीक ने लिखा है कि “सुल्तान दासों को प्राप्त करने में अत्यन्त परिश्रमी था। उसने अपने अधिकारियों को यह स्पष्ट आदेश दिया था कि युद्धबन्दियों को दास बनाकर प्रस्तुत किया जाये।”

फिरोज के शासन-काल में दासों की संख्या अत्यधिक बढ़ जाने के कारण उनकी देखभाल के लिए अलग से एक विभाग खोला गया। ये दास केवल श्रमिक, मजदूर अथवा सेवक मात्र नहीं थे अपितु लगभग 12 हजार दास विभिन्न कलाओं में पूर्ण रूप से दक्ष थे। अफीक ने दासों की बहुमुखी प्रतिभा की ओर इंगित करते हुए लिखा है, “वस्तुतः राज्य में कोई ऐसा कार्य नहीं था जिसमें फिरोज तुगलक के दास लगे हुए न थे।”

परन्तु जिस प्रकार इल्तुतमिश के चालीस दासों के दल ने उसके पुत्रों को कठपुतली बनाये रखा, उसी प्रकार फिरोज तुगलक के इस शौक ने सल्तनतकालीन व्यवस्था को आर्थिक रूप से खोखला किया।

गोरी के योग्य दासों ने धीरे-धीरे शक्ति को हस्तगत किया, उसी प्रकार इल्तुतमिश व बलबन ने दासतां की स्थिति से ऊपर उठकर सुल्तान के सर्वोच्च पद को प्राप्त किया और ऐश्वर्य एवं वैभव का जीवन व्यतीत किया। वस्तुतः तुर्की राज्य की स्थापना में दास-प्रथा का महत्वपूर्ण योगदान है तथा कथित दास-वंश के इतिहास में ‘चालीस गुलामों के दल’ की भूमिका अविस्मरणीय है। समय के साथ दासों की स्थिति में परिवर्तन आना प्रारम्भ हुआ और कालान्तर में यही दास दिल्ली सल्तनत में निरन्तर राजवंशों में शीघ्र परिवर्तन का एक कारण बन गये। बलबन उस समय तक चैन से नहीं बैठा जब तक उसने शक्तिशाली ‘चालीस गुलामों के दल’ की शक्ति को पूर्ण रूप से कुचल नहीं दिया।

हिन्दू समाज- मुस्लिम समाज की तरह हिन्दू समाज भी कई जातियों और उपजातियों में विभाजित था। जाति-व्यवस्था अत्यन्त जटिल हो गयी थी और समाज में अन्धविश्वास, रूढ़ियाँ और अस्पृश्यता की भावना फैल गयी थी। मार्कोपोलो लिखता है कि हिन्दू अन्धविश्वासी थे। वे जादू-टोना, अन्धविश्वास और ज्योतिष में पूर्ण विश्वास करते थे। अलबरूनी ने भी लिखा है, “उनका दम्भ एवं आत्मप्रवंचना इतने बढ़े हुए हैं कि यदि कोई उनको खुरासान या फारस में किसी विज्ञान या विद्वान् के विषय में बतलाता है तो वह उसको मूर्ख और झूठा समझते थे। विदेशियों से वह किसी प्रकार का विवाह अथवा खानपान का सम्बन्ध नहीं रखते थे।’

इब्नबतूता लिखता है कि हिन्दू गंगा में डूबकर आत्महत्या करना पवित्र कार्य समझते थे। साथ ही इस्लाम के अनुयायियों के भारत में आने के बाद हिन्दू समाज में पर्दा-प्रथा और बाल-विवाह जैसी कुप्रथाओं का सूत्रपात हुआ। सल्तनतकालीन हिन्दुओं की स्थिति कदाचित शोचनीय थी, क्योंकि तुर्कों का हिन्दुओं के प्रति व्यवहार अत्यन्त क्रूर एवं अत्याचारपूर्ण था। डॉ0 श्रीवास्तव ने लिखा है, “हमारे देश के इतिहास के किसी भी युग में मानव-जीवन का इतना नृशंसतापूर्ण विनाश नहीं किया गया जितना कि तुर्क-अफगान शासन के इन 250 वर्षों में।” हिन्दू महिलाओं पर तरह-तरह के अत्याचार किये गये और उन्हें दासियों का जीवन व्यतीत करने के लिए बाध्य किया गया। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में हिन्दुओं पर अनेक प्रतिबन्ध लगाये गये। उनके लिए अरबी घोड़े की सवारी करना वर्जित घोषित किया गया और अच्छे कपड़े पहनना निषेध कर दिया गया। हिन्दुओं की तत्कालीन दयनीय स्थिति का वर्णन करते हुए बरनी ने लिखा है, “उनकी (हिन्दुओं) स्त्रियों को जीविकोपार्जन के लिए मुसलमानों के यहाँ नौकरी करनी पड़ती थी।” वास्तव में किसी भी युग में हिन्दुओं की इतनी दुर्दशा नहीं हुई जितनी कि सल्तनत-काल में। यद्यपि अपनी हीन स्थिति के कारण उनमें निराशा की भावना व्याप्त गयी थी किन्तु उनका कभी भी नैतिक पतन नहीं हुआ। रशीबुद्दीन लिखता है, “वे स्वभावतः न्यायप्रिय हैं और अपने आचरणों में इसका त्याग नहीं करते।”

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