जहाँगीरकालीन चित्रकला

जहाँगीरकालीन चित्रकला

मुगलकाल में जहाँगीर का शासनकाल चित्रकला के चरमोत्कर्ष का युग था”

जहाँगीरकालीन चित्रकला

स्थापत्य कला की तुलना में जहाँगीर का झुकाव चित्रकला की ओर अधिक था। वह चित्रकला का संरक्षक ही नहीं अपितु स्वयं भी कुशल चित्रकला-पारखी था। सम्राट के चित्रकला के प्रति विशेष आकर्षण के कारण इस कला को विकास के लिए अनन्य उत्साह प्राप्त हुआ। चित्रकला के प्रति बादशाह की आसक्ति इस सीमा तक थी कि उसका अधिकांश समय चित्रकारों के सम्पर्क में ही व्यतीत होता था। विदेशी भ्रमणकर्ता एवं पादरी जो हमारे देश में आये, उन्होंने चित्रकला के प्रति जहाँगीर के प्रेम की अत्यन्त प्रशंसा की है। फादर गिरीरो, विलियम हाकिन्स और सर टामस रो आदि तत्कालीन चित्रकला के विकसित रूप के प्रशंसक थे।

चरमोत्कर्ष का युग- जहाँगीर ने स्वयं अपनी आत्मकथा तुजके जहाँगीरी में चित्रकला के प्रति अपनी आसक्ति को स्पष्ट करते हुए लिखा है, “अपने सम्बन्ध में मैं यह कह सकता हूँ कि चित्रकला के प्रति मेरी आसक्ति और विवेचना इस सीमा तक पहुंच चुकी है कि जब किसी जीवित अथवा मृत चित्रकार द्वारा बनाया गया चित्र मेरे सम्मुख लाया जाता है तब मैं तुरन्त यह बता देता हूँ कि यह चित्र अमुक व्यक्ति का है। यदि एक चित्रपट पर अनेक व्यक्तियों की छवियाँ हैं जो भिन्न-भिन्न चित्रकारों द्वारा बनायी गयी है तो मैं यह बता सकता हूँ कि किस-किस चित्रकार ने मिलकर इसे बनाया है। यदि किसी अन्य चित्रकार ने चित्र में आँख व भौह बनायी हैं तब मैं यह भी बता सकता हूँ कि मुख्य चेहरा किसके द्वारा अंकित किया गया है और आँख तथा भौंह किसने बनायी है।” जहाँगीर का चित्रकला के प्रति यह दावा तभी सम्भव है जबकि चित्रकला का उसने सूक्ष्म अध्ययन किया हो और प्रत्येक कलाकार की शैली का उसे सम्पूर्ण ज्ञान हो। वस्तुतः उसका उपर्युक्त आत्मकथा से उदधृत अंश चित्रकला में उसके गहन ज्ञान एवं रूचि का परिचायक है।

जहाँगीरकालीन युग चित्रकला की दृष्टि से कलामर्मज्ञों द्वारा चरमोत्कर्ष का काल स्वीकार किया जाता है। सर टामस रो के वर्णन से तत्कालीन चित्रकारों की योग्यता और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। वह लिखता है, उसके द्वारा प्रस्तुत एक चित्र की ऐसी प्रतिलिपियाँ बादशाह ने तैयार करायी कि टामस रो मूल प्रति और चित्रित की गयी प्रति में अन्तर नहीं पा सका, जबकि जहाँगीर ने उसे शीघ्र ही मूल प्रति बता ही नहीं दी अपितु दोनों में जो सूक्ष्म अन्तर था उसे भी स्पष्ट कर दिया।” सर टामस रो के मत का समर्थन करते हुए केटरों ने लिखा है, “उस युग में भारतवर्ष में ऐसे चित्रकार भी थे जो यूरोप में बने चित्रों की इतनी सुन्दर प्रतियाँ तैयार करते थे कि वह मौलिक चित्रों के समान प्रतीत होने लगती थी।”

जहाँगीरकालीन प्रसिद्ध चित्रकार

जहाँगीर के काल में निम्नलिखित दस सर्वाधिक प्रसिद्ध चित्रकार थे जो अपनी योग्यता एवं निपुणता के कारण प्रख्यात थे।

  • अबुल हसन नादिर-उज-जमा,
  • सालिवाहन,
  • उस्ताद मसूर,
  • फारूख बेग
  • मनोहर
  • बिशनदास
  • गोवर्धन
  • दौलत
  • उस्ताद मुराद
  • मुहम्मद नादिर

चित्रकार अबुल हसन अद्वितीय था। उसकी चित्रकला-कृतियों की प्रशंसा जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में की है। अबुल हसन द्वारा निर्मित साधारण चित्र भी कला की भावना व कल्पना के सहारे अत्यन्त कलात्मक बन जाता था। सालिवाहन, उस्ताद मंसूर आदि समस्त कलाकार भी अपने क्षेत्र में प्रमुखता प्राप्त थे।

चित्रों के विषय

यद्यपि चित्रों का मूल विषय राजदरबार था, परन्तु जहाँगीर के काल में उसके सौन्दर्य-प्रेमी होने के कारण प्रकृति-चित्रण को विशेष प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। अधिकांश चित्र उद्यानों के बनाये जाते थे जिनमें फल, फूल, पत्तियों, और पक्षियों की बहुतायत होती थी। कुछ चित्रों में शिकार के दृश्य अंकित है। हाथी, घोड़ा एवं पालतू पशुओं को भी चित्रित किया जाता था। चित्रों में अश्लीलता का प्रदर्शन दिखायी नहीं पड़ता है। जहाँगीरकालीन चित्रकार मंसूर, मुराद और मनोहर प्रकृति-चित्रण में अत्यन्त कुशल थे। जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि मंसूर ने सौ से अधिक प्रकृति-चित्रों को चित्रित किया। चित्रों के चारों ओर बेलबूटे के जो सुन्दर हाशिये बनाये गये थे उससे मुख्य चित्रों के सौन्दर्य में अत्यधिक वृद्धि हो गयी थी। डॉ रामनाथ ने हाशिये की कला के सम्बन्ध में लिखा है, “हाशिये की कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण बर्लिन के राजकीय पुस्तकालय में सुरक्षित जहाँगीर के युग की एक मुरक्का में है। कभी-कभी ये हाशिये इतने सुन्दर बन गये हैं कि मूल चित्र को इन्होंने पृष्ठभूमि में छोड़ दिया है और ऐसा प्रतीत होता है कि चित्रकार का मूल उद्देश्य ही हाशिया बनाना था।”

व्यक्ति-चित्र

जहाँगीर के काल में व्यक्ति-चित्रण को और अधिक प्रोत्साहन प्राप्त हुआ। अकबर ने अपने शासनकाल में व्यक्ति-चित्रों के माध्यम से मृतकों को अमर बनाने की जो परम्परा प्रारम्भ की, उसे जहाँगीर ने अक्षुण्ण ही नहीं बनाया अपितु उसमें चार चाँद लगाये। बिशनदास जहाँगीर के युग का अत्यधिक कुशल व्यक्ति चित्रकार था। ऐसा भी कहा जाता है कि जहाँगीर के शासनकाल में महिला चित्रकारों द्वारा हरम की बेगमों के भी व्यक्ति-चित्र बनाये गये। जहाँगीर के चित्रकला के प्रति लगाव के कारण इस कला में चहुमुखी विकास हुआ।

चित्रकला के विकास में नूरजहाँ का योगदान

जहाँगीर ने अपने महल और उद्यान में अनेक चित्र-गैलरियाँ बनवायीं और चित्रकला को विकसित होने के नवीन क्षेत्र प्रदान किये। उसके समय की चित्रकला मे नवीनता, स्वाभाविकता, गतिशीलता और सजीवता का पूर्ण समावेश हो गया था। चित्रकला सम्राट के मनोभावों की अभिव्यक्ति का सहज माध्यम बन गयी

में थी। जहाँगीर के युग की कला के विकास में नूरजहाँ का भी पूर्ण सहयोग था। वह स्वयं कला-प्रेमी साम्राज्ञी थी। सम्राट को राजनीतिक समस्याओं से मुक्त करके उसने उसे कला के विकास की ओर प्रेरित किया। नूरजहाँ के आकर्षक व्यक्तित्व और सौन्दर्य के अभाव में जहाँगीर कला के प्रति इतना अधिक आकर्षण अनुभव नहीं कर सकता था।

डॉ० रामनाथ ने लिखा है, “जहाँगीर के संरक्षण में मुगल-चित्रकला ईरानी बन्धनों से मुक्त हो गयी और नये-नये क्षेत्रों में उसके विकास का मार्ग खुल गया। यद्यपि मुगल-चित्रकला का जो अपना निजी व्यक्तित्व था वह उसमें बराबर बना रहा किन्तु जहाँगीर के कलात्मक युग में चित्रकारों में एक नवीन जागृति उत्पन्न हुई। विषय और विधि दोनों ही दृष्टिकोणों से ही मुगल-चित्रकला का चरमोत्कर्ष जहाँगीर के राज्यकाल में हुआ।

1627 ई० में जहाँगीर की मृत्यु के साथ इस कला के पतन की प्रक्रिया का प्रारम्भ हुआ। पर्सी ब्राउन ने लिखा है, “जहाँगीर की मृत्यु के साथ-साथ मुगल-चित्रकला की आत्मा विलीन हो गयी।” जहाँगीर के युग में कला की पराकाष्ठा जहाँ उदार संरक्षण एवं बादशाह के कला-प्रेमी होने के कारण प्राप्त हुई वहाँ उपस्थित देशी और विदेशी चित्रकारों का योगदान भी प्रशंसनीय है जिनके अथक परिश्रम से जहाँगीर का युग चित्रकला की दृष्टि से स्वर्ण-युग की संज्ञा प्राप्त करने में सफल रहा।

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