19वीं शताब्दी का धार्मिक सुधार आन्दोलन

ब्रह्म समाज एवं राजा राममोहन राय

अठारहवीं शताब्दी के राष्ट्रीय पतन के समय आर्थिक दरिद्रता तो आई ही, धर्म भी बुरी तरह भ्रष्ट हुआ। उस समय अंधविश्वासों और धार्मिक आडंबर का सर्वत्र बोलवाला था तथा सारे देश में एक तरह का बौद्धिक दिवालियापन छाया हुआ था। अतः सुधारकों की दृष्टि सबसे पहले धर्म पर ही पड़ी। धार्मिक आडंबरों की चुनौती दी गई एवं धर्मों में सुधार कर उन्हें समसामयिक संदर्भ में उपयोगी एवं युक्तिसंगत बनाने का प्रयास शुरू हुआ।

ब्रह्म समाज एवं राजा राममोहन राय

धर्म सुधार का प्रारंभ देशों के पूर्वी भाग–बंगाल से हुआ और इस आंदोलन का नेतृत्व राजा राममोहन राय (1774-1833) ने किया। इसी कारण राजा राममोहन राय को भारत के नवजागरण का अग्रदूत सुधार आंदोलनों का प्रर्वतक एवं आधुनिक भारत का पहला महान नेता माना जाता है।

राममोहन का जन्म बंगाल के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बचपन से ही उनकी बुद्धि तेज थी और वे स्वभाव से विद्रोही थे। अपने विचारों के कारण उन्हें अपने कट्टरपंथी परिवार से बाहर निकाल दिया गया। कुछ समय तक वे इधर-उधर भटकते रहे। परंतु इस बीच उन्होंने विभिन्न भाषाओं का अध्ययन किया और अरबी, फारसी तथा संस्कृत के अच्छे ज्ञाता बन गए। उन्होंने अंग्रेजी, फ्रेंच, ग्रीक, लैटिन, जर्मन और हिब्रू भाषाएँ भी सीखीं। भारतीय भाषाओं के माध्यम से उन्होंने भारतीय धर्म एवं परपंराओं का अध्ययन किया और विदेशी भाषाओं द्वारा इस्लाम, ईसाई एवं विश्व के अन्य धर्मों का अध्ययन किया। इससे वे विश्व के अन्य भागों, विशेषकर यूरोप की सभ्यता-संस्कृति तथा आधुनिक ज्ञान के संपर्क में आए।

राममोहन का जन्म भारत के उस भाग में हुआ था जो उस समय आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक दृष्टि से बड़ी दयनीय स्थिति में था। संयोगवश यही प्रदेश सबसे पहले अंग्रेजों के सीधे संपर्क में आया। इस प्रकार अज्ञान आडंबर और रूढ़िवादिता तथा पश्चिम के आधुनिक विचारों के बीच शीघ्र ही अंतरक्रिया (interaction) शुरू हो गई। राजा राममोहन राय इस अंतरक्रिया के प्रतीक थे। उन्होंने हिंदू धर्म के महत्वपूर्ण ग्रंथों, सामाजिक परंपराओं और तत्कालिक सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति का अध्ययन किया और राष्ट्रीय पतन के मूल कारणों को जानने की कोशिश की। उन्हें अपने देश और देशवासियों से अपार प्रेम था, अतः जिंदगीभर वे उनके सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक पुनरूद्धार के लिए प्रयत्नशील रहे। एक तरफ तो उन्होंने अपने धर्म एवं समाज की बुराइयों को खोज निकाला, तो दूसरी ओर विश्व के अन्य धर्मों और आधुनिक पाश्चात्य ज्ञान एवं विचारों के महत्व को भी समझा। उन्हें पूर्व की परंपरागत दार्शनिक पद्धति और हिंदू धर्म के मौलिक सिद्धांतों में श्रद्धा थी। लेकिन अब वे इस तथ्य से भी उतना ही आश्वस्त थे कि उस समय के भारतीय समाज को केवल पश्चिमी संस्कृति ही पुनर्जीवित कर सकती है। वे चाहते थे कि अपने पुनरूद्धार के लिए उनके देशवासी पश्चिम के युक्तिसंगत वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानव गरिमा तथा सामाजिक एकता के सिद्धांत को स्वीकार करें। इस प्रकार उन्होंने पश्चिम के आधुनिक ज्ञान, विचार और दृष्टिकोण का समर्थन किया और उन्हें जानने के लिए अंग्रेजी शिक्षा की जबर्दस्त वकालत की।

1814 में राममोहन कलकत्ता में रहने लगे, जहाँ अपने युवा समर्थकों के सहयोग से उन्होंने ‘आत्मीय सभा की स्थापना की। तदुपरांत वे आजीवन धर्म और समाज की बुराइयों को देर करने में लगे रहे। अपने विशद ज्ञान और वैज्ञानिक एवं प्रगतिशील दृष्टिकोण की पृष्ठभूमि में राममोहन ने हिंदू धर्म में उत्पन्न कुरीतियों एवं आडंबरों पर गंभीर प्रहार किया। उन्होंने मूर्तिपूजा की आलोचना की और सप्रमाण यह विचार व्यक्त किया कि हिंदुओं के सभी प्राचीन मौलिक धर्मग्रंथों ने एक ब्रह्म का उपदेश दिया है। इस दावे के समर्थन में उन्होंने वेदों और पाँच मुख्य उपनिषदों का बगला भाषा में अनुवाद प्रकाशित किया। उन्होंने निरर्थक धार्मिक अनुष्ठानों का विरोध किया और पंडित-पुरोहितों पर तीखा प्रहार किया, क्योंकि वे इन्हीं को इन आडंबरों के लिए जिम्मेदार मानते थे।

राममोहन का प्राचीन ग्रंथों एवं दर्शन में विश्वास था, परंतु अंतिम रूप से वे मानव विवेक और तर्क-शक्ति पर ही निर्भर करते थे। उनके अनुसार किसी भी सिद्धांत-पाश्चात्य या प्राच्य-की सत्यता की अंतिम कसौटी मानव-विवेक ही है। उनका विश्वास था कि वेदांत दर्शन भी इसी तर्कशक्ति पर आधारित है। उनके अनुसार यदि कोई भी दर्शन, परंपरा आदि तर्क पर खरे न उतरे और वे समाज के लिए उपयोगी न हों तो मनुष्य को उन्हें त्यागने से नहीं हिचकना चाहिए। मानव विवेक को उन्होंने न केवल हिंदू धर्म के संदर्भ में लागू किया, बल्कि उसके सहारे उन्होंने संसार के अन्य धर्मों की भी परीक्षा की। ईसाई धर्म के अंधविश्वासों की भी उन्होंने आलोचना की तथा ईश्वर के देवत्व (divinity) को भी मानने से इनकार कर दिया। इससे उनके कई ईसाई मित्रों को बड़ी निराशा हुई, क्योंकि हिंदू धर्म के प्रति राममोहन के आलोचनात्मक दृष्टिकोण को देखते हुए उन लोगों ने उम्मीद की थी कि अंततः वे ईसाई धर्म को स्वीकार कर लेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ। ऐसा ही भ्रम कुछ मुसलमानों को हुआ था। फिर भी सभी धर्मों की, विशेषकर ईसाई धर्म की अच्छाइयों में उनकी आस्था हमेशा बनी रही। 1820 में उन्होंने प्रीसेप्ट्स ऑफ जीसस नामक पुस्तक प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने न्यू टेस्टामेंट के नैतिक एवं दार्शनिक संदेश को उसकी चमत्कारी कहानियों से अलग करने की कोशिश की। वे ईसा के नैतिक संदेशों के प्रशंसक थे और चाहते थे कि उन्हें हिंदू धर्म में समाहित कर लिया जाए। इसको लेकर उनके बारे में हिंदू और ईसाइयों दोनों में भ्रम फैला और उनकी आलोचना भी हुई। राममोहन संसार के सभी धर्मों की मौलिक एकता को स्वीकार करते थे। उनकी इच्छा थी कि ईसाई और इस्लाम धर्म की अच्छाइयों को हिंदू धर्म में सम्मिलित कर तथा पश्चिम एवं पूरब की संस्कृतियों की श्रेष्ठ तत्वों को मिलाकर एक उत्तम एवं महान संश्लेषण प्रस्तुत किया जाए। उन्होंने कहा कि संसार के सभी धर्मों का मौलिक उद्देश्य एक ही है और सभी धर्मावलंबी भाई-भाई हैं।

फिर भी राममोहन को अपना धर्म और अपनी परंपराएँ प्रिय थी; अतः एक तरफ जहाँ उन्होंने उनकी आलोचना की, दूसरी ओर उन्हें ईसाइयों के प्रचारवादी प्रहार से बचाया भी। मगर उनका सबसे बड़ा काम था खुद हिंदू धर्म और समाज में सुधार करना, जिसके लिए उन्होंने अपनी धारणा के अनुरूप पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान और बुद्धिवाद के उपयोग की जोरदार पेशकश की। परंतु उस समय का रूढ़िवादी समाज उनकी बातों को मानने को तैयार नहीं था। रूढ़िवादिता ने उनके विचारों का डटकर विरोध किया और उनका सामाजिक बहिष्कार तक किया।

लेकिन राममोहन ने एक महान सुधारक का अदम्य उत्साह और शक्ति थीं वे बाधाओं से डरे नहीं। 1829 में उन्होंने ‘ब्रह्म सभा’ के नाम से एक नए समाज की स्थापना की जिसे आगे चलकर ब्रह्म समाज’ के नाम से जाना गया। इस सभा का उद्देश्य था राममोहन की मान्यताओं के अनुरूप हिंदू धर्म में सुधार लाना। इस समाज ने मूर्ति पूजा का विरोध किया और एक ब्रह्म की पूजा का उपदेश दिया। समाज के सिद्धांतों और दृष्टिकोण के मुख्य आधार थे-मानव-विवेक, वेद और उपनिषद। समाज मानव गरिमा को ऊँचा स्थान देता था और सभी धर्मों की अच्छाइयों को अपनाने के पक्ष में था। इसके कार्यक्रम में हिन्दू, मुसलिम और ईसाई तीनों धर्मों के गुणों का समावेश किया गया था। समाज ने सभी विवेकहीन सामाजिक प्रथाओं एवं धार्मिक कर्मकांडों की दो टूक आलोचना की। इसने एकेश्वरवाद का समर्थन किया और कहा कि ‘जीवात्मा अमर है, उसमें उन्नति करने की असीम क्षमता है और वह अपने कार्यों के लिए भगवान के सामने उत्तरदायी है।’ उन्होंने यह भी कहा कि किसी भी बनाई गई वस्तु को ईश्वर समझकर नहीं पूजना चाहिए और न किसी पुस्तक या पुरूष को निर्वाण अथवा मोक्ष का एकमात्र साधन मानना चाहिए।

राममोहन के चिंतन एवं गतिविधि का क्षेत्र केवल धर्म ही नहीं था। भारत के राष्ट्रीय जीवन के अन्य क्षेत्रों पर भी उन्होंने गहरी छाप छोड़ी। जिस तरह से उन्होंने हिंदू धर्म को सुधारने का काम किया, उसी तरह उन्होंने सामाजिक क्षेत्र में भी सुधारों की नींव रखी। वस्तुतः धार्मिक एवं सामाजिक सुधार एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। भारतीय समाज की बहुत सारी कुरीतियों को धार्मिक मान्यता प्राप्त थी। उदाहरण के लिए हम जाति प्रथा, सती और विधवा प्रथा को ले सकते हैं। राममोहन ने उस समय की बहुत सारी कुरीतियों का विरोध किया। उन्होंने सती प्रथा के विरूद्ध ऐतिहासिक आंदोलन आयोजित किया। इस प्रथा को बंद करने के लिए उन्होंने प्राचीन धार्मिक ग्रंथों के हवाले से यह साबित करने की कोशिश की कि मौलिक हिंदू धर्म इस प्रथा के खिलाफ था। उन्होंने यह भी कहा कि मानव विवेक और करूणा ऐसी किसी भी प्रथा का समर्थन नहीं कर सकती थी। इस प्रथा को समाप्त करने के लिए उन्होंने अंग्रेजी सरकार की भी सहायता ली।

वे स्त्रियों के अधिकार के भी समर्थक थे। उन्होंने बहुविवाह का विरोध किया और औरतों को आर्थिक अधिकार देने का समर्थन किया। उनके सामाजिक सुधारों का अध्ययन हम आगे करेंगे।

राममोहन आधुनिक शिक्षा के प्रारंभिक समर्थक एवं प्रचारकों में से थे उनके विचार से भारत में आधुनिक विचारों के प्रसार के लिए आधुनिक शिक्षा आवश्यक थी। इसीलिए उन्होंने अंग्रेजी शिक्षा का भरपूर समर्थन किया। उन्होंने कलकत्ता में डेविड हेयर के सहयोग से हिंदू कॉलेज की स्थापना कराई, जो अपने आप में एक बड़ी घटना थी। 1817 से वे कलकत्ता में एक इंगलिश स्कूल को अपने खर्च से चलाते रहे। इसमें अन्य विषयों के अलावा मैकेनिक्स और वॉल्टेयर का दर्शन जैसे विषय पढ़ाये जाते थे। 1825 में उन्होंने वेदांत कॉलेज की स्थापना की जिसमें भारत विद्या के अलावा सामाजिक एवं भौतिक विज्ञानों की भी पढ़ाई होती थी।

बंगला भाषा के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। उन्होंने स्वयं एक बंगला व्याकरण का संकलन किया। उनके लेखन से बंगाल में एक सुंदर गद्यशैली का जन्म हुआ। राममोहन भारतीय पत्रकारिता के भी अग्रदूत थे। उन्होंने स्वयं बंगाली पत्रिका ‘संवाद कौमुदी’ का प्रकाशन किया। 1833 में उन्होंने समाचार-पत्रों के नियमन के विरूद्ध प्रबल आंदोलन किया। 1835 में समाचार-पत्रों को जो कुछ स्वतंत्रता मिली, वह राममोहन द्वारा चलाए गए आंदोलन का परिणाम थी।

राममोहन ने राजनीतिक क्षेत्र में भी कुछ काम किया। वे उदारवादी विचारों के पोषक थे। अतः उन्होंने आमूल परिवर्तन की जगह भारतीय प्रशासन में सुधार के लिए आंदोलन किया। ब्रिटिश संसद द्वारा भारतीय मामलों पर परामर्श किए जाने वाले वे प्रथम भारतीय थे। उन्होंने अपने देशवासियों में राजनीतिक जागरण पैदा करने का भी प्रयास किया। राजनीतिक मुद्दों पर जनांदोलन की शुरूआत उन्होंने ही की। बंगाली जमीदारों द्वारा कृषकों के शोषण की उन्होंने आलोचना की। उन्होंने वरिष्ठ सेवाओं के भारतीयकरण कार्यपालिका को न्यायपालिका से अलग करने, जूरी द्वारा न्याय और भारतीयों एवं यूरोपियनों के बीच न्यायिक समानता की भी मांग की।

वे अंतर्राष्ट्रीयता और विभिन्न राष्ट्रों के बीच सहयोग के समर्थक थे। राममोहन राय ने अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं में गहरी दिलचस्पी ली और जगह-जगह उन्होंने स्वतंत्रता जनतंत्र और राष्ट्रीयता के आंदोलन का समर्थन तथा हर प्रकार के अन्याय, उत्पीड़न और जुल्म का विरोध किया। कहा जाता है कि 1821 में नेपुल्स में क्रांति की विफलता की खबर से वे बहुत दुःखी हुए थे। पर 1823 में जब स्पेनिश अमरीका में क्रांति सफल हुई तो इस खुशी को उन्होंने एक सार्वजनिक भोज देकर मनाया।

राममोहन का दृष्टिकोण उदार, व्यापक एवं अपेक्षाकृत आधुनिक था। उनके विचारों एवं व्यत्तित्व की स्पष्ट छाप उनके सुधारों पर पड़ी। लेकिन इसी बीच 1833 में इंग्लैंड में उनकी अकाल मृत्यु हो गई। इसका उनके ब्रह्म की गतिविधि पर बुरा प्रभाव पड़ा।

राममोहन की मृत्यु के बाद ब्रह्म समाज का संगठन एवं काम ढीला पड़ने लगा। फिर भी वह इस बीच किसी तरह कायम रहा। जब देवेंद्रनाथ टैगोर (1818.1905) इसमें शामिल हुए तो संस्था में एक बार फिर जान आ गई। राममोहन के विचारों के प्रसार के लिए उन्होंने 1839 में ‘तत्वबोधिनी सभा’ की स्थापना की। कालांतर में इसके अंदर राममोहन के सभी प्रमुख अनुयायी और डेरोजियों, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर तथा अक्षय कुमार दत्त सरीखे स्वतंत्र विचारक भी आ गए। तत्वबोधिनी सभा तथा उसके मुख्य अंग तत्वबोधिनी पत्रिका ने बंगला भाषा में भारत के अतीत के सुव्यवस्थित अध्ययन को भरपूर प्रोत्साहन दिया। उन्होंने बंगाल के बुद्धिजीतियों के दृष्टिकोण को विवेकशील बनाने में सहायता की। 1843 में देवेंद्रनाथ टैगोर ने ब्रह्म समाज का नेतृत्व संभाला। इसके बाद उन्होंने इसका पुनः गठन किया और उसे नया जीवन दिया। अपने सिद्धांतों के प्रचार के साथ ही समाज ने विधवा विवाह का समर्थन किया तथा स्त्री-शिक्षा के पक्ष में सक्रिय आंदोलन चलाया। उन्होंने बहुविवाह भी समाप्त करने के लिए प्रयत्न किया। ब्रह्म समाज ने रैयतों की दशा सुधारने के लिए किए गए आंदोलनों का समर्थन किया और आत्मसंयम का उपदेश दिया।

बाद में देवेंद्रनाथ ने केशवचन्द्र सेन (1834-84) को ब्रह्म समाज का आचार्य नियुक्त किया। उनके प्रभाव में समाज ने हिंदु धर्म के सर्वोत्तम विश्वासों एवं नैतिक आचरणों को बनाये रखने की कोशिश की। उनके आचार्यत्व में समाज बहुत लोकप्रिय रहा, तथा बंगाल बाहर इसकी शाखाएं संयुक्त प्रांत, पंजाब और मद्रास में खोली गई। मगर शीघ्र ही केशवचन्द्र के उदारवादी दृष्टिकोण के परिणामस्वरूप ब्रह्म समाज में फूट पड़ गई। केशवचन्द्र कई बातों में हिन्दू धर्म को संकीर्ण मानते थे और संस्कृत के मूल पाठों के प्रयोग को उचित नहीं समझते थे। अब उनकी सभाओं में सभी धर्मों (ईसी, इस्लाम, पारसी तथा चीनी) के धर्मग्रन्थों का पाठ होने लगा। ऐसे ही सवालों पर मतभेद बढ़ता गया और अंत में देवेन्द्रनाथ ने 1865 में केशवचन्द्र से आचार्य की उपाधि छीन ली। फलस्वरूप केशवचन्द्र मौलिक ब्रह्म समाज से अलग हो गये और समाज की एक नई शाखा का संगठन किया जिसे उन्होंने ‘आदि ब्रह्म समाज’ के नाम से पुकारा।

1878 में इस नवीन ब्रह्म समाज में एक बार फिर फूट पड़ी। केशव चन्द्र एवं उनके अन्य सहधर्मी ब्रह्म समाजियों के लिए विवाह की एक न्यूनतम आयु का प्रचार करते थे, लेकिन 1878 में स्वयं केशवचन्द्र ने अपनी 13 वर्षीया पुत्री का विवाह पूरे वैदिक कर्मकांड के साथ कूच बिहार के राजा के साथ कर दिया। इस पर अन्य समाजियों ने कड़ा विरोध प्रकट किया और अंततः केशवचन्द्र के समाज से अलग होकर उन्होंने एक नये ‘साधारण ब्रह्म समाज’ की स्थापना की। इसके बाद केशवचन्द्र का समाज धीरे-धीरे लुप्त हो गया।

ब्रह्म समाज के कमजोर होने के कई कारण थे। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में समाज में लगातार आंतरिक फूट पड़ती रही जिसका इसके संगठन एवं कार्यशक्ति पर बुरा प्रभाव पड़ा। दूसरे इसका प्रभाव मुख्यतः पढ़े-लिखे शहरी लोगों तक ही सीमित था। इसका दार्शनिक पक्ष आम अनपढ़ आदमी की समझ से बाहर था, अतः साधारण जनता इसे नहीं अपना सकी। इसका कार्य क्षेत्र भी मुख्यतः उच्च वर्गों तक ही सीमित रहा। सती प्रथा ऊंची जातियोंमें ही व्याप्त थी और नारी शिक्षा एवं मुक्ति नीची जाति के आम लोगों के लिए कोई अर्थ नहीं रखती थी। तो भी ब्रह्म समाज के महत्व को नजरअंदाज नहीं किया जासकता। भारत, विशेषकर बंगाल के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन पर इसका काफी प्रभाव पड़ा।

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