मुगलकालीन सामाजिक संरचना तथा विभिन्न वर्ग

मुगलकालीन सामाजिक संरचना तथा विभिन्न वर्ग

मुगलकालीन सामाजिक संरचना

देश की आबादी आजकल की आबादी की तरह घनी नहीं थी। सारी जनता एक ही जाति की नहीं थी। यह ठीक है कि हिन्दू बहुसंख्या में थे और वे जातियों में बंटे हुए थे। इनमें जैन, बौद्ध और सिक्ख भी सम्मिलित थे। राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ और वैश्य ऊंची जातियाँ समझी जाती थीं, किन्तु इनमें अन्तर्जातीय भोज और विवाह नहीं होते थे। जाति-बन्धन आजकल के बन्धनों से अधिक कठोर थे। जाति के नियमानुसार राजपूत फौजी आदमी समझे जाते थे। उनकी जाति के नेता प्रदेशों के शासक और शाही फौज में ऊँचे-ऊंचे मनसबदार होते थे। ब्राह्मण पुरोहित अथवा अध्यापक होते थे। कुछ गुजराती नागर ब्राह्मण फारसी पढ़कर अफसर भी बन गये थे। उत्तरकालीन मुगलों के शासनकाल में तो कुछ नागर ब्राह्मण प्रान्तों के राज्यपाल भी हो गये थे। वैश्य व्यापारी जाति थी और कायस्थ अधिकतर क्लर्क, सेक्रेटरी (मुंशी) और लगान अफसर थे। कुछ नीच जाति के हिन्दू विशेषकर बंगाल में तथा दूसरे देश के भागों में मुसलमान बना लिये गये थे और पंजाब तथा काश्मीर के ऊँचे जाति के लोग भी अपने पैतृक धर्म के त्याग के लिए विवश किये गये थे। इस काल में कुछ उपजातियाँ भी पैदा हो गयी थीं जैसे काजी, तोशखानी और आगा काश्मीरी ब्राह्मणों में, मुंशी गुजराती ब्राह्मणों में तथा कानूनगों और रायजादा कायस्थों में। इसी प्रकार तीनों ही उच्च जातियों में बख्शी और मेहता उपजातियों भी बन गयी थीं। यद्यपि हिन्दू समाज जातियों में बँटा हुआ था, किन्तु इनमें परस्पर सहयोग और संगठन बना हुआ था। ये जातियाँ अपनी-अपनी जातियों के लोगों के चरित्रों की देखभाल रखती थी।

मुसलमान स्पष्ट रूप से दो भागों में बँटे हुए थे, अर्थात एक तो वे थे जो अरबी, फारसी और दूसरे देशों से नौकरी अथवा व्यापार के लिए भारत आये थे और दूसरे वे थे जो हिन्दू थे और बाद में मुसलमान बन गये थे या मुगलों के पहले बने हुए मुसलमानों की सन्तान थे।

विदेशी मुसलमानों की अपेक्षा देशी मुसलमानों की संख्या अधिक थी। अरबी और फारसी इत्यादि विदेशों से आने वाले मुसलमान व्यापारी समुद्रतटों पर बस गये ये और वे नौकरी के लिए आये हुए मुसलमान उत्तरी भारत में बस गये थे। इनमें से छः लोग अहमदनगर, बीजापुर और गोलकुण्डा के दरबारों में भी नौकर हो गये थे। मुगल परिवारों में अधिकतर विदेशी मुसलमान ही प्रतिष्ठित-समझे जाते थे और बड़े-बड़े ओहदों पर थे।

अरब, परसियन, तुर्की, मंगोल और उजबेगों के अतिरिक्त देश में हब्शी और आरमीनियम भी रहते थे। ये देशों और विदेशी मुसलमान अपने धार्मिक रीति-भेदों के कारण सुत्री, शिया, बौहरे और खोजों में बँटे हुए थे। मुसलमानों में सुन्नियों की संख्या अधिक थी। प्रायः सुनी, शिया तथा दूसरे सम्प्रदाय के मुसलमानों में झगड़े हुआ करते थे। वंश के अनुसार मुसलमान तुर्क, अफगान, परसियन, सैय्यद और हिन्दुस्तानी मुसलमानों में बँटे हुए थे। हिन्दुस्तानी मुसलमानों में से कुछ ऐसे थे जो अपनी हिन्दू जाति की कुछ समानता अभी तक रखे हुए थे। विदेशी यात्रियों के लिए देश का द्वार खुला हुआ था, अतः यहाँ विदेशियों के बसने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं था। इसलिए देश में पुर्तगाली, अग्रेज, चीनी, तुर्की, यहूदी इत्यादि भिन्न-भिन्न राष्ट्रों के व्यक्ति दिखायी देते थे। पारसी कई शताब्दी पूर्व देश में आकर बस गये थे। अकबर और जहाँगीर के शासनकाल में ये खेती किया करते थे, किन्तु शाहजहाँ के शासनकाल में इन्होंने व्यापार करना आरम्भ कर दिया था। युरोपियन में पुर्तगाली अपना विशेष महत्व रखते थे। इन्होंने गोआ तथा दूसरे पश्चिमी तटों पर अधिकार जमा लिया था। इन्होंने सिन्धु तथा गंगा के मुहानों पर व्यापारिक केन्द्र भी स्थापित कर लिये थे।

मुगलकालीन भारत आज के भारत से बहुत कुछ मिलता-जुलता था। यह ठीक है कि उस समय न तो रेलें थे और न पंजाब तथा उत्तर प्रदेश की आधुनिक नहर-प्रणाली ही। उस समय देश में पक्की सड़के भी नहीं थी। देश के भिन्न-भिन्न भाग तथा मुख्य-मुख्य नगरों में कच्ची सड़कों से ही आना-जाना होता था। इन सड़कों के दोनों ओर छायादार वृक्ष लगे थे और नुक्कड़ों पर सरायें बनी थीं, जिनमें व्यापारी तथा यात्री रात में बे-खटके ठहर सकते थे। आगरा बहुत समय तक भारत की राजधानी रहा था, अतः देश के भिन्न-भिन्न भागों से इसमें आने-जाने का अच्छा प्रबन्ध था। इसके पूरब में ग्राण्ट ट्रंक रोड ढाका तक तथा उत्तर-पश्चिम में काबुल तक जाती थी। यह बड़ी सड़क पटना, इलाहाबाद, बनारस, आगरा, मथुरा, दिल्ली लाहौर तथा अटक होती हुई काबुल जाती थी। एक दूसरी सड़क आगरा से असीरगढ़ तक जाती थी। इस सड़क के किनारे आगरा, धौलपुरा, ग्वालियर, जोधपुर, सिरोही, अजमेर तथा असीरगढ़ थे। एक दूसरी मुख्य सड़क आगरा से अहमदाबाद तक जाती थी। दूसरी मुख्य सड़क लाहौर और मुल्तान से मिली हुई थी। सिन्धु, गंगा, यमुना, घाघरा तथा बंगाल की नदियाँ ऐसी थीं जिनसे यात्रा हो सकती थी, अतः इन नदियों के द्वारा प्रायः व्यापार तथा यात्रा होती थी। मुगलकाल में आजकल की अपेक्षा अधिक जंगल थे। उत्तर के गोरखपुर, गोंडा, लखीमपुर-खीरी तथा बिजनौर जिलों में, बिहार के भागों में तथा मध्य प्रदेश में विशेष घने जंगल थे। जंगली जानवर गंगा के मैदान के कुछ भागों में भी पाये जाते थे। गंगा-यमुना के दक्षिणी जंगलों में हाथी पाये जाते थे और सिंह तथा चीतों का शिकार मालवा के अनेक भागों में किया जाता था। इनके अतिरिक्त आज के भारत में तथा मुगलकालीन भारत में कोई विशेष भिन्नता नहीं थी। देहातों में बहुत अधिक गाँव थे, जो पास-पास घने बसे हुए थे। कलकत्ता, बम्बई, मद्रास, कानपुर इत्यादि आजकल के नये-नये नगर मुगल काल में नहीं थे। कन्नौज, विजयनगर, इत्यादि पुरानी राजधानियों की इमारतें खण्डहर हो गयी थीं। उस समय सबसे समृद्ध नगर फतेहपुरसीकरी, आगरा, दिल्ली, इलाहाबाद, बनारस, मुल्तान, लाहौर, उज्जैन, अहमदाबाद, अजमेर, पटना, राजमहल और ढाका थे। ये सब घने बसे हुए थे और अत्यन्त समृद्ध थे। वैसे तो बड़े-बड़े बाग देश के सभी भागों में पाये जाते थे, किन्तु बड़े-बड़े नगरों के आसपास ये विशेष रूप से दिखायी देते थे। केवल देहात ही नहीं, अपितु नगर भी दूर से बड़े सुहावने लगते थे।

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