मुगल काल में फारसी साहित्य का विकास

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फारसी साहित्य के विकास में मुगल शासकों का योगदान

मुगलकालीन साहित्य

मुगल-युग सभी क्षेत्रों में उन्नति और अन्वेषण का युग था। सभी मुगल शासक न केवल विद्वानों के आश्रयदातां थे अपितु विद्या और कला के भी प्रेमी थे। उन्होंने अपने शासन के अन्तर्गत कई विद्वानों को दरबार में आश्रय प्रदान किया। फलतः विभिन्न भाषाओं के साहित्य में प्रगति हुई जिसमें से फारसी साहित्य विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं-

फारसी साहित्य

मुगल काल में फारसी साहित्य की बहुत उन्नति हुई। तैमूर के वंशज सभी शासक विद्वान थे और विद्या का प्रचार करते थे। बाबर तुर्की और फारसी का जन्मजात कवि तथा उच्चकोटि का लेखक था। वह साहित्य का बड़ा प्रेमी था। हुमायूँ भी साहित्य का बड़ा प्रेमी था। इन सम्राटों के दरबारों में बड़े-बड़े विद्वान थे और उन्होंने अपने अपने सम्राटों के संरक्षण में उच्चकोटि के साहित्य का निर्माण किया था। मध्यकालीन भारत के इतिहास में अकबर का शासनकाल सभ्यता एवं संस्कृति का पुनरुत्थान काल था। अकबर धर्मसाहिष्णु उदार और विद्याप्रेमी था तथा उसने देश में आन्तरिक शान्ति रखकर समृद्धि के बढ़ाने का सदा प्रयत्न किया था, जिससे उसके शासनकाल में साहित्य और कला का पूर्ण विकास हुआ था, अतः यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अकबर के शासनकाल में ही उच्चकोटि के विद्वानों द्वारा उच्चकोटि के मौलिक साहित्य का निर्माण हो सका। फारसी में दो प्रकार के साहित्य का निर्माण हुआ। इसमें कुछ तो मौलिक रचनाएँ थी और कुछ अनुवाद थे। मौलिक रचनाओं में पत्र तथा काव्यों का महत्वपूर्ण स्थान था। उस समय ऐसी रीति थी कि साहित्यकार अपने पीछे अपने पत्र छोड़ जाते थे, जो साहित्यिक शैली के नमूने समझे जाते थे। अबुल फजल तथा दूसरे लेखकों के पत्रों को देखने से अकबर के समय की फारसी शैली का ज्ञान होता है। मध्यकाल में कविता साहित्यिक भावों के प्रदर्शन का सर्वप्रिय साधन थी और देशों तथा विदेशी मुसलमान विद्वान इसके बहुत प्रेमी थे। अकबर के दरबार में बहुत अधिक कवि थे। अबुल फजल की रचनाओं के देखने से ज्ञात होता है कि इन कवियों ने अपने अलग-अलग दीवान लिखे थे, जिनमें उनकी विविध प्रकार की श्रेष्ठ कविताओं का संग्रह रहता था। आइने अकबरी में फारसी के उन 59 सर्वश्रेष्ठ कवियों के नाम दिये हुए है जो अकबर के दरबार में रहते थे। इनके अतिरिक्त 15 कवि और थे, जो मौलिक रचनाएं किया करते थे और फारस से अपनी कविताएँ अकबर के दरबार में भेजा करते थे। अबुल फैजी अकबर का राजकवि था जो अमीर खुसरो के बाद फारसी का सबसे बड़ा कवि माना जाता था। फैजी तथा दूसरे कवियों की फारसी कविताओं की उत्तमता के विषय में आलोचकों के भिन्न-भिन्न मत हैं। वी0ए0 स्मिथ का मत है कि ये कवि केवल तुकबन्दी करने वाले कवि थे, किन्तु भारतीय विद्वान उस युग के साहित्य का अच्छा मान करते हैं। चाहे कोई स्मिथ के मत के बिलकुल विरूद्ध हो, किन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं कि उस समय फारसी में कविता करने वाले कवि भाषा के सजाने पर अधिक जोर देते थे, भावों पर बहुत कम ध्यान देते थे तथा उनका विषय प्रायः प्रेम होता था।

बहुत-से लेखकों ने कुरान पर भाष्य लिखे हैं। इस काल के इतिहास के उल्लेखनीय ग्रन्थ अबुल फजल का अकबरनामा और आइने अकबरी निजामुद्दीन अहमद का तबकाते अकबरी, गुलबदन बेगम का हुमायूँनामा और जौहर का तजकिरातुल वाकयात है। अब्बास सरवानी ने तौफा-ए-अकबरबादशाही अर्थात तारीखें शेरशाह लिखा था। अकबर ने नकीबखाँ, थट्टा के मुल्ला मुहम्मद और जाफरवेग की इस्लाम धर्म के 1,000 वर्ष के इतिहास को लिखने की आज्ञा दी थी और यह ग्रन्थ अबुल फजल की भूमिका के साथ तारीखे अलफी नाम से ठीक समय पर प्रकाशित हो गया था। इस समय के इतिहास के कुछ और ग्रन्थ भी लिखे गये जिनमें अबुल कादिर बदायूनी का मुन्तखब-उल-तवारीख, अहमद यादगार का तारीखे सलातीने अफगाना, बयाजीद, सुल्तान का तारीखे हुमायूँ नूरूलहक का जुब्दतुल तवारीख असदबेग का वाकयात और शेख इलाहाबाद फैजी सरहिन्द का अकबरनामा इत्यादि प्रसिद्ध है।

अकबर ने संस्कृत, अरबी, तुर्की और यूनानी भाषा के अनेक ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद कराया, जिससे देश के विद्वानों को सर्वमान्य साहित्य प्राप्त हो सके। खगोल-विद्या के प्रसिद्ध ग्रन्थ ताजक और तुजके बाबरी को आत्मकथाओं का जिच जदीदे मिरा0 का, तथा हिन्दी संस्कृत के रामायण, महाभारत, अर्थर्ववेद, राजतरंगिनी, हरवंशपुराण, पंचतन्त्र इत्यादि अनेक उत्तम ग्रन्थों का फारसी में अनुवाद कराया गया।

अकबर के उत्तराधिकारियों के शासनकाल में भी फारसी साहित्य की खूब उन्नति हुई। जहाँगीर स्वयं विद्वान और आलोचक था। उसने अपने दादा के समान तुजुके जहाँगीरी नाम की आत्मकथा लिखी जिसमें उसने अपने शासन के 17वें वर्ष तक का हाल लिखा था। बाद में उसकी आज्ञा से मौतमिदखाँ ने उसका यह काम जारी रखा और बादशाह के 19वें वर्ष तक का हाल उसमें लिखा। इसमें जहाँगीर की दिनचार्य सच्चाई और सफाई के साथ लिखी गयी है। केवल जहाँगीर का अपने पिता के प्रति विद्रोह, वे परिस्थितियाँ जिनमें उसने नूरजहाँ के साथ विवाह किया और शाहजादा खुसरों की मृत्यु इत्यादि कुछ बातों को वर्णन ईमानदारी के साथ नहीं किया है। सम्राट उच्चकोटि के साहित्य का निर्माण करने वाले कवियों को अच्छा पुरस्कार देता था। निशापुर का नासीर जहाँगीर के दरबार में फारसी का सबसे योग्य कवि थे तथा इस काल में कुरान पर भाष्य लिखे गये और कविता की बहुत अधिक रचना हुई। किन्तु अनुवाद का काम रूक गया। शाहजहाँ भी अपने पति तथा दादा के समान विद्वानों और कवियों को पुरस्कार देता रहा। उसके दरबारी कवियों में अबु जालेह उपनाम कलीम हाजी मुहम्मद जान तथा चन्द्रभान ब्राह्मण मुख्य थे। उसके शासनकाल में ऐतिहासिक साहित्य का अच्छा निर्माण हुआ। सम्राट का सबसे बड़ा लडका दाराशिकोह उच्चकोटि का विद्वान था। यह अरबी, फारसी और संस्कृत का अच्छा विद्वान था और उसने सूफी दर्शन पर अनेक ग्रन्थ और मुसलमान सन्तों की जीवनियाँ लिखी। उसने अनेक उपनिषद भगवदगीता और योग-वाशिष्ठ का अनुवाद भी किया। उसका सबसे अच्छा मौलिक ग्रन्थ मज्मुल-बहरीन अथवा दो सागरों का सम्मिश्रण है। इसमें उसने दर्शाया है कि हिन्दू धर्म और इस्लाम एक ही लक्ष्य के दो मार्ग हैं और दोनों एक-दूसरें में सरलता से मिल सकते है। औरंगजेब ने मुस्लिम दर्शन और मुस्लिम धर्मशास्त्र का सूक्ष्म अध्ययन किया था, किन्तु उसे कविता से प्रेम नहीं था और वह अपने शासनकाल का इतिहास लिखने का भी विरोधी था। तो भी उसके समय में अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे गये, यद्यपि इन पर कोई पुरस्कार नहीं मिला। औरंगजेब के शासनकाल में सम्राट की आज्ञा से मुस्लिम कानून का केवल एक वृहद ग्रन्थ लिखा गया, जिसका नाम फतवा-ए-आलमगीरी था। यह कानून की पुस्तक थी और उलेमाओं की विद्वत्मण्डली ने इसे बड़े परिश्रम से तैयार किया था। औरंगजेब के बाद

मुहम्मदशाह (1713-48 ई०) तक तो फारसी जो राज्याश्रय प्राप्त होता रहा, किन्तु मुहम्मदशाह के बाद जो सम्राट हुए, वे फारसी बोलने और समझने में स्वयं अयोग्य थे अतः वे फारसी से उर्दू पर आ गये और उर्दू ने फारसी का स्थान लेना आरम्भ कर दिया। तो भी अठारहवीं शताब्दी में हिन्दू तथा मुसलमान दोनों ने फारसी में अनेक पुस्तकें लिखीं। इसमें से कुछ सूफी सम्प्रदाय पर थी और कुछ इतिहास की पुस्तकें थी, किन्तु इनका साहित्यिक महत्व बहुत कम था। फारसी में ऐतिहासिक पुस्तकें लिखी जाती रही। पहले तो इनके लेखकों को स्थानीय शासकों के राजवंशों से सहायता मिलती रही और फिर अंग्रेजी राज्यपाल और अफसरों से। इस काल में जो मुख्य-मुख्य ग्रन लिखे गये उनके नाम ये हैं-‘सियरूल मुतखारीन’ लेखक गुलाम हुसैन, ‘तवारीखे मुजफ्फरी’ लेखक मुहम्मदअली अन्सारी, ‘तवारीख चद्दार गुलजारे शुजाई’ लेखक हरिचरनदास, ‘इमादुस-सआदत’ लेखक गुलामी अली नकवी, ‘मदन-उस-सआदत’ लेखक मुलतानअली सफवी, ‘इबप्तनामा’ लेखक खैरूद्दीन, हदीकुल अकालीम’ लेखक मुर्तजाहुसैन विलग्रामी। शाहआलम द्वितीय तक दिल्ली के दरबार में इतिहास की असंख्य पुस्तकें लिखी जाती रही।

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